Teri meri Kahaani - 2 in Hindi Love Stories by smita books and stories PDF | तेरी मेरी कहानी - 2

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तेरी मेरी कहानी - 2

और फिर एक दिन……सिया घर के कामों में व्यस्त थी तभी उसके फोन पर एक ईमेल आया—"Congratulations! You have been shortlisted for the interview"ईमेल पढ़ते ही सिया की आँखों में आँसू आ गए। ये आँसू दर्द के नहीं, बल्कि खुशी, उम्मीद और उत्साह के थे। लेकिन खुशी के साथ डर भी था—"अगर घरवालों को पता चला और उन्होंने जाने नहीं दिया तो?"इंटरव्यू वाले दिन सिया ने साधा सा सूट पहनकर, कांपते कदमों से उस ऊँची चमकती बिल्डिंग के सामने खड़ी हुई, जो कि अर्शित रॉय की कंपनी थी।सिया डरी-सहमी बिल्डिंग के अंदर गई। अंदर का माहौल बहुत सख्त और प्रोफेशनल था। हर कोई जल्दी में था, हर चेहरा गंभीर था। सिया का दिल जोर-जोर से धड़क रहा था।उसी वक्त लिफ्ट के दरवाजे खुले—ब्लैक सूट में, आँखों में गॉगल्स—अर्शित रॉय।एक पल के लिए जैसे पूरा ऑफिस थम सा गया। हर कोई अपना सिट छोड़कर खड़ा हो गया। उसकी मौजूदगी से हवा तक भारी लग रही थी। सिया ने पहली बार उसे सामने से देखा और अनजाने में ही उसकी नज़रें झुक गईं।उसे नहीं पता था कि यही इंसान उसकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा मोड़ बनने वाला है।इंटरव्यू हॉल के बाहर सिया कुर्सी पर बैठी थी। उसकी उंगलियाँ बार-बार एक-दूसरे में उलझ रही थीं। दिल इतनी जोर-जोर से धड़क रहा था कि उसे डर लग रहा था कहीं आवाज बाहर न निकल जाए। आस-पास बैठे बाकी कैंडिडेट आत्मविश्वास से भरे दिख रहे थे, और सिया खुद को छोटा महसूस कर रही थी।"Ms. Siya Sharma…", रिसेप्शन से आवाज आई।सिया ने गहरी साँस ली और कांपते कदमों से अंदर चली गई।कमरा बड़ा और शांत था। सामने बड़ी सी टेबल पर लैपटॉप और कुछ फाइलें रखी हुई थीं। वहीं कुर्सी पर बैठा अर्शित रॉय, काले सूट में गंभीर चेहरा, तीखी नज़रें—जैसे सामने बैठे इंसान की रूह तक पढ़ सकते हों।"बैठिए", उसकी भारी आवाज़ कमरे में गूँज गई।सिया ने सिर झुका कर कुर्सी खींची और बैठ गई। डर और घबराहट से आँखें उठाने की हिम्मत नहीं हो रही थी।"आप इस कंपनी में काम क्यों करना चाहती हैं?"अर्शित ने बिना किसी भाव के पूछा।सिया की आवाज़ पहले तो लड़खड़ाई, लेकिन फिर उसने खुद को संभाला—"सर… मैं कुछ सीखना चाहती हूँ, अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती हूँ और साबित करना चाहती हूँ कि मैं कुछ कर सकती हूँ।""लेकिन आपको पता है, नौकरी के लिए आपकी उम्र अभी बहुत कम है,"— अर्शित ने कहा।सिया ने कांपती हुई आवाज़ में कहा—"जी सर! लेकिन मैं काम और पढ़ाई दोनों कर सकती हूँ।"अर्शित ने फिर कहा—"लेकिन ये आसान नहीं है।""हाँ सर… लेकिन आसान ज़िंदगी ने मुझे कभी कुछ दिया भी नहीं।"सिया ने धीरे लेकिन पूरे आत्मविश्वास के साथ जवाब दिया।कमरे में कुछ पल की खामोशी छा गई। अर्शित की नज़रें बस सिया पर टिकी थीं। जैसे उसकी दुनिया सिया के चेहरे पर ही रुक गई हो। उसे उस चेहरे में कोई डर नहीं, बल्कि संघर्ष और जज़्बा दिखाई दे रहा था।"आप जा सकती हैं" — उसने फाइल बंद करते हुए कहा।सिया का दिल बैठ गया। उसे लगा, की शायद वह हार गई। बिना कुछ कहे वह हॉल से बाहर निकल गई। आँखों में नमी थी, लेकिन उसने खुद को रोने नहीं दिया।दो दिन बाद…सिया पढ़ाई कर रही थी तभी उसके फोन पर अंजान नंबर से कॉल आया। सिया ने कॉल रिसीव किया—"Hello?""Ms. Siya Sharma? Congratulations! You are selected as an intern in Arshit Roy Enterprises."