Do Patiyo ki Ladli Patni - 3 in Hindi Drama by Sonam Brijwasi books and stories PDF | दो पतियों की लाडली पत्नी - 3

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दो पतियों की लाडली पत्नी - 3

आधी रात का डर

रात के 12 बजे। कमरा शांत। हल्की–सी हवा परदे हिला रही है।
तीनों गहरी नींद में हैं।
अचानक — बाहर से कुत्ते के जोर-जोर से भौंकने की आवाज़ — “भौं! भूँ!!”
श्रेया की आँख फट से खुल जाती है। वो खिड़की के बिलकुल पास सो रही है। डर से सीधी उठकर बैठ जाती है।

श्रेया (घबराई हुई, तेज सांसें लेते हुए) बोली - 
बाबा रे… कोई आया… कोई जरूर आया…।

उसकी आवाज़ सुनकर करन और कबीर दोनों अचानक उठ जाते हैं।

कबीर (नींद में बाल उड़ाते हुए) बोला - 
क्या? क्या हुआ? कोई चोर आया क्या? या बम फट गया?

करन बोला - 
Shreya… तुम ठीक हो?

श्रेया (बाल ठीक करते हुए, घबराई हुई) बोली - 
मुझे… बीच में सोना है!

करन और कबीर दोनों एक साथ बोला - 
क्या? रात के 12 बजे!

श्रेया (गंभीर आवाज में) बोली - 
हां! मुझे लग रहा गौ window से किसी का हाथ आकर मुझे पकड़ लेगा।
और मुझे बाहर खींच लेगा।

1 सेकंड की चुप्पी… फिर दोनों भाइयों की जोरदार हंसी फूट पड़ती है।

कबीर (हंस-हंसकर लोटपोट होकर) बोला - 
भूत ! वो भी तुम्हे पकड़ लेगा?

करन (हंसी रोकते हुए) बोला - 
Shreya… ये कोई Ramsay की horror movie थोड़ी चल रही है!

श्रेया (गुस्से + डर के mix में) बोली - 
हंसो मत! सच में डर लग रहा है मुझे।

वो पल्लू पकड़कर करन का हाथ जोर से पकड़ लेती है। करन तुरंत गंभीर हो जाता है।

करन (softly) बोला - 
Okay… okay. डरो मत। तुम बीच में सो जाओ।
Oye कबीर परेशान मत करना shreya को। 

कबीर (acting करते हुए) बोला - 
हां हां , महोदया को center चाहिए।
Center ही मिलेगा!
हम तो side में कुल्हड़ की चाय की तरह चिपक के सो जाएंगे!
पर एक शायरी तो बनती है मेरी तरफ से - 

"अरे जान, किस ख़ौफ़ ने यूँ रातों में तुझे बेकरार किया,
नींद से यूँ घबरा कर हमारे दरमियान आने पर मजबूर किया?
खिड़की के साए को भी तू भूत समझ बैठी,
और ख़्वाबों के जिन्नात ने तुझे यूँ सहमा दिया।
चल, डर मत… हम दो नहीं, तेरे दो हिमायती हैं,
हमारे होते हुए तुझे कौन सा साया छु सकेगा, मेरी रानी?
तू तो बस हमारी जान है, हमारी अमानत है—
ख़ुदा की कसम, तुझे डर लगे तो हँस भी ले…
पर ऐसे यूँ बीच में आकर लेट जाया कर,
क्योंकि तेरी यह मासूमियत भी हमको बड़ी शायराना लगती है…"


श्रेया उसे गुस्से से घूरती है।

कबीर बोला - 
अच्छा Sorry! Sorry! आजाओ बीच में सो जाओ।

तीनों फिर से लेटते हैं। इस बार श्रेया बीच में।

कबीर (धीमी आवाज में) बोला - 
अगर भूत आया,तो पहले मुझे उठाना।
मैं दिखा दूंगा उसे ठाकुर family की power..

