भाग 1: बचपन की शुरुआत
मेरा नाम आदित्य है। मैं हिमाचल प्रदेश के एक छोटे से कस्बे में जन्मा और पला-बढ़ा।
हमारा घर छोटा था, लेकिन उसमें एक बड़ी दुनिया बसती थी — किताबों की दुनिया।
पिता जी सरकारी स्कूल में हिंदी के अध्यापक थे। उनके कमरे में कदम रखते ही एक अलग-सी खुशबू महसूस होती थी — पुराने पन्नों, स्याही और लकड़ी की अलमारी की। दीवार से सटी तीन बड़ी अलमारियाँ थीं जिनमें सैकड़ों किताबें रखी थीं — ‘गोदान’, ‘राग दरबारी’, ‘गीतांजलि’, ‘Discovery of India’, और न जाने कितनी पत्रिकाएँ।
जब दूसरे बच्चे गिल्ली-डंडा या क्रिकेट में मग्न रहते, मैं अक्सर उन अलमारियों के सामने बैठ जाता और किसी किताब को यूँ ही खोल लेता। पहले तो अक्षर समझ नहीं आते थे, लेकिन फिर भी पन्ने पलटना अच्छा लगता था — जैसे किसी रहस्यमय खजाने के नक्शे को देख रहा हूँ।
एक दिन पिता जी ने मुस्कुराते हुए कहा,
“आदित्य, जब तू थोड़ा बड़ा हो जाएगा, तो ये किताबें तेरी सबसे अच्छी दोस्त बनेंगी।”
उस समय शायद मैं नहीं समझा कि वो क्या कह रहे हैं, लेकिन आज सोचता हूँ तो लगता है — उन्होंने सही कहा था।
मेरी असली दोस्ती तो उन्हीं पन्नों के बीच शुरू हुई थी।
भाग 2: किताबों की दुनिया में खोया मैं
स्कूल के दिनों में मैं बाकी बच्चों से कुछ अलग था।
क्लास में चुपचाप बैठा रहना, अवकाश के समय कोना ढूँढकर किताब निकाल लेना — ये मेरी आदत थी।
दोस्तों की टोली जब स्कूल की कैंटीन में समोसे खा रही होती, मैं लाइब्रेरी में बैठा ‘बालभारती’ या ‘चंपक’ पढ़ रहा होता।
लोग कहते थे — “ये लड़का ज़्यादा बोलता नहीं।”
पर सच तो ये था कि मैं किताबों से बात करता था।
कभी ‘पंचतंत्र’ की कहानियों से जीवन के सबक सीखता, कभी ‘रवींद्रनाथ टैगोर’ की कविताओं में खुद को ढूँढता, तो कभी ‘रस्किन बॉन्ड’ के पहाड़ों में खो जाता।
मुझे ऐसा लगता, जैसे हर किताब मेरे अंदर किसी नए दोस्त की तरह बस जाती हो।
हर एक की अपनी बोली, अपनी सोच, अपनी ख़ासियत होती।
माँ को मेरी ये आदत थोड़ी अजीब लगती। वो कहतीं —
“बेटा, दोस्तों के साथ भी वक्त बिताया कर।”
मैं हँसकर कहता —
“माँ, मेरे दोस्त तो घर में ही हैं — बस बोलते नहीं, लिखते हैं।”
माँ मुस्कुरा देतीं, लेकिन शायद नहीं जानती थीं कि किताबों के पन्नों में मैं अपने मन की बातें ढूँढ रहा था, जिन्हें किसी इंसान से कहने की हिम्मत मुझमें नहीं थी।
भाग 3: किशोरावस्था की उलझनें
जब मैं कक्षा दसवीं में पहुँचा, तो ज़िंदगी ने कुछ नया रूप लेना शुरू किया।