फोन हाथ से छूटने ही वाला था। यह सच था—उसने कर दिखाया था। लेकिन उसकी खुशी ज्यादा देर तक टिक नहीं पाई। जैसे ही उसने घर में ये बात सबको बताई, सौतेली माँ का चेहरा सख्त हो गया। उसने ऊँची आवाज़ में कहा—"मैंने मना किया था न!"सिया ने रोते हुए कहा—"लेकिन माँ, ये मेरे करियर के लिए ज़रूरी है।""करियर? लड़की का करियर? उसका जीवन उसका घर होता है!"उसने सिया की बात काट दी। पिता भी चुप थे, हमेशा की तरह।उस रात सिया ने फैसला कर लिया कि अब वह चुप नहीं रहेगी।वहीं दूसरी तरफ… अर्शित बार-बार सिया के दिए जवाब के बारे में सोच रहा था।"इतनी छोटी उम्र में नौकरी? और इतनी गंभीरता के साथ उसने ऐसा क्यों कहा कि ‘आसान ज़िंदगी ने मुझे कभी कुछ नहीं दिया’?"उसे समझ नहीं आ रहा था कि एक इंटर्न की बात ने उसे इतना सोचने पर मजबूर कैसे कर दिया।सुबह-सुबह सिया ऑफिस पहुंची। सफेद सूट, हल्का लाल दुपट्टा, चेहरे पर घबराहट और आँखों में ढेर सारे सपने। इतनी बड़ी कंपनी, इतने बड़े लोग—सब कुछ उसके लिए नया था। रिसेप्शन से लेकर कैबिन तक, हर कोई जल्दी में था, कोई किसी को ठीक से देख भी नहीं रहा था।"Ms. Siya Sharma… You are assigned to the 14th floor intern desk" — HR ने बताया।सिया ने हल्की मुस्कान के साथ सिर हिलाया और फिर सीट की तरफ बढ़ गई। पहला दिन था। पहले ही दिन कहीं कोई गलती न हो, इसलिए वह हर काम बहुत ध्यान से कर रही थी। लेकिन उसे पता नहीं था कि कैबिन के कोने में बैठे अर्शित रॉय की नज़रें लगातार सिया को देख रही थीं। वह मन ही मन सोच रहा था—"इतनी कम उम्र, और इतनी गंभीरता…"उसने अपने P.A को बुलाया और सिया शर्मा की फाइल मंगवाई। लेकिन फाइल में केवल उसके कुछ जरूरी और पढ़ाई से संबंधित कागजात थे, उसकी निजी जिंदगी से जुड़ा कुछ भी नहीं।देखते-देखते कुछ दिन बीत गए। सिया की मेहनत धीरे-धीरे सबका दिल जीत रही थी। लेकिन काम और प्रोजेक्ट की वजह से सिया को कभी-कभी घर आने में देर हो जाती, जिससे घर के काम पर उसका ध्यान थोड़ा कम हो जाता। यह सब उसकी माँ को बिल्कुल पसंद नहीं आता था।और फिर एक दिन अचानक सिया की सौतेली माँ ऑफिस पहुँच गई और जोर-जोर से चिल्लाने लगी—"मेरी बेटी बदचलनी है! उसे इस नौकरी से बाहर निकाल दो!"ऑफिस के सारे लोग सिया की माँ को देखने लगे। इतनी शोर सुनकर अर्शित भी अपने कैबिन से बाहर आया—"ये सब क्या हो रहा है यहाँ? कौन हैं आप?" उसने ऊँची आवाज़ में पूछा।"सिया की माँ" — उसकी माँ ने जवाब दिया।अर्शित सिया की तरह देखने लगा। सिया की नज़रें नीचे झुक गईं, लेकिन डर से उसका पूरा शरीर कांप रहा था।"Security, बाहर निकालो इन्हें" — आरक्षित चिल्लाकर बोला।फिर उसने सिया से कहा—"Ms. Sharma, आपके घर की जो भी तकलीफें है, उसे अपने घर तक रखें। मेरी कंपनी में मैं इस तरह की घटिया हरकत दुबारा बर्दाश्त नहीं करूंगा।"अर्शित का सख्त रवैया और अपनी माँ की नौटंकी देख कर सिया टूट गई। उसकी आँखों में आंसु आ गए। उसने अपना बैग उठाया और घर चली गई।उसी वक्त अर्शित ने भी उसका पीछा किया। उसने देखा सिया नदी किनारे शांत जगह पर बस रो रही थी। पहले तो उसने पास जाकर पूछने की सोची, लेकिन फिर रुक गया और वापस चला गया।अर्शित जब अपने घर पहुँचा तो वह बहुत बेचैन था। बार-बार उसे सिया की आँखों के आँसू याद आ रहे थे। वह बार-बार खुद से पूछ रहा था—"आख़िर ऐसी क्या बात है? ऑफिस में भी उसने कोई जवाब नहीं दिया…"