Safar-e-Dil - 5 in Hindi Drama by Abantika books and stories PDF | सफ़र-ए-दिल - जब नफ़रत जुनून में बदल जाए.. - 5

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सफ़र-ए-दिल - जब नफ़रत जुनून में बदल जाए.. - 5

EPISODE 5

अभिमान: "ठीक है। मैं आपकी शारीरिक दूरी का सम्मान करूँगा। 'नाम की शादी'।" उसने ये शब्द ऐसे कहे जैसे वे मज़ाक हों, "पर, अन्वेषा जी, भावनात्मक दूरी... वह मेरी ज़िम्मेदारी नहीं है। मेरी पत्नी बनने के बाद, आपके ख़याल कहाँ भटकते हैं, यह तय करना मेरे बस में नहीं है।" वह एक पल रुका, अपनी गहरी आँखों से उसकी आत्मा को भेदते हुए, "और हाँ, यह लीगल दस्तावेज़ देखिए—राहुल अब आज़ाद है। वह कल रात ही रिहा हो चुका है और अपने घर पर सुरक्षित है।" 

​अन्वेषा के पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गई। वह हँस रहा था। वह हँस रहा था क्योंकि उसे पता था कि राहुल को छुड़वाने की 'कीमत' क्या थी—वह ख़ुद थी। उसकी बलि, उसका बलिदान। 

​अभिमान ने एक और कागज़ अन्वेषा की ओर बढ़ाया—यह एक जटिल, कई पन्नों का लीगल मैरिज कॉन्ट्रैक्ट था, जो किसी शाही फ़रमान जैसा लग रहा था। 

​अभिमान: "अब सबसे ज़रूरी बात। यह शादी छिपकर नहीं होगी। यह मेरे राजनीतिक जीवन का सबसे महत्वपूर्ण कदम है। मेरी अगली रैली से पहले, मुझे एक प्रतिष्ठित, साफ़ छवि वाली पत्नी की ज़रूरत है। इसलिए, यह पूरे राज्य के सामने होगी। एक भव्य, सार्वजनिक समारोह।" उसकी आँखें चमक उठीं, "मुझे आपकी ईमानदार छवि चाहिए, ताकि मेरी राजनीतिक छवि पर कोई सवाल न उठे। मेरे विरोधी आपकी बेदाग़ प्रोफ़ाइल पर उँगली न उठा सकें।" उसने घड़ी देखी, "आपकी फ़ैमिली को आज शाम तक जयपुर पहुँचना होगा।" 

​ 

​अन्वेषा का चेहरा, जो पहले शांत था, अब क्रोध और भय से विकृत हो गया। उसका निजी दुख और अपमान अब उसके परिवार तक पहुँच गया था। 

​अन्वेषा (आँखों में नफ़रत और आँखों में पानी के बीच लड़ाई): "मेरी फ़ैमिली को बीच में मत लाइए। मेरे माता-पिता इसमें नहीं आएंगे। मैं आपको... मैं आपको अपनी इच्छा से अपना जीवन बर्बाद करने दूँगी, लेकिन उन्हें नहीं खींचूँगी।" 

​अभिमान (फ़ोन उठाता है—एक जानबूझकर, धीमी गति से, उसकी आँखें अन्वेषा को देखती हैं, उसकी हर प्रतिक्रिया को दर्ज करती हैं): "आपके पिता, प्रोफेसर पट्टनायक, एक सम्मानित व्यक्ति हैं। उन्हें शिक्षण के क्षेत्र में दशकों का अनुभव है। उनकी सरकारी नौकरी, जहाँ वे हेड प्रोफ़ेसर हैं..." 

​अन्वेषा हाँफने लगी। उसे पता था कि आगे क्या आने वाला है। 

​अभिमान: "...क्या वह स्थायी है? या उस पर भी किसी की हुक़ूमत चल सकती है? मुझे लगता है कि कुछ पुरानी शिकायतें, कुछ अनियमितताएँ, जिनका सामना उन्हें करना पड़ सकता है... वे उन्हें अपनी रिटायरमेंट के बहुत नज़दीक, एक ख़तरे में डाल सकती हैं।" 

​अन्वेषा (दर्द से कराहते हुए): "नहीं! नहीं! उन्हें मत छुओ!" 