अब लोग “बोर्ड परीक्षा”, “भविष्य”, “कैरियर” जैसे शब्द ज़्यादा बोलने लगे।
पिता जी की उम्मीद थी कि मैं डॉक्टर बनूँ, ताकि परिवार का नाम रोशन हो।
माँ चाहती थीं कि मैं शिक्षक बन जाऊँ, ठीक अपने पिता की तरह।
पर मेरे दिल की चाह कुछ और थी — मैं लेखक बनना चाहता था।
मैंने स्कूल मैगज़ीन के लिए अपनी पहली कहानी लिखी — अधूरी उड़ान।
कहानी थी एक ऐसे लड़के की, जो समाज की उम्मीदों में खुद को खो देता है।
जब वो कहानी प्रकाशित हुई और सभी अध्यापकों ने उसकी तारीफ की, तो लगा जैसे किसी ने मेरे भीतर छिपे लेखक को पहचान लिया हो।
उस रात मैंने पिता जी की पुरानी अलमारी से अपनी प्रिय किताब ‘गोदान’ निकाली।
उसके पन्नों को छूते हुए मैंने कहा,
तू ही तो है जो मुझे समझती है बाकी सब तो बस आदेश देते हैं।
उस दिन से किताबें मेरे लिए सिर्फ़ मनोरंजन नहीं, आत्मा का आधार बन गईं।
भाग 4: शहर की भीड़ में अकेलापन
बारहवीं कक्षा के बाद मैंने दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया।
शहर बड़ा था, लोग तेज़-तर्रार, और ज़िंदगी भागती हुई।
पहले-पहल सब कुछ नया और रोचक लगा, पर धीरे-धीरे एक सच्चाई सामने आई —
भीड़ में भी अकेलापन होता है।
हॉस्टल के कमरे में रातें लंबी लगती थीं।
कमरे के साथी टीवी देखते या मोबाइल चलाते रहते, जबकि मैं अपनी किताबों के साथ बैठ जाता।
कभी ‘चित्रलेखा’ पढ़ते हुए जीवन और पाप के अर्थों में उलझ जाता,
तो कभी ‘The Alchemist’ में सपनों का पीछा करने की हिम्मत ढूँढता।
कई बार जब उदासी छा जाती, मैं अपनी किताबों से बातें करता।
मन में कहता —
“तुम ही तो हो जो बिना बोले मेरा दर्द समझ लेती हो।”
और सच में, जब मैं पढ़ता, तो जैसे किताब मुझे जवाब देती —
“मत डर, जो तेरे भीतर है, वही तेरी सबसे बड़ी ताक़त है।”
वो शब्द मेरे लिए मरहम बन जाते थे।
धीरे-धीरे किताबें मेरे भीतर का डर धोती चली गईं, और एक नई पहचान गढ़ने लगीं।
भाग 5: आत्म-खोज की यात्रा
तीसरे वर्ष में मैंने ठान लिया कि अब मैं अपनी पहली किताब लिखूँगा।
नाम रखा — “शब्दों के उस पार।”(यह नाम कहानी के लिए काल्पनिक है किताब का असली नाम यह नहीं है)
मैंने तय किया कि यह किताब किसी काल्पनिक कथा पर नहीं, बल्कि मेरे अपने जीवन और किताबों के साथ रिश्ते पर होगी।
हर अध्याय में एक किताब का नाम होता —
‘गोदान’, ‘चित्रलेखा’, ‘The Alchemist’, ‘Kabuliwala’, ‘Train to Pakistan’ —
और उसके साथ मेरी कोई स्मृति जुड़ी होती।
कभी मैंने लिखा कि कैसे ‘गोदान’ ने मुझे संघर्ष सिखाया,