श्रेया (धीरे से मुस्कुराकर) बोली - 
आप दोनों gaurd हो…।
तो मुझे कुछ नहीं होगा।

करन (शांत, protective आवाज में) बोला - 
हां, Shreya. हम दोनों हैं ना।
सो जाओ… कुछ नहीं होगा।

श्रेया शांति से आंखें बंद कर लेती है। करन भी राहत की सांस लेता है।

कबीर (फुसफुसाकर करन से) बोला - 
भैया… ये ‘भूत’ वाला drama daily rehearse नहीं होगा ना?

करन बोला - 
Kabir…

कबीर बोला - 
ठीक है, सो जाता हूं!

रात की हवा, खिड़की की हल्की आवाज़ और तीनों के बीच बनी एक नई warmth… सब माहौल को सुरक्षित बना देते हैं।
धीरे–धीरे तीनों नींद में खो जाते हैं।

कमरे में हल्की धूप घुस रही है। Kabir मुँह पर तकिया रखकर सोया है।
करन गहरी नींद में है।

खटर-पटर… टमाटर काटने की आवाज… कड़ाही में छौंक…

कबीर (नींद में चिढ़कर शायरी के अंदाज में) बोला - 
Ufff… 
“या ख़ुदा… ये सुबह-सुबह खटर-पटर की कैसी साज़िश है,
नींद की गोद में था मैं, और दिल को जगाने की ये कैसी जिसारत है?
घर की दीवारें भी आज मानो दंगे कर रही हों,
हर ठक-ठक में जैसे मेरी ख़ामोशी से बग़ावत कर रही हों।
मैंने तकिया कान पर रखा और बेसाख्ता बोल पड़ा—
‘ए दुनिया वालों, ज़रा सुकून की भी इज़्ज़त कर लिया करो,
ये नींद भी मेरी मेहमान है… इसे बेवजह भगाया ना करो।’”

कौन बजा रहा है सुबह - सुबह band. कौन गा रहा हैं कव्वाली?

वो ताकिया और कसकर कानों पर रख लेता है
करन करवट लेता है। हाथ बढ़ाकर चेक करता है—Shreya बीच में नहीं है।

करन (आंखें झपकाते हुए, धीरे से एक गजल की लाइन बनाते हुए) बोला - 
"सुबह उठकर तेरी ख़ाली रज़ाई ने ये इल्म दिया,
कि मेरा दिल तो यहीं है… पर मेरी हमनफ़स, तू कहाँ चली गई?
Shreya? कहां गई?

वो उठता है, बाल ठीक करता है और रूम से बाहर आता है।
Karan दरवाजे के पास रुक जाता है।
श्रेया ने पल्लू कमर में खोंसा हुआ है, उसके खुले लंबे बाल हैं, और वो हल्की सी मुस्कान के साथ खाना बना रही है। 
चूल्हे पर उपमा/पोहा/पराठे जिस तरह चाहें—बन रहा है।

करन (धीरे से, हैरान होकर) बोला - 
Shreya… तुम?

Shreya (चौंककर मुड़ती है, फिर मुस्कुराती हुई) बोली - 
Good morning… Karan जी...
मैने सोचा… आज सुबह मैं ही बना दूं  खाना।

करन (हल्की मुस्कान रोकते हुए गजल भरे अंदाज में) बोला -
सुबह की रोशनी में तुझे रसोई में देखकर ये ख़याल आया,
कि मेरे घर की हर नसीम अब तेरी मुस्कान से महक जाएगी."
"तुझसे कहने चला था कि इतनी तकलीफ़ न किया कर,
जो तू चाह ले… इस फ़रमाँबरदार को तेरे लिए जाँ भी देनी आए."

Shreya बोली - 
क्या मतलब?

Karan बोला - 
मेरा मतलब है… तुम्हे जरूरत नहीं थी खाना बनाने की।
यहां रोज मैं ही खाना बनाता हूं।
तुमने क्यों तकलीफ की ?

श्रेया (धीमे, सम्मान भरे स्वर में) बोली - 
पता है!
इसलिए सोचा… कुछ अलग कर दूँ।
कल रात आप दोनों ने मुझे comfort दिया…
तो आज मेरी तरफ से… एक छोटा सा thanks.

करन कुछ सेकंड उसे देखता रहता है, थोड़ा सा emotional भी हो जाता है।

करन बोला था 
Shreya… तुम्हे पता है 
हम तुमसे expect कुछ करते नहीं?

