ट्रेन धीरे-धीरे प्लेटफॉर्म पर आकर रुक रही थी। रात के नौ बज चुके थे और शहर की चकाचौंध भरी रोशनियाँ अनाया की आँखों में चुभ रही थीं। डरी-सहमी सी अनाया, कंधे पर अपना बैग सँभालते हुए, भीड़ के साथ ट्रेन से नीचे उतर गई।
नया शहर…
नए लोग…
नया नाम…
और सबसे ज़रूरी बात — यहाँ कोई उसे पहचानता नहीं था।
अनाया ने एक गहरी साँस ली और आगे बढ़ गई।
अनाया एक मिडिल क्लास परिवार की सीधी-सादी लड़की थी। छोटे से शहर से ग्रेजुएशन पूरा करने के बाद वह नौकरी की तलाश में मुंबई जैसे बड़े शहर आई थी। लेकिन उसे क्या पता था कि ज़िंदगी उसे कहाँ ले जाने वाली है…?
मुंबई में उसे एक पीजी में कमरा मिल गया, मगर नौकरी की तलाश आसान नहीं थी। उसने कई जगह आवेदन किया, लेकिन छोटे शहर और साधारण परिवार की वजह से कोई भी उसे नौकरी देने को तैयार नहीं था।
अचानक एक दिन अनाया के पास एक कॉल आया।
“हैलो, कौन?” अनाया ने पूछा।
उधर से एक आदमी की आवाज़ आई,
“हैलो मैम, मेरा नाम अनिकेत त्रिपाठी है। हमने आपका रिज़्यूमे देखा है और हमारे बॉस को आपकी प्रोफ़ाइल पसंद आई है। अगर आप चाहें तो कल इंटरव्यू के लिए आ सकती हैं।”
इतने दिनों की निराशा के बाद यह कॉल किसी उम्मीद की तरह थी। अनाया के चेहरे पर पहली बार हल्की-सी मुस्कान आई और उसने तुरंत हाँ कर दी।
अगले दिन अनाया तय समय पर ऑफिस पहुँची। ऑफिस छोटा-सा था, लेकिन माहौल काफ़ी प्रोफेशनल लगा। इंटरव्यू अच्छा गया और शाम तक उसे जॉब ऑफ़र मिल गया। अनाया की आँखों में ख़ुशी के आँसू थे। उसे लगा जैसे ज़िंदगी ने आख़िरकार उस पर थोड़ा रहम किया हो।
यहीं उसकी मुलाक़ात रोहित से हुई।
रोहित स्मार्ट, अच्छी नौकरी और माता-पिता का इकलौता बेटा था। उसका व्यवहार और नेचर अच्छा था, लेकिन वह थोड़ा ज़्यादा अधिकार जताने वाला लड़का था। अपने गुस्से और भावनाओं पर उसका कोई नियंत्रण नहीं था। उसकी सोच थी कि जो चीज़ उसके पास है, वह सिर्फ़ उसी की होनी चाहिए — चाहे वह सामान हो या इंसान। अपनी मीठी बातों से वह किसी को भी इंप्रेस कर सकता था। रोहित उसी ऑफिस में सीनियर पोज़िशन पर था।
धीरे-धीरे रोहित और अनाया की दोस्ती हो गई। शुरू-शुरू में रोहित का व्यवहार अनाया के लिए बहुत सपोर्टिव था। वह उसकी हर छोटी-बड़ी बात का ख़याल रखता, मुंबई जैसे बड़े शहर में उसे एडजस्ट करने में मदद करता। ऑफिस के बाद दोनों मिलने लगे, घंटों साथ समय बिताते और देर रात तक बातें करते।
देखते-देखते दोस्ती प्यार में बदल गई। अनाया को पहली बार लगा कि उसे कोई समझने वाला मिल गया है।
कुछ महीनों बाद, प्यार के साथ-साथ रोहित का असली चेहरा भी सामने आने लगा। वह हर बात पर अनाया से सवाल करने लगा, उस पर शक करने लगा।
“किससे बात कर रही थी?”
“इतनी देर क्यों हो गई?”
