Shrapit ek Prem Kahaani - 38 in Hindi Love Stories by CHIRANJIT TEWARY books and stories PDF | श्रापित एक प्रेम कहानी - 38

Featured Books
Categories
Share

श्रापित एक प्रेम कहानी - 38

वर्शाली एकांश से कहती है----


वर्शाली : - एकांश जी आप मुझे अपने घर तक पहूँचा देंगे ? 


सत्यजीत कहता है--


सत्यजीत :- कैसी बात कर रही हो बेटी तुम इस हालत घर कैसे जाओगी तुम अभी हमलोग के साथ चलोगी।


 एकांश भी वर्शाली से कहता है --


एकांश :- हां वर्शाली ऐसी हालत में तुम वहाँ नहीं जा 
सकती ।


 वर्शाली सबको समझा कर कहती है--

वर्शाली: - मैं अब ठीक हु आप सब मेरी चिंता ना करे। अगर में घर नहीं पँहूची तो मेरे बाबा चिंतित हो जाएंगे। इसिलिए मुझे जाना पड़ेगा। 


सभी वर्शाली की बात सुनता है और इंद्रजीत एकांश से कहता है---


इंद्रजीत :- बेटा तुम वर्षाली को उसके घर तक छोड़ देना और जब तक वर्षाली ठीक नहीं हो जाती तुम उसका ख्याल रखना। 



एकांश कहता है---


एकांश :- जी पापा। 


तभी संपूर्णा कहती है--


संपूर्णा: - वो सब तो अच्छा है। पर भैया ये कुम्भन अचानक से कहां गायब हो गया ?


 एकांश :- पता नहीं वो अचानक से कैसे गायब हो गया। 

सत्यजीत कहता है---

सत्यजीत :- वो गायब नहीं हुआ। उसे किसी चिज से चौट लगी थी । तभी वो दूर जाकर गिरा। मैने दैखा एक तेज रोशनी सा कुछ था ।


इंद्रजीत कुछ सोचते हुए कहता हैं--

इंद्रजीत :- पर ये कुम्भन बाहर कैसे आ गया ? 


एकांश :- पापा राजनगर के पास जो रक्षा कवच थी वो 
वहां से ग़ायब है और पेड़ के नीचे बहोत सारे जनवारो के कंकल या इंसान के कटा हुआ सर रखा था। पर पापा हमलोगो के गांव की सीमा में वो रक्षा कवच है। 


इंद्रजीत हैरानी से कहता है ---


इंद्रजीत :- क्या..? रक्षा कवच नहीं है। पर ये कैसे हो सकता है। रक्षा कवच को किसने हटाया होगा। कुम्भन तो उसे छू भी नहीं सकता । तो फिर ऐसा काम कौन किया होगा।


 तभी सत्यजीत कहता है---

सत्यजीत : - भैया ये बहुत बड़ी संकट की बात है। अगर रक्षा कवच ना हुआ तो कुम्भन सबको अपना शिकार बनाता रहेगा। 

इंद्रजीत :- चलो यहाँ से ये जगह ठीक नही है। कुम्भन यहां पर कभी भी आ सकता है। अब हमें जल्दी बाबा के पास जाना होगा और उन्हे सब बताना होगा के़ हमारी रक्षा अब वही कर सकते है।


 इतना बोलकर सभी वहाँ से चला जाता है। एकांश अपनी पर वर्शाली को बैठा कर उसके घर सुंदरवन की और जाने लगता है। उधर अघोर बाबा को मेला में वर्शाली के कुम्भन पर मणी द्वारा प्रहार किया गया शक्ति का पता चल जाता है। 


अघोरी बाबा अपने आंखें खोलता है और कहता है--

अघोरी :- असंभव...! ये कैसे संभव है। 

चेतन अघोरी के इस तरह कहने से हैरान हो जाता है और अघोरी से पुछता है--

चेतन :- क्या हुआ गुरुदेव। क्या नहीं हो सकता..?