कभी बताया कि कैसे ‘The Alchemist’ ने मुझे अपने सपनों की ओर बढ़ने की प्रेरणा दी।
कभी लिखा कि कैसे ‘अमृता प्रीतम’ की कविताएँ मुझे अपनी संवेदनाओं से जोड़ गईं।
लिखते-लिखते मैंने जाना कि किताबें हमें केवल ज्ञान नहीं देतीं,
वे हमें खुद से मिलवाती हैं।
तीन महीने तक मैं लिखता रहा — कभी रात में, कभी सुबह की ठंडी हवा में।
और जब आख़िरकार किताब पूरी हुई, तो उसे देखकर मेरी आँखों में आँसू आ गए।
जैसे कोई सपना हक़ीक़त में बदल गया हो।
उस किताब की पहली प्रति मैंने अपने कॉलेज की लाइब्रेरी को दान कर दी।
मैंने उसके पहले पन्ने पर लिखा —
“किसी ऐसे के लिए जो अकेला है — ये किताब उसकी मित्र बने।”
भाग 6: सफलता और सच्चाई
कुछ ही महीनों में उस किताब की चर्चा कॉलेज से बाहर भी फैल गई।
एक साहित्यिक संस्था ने मुझे बुलाया और कहा,
“आदित्य, तुम्हारी किताब में सच्चाई है। इसमें वो भावनाएँ हैं जो लोग महसूस तो करते हैं, पर कह नहीं पाते।”
उन्होंने मेरी किताब को प्रकाशित करने का प्रस्ताव दिया।
जब किताब छपी और मेरे हाथ में उसकी पहली कॉपी आई, तो मुझे लगा जैसे वर्षों की साधना सफल हो गई।
उसकी जिल्द पर मेरा नाम लिखा था, लेकिन अंदर हर शब्द किताबों का उपहार था।
मैंने पहली कॉपी अपने पिता जी को दी।
उन्होंने किताब खोली, कुछ पन्ने पढ़े, और बोले —
“अब समझा, तू किताबों से इतना प्यार क्यों करता है। आज तू खुद एक किताब बन गया है।”
उनकी आँखों में गर्व और मेरे दिल में शांति थी।
मैंने किताब सीने से लगाई और धीरे से कहा —
“मेरी प्रिय मित्र — तूने ही मुझे मेरा रास्ता दिखाया।”
भाग 7: जीवन का मोड़
वक़्त बीतता गया।
मैंने कई और किताबें लिखीं — कभी कहानियाँ, कभी निबंध, कभी आत्मकथाएँ।
लोग मुझे ‘युवा लेखक’ कहने लगे।
पर मेरे भीतर अब भी वही छोटा सा लड़का ज़िंदा था जो पिता की अलमारी में बैठकर किताबों के पन्ने पलटा करता था।
एक दिन मैं अपने गृहनगर गया। वहाँ के सरकारी स्कूल में देखा कि बच्चों के पास मुश्किल से कुछ पुरानी पाठ्यपुस्तकें थीं।
मुझे वह दृश्य देखकर बहुत दुख हुआ।
मुझे लगा — जब किताबों ने मेरे जीवन को इतना सुंदर बनाया, तो क्या मैं किसी और के जीवन में वैसा ही उजाला नहीं फैला सकता?
मैंने वहीं एक छोटी-सी लाइब्रेरी शुरू करने का निर्णय लिया।
अपने पुराने संग्रह से सौ से अधिक किताबें दान कर दीं।
बच्चों के चेहरे पर जो चमक थी, वो किसी पुरस्कार से कम नहीं थी।
एक नन्ही बच्ची ने मुझसे पूछा —
“भैया, क्या ये किताबें बात करती हैं?”