“उस लड़के से दूर रहो, मुझे तुम्हारा किसी से बात करना पसंद नहीं।”
शुरू में अनाया को लगा कि यह सब उसकी केयर है।
“रोहित मुझसे बहुत प्यार करता है, इसलिए ऐसा कर रहा है,”
वह खुद को समझाती रही।
लेकिन बहुत जल्दी यह केयर, कंट्रोल में बदल गई। रोहित चाहता था कि अनाया सिर्फ़ उसकी दुनिया बनकर रहे। वह न किसी और लड़के से मिले, न बात करे। यहाँ तक कि वह उसे ऑफिस के कलीग्स से बात करने से भी रोकता था। अनाया का हँसना, बोलना, बाहर जाना, दोस्त बनाना — हर चीज़ पर रोहित की इजाज़त ज़रूरी हो गई थी। मानो वह उसकी पूरी ज़िंदगी कंट्रोल कर रहा हो।
एक बार जब अनाया ने ऑफिस पार्टी में जाने की बात की, तो रोहित का गुस्सा फूट पड़ा।
उसने कहा,
“अगर जाना है तो मेरे साथ चलो, अकेले नहीं।”
अनाया चुप रह गई। उसे डर लगने लगा था, लेकिन प्यार के नाम पर वह सब सहती रही।
उधर किस्मत भी अनाया का साथ छोड़ने लगी। रोहित के बदले हुए व्यवहार की वजह से वह परेशान रहने लगी। देर रात तक सोच-सोचकर रोती रहती। टेंशन और अकेलापन इतना बढ़ गया कि ऑफिस के काम में भी उसका मन नहीं लगता था। अधूरे काम और समय पर पूरा न होने की वजह से उसे सैलरी भी समय पर नहीं मिलने लगी।
अनाया का जीवन अब धीरे-धीरे उलझनों में फँसने लगा था। रोहित का व्यवहार अब प्यार से ज्यादा कंट्रोल और शक भरा हो गया था। हर छोटी-छोटी बात पर वह सवाल करता, हर कॉल या मैसेज पर नजर रखता, और अनाया की आज़ादी धीरे-धीरे खत्म होती जा रही थी।
एक शाम, ऑफिस के काम से थकी अनाया घर लौटी। पीजी के कमरे में अकेले बैठकर उसने रोहित की हर बात पर सोचना शुरू किया। दिल कह रहा था कि शायद यही प्यार है, लेकिन दिमाग़ लगातार कह रहा था — “क्या ये सही है? क्या इसे प्यार कहते हैं या सिर्फ़ नियंत्रण?”
उसी रात, अनाया ने अपनी सबसे अच्छी दोस्त मीरा को फोन किया।
“मीरा… मुझे लगता है कि मैं गलत राह पर जा रही हूँ। रोहित मुझसे बहुत प्यार करता है, लेकिन कभी-कभी लगता है कि मैं उसकी दुनिया की सिर्फ़ एक चीज़ हूँ।”
मीरा ने गहरी साँस ली और बोली,
“अनाया, प्यार किसी पर हक़ जमाने का नाम नहीं है। अगर कोई तुम्हें खुश रहने नहीं देता, तुम्हारी आज़ादी छीनता है, तो ये प्यार नहीं, नियंत्रण है। तुम्हें खुद की ज़िंदगी के लिए फैसला लेना होगा।”
अगले हफ्ते, ऑफिस में रोहित का व्यवहार और बढ़ गया। वह अब सिर्फ़ शक करने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अनाया के हर कदम पर नियंत्रण करना शुरू कर दिया।
एक दिन, अनाया को ऑफिस के एक सीनियर ने कॉल किया,
“अनाया, क्या तुम अगले महीने हमारे प्रोजेक्ट के लिए नई टीम के साथ ट्रैवल कर सकोगी?”
अनाया का दिल धक-धक करने लगा। अगर उसने हाँ कहा, तो रोहित फिर गुस्सा करेगा, लेकिन अगर उसने मना किया, तो कैरियर का मौका हाथ से निकल जाएगा।
यहीं से अनाया के जीवन का नया मोड़ शुरू हुआ। अब उसे प्यार और अपने सपनों के बीच चुनाव करना था।
अनाया अगले कुछ दिनों से बहुत सोच में डूबी रही। वह जानती थी कि अगर उसने ऑफिस के नए प्रोजेक्ट के लिए हाँ कर दी, तो रोहित का गुस्सा फिर उफान पर होगा। लेकिन अगर उसने मना कर दिया, तो उसके करियर का एक बड़ा अवसर हाथ से निकल जाएगा।
आख़िरकार, उसने साहस जुटाया और खुद से कहा,
“मुझे अपने सपनों का पीछा करना है। अगर कोई मेरे प्यार को ऐसे नियंत्रित करने की कोशिश करेगा, तो वह मेरा प्यार नहीं बल्कि उसका डर है।”
अगले दिन, अनाया ने ट्रैवल के लिए हाँ कर दी। रोहित ने यह सुना तो उसका चेहरा काला पड़ गया। उसने गुस्से में फोन काट दिया और अनाया को केवल यह कहा,
“अगर तुम जाओगी, तो तुम्हारे साथ मैं भी आऊँगा। लेकिन याद रखना, तुम्हें मेरी इजाज़त के बिना किसी से बात नहीं करनी।”
अनाया का दिल टूट गया। वह समझ गई कि रोहित का प्यार अब उसकी खुशियों पर कब्ज़ा जमाने जैसा बन गया है। लेकिन इस बार उसने खुद को रोक लिया। उसने ठान लिया कि अब वह अपनी ज़िंदगी खुद जिएगी, चाहे इसके लिए उसे किसी से लड़ना पड़े।
ट्रैवल का दिन आया। अनाया नई टीम के साथ ट्रेन में बैठी थी। बाहर की हवा, नए लोग, और नई उम्मीदें उसे जगा रही थीं। अचानक उसके फोन पर रोहित का मैसेज आया:
“अगर तुम मेरी बात नहीं मानोगी, तो यह तुम्हारे लिए आख़िरी मौका है।”
अनाया ने गहरी साँस ली। उसने फोन बंद किया और खुद से कहा,
“अब मैं डरने वाली नहीं हूँ। अब मैं अपने लिए जियूँगी।”
यहीं से अनाया का नया सफर शुरू हुआ — एक ऐसी ज़िंदगी जिसमें वह खुद का फैसला करेगी, अपने सपनों को चुनेगी और किसी के डर में नहीं जी पाएगी।