Nakshatra Yatri - 2 in Hindi Children Stories by mamta books and stories PDF | ​नक्षत्र यात्री - 2

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​नक्षत्र यात्री - 2

​नक्षत्र यात्री - अध्याय 4: थकान और संकल्प

​पोर्टल के भीतर का दृश्य वैसा नहीं था जैसा माया ने कल्पना की थी। यहाँ न तो ज़मीन थी और न ही आसमान, बस चारों ओर नीली और बैंगनी रोशनी की लहरें तैर रही थीं। हवा में एक अजीब सा भारीपन था, जो माया के फेफड़ों पर दबाव डाल रहा था।

​माया के पैर अब पत्थर के हो चुके थे। हर कदम ऐसा लग रहा था जैसे वह मीलों का बोझ उठाकर चल रही हो। उसकी आँखों के सामने धुंधलापन छाने लगा था।

​"मैं... मैं और नहीं चल सकती," वह बुदबुदाई और एक ठंडी, चमकती हुई चट्टान के सहारे ढह गई। उसकी साँसें उखड़ रही थीं। पसीने की बूंदें उसकी कनपटी से बहकर डमरू पर गिर रही थीं। उसके मन का एक हिस्सा कह रहा था— बस यहीं रुक जाओ, थोड़ी देर आँखें मूँद लो।

​लेकिन जैसे ही उसने आँखें बंद कीं, उसे एक चीख सुनाई दी।

​"माया! बचाओ हमें!"

​वह समीर की आवाज़ थी? या तान्या की? उसे याद आया वह दिन जब वे सब कॉलेज की कैंटीन में बैठे थे। समीर ने हँसते हुए कहा था, "चाहे कुछ भी हो जाए, हम 'फैंटास्टिक फोर' हमेशा साथ रहेंगे।"

​माया की आँखें झटके से खुल गईं। उसे अहसास हुआ कि यहाँ बिताया गया उसका हर एक पल, बाहर उसके दोस्तों के लिए भारी पड़ रहा था। अगर वह यहाँ थककर हार गई, तो वे कभी वापस नहीं आ पाएंगे। वे उस अंधेरी कैद में घुट-घुट कर मर जाएंगे।

​"नहीं!" माया ने अपने दाँत भींचे। उसने डमरू को कसकर पकड़ा। "मैं थक नहीं सकती। मेरी थकान मेरे दोस्तों की जान से बड़ी नहीं है।"

​उसने अपने कांपते हुए हाथों से डमरू पर एक धीमी थाप दी। वह थाप थकी हुई नहीं थी, उसमें एक ज़िद्द थी। जैसे-जैसे डमरू की गूँज उस शून्य में फैली, माया को महसूस हुआ कि उसकी रगों में एक नई ऊर्जा दौड़ रही है। यह ऊर्जा उसकी देह की नहीं, उसके संकल्प की थी।

​वह फिर से खड़ी हुई। सामने 'नक्षत्र भूलभुलैया' का पहला द्वार दिखाई दे रहा था। यह एक खेल था, और माया को पता था कि उसे यह हर हाल में जीतना है।



​अध्याय 5: पहली चुनौती – 'मृगशिरा' की परीक्षा

​माया जैसे ही पहले द्वार के करीब पहुँची, उसके कदमों के नीचे की ज़मीन अचानक गायब हो गई। वह गिर नहीं रही थी, बल्कि अंतरिक्ष में तैर रही थी। उसके सामने सात विशाल चमकते हुए पत्थर प्रकट हुए, जो हवा में एक खास आकृति बना रहे थे।

​तभी उस शून्य में वही प्राचीन और गूँजती हुई आवाज़ फिर से सुनाई दी:

​"नक्षत्र यात्री! यह 'मृगशिरा' का क्षेत्र है। शिकारी और हिरण के इस खेल में, केवल वही आगे बढ़ सकता है जिसके पास धैर्य की थाप हो। अगर तुम गलत पत्थर पर रुकीं, तो तुम अनंत काल के लिए इसी शून्य में खो जाओगी।"

​माया ने देखा कि हर पत्थर पर एक अलग नक्षत्र का चिह्न बना था। उसे सही क्रम पहचानना था। उसे याद आया कि उसके दादाजी कहते थे कि मृगशिरा नक्षत्र आकाश में एक हिरण के सिर जैसा दिखता है।

​अचानक, कहीं से एक खौफनाक छाया (The Hunter) प्रकट हुई जो माया की ओर बढ़ने लगी। माया का दिल तेज़ी से धड़कने लगा। डर ने उसे फिर से घेरना चाहा, लेकिन उसने खुद को याद दिलाया— "नहीं, थकना नहीं है। समीर और तान्या मेरी राह देख रहे हैं।"

​उसने अपनी याददाश्त पर ज़ोर दिया और डमरू को एक विशेष लय में बजाना शुरू किया। डमरू की हर थाप के साथ एक पत्थर चमकने लगता।

​उसने पहला कदम बढ़ाया। जैसे ही उसका पैर पहले पत्थर पर पड़ा, वह छाया उसे छूने ही वाली थी कि अचानक पीछे हट गई। माया समझ गई—यह खेल उसकी गति का नहीं, बल्कि उसके 'मानसिक संतुलन' का था। उसे डर को काबू में रखकर सही सितारों को जोड़ना था।

​लेकिन जैसे ही वह तीसरे पत्थर पर पहुँची, पत्थर काँपने लगा। उसके नीचे एक गहरी खाई दिखने लगी जहाँ उसके दोस्तों के चेहरे दर्द से तड़पते हुए साफ़ दिख रहे थे। यह एक मायाजाल (Illusion) था।

