pratighat:Delhi ki wah sham in Hindi Drama by Abantika books and stories PDF | प्रतिघात: दिल्ली की वो शाम

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प्रतिघात: दिल्ली की वो शाम

"प्रतिघात: दिल्ली की वो शाम"

​"सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ने के लिए क्या प्यार की बलि देना ज़रूरी है?"

​पर समय का पहिया घूमता है और हिसाब बराबर करने के लिए वापस आता है।



"नागेंद्र के लिए यह किसी सपने से कम न था। वर्षों बाद सुलोचना का यूँ अचानक सामने आ जाना उसकी कल्पना से परे था। वह दौर याद आया जब इंटरव्यू में मिलती असफलताओं ने उसे तोड़ दिया था और एक सुरक्षित भविष्य की खातिर उसने सुलोचना को बिना बताए छोड़कर अपर्णा से विवाह कर लिया था। आज दिल्ली की इस भीड़ में, दस साल बाद सुलोचना का साक्षात् चेहरा देखकर नागेंद्र अवाक रह गया।"
नागेन्द्र की  मुख से अस्पष्ट ही निकला सुलोचना!!!!""



​"किसी तीव्र आवेग में आकर नागेंद्र ने भीड़ के पार देखा, जैसे उसने दुनिया का आठवां अजूबा देख लिया हो। अब उस महिला का चेहरा पूरी तरह नागेंद्र की ओर था। नागेंद्र के मुँह से अनायास ही एक शब्द निकला— 'सुलोचना!!!'"

​"नागेंद्र ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि आज, इतने सालों बाद, अचानक सुलोचना से उसकी मुलाकात होगी।

लगातार नौकरी के इंटरव्यू में विफल होने के बाद, केवल एक पद और सुरक्षित भविष्य के लालच में उसने अपर्णा से शादी कर ली थी। वह सुलोचना को बिना बताए, उसे बीच राह में छोड़कर दूर चला गया था।"

​"पर आज... दिल्ली की इस भीड़ में, दस साल बाद! क्या सुलोचना से यह मिलना महज़ एक संयोग था? नागेंद्र ने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि वक्त उसे फिर से वहीं लाकर खड़ा कर देगा, जहाँ से वह भागा था।"
"दिल्ली के सरोजिनी नगर मार्केट में बच्चों के कपड़ों की एक दुकान पर अपने सात साल के बेटे, सोनू के लिए ड्रेस चुनते-चुनते अचानक नागेंद्र के हाथ रुक गए।

​उसने चोरी-छिपे और फिर थोड़ा और गौर से पीछे मुड़कर देखा। सामने वाली दुकान पर एक महिला कपड़े देख रही थी। 

नागेंद्र को केवल उसकी पीठ दिखाई दे रही थी, फिर भी पीछे से वह उसे कुछ जानी-पहचानी सी लगी।

​नागेंद्र ने सोचा, शायद दफ्तर की कोई सहकर्मी या किसी दोस्त की पत्नी होगी। उसने अपना ध्यान वहां से हटाया और फिर से भीड़ के बीच कपड़े देखने लगा।""नागेंद्र जितनी भी कोशिश करता, उसकी नज़रें बार-बार उस महिला की ओर ही खिंची चली जा रही थीं।

उसने देखा कि वह महिला पूरी एकाग्रता से कपड़े छाँटकर अलग रख रही थी। कत्थई रंग के बॉर्डर वाली सुंदर कांचीपुरम साड़ी में लिपटी वह महिला, यकीनन अपने बच्चे के लिए ही कपड़े खरीदने आई होगी।"


​" 'ओह! मैं अपना काम छोड़ उसे क्यों देख रहा हूँ?' नागेंद्र ने मन ही मन सोचा। 

आज अगर अपर्णा साथ होती, तो अब तक यकीनन छोटा-मोटा महाभारत शुरू हो चुका होता।

नागेंद्र लाख कोशिशों के बावजूद खुद को उस महिला की ओर देखने से रोक नहीं पा रहा था।"अचानक उस महिला ने अपनी लंबी और घनी चोटी झटकी और सीधी खड़ी हो गई। जब वह दूसरी तरफ मुड़कर कपड़े देखने लगी, तो उस लंबी चोटी और उसके सिर हिलाने के अंदाज़ ने एक पल के लिए नागेंद्र को सुदूर अतीत के गलियारों में पीछे खींच लिया।"

​"उसकी आँखों के सामने किसी की गोरी पीठ, वह सुंदर चेहरा और लंबी चोटी में बंधे घने बाल तैरने लगे... उन बालों में सजा चंपा के फूलों का गजरा! आह! पुरानी यादें ताजे गुलाब के कांटों की तरह नागेंद्र के सीने में चुभ गईं। एक लंबी और गहरी सांस लेने के बाद उसने अपनी आँखें खोलीं, जैसे वह खुद को अतीत के उस भंवर से बाहर निकालने की कोशिश कर रहा हो।"



"वह महिला अब भी कपड़े चुन रही थी। लगभग 10-12 कपड़े पसंद कर उसने काउंटर पर रखे और अपने पर्स से पैसे निकालकर बिल चुकाने लगी। तभी अचानक उसका फोन बज उठा। भीड़ के बीच उसने पर्स से फोन निकालने के लिए हाथ डाला और शायद किसी को बुलाने के लिए इधर-उधर देखने लगी।"

जारी है......