Meri ho Tum - 2 in Hindi Thriller by Pooja Singh books and stories PDF | मेरी हो तुम - 2

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मेरी हो तुम - 2

आदित्य – चेताक्क्षी | सोलफुल रिश्ता
मंदिर में धूप और अगरबत्ती की खुशबू फैली थी।
चेताक्क्षी दीपक जला रही थी।
आदित्य उसे दूर से देख रहा था—शांत, मजबूत, और बेहद सुकून देने वाली।
“तुम्हें डर नहीं लगा?”
आदित्य ने पूछा।
चेताक्क्षी मुस्कुराई।
“डर था… लेकिन विश्वास ज़्यादा था।”
“किस पर?”
“तुम पर… और किस्मत पर।”
आदित्य कुछ पल चुप रहा, फिर बोला—
“मेरी ज़िंदगी में बहुत फैसले दूसरों ने लिए…
पहली बार है जब कोई फैसला सही लग रहा है।”
चेताक्क्षी ने उसकी तरफ देखा—
“तो फिर साथ निभाओगे?”
आदित्य ने बिना देर किए कहा—
“जब तक साँस है।”
दोनों की नज़रें मंदिर की घंटी के साथ एक हो गईं।
उसी रात…
चारों पैहरगढ़ से दूर, पहाड़ों के पीछे—
काली आग से भरा एक कुआँ उबल रहा था।
उसके ऊपर खड़ा साया बुदबुदाया—
“दो जोड़ियाँ…
प्रेम… विश्वास…
यही तो सबसे बड़ी कमजोरी होती है।”
वो ज़मीन पर बने चिन्हों पर खून टपकाता है।
“पाँच साल नहीं…
मुझे केवल पाँच रातें चाहिए…”
उसी पल अदिति की नींद टूट जाती है।
उसकी साँस तेज़ चलने लगती है।
उसके हाथ अपने आप चमक उठते हैं—सफ़ेद ज्योति।
दूर से वही आवाज़—
“सावधान रहो, वनदेवी…
प्रेम तुम्हारी शक्ति भी है…
और परीक्षा भी।”
अदिति खिड़की से बाहर देखती है।
आसमान में चाँद आधा छिप चुका था।
और कहानी…
अब असली खेल की ओर बढ़ चुकी थी।
सुबह का सूरज पहाड़ियों के पीछे से झाँक रहा था।
चारों पैहरगढ़ की गलियाँ आज कुछ ज़्यादा ही शांत थीं—
जैसे सब कुछ बीते तूफ़ान के बाद चैन की साँस ले रहा हो।
आदित्य सबसे आगे चल रहा था।
उसके पीछे चेताक्क्षी—शांत, संयमित, लेकिन आँखों में अजीब-सी चमक।
और सबसे पीछे…
विवेक और अदिति।
कुछ दूरी तक दोनों खामोश चले।
फिर विवेक ने धीरे से कहा—
“घर लौट रहे हैं…
लेकिन लगता है जैसे सब कुछ पहले जैसा नहीं रहा।”
अदिति ने उसकी ओर देखा।
“क्योंकि अब हम पहले जैसे हैं ही नहीं।”
विवेक मुस्कुरा दिया।
रास्ते में एक छोटी-सी नदी आई।
अदिति पत्थरों पर संभल-संभलकर चल रही थी कि अचानक उसका पैर फिसला—
विवेक ने तुरंत उसका हाथ थाम लिया।
“संभलकर, वनदेवी जी…”
उसकी आवाज़ में चिंता साफ़ थी।
अदिति हल्की हँसी के साथ बोली—
“अब तो आदत डाल लो…
ज़िंदगी भर ऐसे ही थामना पड़ेगा।”
विवेक एक पल के लिए ठिठक गया।
फिर बिना कुछ कहे उसका हाथ और मज़बूती से थाम लिया।
🌸 आदित्य – चेताक्क्षी | सुकून का सफ़र
आदित्य पीछे मुड़कर चेताक्क्षी से बोला—
“सब खत्म हो गया है… फिर भी लगता है कुछ बाकी है।”
चेताक्क्षी ने आसमान की ओर देखा।
“हर अंत के बाद एक नया आरंभ होता है, आदित्य।”
“और अगर वो आरंभ कठिन हुआ तो?”
चेताक्क्षी ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—
“तो हम साथ होंगे।”
आदित्य के चेहरे पर पहली बार पूरी तसल्ली दिखी।
🏠 घर की देहरी पर…
जैसे ही सब शहर में दाख़िल हुए,
लोगों की नज़रें ठहर गईं।
कोई फुसफुसाया—
“यही हैं… जो मौत से लौटकर आए हैं।”
देविका जी दरवाज़े पर खड़ी थीं।
जैसे ही अदिति को देखा, दौड़कर उसे गले लगा लिया।
“अब कहीं मत जाना…”
उनकी आवाज़ काँप रही थी।
अदिति ने सिर हिलाकर कहा—
“अब यहीं हूँ, काकी।”
विवेक ये सब चुपचाप देख रहा था।
तभी देविका जी ने उसका हाथ पकड़ लिया—
“अब ये घर तुम्हारा भी है, बेटा।”
विवेक की आँखें नम हो गईं।
उसने सिर्फ़ इतना कहा—
“मैं अदिति को कभी अकेला नहीं छोड़ूँगा।”
अदिति ने पहली बार बिना झिझक उसके कंधे पर सिर टिका दिया।
🌙 रात की खामोशी… और अनकहा डर
रात को सब सो चुके थे।
अदिति छत पर खड़ी चाँद देख रही थी।
विवेक चुपचाप उसके पास आकर खड़ा हो गया।
“डर लग रहा है?”
उसने पूछा।
अदिति ने सच कह दिया—
“थोड़ा…”
विवेक ने उसका हाथ अपने दिल पर रख दिया।
“जब तक ये धड़क रहा है…
तुम्हें कुछ नहीं होगा।”
उसी पल हवा ठंडी हो गई।
दूर कहीं से एक धीमी-सी हँसी गूँजी—
“घर लौट आए हो…
लेकिन खेल अब शुरू होगा।”
अदिति की आँखों में एक पल के लिए सफ़ेद ज्योति चमकी।
वो जान चुकी थी—
घर लौटना अंत नहीं था…
बल्कि सबसे कठिन सफ़र की शुरुआत।