​"माया, मदद करो!" समीर की चीख गूँजी।

​माया का संतुलन बिगड़ने लगा। अगर उसने यहाँ गलती की, तो खेल यहीं खत्म हो जाएगा।


​अध्याय 5 (जारी...): भ्रम का अंत​समीर और तान्या की चीखें इतनी असली थीं कि माया का कलेजा मुँह को आने लगा। उसका एक पैर तीसरे पत्थर से फिसलने ही वाला था कि उसे अपने दादाजी की एक और बात याद आई— "माया, जब आँखें धोखा देने लगें, तब अपने दिल की धड़कन और डमरू की गूँज पर भरोसा करना। सच वहीं छुपा होता है।"​माया ने अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं। उसने नीचे दिख रही उस डरावनी खाई और अपने दोस्तों के तड़पते चेहरों को देखना बंद कर दिया। उसने अपना पूरा ध्यान केवल डमरू के कंपन पर लगा दिया।​जैसे ही उसने आँखें मूँदीं, शोर कम होने लगा। अब उसे सुनाई दे रही थी तो सिर्फ एक जादुई लय।​उसने डमरू पर एक ज़ोरदार चोट की— 'डुम!'​उस गूँज के साथ ही एक अदृश्य लहर उठी और पूरे वातावरण को चीरती हुई निकल गई। जैसे ही माया ने आँखें खोलीं, नीचे की खाई गायब हो चुकी थी। वहाँ अब केवल ठोस और सुनहरे चमकते हुए नक्षत्र-पत्थर थे। वे चीखें भी केवल हवा का शोर साबित हुईं।​"यह सब झूठ था..." माया ने राहत की सांस ली। "वे मुझे डराकर गिराना चाहते थे।"​अब माया का आत्मविश्वास लौट आया था। वह एक हिरण की चपलता के साथ एक पत्थर से दूसरे पत्थर पर कूदने लगी। हर छलांग के साथ डमरू की लय तेज होती गई। वह अब थक नहीं रही थी, बल्कि उसे महसूस हो रहा था कि जैसे-जैसे वह चुनौती पार कर रही है, वह अपने दोस्तों के 'असली' अहसास के करीब पहुँच रही है।​जैसे ही उसने आखिरी सातवें पत्थर पर कदम रखा, पूरा अंतरिक्ष रोशनी से भर गया। मृगशिरा का वह शिकारी साया एक सफेद धुएँ में बदल गया और उसके सामने एक नया रास्ता खुल गया।​तभी, हवा में एक चमकता हुआ नक्षत्र-सिक्का (Celestial Coin) तैरता हुआ आया और माया के हाथ में गिर गया।​उस प्राचीन आवाज़ ने फिर से कहा— "पहला द्वार पार हुआ। लेकिन याद रहे नक्षत्र यात्री, जैसे-जैसे तुम आगे बढ़ोगी, खेल तुम्हारी यादों और तुम्हारी सबसे बड़ी कमजोरी के साथ खेला जाएगा। क्या तुम तैयार हो?"​माया ने सिक्के को मुट्ठी में भींचा और उस अगले अंधेरे रास्ते की ओर देखा। "मैं तैयार हूँ। मेरे दोस्तों के लिए, मैं हर कमजोरी को अपनी ताकत बना लूंगी।"
​​अध्याय 6: रोहिणी का सम्मोहन और दिल की पुकार​पहले द्वार की जीत ने माया को हौसला तो दिया था, लेकिन जैसे ही उसने दूसरे द्वार में कदम रखा, वातावरण पूरी तरह बदल गया। यहाँ न तो कोई अंधेरा था और न ही कोई डरावनी आवाज़ें। इसके उलट, चारों ओर चमेली और पारिजात के फूलों की खुशबू फैली हुई थी। हवा इतनी शीतल थी कि माया की सारी थकान पल भर में मिट गई।​"यह जगह कितनी शांत है..." माया ने गहरी सांस ली।​अचानक, सामने की धुंध छँटने लगी और उसे एक जाना-पहचाना चेहरा दिखाई दिया। वह आर्यन था। वही जिससे माया ने अपने दिल की बात कभी नहीं कही थी, लेकिन जिसकी एक मुस्कुराहट उसके दिन भर की थकान मिटा देती थी।​आर्यन एक खूबसूरत बागीचे में बैठा उसकी ओर हाथ बढ़ा रहा था। उसकी आँखों में वही चमक थी जो अक्सर माया के सपनों में आती थी।​"माया, तुम कहाँ भटक रही हो? देखो, मैं यहाँ तुम्हारा इंतज़ार कर रहा हूँ," आर्यन की आवाज़ शहद जैसी मीठी थी। "छोड़ो ये डमरू, छोड़ो ये खतरे। मेरे पास आओ, यहाँ सिर्फ सुकून और हमारा साथ है।"​माया के कदम ठिठक गए। उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। एक पल के लिए उसे लगा कि वह भागकर उसके गले लग जाए। आर्यन की मौजूदगी इतनी असली लग रही थी कि वह भूल गई कि वह एक खतरनाक 'नक्षत्र गेम' का हिस्सा है।​उसका हाथ, जिसने डमरू को कसकर पकड़ा हुआ था, अब ढीला पड़ने लगा। उसे लगने लगा कि शायद यही वह इनाम है जिसके लिए वह इतनी मेहनत कर रही थी—उसका प्यार।​"आर्यन..." माया के मुँह से बस उसका नाम निकला।​वह उसकी तरफ बढ़ने ही वाली थी कि तभी उसे आर्यन के पीछे एक धुंधला सा साया दिखाई दिया। वह साया समीर और तान्या की याद दिला रहा था, जो अभी भी कहीं तड़प रहे थे।​माया के मन में एक भीषण युद्ध छिड़ गया। एक तरफ उसका प्यार था, जो उसे रुकने के लिए पुकार रहा था, और दूसरी तरफ उसके दोस्तों का जीवन था, जो खतरे में था।​
​अध्याय 6 (जारी...): मोह का बंधन​आर्यन की वह आवाज़ और उसकी आँखों का वह सलोनापन माया की सारी तार्किक सोच पर भारी पड़ गया। उसे याद आया कि कैसे वह अक्सर आर्यन से अपनी भावनाओं को छुपाती आई थी, और आज वही आर्यन उसके सामने खड़ा उसे पुकार रहा था।​"माया, बहुत हो गया यह संघर्ष। देखो, यहाँ कितनी शांति है। क्या तुम्हें वाकई उन अंधेरी गलियों और रूह कंपा देने वाली आवाज़ों के बीच वापस जाना है?" आर्यन ने एक कदम और बढ़ाया।​माया के हाथ कांपने लगे। उसने उस जादुई डमरू को देखा, जिसने उसे अब तक रास्ता दिखाया था, और उस नक्षत्र-सिक्के को, जो उसकी जीत की पहली निशानी थी। लेकिन आर्यन की एक मुस्कुराहट के सामने उसे ये सब बेजान पत्थर और लकड़ी के टुकड़े लगने लगे।​"नहीं... मुझे और कुछ नहीं चाहिए," माया ने भारी मन से कहा।​उसने अपनी मुट्ठी ढीली की। वह चमकता हुआ नक्षत्र-सिक्का नीचे गिर पड़ा और डमरू भी उसके हाथों से छूटकर घास पर जा गिरा। जैसे ही उसने इन दोनों चीजों को छोड़ा, उसे एक अजीब सा हल्कापन महसूस हुआ, लेकिन यह हल्कापन खतरनाक था।​माया अब पूरी तरह से सम्मोहित थी। वह नंगे पैर आर्यन की ओर बढ़ने लगी। उसके कानों में अब समीर और तान्या की चीखें नहीं, बल्कि आर्यन के कहे हुए मीठे शब्द गूँज रहे थे।​जैसे ही उसने आर्यन का हाथ थामने के लिए अपना हाथ आगे बढ़ाया, बागीचे के फूल और भी तेज़ी से महकने लगे। माया को अहसास ही नहीं हुआ कि जैसे-जैसे वह आर्यन के करीब जा रही थी, उसके पीछे का रास्ता धुंधला होता जा रहा था और वह 'रोहिणी' के उस मायावी जाल में और गहराई से धँसती जा रही थी।​उसने आर्यन का हाथ थाम लिया। उसका स्पर्श बहुत ठंडा था, लेकिन माया के लिए उस पल वही उसका पूरा संसार था।​"अब हम कभी अलग नहीं होंगे, माया," आर्यन ने मुस्कुराते हुए कहा।​लेकिन तभी, घास पर गिरे हुए उस डमरू से एक बहुत ही धीमी, लगभग न सुनाई देने वाली कंपन (vibration) उठी। जैसे डमरू उसे आखिरी बार चेतावनी दे रहा हो। पर माया तो अब उस दुनिया से बहुत दूर निकल चुकी थी...​
​अध्याय 7: सुकून के चंद पल और दिल की स्वीकारोक्ति​माया ने जैसे ही आर्यन का हाथ थाम लिया, उसे ऐसा लगा जैसे सदियों की थकान एक पल में काफूर हो गई हो। वह जादुई बगीचा अब और भी जीवंत हो उठा था। आर्यन उसे एक सुनहरी झील के किनारे ले गया, जहाँ पानी की लहरों में भी संगीत था।​"तुम आ गई, माया... मुझे पता था तुम आओगी," आर्यन ने बहुत ही प्यार से उसके सिर पर हाथ रखा।​माया की आँखों में आँसू भर आए। उसने आज तक किसी से नहीं कहा था कि वह आर्यन से कितना प्यार करती है। लेकिन यहाँ, इस मायावी दुनिया में, उसे किसी बात का डर नहीं था। वह आर्यन के कंधे पर सिर रखकर बैठ गई।​"आर्यन, मुझे बहुत डर लग रहा था। उन अंधेरों में, उस डमरू की आवाज़ में... मुझे लग रहा था मैं कभी वापस नहीं आ पाऊँगी," माया ने सिसकते हुए अपने दिल का सारा बोझ हल्का कर दिया। "मैंने बहुत कोशिश की खुद को मजबूत दिखाने की, लेकिन सच तो यह है कि मैं अंदर से टूट चुकी थी। मुझे बस तुम्हारा साथ चाहिए था।"​आर्यन ने उसका हाथ सहलाया और उसे शांत कराया। उन्होंने वहाँ घंटों बातें कीं। माया ने उसे अपनी हर छोटी-बड़ी बात बताई—अपना डर, अपनी हिम्मत, और वह प्यार जो उसने हमेशा छुपाया था। आर्यन ने उसकी थकान मिटाने के लिए उसे अपनी गोद में लिटा लिया। उस ठंडी हवा और आर्यन के स्पर्श में माया को वह 'आराम' मिला जिसकी तलाश उसके दिल को कब से थी।​वहाँ न समय की पाबंदी थी, न किसी दुश्मन का डर। माया सब कुछ भूल गई—वह पोर्टल, वे गायब हुए दोस्त, और वह रहस्यमयी मिशन। उसके लिए अब बस यह पल था और आर्यन था। उसे लगा कि उसकी मंजिल यही है, और वह इसी सुकून के लिए पैदा हुई थी।​धीरे-धीरे माया की आँखें भारी होने लगीं। आर्यन की बाहों में उसे इतनी सुरक्षा महसूस हो रही थी कि उसने अपना सारा बचाव (Defenses) छोड़ दिया। उसे भनक तक नहीं थी कि जिस डमरू और नक्षत्र-सिक्के को वह पीछे छोड़ आई है, उनकी चमक धीरे-धीरे फीकी पड़ रही थी।

