यह महाभारत की कथाओं पर आधारित रचनात्मक संवाद है, जिसमें मूल भाव सुरक्षित रखे गए हैं।
युद्ध से पहले श्रीकृष्ण, माता कुंती और कर्ण का संवाद
कुरुक्षेत्र के युद्ध की विभीषिका से ठीक पहले का समय था। आकाश में एक अजीब सा मौन छाया हुआ था, मानो प्रकृति भी आने वाले रक्तपात को भांप चुकी हो। उसी समय गंगा के तट पर एक गंभीर और हृदयविदारक संवाद होने वाला था, जो इतिहास के सबसे करुण प्रसंगों में गिना जाता है।
सबसे पहले वहाँ श्रीकृष्ण पहुँचे। उनके मुख पर वही शांति थी, पर नेत्रों में गहरी करुणा। थोड़ी देर बाद कर्ण आए—तेजस्वी, दानवीर, पर भीतर से अत्यंत पीड़ित। कर्ण जानते थे कि कृष्ण उन्हें क्या कहने वाले हैं।
श्रीकृष्ण बोले —
“कर्ण, तुम्हारा जन्म साधारण नहीं है। तुम कुंतीपुत्र हो, पांडवों में सबसे ज्येष्ठ। यदि तुम धर्म का साथ दो, तो यह युद्ध टल सकता है।”
कर्ण मंद मुस्कान के साथ बोले —
“माधव, अब बहुत देर हो चुकी है। जिन अपमानों के साथ मैंने जीवन जिया है, उनका क्या? क्या केवल जन्म से कोई अपना हो जाता है?”
कृष्ण कुछ कहने ही वाले थे कि उसी क्षण माता कुंती वहाँ पहुँचीं। वर्षों का पश्चाताप उनके चेहरे पर स्पष्ट था। कर्ण को देखते ही उनकी आँखों से अश्रुधारा बह निकली।
माता कुंती कांपती आवाज़ में बोलीं —
“पुत्र… कर्ण… क्षमा कर दो मुझे। अज्ञानवश मैंने तुम्हें त्याग दिया। मैं एक माँ होने का धर्म निभा न सकी।”
कर्ण ने सिर झुका लिया। वर्षों से दबा हुआ दर्द अब शब्दों में उतर रहा था।
कर्ण बोले —
“माता, आपने मुझे जन्म दिया, पर माँ का अधिकार कभी नहीं दिया। जब मुझे समाज ने सूतपुत्र कहकर अपमानित किया, तब आप कहाँ थीं?”
कुंती फूट-फूट कर रोने लगीं —
“मैं डर गई थी पुत्र। समाज, लोकलाज, मर्यादा—इन सबके बीच मैं माँ बनना भूल गई।”
श्रीकृष्ण ने संवाद को संभालते हुए कहा —
“कर्ण, अब भी समय है। तुम पांडवों के साथ आ जाओ। तुम्हें राजमुकुट मिलेगा, सम्मान मिलेगा।”
कर्ण ने दृढ़ स्वर में उत्तर दिया —
“माधव, सम्मान मुझे दुर्योधन ने दिया। जब पूरी सभा मेरा अपमान कर रही थी, तब उसने मुझे अंगराज बनाया। मित्रता का ऋण मैं कैसे भूल जाऊँ?”
कुंती ने करुण स्वर में कहा —
“पुत्र, कम से कम अपने भाइयों को मत मारना। अर्जुन तुम्हारा छोटा भाई है।”
कर्ण कुछ क्षण मौन रहे, फिर बोले —
“माता, यह युद्ध नियति है। पर मैं आपको वचन देता हूँ—अर्जुन के सिवाय मैं किसी पांडव को नहीं मारूँगा। या तो अर्जुन जीवित रहेगा, या मैं।”
कुंती का हृदय काँप उठा। उन्होंने कांपते हाथों से कर्ण के सिर पर हाथ रखा।
कुंती बोलीं —
“तू मेरा पुत्र है कर्ण। युद्ध के बाद लोग चाहे जो कहें, पर मेरे लिए तू सदैव मेरा पहला पुत्र रहेगा।”
कर्ण की आँखें भर आईं, पर स्वर अडिग रहा —
“माता, अब मुझे जाने दीजिए। सूर्यपुत्र को उसके कर्तव्य से मत रोकिए।”
श्रीकृष्ण ने गहरी दृष्टि से कर्ण को देखा और बोले —
“कर्ण, इतिहास तुम्हें पराजित योद्धा कहे या महान दानी—यह युद्ध तय करेगा। पर तुम्हारा त्याग तुम्हें अमर बना देगा।”
कर्ण ने हाथ जोड़कर कहा —
“माधव, यदि मुझे अधर्म के पक्ष में खड़ा होना पड़ा, तो भी मेरा अंत धर्म के लिए होगा।”
इतना कहकर कर्ण वहाँ से चले गए। माता कुंती भूमि पर बैठकर रोती रहीं और श्रीकृष्ण मौन भाव से आकाश की ओर देखते रहे। युद्ध अब अवश्यंभावी था।
यह संवाद केवल तीन व्यक्तियों का नहीं था, यह कर्तव्य, त्याग, पश्चाताप और नियति का संगम था। कर्ण का जीवन इस बात का प्रमाण है कि जन्म नहीं, कर्म मनुष्य को महान बनाते हैं।