​अभिमान ने अपने होठों पर एक ऐसी मुस्कान लाई जो किसी दरिंदे की मुस्कान से कम नहीं थी। 

​अभिमान: "मैंने कहा—आज शाम तक, आपके माता-पिता, आपकी शादी में खुशी-खुशी शामिल होने चाहिए। वे मेरे सम्माननीय अतिथि होंगे। वरना, राहुल तो बचेगा..." उसने गहरी साँस ली, "पर आपके पिता की इज़्ज़त पर आंच आएगी। और आप जानती हैं, अन्वेषा जी, एक सम्माननीय व्यक्ति के लिए, इज़्ज़त का टूटना मृत्यु से भी बुरा होता है।" 

​यह अंतिम वार था। एक लड़की अपने भविष्य की बलि दे सकती है, अपने प्रेम को त्याग सकती है, लेकिन अपने वृद्ध, सम्मानित पिता के सम्मान पर आंच नहीं आने दे सकती। यह उसके धर्म, उसकी भारतीय संस्कृति, और उसके व्यक्तिगत मूल्यों पर सीधा प्रहार था। 

​अन्वेषा पूरी तरह से टूट जाती है। उसका शरीर हिल रहा था, लेकिन वह रोई नहीं। वह समझ गई थी कि अभिमान कितना क्रूर, कितना निर्णायक और कितना शक्तिशाली हो सकता है। यह व्यक्ति केवल एक प्रेमी नहीं था—यह एक सत्ता का प्रतीक था जिसने अब उसके जीवन को अपने राजनीतिक खेल का मोहरा बना लिया था। 

​अन्वेषा (दबी हुई, टूटी हुई आवाज़ में, जैसे किसी ने उसकी साँस छीन ली हो): "मैं... मैं उन्हें बुलाती हूँ। पर आप उन्हें... कोई चोट नहीं पहुँचाएंगे। न उन्हें, न मेरी माँ को।" 

​अभिमान (मुस्कुराता है, अपनी जीत का जश्न मनाते हुए, लेकिन उसकी आवाज़ में एक अजीब-सा अपनापन आ गया था): "बेशक नहीं। वे मेरे ससुर और सास होंगे। मेरे परिवार के सबसे महत्वपूर्ण सदस्य।" उसने अपनी उंगली से लीगल कॉन्ट्रैक्ट पर उस जगह को थपथपाया जहाँ अन्वेषा को हस्ताक्षर करने थे, "आप यहाँ साइन कीजिए।" 

​अन्वेषा ने आगे बढ़कर अभिमान के डेस्क पर रखा पेन उठाया। यह पेन सोने का था, भारी और ठंडा। जब उसने अपना नाम लिखा—अन्वेषा पट्टनायक—तो उसे लगा जैसे उसने अपनी पहचान का आख़िरी अवशेष भी बेच दिया हो। उसके लिए, यह केवल एक शादी का कागज़ नहीं था; यह उसकी आत्मा और उसकी आज़ादी का डेथ वारंट था। स्याही उसके नाम के नीचे फैल गई, जैसे किसी ज़ख्म से बहता हुआ रक्त। 

​अभिमान ने शांत भाव से कागज़ उठाया, उसे फोल्ड किया और अपनी तिजोरी में रख दिया। 




​अन्वेषा दफ़्तर से निकलकर तुरंत अपने माता-पिता को फ़ोन करती है। हवेली के गलियारे इतने विशाल और शांत थे कि उसकी हर आहट गूँज रही थी। 

​उसने खुद को पास की एक संगमरमर की बेंच पर गिरा दिया। उसने अपनी माँ का नंबर डायल किया, उसके हाथ काँप रहे थे। 

​अन्वेषा (रोते हुए, पर आवाज़ मज़बूत रखती है, एक कृत्रिम ख़ुशी की परत ओढ़ती हुई): "माँ... मैं... मैं ठीक हूँ। हाँ। सुनिए, आप और पापा... आप अभी जयपुर आ जाइए। अभी।" 

​माँ (फ़ोन पर, चिंतित): "क्या हुआ, अन्वेषा? तू रो रही है क्या? क्या हुआ राहुल को?" 