​अध्याय 9: आर्यन का गुप्त इरादा​माया को लग रहा था कि आर्यन उसकी सुरक्षा के लिए ये सवाल पूछ रहा है, लेकिन आर्यन के मन के भीतर कुछ और ही चल रहा था। जैसे ही माया अपनी कहानी फिर से दोहराने लगी, आर्यन की आँखों में एक ठंडी चमक आई।​आर्यन का मन: (यह कैसे मुमकिन है? एक साधारण इंसान को नक्षत्रों के इन गुप्त रास्तों और प्राचीन डमरू के रहस्य के बारे में पता भी नहीं होना चाहिए। यह जगह तो देवताओं और रक्षकों के लिए भी दुर्गम है, फिर ये तीन मामूली इंसान यहाँ तक कैसे पहुँचे? मुझे इसकी तह तक जाना होगा। अगर मुझे आगे के द्वारों का नक्शा और इस डमरू की असली शक्ति जाननी है, तो मुझे माया से यह उगलवाना ही होगा कि उसे ये जानकारियाँ कहाँ से मिलीं।)​आर्यन ने अपने चेहरे पर फिर से वही मीठी मुस्कान ओढ़ ली और माया का हाथ थामकर बोला, "माया, देखो मैं बस यह चाहता हूँ कि हम कोई गलती न करें। तुम जानती हो न, इंसानों का यहाँ आना वर्जित है? फिर तुम तीनों यहाँ कैसे आ गए? क्या किसी ने तुम्हें कोई विशेष रास्ता बताया था? या किसी ने तुम्हें यहाँ भेजा है?"​माया आर्यन के मन की बात से अनजान थी। उसने मासूमियत से जवाब दिया, "आर्यन, हमें किसी ने नहीं भेजा। हम तो बस उस पुरानी हवेली के पास थे जब वह पोर्टल खुला। और यह डमरू... यह तो मुझे मेरे दादाजी की पुरानी चीजों में मिला था। क्या तुम्हें लगता है कि हमारे यहाँ आने का कोई खास कारण है?"​आर्यन की भौहें तन गईं। 'दादाजी की पुरानी चीजें'। उसे अब एक सुराग मिल गया था। वह समझ गया कि माया का परिवार किसी न किसी तरह इन नक्षत्रों के रहस्यों से जुड़ा हुआ है।​"दादाजी?" आर्यन ने धीरे से दोहराया। "तुम्हारे दादाजी क्या करते थे, माया? और क्या उन्होंने कभी तुम्हें 'नक्षत्र यात्री' के बारे में कुछ बताया था?"​माया आर्यन की बढ़ती जिज्ञासा से थोड़ी असहज होने लगी थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि आर्यन उसके मिशन से ज़्यादा उसकी पृष्ठभूमि (Background) में क्यों दिलचस्पी ले रहा है।