मैं मुस्कुरा दिया और बोला —
“हाँ, पर तब जब तुम चुप होकर सुनो।”
वो बच्ची मुस्कुराई, किताब को सीने से लगाया और चली गई।
उस पल मुझे लगा जैसे मेरी पुरानी मित्र किताब अब दूसरों के दिल में भी जगह बना रही है।
भाग 8: किताबों से संवाद
उस रात जब मैं घर लौटा, तो अपनी पुरानी किताब ‘गोदान’ के पास बैठा।
उसके पन्ने थोड़े पीले पड़ चुके थे, लेकिन अब भी उनकी खुशबू वही थी — अपनापन भरी।
मैंने उसे धीरे से खोला और बोला —
“देख न दोस्त, अब मैं भी किसी के लिए किताब बन गया हूँ।”
मुझे लगा, जैसे वो जवाब दे रही हो —
“यही तो चाहा था हमने। जो तूने सीखा, वो अब दूसरों तक पहुँचा।”
वो पल बेहद भावनात्मक था।
मुझे एहसास हुआ कि किताबें केवल शब्द नहीं, जीवित आत्माएँ होती हैं —
जो हमें आकार देती हैं, हमारी सोच को दिशा देती हैं, और हमें जीवन की सच्चाई से मिलवाती हैं।
उस रात मैंने अपने कमरे की बत्ती बंद की, खिड़की से आसमान देखा —
तारे झिलमिला रहे थे, जैसे आसमान की किताब पर कोई कहानी लिखी जा रही हो।
और मैं मुस्कुरा दिया — क्योंकि मुझे पता था, मेरी ज़िंदगी की सबसे सुंदर कहानी अब भी किताबों के साथ ही लिखी जा रही है।
भाग 9: समापन — किताब का अर्थ
आज जब मैं यह कहानी लिख रहा हूँ, तब मैं चालीस वर्ष का हूँ।
मेरे पास अब सैकड़ों किताबें हैं — कुछ खरीदी हुईं, कुछ उपहार में मिलीं, कुछ खुद लिखी हुईं।
पर मेरे दिल में अब भी वही पहली किताब बसी है, जिसे मैंने बचपन में पढ़ा था।
किताबों ने मुझे सिखाया कि जीवन की सबसे सच्ची मित्रता वही होती है जिसमें कोई अपेक्षा नहीं, कोई स्वार्थ नहीं — केवल सच्चा साथ।
जब लोग मुझे छोड़कर चले गए, जब सपने अधूरे लगे, जब दुनिया ने सवाल किए — तब किताबों ने जवाब दिया।
उन्होंने मुझे सिखाया कि
“अंधेरे से मत डर, क्योंकि हर शब्द में एक दीप जलता है।”
आज जब मैं किसी अकेले बच्चे को देखता हूँ, जो किताब में झाँक रहा होता है, तो मुझे अपना बचपन याद आता है।
और मैं मन ही मन कहता हूँ —
“पढ़ो, क्योंकि हर किताब तुम्हें तुमसे मिलवाने आई है।”
किताबें मेरे लिए केवल ज्ञान का स्रोत नहीं हैं,
वे मेरे भावनाओं का घर हैं,
मेरे विचारों की आवाज़ हैं,
और मेरे अस्तित्व की साथी हैं।
लोग कहते हैं, “सच्चा दोस्त वही जो मुश्किल में साथ दे।”
तो फिर किताबें ही मेरी सबसे सच्ची दोस्त हैं —
क्योंकि उन्होंने कभी मुझसे मुँह नहीं मोड़ा।
उन्होंने मुझे गिरने से पहले संभाला, और टूटने के बाद जोड़ा।
अब जब कोई मुझसे पूछता है —
“आदित्य, तुम्हारी सबसे प्यारी मित्र कौन है?”
तो मैं मुस्कुराकर कहता हूँ —
> “वो जो बोलती नहीं, पर सुनती है;
वो जो सिखाती है, पर डाँटती नहीं;
वो जो मेरे हर सुख-दुख की साक्षी है —
मेरी प्रिय मित्र — किताब।”
अंतिम संदेश
किताबों से प्रेम केवल पढ़ने की आदत नहीं,
बल्कि आत्मा को जीवित रखने की कला है।
किताबें हमारे जीवन की वह रोशनी हैं,
जो हमें हमारे भीतर के अंधेरे से बाहर निकालती हैं।
अगर तुम कभी अकेले महसूस करो,
तो किसी किताब का पन्ना खोल लेना —
वो ज़रूर बोलेगी,
क्योंकि किताबें कभी मौन नहीं होतीं,
बस सुनने वाले की ज़रूरत होती है।
—अरुण कुमार