​अन्वेषा (आँसू पोंछती है, अपनी आवाज़ में 'खुशी' भरती है, जैसे कि वह एक शानदार अभिनय कर रही हो): "नहीं, माँ! मैं... मैं ख़ुशी के मारे रो रही हूँ! मेरी शादी... मेरी शादी अभिमान राठौड़ से हो रही है। हाँ! उसी से!" 

​एक गहरा, अजीब सन्नाटा। 

​अन्वेषा: "आप प्लीज... खुश होकर आना। वह बहुत अच्छा आदमी है, बहुत बड़ा आदमी है। और हाँ, किसी को... किसी को भी... कुछ मत बताना। यह... यह हमारी ख़ुद की इच्छा थी। हम एक सादा समारोह चाहते हैं।" 

​उसने फ़ोन काट दिया। उसके दिल पर एक भयानक भार पड़ गया। उसने झूठ बोला था। उसने अपने माता-पिता को एक क्रूर जाल में खींच लिया था, लेकिन उसने ऐसा उनके सम्मान को बचाने के लिए किया था। यह उसका सबसे बड़ा बलिदान था। 

​अभिमान, अपने दफ़्तर में बैठकर जीत का जश्न मनाता है। वह तिजोरी से अन्वेषा द्वारा साइन किए गए कागज़ को निकालता है। उसके अंगूठे ने उसके नाम के ऊपर के काले हस्ताक्षर को छुआ। 

​अभिमान (मन में, जुनून से, उसकी आँखें एक अजीब, अंधेरे प्रेम से चमकती हैं): "तुम मेरी हो, अन्वेषा। अब तुम्हारा धर्म (Duty) और तुम्हारा जुनून (Desire) दोनों मेरे क़ाबू में है। मैंने तुम्हें राहुल से नहीं, बल्कि तुम्हारी आज़ादी से ख़रीदा है। तुमने मेरे अभिमान को पहले ही दिन चोट पहुँचाई थी। अब मैं तुम्हें अपनी हुक़ूमत का असली मतलब समझाऊँगा।" 

​वह मेज पर कागज़ रखता है और आत्मविश्वास से अपनी कुर्सी पर पीछे की ओर झुक जाता है। 

​अभिमान (धीमी, जीत भरी मुस्कान): "अब शुरू होगा हमारा सफ़र-ए-दिल। तुम्हें मेरे लिए रोना होगा, तड़पना होगा, और फिर... तुम्हें मुझसे प्यार करना ही होगा।" 🐬❤️‍🔥💙🌸😈🔥✨️🦋♥️💖

क्रमशः .......❤️ 
Thank you 😊 🌸❤️‍🔥 
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मेरी कलम से...✍️🦋
"दोस्तों, आज अन्वेषा ने वो खो दिया है जो उसे सबसे प्यारा था—उसकी आज़ादी। अभिमान ने उसे अपने जाल में तो फँसा लिया है, पर क्या वो उसके दिल की नफरत को खत्म कर पाएगा?
​आज का एपिसोड आपको कैसा लगा? क्या अन्वेषा का यह फैसला सही था? कमेंट बॉक्स में अपनी राय जरूर दें!

सफ़र-ए-दिल की अगली कड़ी में देखिए—एक ऐसी शादी, जहाँ मंत्रों की गूँज में सिसकियाँ छिपी होंगी। 💔🔥✨

​मुझे Follow करें और कहानी को Rating देना न भूलें! आपकी प्रतिक्रिया ही मेरी कलम की ताकत है। 🙏🦋"
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About novel 🪼
ABHIMAN RATHOUR ×ANWESHA PATTNAIK 
ARRANGE MARRIAGE × FORCED ❤️‍🩹❤️‍🔥🔥
राजस्थान ×ओडिशा 💛💙
MLA × GOVT OFFICER 🕊🗿

मेरी कहानी अलग ही दुनिया में ले जाएगी आपको l 

इस journey में आप different cultures , नफ़रत से जुनून तक का सफ़र तय करेंगें l और suspense, romance ♥️, family drama ka full package 📦 हे ये कहानी SAFAR-E-DIL : जब नफ़रत जुनून में बदल जाए ... ✨️