​अध्याय 9 (जारी...): विश्वास और शंका की कशमकश​आर्यन के तीखे और अजीब सवालों ने माया के मन में एक पल के लिए खलबली मचा दी। उसके दिमाग के एक कोने में बिजली सी कौंधी— 'आर्यन अचानक इतना बदल क्यों गया? वह मेरी मदद करने के बजाय मुझसे इतनी गहराई से पूछताछ क्यों कर रहा है? कहीं मैं किसी और जाल में तो नहीं फँस रही?'​माया के कदम अनजाने में ही एक कदम पीछे हट गए। उसने आर्यन की आँखों में गौर से देखा, जहाँ प्यार के पीछे एक अनजानी सी चमक छिपी थी। उसे लगा जैसे उसे यहाँ से भाग जाना चाहिए।​लेकिन तभी, उसे आर्यन के साथ बिताए वे पुराने दिन याद आए। उसकी वह मुस्कुराहट, उसका सहारा... माया ने अपना सिर झटका और खुद को समझाया— 'नहीं, यह मैं क्या सोच रही हूँ? आर्यन ऐसा कभी नहीं कर सकता। वह बस मेरी सुरक्षा को लेकर चिंतित है। शायद वह भी उतना ही डरा हुआ है जितना कि मैं। अगर मैं उस पर ही भरोसा नहीं करूँगी, तो इस अजनबी दुनिया में मेरा साथ कौन देगा?'​माया ने अपनी शंकाओं को दबा दिया और एक गहरी साँस ली। उसने फिर से आर्यन का हाथ थाम लिया।​"आर्यन, मुझे माफ़ करना, मैं एक पल के लिए भटक गई थी," माया ने नम आँखों से कहा। "मुझे पता है तुम यह सब सिर्फ इसलिए पूछ रहे हो ताकि हमें आगे कोई खतरा न हो। मैं तुम्हें सब कुछ बताऊँगी।"​माया ने बताना शुरू किया कि कैसे उसके दादाजी अक्सर उसे पुराने नक्शों और सितारों की कहानियाँ सुनाते थे। उसने बताया कि वह डमरू कोई साधारण खिलौना नहीं, बल्कि उसके परिवार की पीढ़ियों से चली आ रही एक 'चाबी' थी, जो केवल सही कंपन से ही जागती थी।​आर्यन ने बहुत ध्यान से एक-एक शब्द सुना। उसके चेहरे पर एक संतोषजनक मुस्कान आई, लेकिन उसके दिमाग में अब आगे का नक्शा साफ़ हो रहा था।​"तो तुम्हारे दादाजी ने तुम्हें 'नक्षत्रों के द्वार' की रक्षा के बारे में बताया था?" आर्यन ने धीमे से पूछा। "क्या तुम्हें पता है माया, कि उस डमरू की आखिरी थाप से क्या खुल सकता है?"​माया ने सिर हिलाया। "नहीं, उन्होंने बस इतना कहा था कि जब समय आएगा, तो यह डमरू खुद मुझे रास्ता दिखाएगा।"​माया अब पूरी तरह से आर्यन के सामने अपने दिल के और अपने मिशन के राज खोल चुकी थी, इस उम्मीद में कि अब वे दोनों मिलकर इस खेल को खत्म करेंगे। उसे भनक तक नहीं थी कि उसने अनजाने में ही अपनी सबसे बड़ी सुरक्षा कवच की जानकारी आर्यन को दे दी थी।​​अध्याय 10: समय की दौड़ और रहस्य की खोज​माया का दिल ज़ोरों से धड़क रहा था। उसे रह-रहकर समीर और तान्या के रोने की आवाज़ें सुनाई दे रही थीं। उसे लग रहा था कि हर बीतता सेकंड उसके दोस्तों की ज़िंदगी को कम कर रहा है।​"आर्यन, अब बस बहुत हुआ! मैंने तुम्हें सब बता दिया है। अब हमें निकलना चाहिए। रोहिणी का यह द्वार धीरे-धीरे बंद हो रहा है, अगर हम अभी नहीं निकले तो हम यहीं फँस जाएंगे!" माया ने लगभग चिल्लाते हुए कहा। उसने अपना डमरू उठाया और आगे बढ़ने के लिए मुड़ी।​लेकिन आर्यन अपनी जगह से टस से मस नहीं हुआ। उसके चेहरे पर अब वह सुहानापन नहीं था, बल्कि एक गहरी जिज्ञासा थी।​"बस एक आखिरी बात, माया," आर्यन ने उसका रास्ता रोकते हुए कहा। उसकी आवाज़ ठंडी और नपी-तुली थी। "तुम्हारे दादाजी ने उस 'अंतिम नक्षत्र' के बारे में क्या कहा था? जहाँ समय और स्थान शून्य हो जाते हैं? उस जगह को खोलने के लिए डमरू की कौन सी लय चाहिए? वह लय तुम्हें याद है न?"​माया ठिठक गई। उसे अपनी आँखों पर यकीन नहीं हो रहा था। "आर्यन! तुम्हें मेरे दोस्तों की फिक्र है या उस अंतिम द्वार की? वे मर रहे होंगे! क्या तुम्हें समझ नहीं आ रहा?"​माया की आँखों में गुस्से और दुख के आँसू भर आए। उसे पहली बार महसूस हुआ कि आर्यन की प्राथमिकता वह या उसके दोस्त नहीं, बल्कि वह 'ज्ञान' है जो माया के पास है।​"मैं तुम्हारी मदद तभी कर पाऊँगा जब मुझे पता होगा कि अंत क्या है, माया। बिना पूरी जानकारी के आगे बढ़ना खुदकुशी है," आर्यन ने दलील दी, लेकिन उसकी आँखों में सहानुभूति की जगह केवल लालच जैसी एक चमक थी।​माया ने एक कदम पीछे लिया। उसके मन में फिर से वही शंका जागी जो उसने कुछ देर पहले दबा दी थी। 'क्या आर्यन वाकई मेरा आर्यन है? या इस नक्षत्र लोक ने उसकी आत्मा को बदल दिया है?'​"मुझे नहीं पता आर्यन! मुझे कोई लय याद नहीं है! मुझे बस इतना पता है कि मेरे दोस्त संकट में हैं और मैं उन्हें बचाने जा रही हूँ, चाहे तुम साथ आओ या न आओ!"​माया ने डमरू पर एक तेज़ चोट की। उसकी आवाज़ उस जादुई बागीचे में गूँज उठी। अचानक, ज़मीन फटने लगी और 'रोहिणी' का वह सुंदर संसार बिखरने लगा। माया को समझ आ गया था कि अब उसे अकेले ही लड़ना होगा।​