चेतन के इतना कहने पर अघोरी कहता है--


अघोरी :- सांतक मणी का प्रयोग हूआ है । इसका मतलब मेरा शक सही था । वो यहां पर आ चुकी है ।


 चेतन हैरानी से पुछता है---

चेतन :- कौन आ गया है गुरुदेव? 

 अघोरी कहता है--
.
अघोरी :- आखिर उस महाशक्ती का प्रयोग किस पर हूआ है ।


 चेतन :- महाशक्ति , कही कुंम्भन बाहर तो नही आ गया ।

अघोरी :- हो सकता है , दोनो शक्ती शाली है और हो सकता है ये शक्ती कुम्भन पर प्रयोग किया गया हो ।


इतना बोलकर अघोरी बाबा सोच में पड़ जाते हैं। चेतन अघोरी की चिंता देख कर अघोरी से पुछता है--

चेतन :- क्या हुआ गुरुदेव..? आप किस चिंता में पड़ गए। 


अघोरी :- मेला में उस शक्ती का प्रयोग किया जिसका ज्ञात मुझे हो रहा है। परंतु....! उसी मेला में एक और शक्ति का प्रयोग हुआ है। 

चेतन हैरानी से कहता है–-

चेतन :- एक और शक्ति...? पर कोनसी शक्ति गुरुदेव ? 


अघोरी :- चेतन तुम जाओ जा पता करो के वास्तव में 
वहाँ कुम्भन आया था क्या और मेला मे क्या हूआ था। क्योंकी मुझे आया आभास हो रहा है के वहाँ कुछ कुछ न कुछ घटित हुआ है। 


चेतन :- जो आज्ञा गुरुदेव में सिघ्र ही उस शक्ति पता करके आपके समक्ष आउगां।



 इतना बोलकर चेतन वहाँ से चला जाता है। उधर दयाल हांफते हांफते भागकर दक्षराज के पास आता है। दयाल को डरा हुआ देख दक्षराज दयाल से पुछता है---

दक्षराज :- क्या हुआ दयाल क्या कुम्भन मारा गया।? 

दयाल :- मालीक.....मालिक...वो ...वो कुम्भन। 


दक्षराज :- हा बोलो दयाल क्या हुआ कुम्भन के साथ। 


दयाल :- मालिक वो कुम्भन बहुत ही भयंकर और डरावना देत्य है। जिसे देख कर हमारे कुछ आदमी भाग गए और बाकी बचे सबको उस कुम्भन ने मार दिया। उसके सामने हमारा ये बंदुक या कोई भी शस्त्र उसके सामने एक खिलोना समान है। 



दक्षराज ये सब सुनकरर हैरान हो जाता है। 


दयाल :- अब वो किसिको नहीं छोड़ेगा मालिक। 


दक्षराज :- पर वो कुम्भन सुंदरवन के कैद से बाहर कैसे आया ?


 दयाल :- यही बताने के लिए में आपके पास आया था मालिक पर निलु के बारे में सुनकर में बहुत दुखी हो गया था। हो ना हो मालिक हमारे नीलू को उसी कुम्भन ने मार दिया होगा। क्योंकी हमारे गांव के रक्षा कवच को किसीने तोड़ दिया है मालिक। वहाँ पर अब पहले जैसे मानव का कटा सर और जानवर के कंकाल है।



 दक्षराज ये खबर सुनकर चौंक जाता है और कहता है---


दक्षराज :- क्या....? ये....ये क्या कह रहे हो तुम दयाल रक्षा कवच टूट गया। अब क्या होगा ? वो कुम्भन अब किसिको नहीं छोड़ेगा। सबको मार देगा। मेरा मणी भी अब ...



 दक्षराज बहुत डरा हुआ था क्योकी उसे डर था के अब वो कुम्भन भी उस मेघ मणी को ढुडने लगेगा । 


दक्षराज दयाल से आलोक के बारे में पुछता है---



दक्षराज :- दयाल और ये आलोक कहा रह गया वो भी तो मेला में था।


 दयाल :- वो सब ठीक है मालिक वो आते ही होंगे।


दक्षराज :- और वो कुम्भन क्या वो मेला से चला गया ? 