श्रेया (मुस्कुराकर) बोली - 
Friends के लिए कुछ भी expect नहीं hota… बस feeling होतीं है।

उसकी बात सुनकर करन के चेहरे पर एक genuine smile फैल जाती है।
कबीर आँखें मलते हुए kitchen में आता है।

कबीर बोला - 
Karan भैया… क्या मचा रखा है।
(वो Shreya को देखता है, चौंक जाता है। वो एक और शायरी बोलता है -)
*"आज रसोई में तुझे देखा तो दिल को बड़ा अजब सा सुकून मिला,
वरना इन चौखटों ने तो सिर्फ़ मेरे भाई की दस्तरख़्वानी ही देखा था।
तेरा ये पहला दिन… और चूल्हे पर तेरी पहली मुस्कान,
यूँ लगा जैसे मेरे घर ने आज सच में एक नूर अपना लिया हो."*

अरे अरे रे … femel chef?
आज तो सूरज west से निकला होगा!

श्रेया (नाराज़ होकर आंखें सिकोड़ती हुई) बोली - 
मैं बस… कुछ बना रही थी।

कबीर (मज़ाक में नाटकीय अंदाज़ में) बोला - 
हमें पता है। 
तुम खुद को भूत से बचाने के बाद अब रसोई पर कब्ज़ा जमाना चाहती हो!

श्रेया उसे हल्के से चम्मच दिखाते हुए धमकाती है।

श्रेया बोली - 
और एक word बोला ना… तो मैं -

कबीर (हंसते हुए) बोला -
तो मैं क्या ?

श्रेया बोला - 
तो मैं ये spoon आपके मुंह में डाल दूंगी।

कबीर (पीछे हटते हुए) बोला - 
नहीं नहीं… peace!
नई frindship शुरू होने से पहले ही war मत शुरू करो यार।

करन शांति से हंस रहा है, दोनों की नोंकझोंक देखकर।

तीनों table पर बैठे हैं। Shreya खाना परोस रही है।

करन बोला - 
Shreya… really… taste बहुत अच्छा है।

कबीर (नाटक करते हुए एक byte लेता है, फिर आँखें बंद करके एक शायरी बोलते हुए) बोला - 
*"तेरे हाथ के ज़ायकों ने आज दिल को बड़ी ख़ुशी से भर दिया,
हर निवाले में जैसे मोहब्बत का कोई रस्म-ओ-अंदाज़ उतर आया।
कसम फ़िज़ाओं की… ये खाना नहीं, तेरी नर्म सी फ़िक्र लगता है,
यूँ लगा पहली बार मुझे—
मेरी ज़िंदगी ने भी एक मीठा सा लुत्फ़ पा लिया है."*
मेरा मतलब - 
वाह…!
ऐसी feeling आ रही… जैसे Swiggy की भतीजी घर में आ गई हो!

श्रेया (हंसते हुए) बोली - 
आप ना… कुछ भी बोलते हो…।

कबीर (शायरी भरे अंदाज में)बोला - 
*"रात भर तेरी ख़ामोशी ने दिल को एक अजीब सा बेचैन रखा,
सुबह तक तेरी हर आहट ने मुझे बस दुआओँ में ही उलझाए रखा।
मगर जब खाने की मेज़ पर तुझे यूँ मुस्कराता देखा,
तो लगा—मेरे घर की हर रौनक आज फिर लौट आई है।"*
मेरा मतलब 
seriously…
कल रात से लेकर सुबह तक…
तुम पहली बार… normal लगी हो।
मेरी तरफ़ से एक शायरी तो बनती है - 

श्रेया थोड़ा शर्मिंदगी से मुस्कुराती है।

करन (softly) बोला - 
हां Shreya… तुम comfortable लग रही हो।
और हमें अच्छा लग रहा है।

Shreya के होंठों पर हल्की, सच्ची सी मुस्कान उभरती है।
तीनों पहली बार family की तरह breakfast खत्म करते हैं—
ना मजबूरी,
ना awkwardness—
बस एक हल्की सी warm beginning।