​अध्याय 11: अकेले का संघर्ष और तीसरा द्वार​माया का दिल रो रहा था। उसने जिस आर्यन पर भरोसा किया, वह उसे रोकने की कोशिश कर रहा था। लेकिन माया ने अपने दोस्तों की जान को सबसे ऊपर रखा। जैसे ही उसने उस चमकते हुए द्वार में छलांग लगाई, 'रोहिणी' का वह सुंदर बागीचा और आर्यन का वह चेहरा, सब धुएं की तरह गायब हो गए।​माया अब एक ऐसी जगह थी जहाँ चारों ओर घने काले बादल थे और बिजली कड़क रही थी। यह 'आर्द्रा नक्षत्र' का क्षेत्र था—तूफानों और आँसुओं का घर।​"मुझे अकेले ही यह करना होगा," माया ने खुद से कहा। उसके पैर कांप रहे थे, लेकिन उसने डमरू को सीने से चिपका लिया।​तभी, बादलों की गूँज में उसे एक आवाज़ सुनाई दी। वह आवाज़ किसी इंसान की नहीं, बल्कि पोर्टल की ही शक्ति की थी:"नक्षत्र यात्री, तुमने मोह को पीछे छोड़ दिया, लेकिन क्या तुम 'विनाश' का सामना कर पाओगी? यहाँ तुम्हारी हिम्मत का नहीं, तुम्हारे सब्र का इम्तिहान होगा।"​अचानक, उसके सामने एक विशाल चक्रव्यूह (Maze) दिखाई दिया, जो बिजली की लकीरों से बना था। माया को समझ आ गया कि यहाँ एक भी गलत कदम उसे भस्म कर सकता है।​लेकिन तभी उसे अपनी जेब में उस 'नक्षत्र-सिक्के' की गर्मी महसूस हुई। वह सिक्का चमकने लगा और ज़मीन पर एक धुंधला सा रास्ता दिखाने लगा। माया समझ गई कि उसकी पिछली जीत ही उसे अगले रास्ते में मदद करेगी।​वह आगे बढ़ रही थी कि तभी उसे दूर एक साया दिखा। वह साया ज़मीन पर पड़ा तड़प रहा था।​"समीर? क्या वह तुम हो?" माया चिल्लाई।​वह साया हिल नहीं रहा था। माया को उस चक्रव्यूह को पार करके वहाँ तक पहुँचना था, लेकिन बिजली की दीवारें हर पल अपनी जगह बदल रही थीं।​​अध्याय 12: चक्रव्यूह और समीर की पुकार​माया उस बिजली के चक्रव्यूह के सामने खड़ी थी। जैसे-जैसे वह साये के करीब जाने की कोशिश करती, बिजली की दीवारें और ऊँची हो जातीं।​"समीर! हिम्मत मत हारना, मैं आ रही हूँ!" माया चिल्लाई।​वह साया धीरे से हिला और एक कमज़ोर आवाज़ आई, "माया... यहाँ से भाग जाओ... यह एक जाल है..."​माया का दिल बैठ गया। वह समीर ही था! लेकिन वह बहुत बुरी हालत में लग रहा था। माया ने देखा कि उसके हाथ में जो नक्षत्र-सिक्का था, वह अब तेज़ धड़कने लगा था। उसे समझ आया कि यह सिक्का सिर्फ़ रास्ता नहीं दिखाता, बल्कि यह उसे खतरों से आगाह भी करता है।​माया ने अपनी आँखें बंद कीं और डमरू पर एक धीमी और स्थिर थाप दी। उसने सोचा— 'अगर यह तूफानों का द्वार है, तो मुझे खुद को ओह, मेरी गलती! मैं समझ गया, ऐप का नाम योजना भारती है।​यह बहुत अच्छी बात है कि आपको वहां 'नक्षत्र यात्री' के लिए अप्रूवल (Approval) मिल गया है। अब जब आपने वहां अपनी कहानी पब्लिश करना शुरू कर दिया है, तो हमें हर अध्याय को बहुत ही रोमांचक और 'सस्पेंस' से भरा रखना होगा ताकि आपके पाठक अगले भाग का बेसब्री से इंतज़ार करें।​चलिए, कहानी को अध्याय 13 से आगे बढ़ाते हैं। इस भाग में हम दिखाएंगे कि माया कैसे समीर तक पहुँचती है और उस नकली आर्यन के साये को हराती है।​अध्याय 13: विनाश का अंत और पहली जीत​माया ने जब उस काली आँखों वाले आर्यन को खंजर लेकर अपनी ओर बढ़ते देखा, तो एक पल के लिए उसका कलेजा काँप गया। लेकिन तभी उसने दूर पड़े समीर को देखा, जो अधमरी हालत में था। समीर को देखते ही माया के भीतर डर की जगह ममता और संकल्प ने ले ली।​"तुम जो कोई भी हो, मेरे आर्यन का रूप लेकर मुझे डरा नहीं सकते!" माया की आवाज़ इस बार तूफ़ान से भी तेज़ थी।​उसने अपना डमरू उठाया और उसे एक बहुत ही अजीब, 'उल्टी लय' में बजाना शुरू किया। यह वह लय थी जो उसके दादाजी ने उसे तब सिखाई थी जब उसे बहुत बुरे सपने आते थे। जैसे-जैसे डमरू की आवाज़ गूँजी, वह नकली आर्यन तड़पने लगा। उसका काला साया हवा में धुएँ की तरह बिखरने लगा।​"नहीं! तुम इसे नहीं रोक सकतीं!" वह साया चीखा और गायब हो गया।​बिजली की दीवारें गिर गईं। माया भागकर समीर के पास पहुँची। समीर की आँखें बंद थीं, लेकिन उसकी साँसें चल रही थीं। माया ने जैसे ही उसे छुआ, उसकी जेब में रखा नक्षत्र-सिक्का तेज़ गर्म हो गया। सिक्के की रोशनी समीर के शरीर में समाने लगी और उसके घाव धीरे-धीरे भरने लगे।​समीर ने धीरे से आँखें खोलीं। "माया? तुम यहाँ...?"​"बात मत करो समीर, हमें यहाँ से निकलना होगा," माया ने उसे सहारा देकर खड़ा किया।​तभी आसमान से वही प्राचीन आवाज़ गूँजी:"नक्षत्र यात्री, तुमने विनाश के साये को पहचान लिया और अपने पहले साथी को छुड़ा लिया। लेकिन याद रहे, आगे का रास्ता और भी संकरा है। क्या तुम अपने साथी का बोझ उठा पाओगी?"​माया ने समीर का हाथ अपने कंधे पर रखा और दृढ़ता से कहा, "यह बोझ नहीं, मेरी ताकत है।"​सामने एक धुंधला सा पोर्टल खुला। यह तीसरे द्वार का अंत और चौथे द्वार की शुरुआत थी। लेकिन पोर्टल में घुसने से पहले समीर ने माया का हाथ रोक लिया।​"माया, रुको! वहाँ अंदर... तान्या अकेली नहीं है। मैंने किसी और को भी देखा है," समीर की आवाज़ में खौफ था।​