दयाल :- नहीं मलिक वो गया नहीं था पर ऐसा लगा जैसे उसे किसी चीज से मारा गया था जिस कारण वो जंगल में जा गिरा। 


दक्षराज दयाल की बात सुनकर और भी हैरान हो जाता है और दयाल से पुछता है---


दक्षराज :- मारा गया था , आखिर कौन हो सकता है जो कुम्भन को मार सकता है । किसने मारा... और ..? 


दयाल :- वो नहीं पता मालिक पर कुम्भन ने एकांश पर अपनी शक्ति से हमला किया था या तभी एकांश को एक लड़की बचा लेती है और फिर उसी समय कुंम्भन की चिखने की आवाज आती है और वो चिखता हुआ हवा में उड़ते हूए जंगल में जा गिरता है ऐसा लग रहा था जैसे किसने उसपर किसी शक्ति से वार किया हो। 



दक्षराज ये सब सुनकर चौंक जाता है और हैरीनी से कहता है---


दक्षराज :- ओ .... तो एकांश के साथ एक लड़की भी थी । पर ऐसी कौन सी शक्ती है उस लड़की के पास जो कुम्भन जैसे देत्य को हवा में उड़ाता हुआ जंगल में फेंक दे। दयाल क्या तुम उस लड़की को पहचानते हो ?


दयाल :- नही मालिक , मैने पहले उस लड़की को कभी नही दैखा । वो यहां की तो नही लगती ।


दक्षराज :- दयाल तुम एकांश पर नजर रखना कहीं उसके पास तो कुंम्भनी का मेघ मनी नहीं है ? इसिलिए कुंभन ने उस पर हमला किया और एकांश ने 
उस मणि से कुम्भन पर। वरना इंसान के पास देत्य को परजीत करने का कोई शक्ति नहीं है। 


तभी वहाँ आलोक आ जाता है। आलोक को दैख कर दक्षराज खुशी से आलोक के पास जाता है और कहता है--


दक्षराज :- आलोक बेटा तुम ठिक तो हो ना। 


आलोक कहता है---


आलोक :- हां बड़े पापा में बिल्कुल ठिक हूं। 


आलोक मायुस होकर कहता है--


आलोक :- बड़े पापा वो दैत्य बहुत भयानक है और उसने आज बहुत सारे निर्दोश लोगो की जान ले ली। दयाल :- ये सब उस इंसान के वजह से हुआ है जिसने वो रक्षा कवच तोड़ा है। 


आलोक :- नहीं काका ये सब उस इंसान की वजह से 
हुआ है ये सब उस इंसान के कारण हूआ है जिसने कुम्भन को पृथ्वी पर आने के लिए मजबूर किया है। पता नहीं कौन है वो राक्षस जितके वजह से इतने सारे मासूमो की जान गई। 


तभी आलोक नीलू को वहाँ पर न देखर दक्षराज से पुछता है--


आलोक :- बड़े पापा नीलू काका कहा है। 


आलोक के इतना पुछने पर दक्षराज घबरा जाता है और कहता है---


दक्षराज :- वो बेटा निलु कुछ दिन के लिए अपने रिस्तेदार के वहां गया है।।


 आलोक :- क्या....? नीलू काका रिस्तेदार के घर गए है। 



आलोक के इतना बोलते ही वहा हवेली के बाहर लोगो की चिखने की आवाज आने लगती है जिसे सुनकर आलोक दौड़ कर बाहर चला जाता है। दक्षराज दयाल से कहता है---


दक्षराज :- दयाल क्या निलू कभी वापस आएगा ? 


तभी लोगो की रोने की आने आने लगी है। दक्षराज कहता है---


दक्षराज :- चलो दयाल बाहर जा कर देखते हैं। के उस कुम्भन ने क्या किया है।


To be continue.....577