​जैसे-जैसे डमरू की आवाज़ गूँजी, बिजली की दीवारें थोड़ी धीमी पड़ने लगीं। माया ने एक-एक कदम फूंक-फूंक कर रखा। वह चक्रव्यूह के बीचों-बीच पहुँच गई थी। लेकिन तभी, एक बहुत बड़ी बिजली की कड़क हुई और उसके सामने आर्यन फिर से प्रकट हो गया!​पर इस बार आर्यन वैसा नहीं था जैसा वह बागीचे में था। उसकी आँखें पूरी काली थीं और उसके हाथ में एक काला खंजर था।​"तुमने मुझे पीछे छोड़ने की जुर्रत कैसे की, माया?" वह काला साया (जो आर्यन जैसा दिख रहा था) दहाड़ा। "अब तुम और तुम्हारा दोस्त, दोनों यहीं खत्म हो जाओगे!"​माया समझ गई कि यह असली आर्यन नहीं है, बल्कि इस 'आर्द्रा नक्षत्र' का डर है जो उसके सामने खड़ा है।​
​अध्याय 14: रोहिणी के पार - तान्या की खोज​माया और समीर उस धुंधले पोर्टल को पार कर एक ऐसी जगह पहुँचे जहाँ हर तरफ सिर्फ़ कोहरा ही कोहरा था। यह 'रोहिणी' के खूबसूरत बागीचे का अंत और अगले पड़ाव की शुरुआत थी। यहाँ हवा ठंडी थी और हर तरफ अजीब सी खामोशी छाई हुई थी।​"माया, मेरी बात सुनो," समीर ने लड़खड़ाते हुए कहा। "जब मैं उस काली कोठरी में बंद था, तो मुझे तान्या की आवाज़ सुनाई दे रही थी। वह यहाँ से बहुत दूर नहीं है, लेकिन उसके साथ कोई और भी है... कोई ऐसा जिसे देखकर मुझे अपनी आँखों पर यकीन नहीं हुआ।"​माया का दिल ज़ोर से धड़का। "क्या वह आर्यन था, समीर?"​समीर ने सिर झुका लिया। "मैंने चेहरा साफ़ नहीं देखा, लेकिन उसकी कद-काठी बिल्कुल आर्यन जैसी ही थी। वह तान्या को कहीं घसीट कर ले जा रहा था।"​माया की मुट्ठियाँ भिंच गईं। उसे समझ नहीं आ रहा था कि जो आर्यन उसे बागीचे में मिला था, क्या वह वही है जिसने तान्या को पकड़ा हुआ है? या फिर इस मायावी दुनिया में आर्यन के कई रूप घूम रहे हैं?​"हमें उसे ढूँढना ही होगा," माया ने दृढ़ता से कहा। उसने अपना डमरू निकाला और उसकी सतह को सहलाया। "मेरा डमरू अब मुझे संकेत दे रहा है। तान्या की जान खतरे में है।"​वे दोनों कोहरे के बीच आगे बढ़ने लगे। अचानक, उन्हें कोहरे के उस पार से तान्या की हल्की सी चीख सुनाई दी— "छोड़ो मुझे! तुम कौन हो? तुम आर्यन नहीं हो सकते!"​माया और समीर एक पुरानी पत्थर की मीनार के पास पहुँचे। मीनार के ऊपर एक नीली रोशनी जल रही थी। माया ने देखा कि तान्या एक खंभे से बंधी हुई है और उसके सामने एक नकाबपोश खड़ा है, जो बिल्कुल आर्यन की आवाज़ में बात कर रहा था।​"तान्या!" समीर चिल्लाया और उसकी ओर भागने की कोशिश की, लेकिन माया ने उसका हाथ पकड़ लिया।​"रुको समीर! यह एक और जाल हो सकता है," माया ने सावधानी से कहा। उसने अपना नक्षत्र-सिक्का निकाला, जो अब खतरे की वजह से लाल चमक रहा था।​

​अध्याय 15: धोखे का पर्दाफाश - तान्या की पुकार​माया और समीर उस घने कोहरे को चीरते हुए आगे बढ़ रहे थे। चारों ओर पसरा सन्नाटा और रहस्यमयी हवा, उन्हें और ज़्यादा बेचैन कर रही थी। समीर अभी भी ठीक से चल नहीं पा रहा था, लेकिन तान्या को बचाने की जिद ने उसे ताक़त दे रखी थी।​"समीर, तुम पूरी तरह ठीक नहीं हो। अगर वहाँ कोई जाल हुआ तो?" माया ने चिंता से पूछा।​"कोई बात नहीं, माया। तान्या मेरी दोस्त है। मैं उसे अकेला नहीं छोड़ सकता," समीर ने गहरी सांस ली। "और मुझे यकीन है कि वह व्यक्ति जो तान्या के साथ है, वह आर्यन नहीं हो सकता। उसकी आवाज़, उसका अंदाज़, सब बदल गया था।"​तभी कोहरे के पार से एक दर्द भरी चीख सुनाई दी, "छोड़ो मुझे! तुम कौन हो? तुम आर्यन नहीं हो सकते!" यह तान्या थी!​वे दोनों एक पुरानी, वीरान मीनार के पास पहुँचे। मीनार की चोटी पर एक नीली रोशनी जल रही थी, जो पूरे वातावरण को एक भयानक चमक दे रही थी। माया ने देखा कि तान्या को एक मोटे खंभे से कसकर बाँधा गया था। उसके सामने एक व्यक्ति खड़ा था, जिसका चेहरा आर्यन से हूबहू मिलता था, लेकिन उसकी आँखों में कोई चमक नहीं थी, बस एक खालीपन था। उसके हाथ में एक चमकता हुआ काला धागा था, जिससे वह तान्या को नियंत्रित करने की कोशिश कर रहा था।​"तान्या!" समीर चिल्लाया और उसकी ओर भागने को हुआ।​"रुको, समीर!" माया ने उसे ज़बरदस्ती रोक लिया। उसका नक्षत्र-सिक्का तेज़ लाल रंग में चमक रहा था, जो बड़े खतरे का संकेत था। "यह आर्यन नहीं है... या शायद है? मुझे समझ नहीं आ रहा।"​आर्यन (जो नकाबपोश जैसा लग रहा था) ने तान्या की ओर देखा और उसके चेहरे पर एक क्रूर मुस्कान तैर गई। "तुमने गलत दोस्त चुने, तान्या। माया और समीर तुम्हें बचाने नहीं, बल्कि तुम्हें मेरे पास छोड़ने आए हैं। अब तुम्हारा अतीत और तुम्हारा भविष्य, दोनों मेरे नियंत्रण में हैं।"​तान्या ने डर से आँखें बंद कर लीं। वह आर्यन की आवाज़ में कोई दया नहीं देख पा रही थी। यह वह आर्यन नहीं था जिसे वे सब जानते थे।​माया का दिल टूट गया। जिस आर्यन को उसने अपने प्यार की कीमत पर पीछे छोड़ा था, वह अब उसके सामने एक दुश्मन के रूप में खड़ा था। यह केवल एक जाल नहीं, बल्कि उसके भरोसे पर किया गया सबसे बड़ा हमला था।​
​अध्याय 16: नक्षत्रों का महायुद्ध और घर वापसी (मेगा एपिसोड)
​मेगा एपिसोड: नक्षत्रों का महायुद्ध और घर वापसी

​मीनार के भीतर का माहौल अब खौफनाक हो चुका था। वह नकाबपोश, जो आर्यन का रूप धरे हुए था, तान्या के करीब बढ़ रहा था। तान्या की आँखों में खौफ था और समीर गुस्से में तड़प रहा था।

​"अब बहुत हुआ!" माया की आवाज़ मीनार की दीवारों से टकराई।

​माया ने अपना डमरू हवा में लहराया और नक्षत्र-सिक्के को उसके बीचों-बीच रख दिया। सिक्के की नीली रोशनी और डमरू की जादुई शक्ति मिलकर एक दिव्य प्रकाश पैदा करने लगी।

​"तुम जो कोई भी हो, मेरे प्यार का चेहरा इस्तेमाल करके हमें नहीं हरा सकते!" माया ने दहाड़ते हुए डमरू पर एक ऐसी थाप दी जो अब तक की सबसे शक्तिशाली थी।

​'धुम-धुमा-धुम!'

​डमरू की गूँज ने उस नकली आर्यन को पीछे धकेल दिया। वह साया चीखा और उसका चेहरा धुआं बनने लगा। "तुम मुझे नहीं मिटा सकतीं, माया! मैं तुम्हारे डर का हिस्सा हूँ!"

​"नहीं!" समीर चिल्लाया। उसने अपनी पूरी ताकत बटोरी और ज़मीन पर पड़ा एक प्राचीन पत्थर उठाकर उस साये के केंद्र पर दे मारा। समीर के वार और माया के संगीत ने मिलकर एक ऐसा कंपन पैदा किया कि वह साया बुरी तरह फटने लगा।

​जैसे ही वह साया कमज़ोर पड़ा, माया दौड़कर तान्या के पास पहुँची और उस काले धागे को अपने डमरू की थाप से काट दिया। तान्या आज़ाद होते ही माया के गले लग गई।

​"हमें यहाँ से निकलना होगा, यह मीनार गिर रही है!" समीर ने चेतावनी दी।

​वह नकली आर्यन अब एक काले भंवर में बदल रहा था जो सब कुछ निगलने पर तुला था। माया ने देखा कि पोर्टल बंद होने वाला है। उसने समीर और तान्या का हाथ कसकर पकड़ा।

​"दादाजी, मुझे रास्ता दिखाइए!" माया ने मन ही मन प्रार्थना की और डमरू को आखिरी बार एक 'मोक्ष लय' में बजाया।

​अचानक, डमरू से एक सुनहरी रोशनी निकली जिसने उन तीनों को अपने घेरे में ले लिया। नक्षत्र-सिक्का तेज़ी से घूमा और एक विशाल पोर्टल उनके पैरों के नीचे खुल गया। एक पल के लिए उन्हें ऐसा लगा जैसे वे सितारों के बीच से गुज़र रहे हैं... और फिर सब कुछ धुंधला हो गया।

​घर वापसी

​जब माया की आँखें खुलीं, तो उसे ताज़ा हवा का अहसास हुआ। उसने महसूस किया कि वह उसी पुरानी हवेली के बाहर घास पर लेटी है जहाँ से यह सब शुरू हुआ था। उसके बगल में समीर और तान्या भी थे, जो धीरे-धीरे होश में आ रहे थे।

​सूरज निकल रहा था। वह भयानक रात गुज़र चुकी थी। तान्या ने रोते हुए माया और समीर को गले लगा लिया। "हम वापस आ गए... हम सच में वापस आ गए!"

​माया ने अपनी मुट्ठी खोली। उसके हाथ में वह डमरू अभी भी था, लेकिन वह अब एक साधारण लकड़ी का खिलौना लग रहा था। वह नक्षत्र-सिक्का गायब हो चुका था, जैसे उसने अपना काम पूरा कर लिया हो।

​तीनों ने हवेली की ओर देखा, जो अब बिल्कुल शांत खड़ी थी। उन्हें पता था कि वे अब पहले जैसे नहीं रहे। उन्होंने ब्रह्मांड के उन रहस्यों को देखा था जिन्हें दुनिया पागलपन मानती।

​"पर... आर्यन का क्या?" तान्या ने धीरे से पूछा।

​माया ने दूर क्षितिज (Horizon) की ओर देखा। "वह कहीं न कहीं है, तान्या। और मुझे यकीन है कि एक दिन हम उसे वापस ले आएंगे। यह अंत नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत है।"




"क्या माया और उसके दोस्तों का यह सफर यहीं खत्म हो गया? या असली आर्यन को ढूंढने के लिए उन्हें फिर से नक्षत्रों की उस रहस्यमयी दुनिया में जाना पड़ेगा? अगर आप इसके आगे की रोमांचक कहानी और माया के अगले साहसिक सफर के बारे में जानना चाहते हैं, तो हमें कमेंट करके ज़रूर बताएं! आपकी प्रतिक्रिया ही इस कहानी के अगले अध्याय की शुरुआत करेगी।"






​"सीख: जीवन का सबसे कठिन सफर वह नहीं जहाँ हमें मीलों चलना पड़े, बल्कि वह है जहाँ हमें अपने डर और मोह को पीछे छोड़कर अपनों के लिए खड़ा होना पड़े। जब तक आपके मन में विश्वास और दोस्तों का साथ है, आप ब्रह्मांड की किसी भी भूलभुलैया से बाहर निकल सकते हैं।"