Do Dil Kaise Milenge - 45 in Hindi Love Stories by Pooja Singh books and stories PDF | दो दिल कैसे मिलेंगे - 45

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दो दिल कैसे मिलेंगे - 45

पुनर्मिलन की शांति अभी पूरी तरह उतरी भी नहीं थी कि आकाश में अचानक काले बादल घिर आए। हवा भारी हो गई, जैसे किसी ने स्वयं समय की सांसें रोक दी हों। धरती में दरारें पड़ने लगीं और उन दरारों से वही परिचित, भयावह ऊर्जा उठी—
प्राक्षिरोध।
अधिराज की आंखें चौकन्नी हो गईं। “नहीं… यह ऊर्जा… मैं इसे पहचानता हूं…”
एकांक्षी का हृदय तेज़ धड़कने लगा। उसके भीतर छिपी जिवंत मणि ने पहली बार स्पष्ट रूप से प्रतिक्रिया दी। उसके सीने में हल्का-सा प्रकाश जाग उठा, जैसे किसी ने भीतर से दस्तक दी हो।
अंधकार के बीच से एक विशाल आकृति उभरी—आग और छाया का मिश्रण। प्राक्षिरोध की गूंजती आवाज़ चारों दिशाओं में फैल गई— “आख़िरकार… वैदेही का पुनर्जन्म… और जिवंत मणि का निवास…”
एकांक्षी ने कांपते स्वर में कहा— “वह… मेरे अंदर की शक्ति को जानता है…”
अधिराज आगे बढ़ा, अपने पंख फैलाते हुए। “प्राक्षिरोध! इस बार तुम उसे छू भी नहीं पाओगे।”
प्राक्षिरोध हंसा—वह हंसी जिसमें युगों का अहंकार था। “पक्षीराज… उस जन्म में तुम उसे बचा पाए,
लेकिन इस जन्म में… मैं उसे ले जाऊंगा।”
अचानक अंधकार ने रूप बदला। काले बंधनों की तरह ऊर्जा ने एकांक्षी को चारों ओर से जकड़ लिया। अधिराज ने झपट्टा मारा, लेकिन यह बंधन नागलोक से भी अधिक प्राचीन था—विनाश-बंधन।
“एकांक्षी—!”
अधिराज की आवाज़ टूट गई।
एकांक्षी ने संघर्ष करते हुए कहा— “अधिराज… अगर जिवंत मणि उसके हाथ लग गई… तो संसार नष्ट हो जाएगा…”
प्राक्षिरोध की आंखें जल उठीं। “यही तो मैं चाहता हूं।
जिवंत मणि—जो सृजन और उपचार की शक्ति है—
उसे विनाश में बदलना… यही मेरी लालसा है।”
उसने अपना हाथ बढ़ाया। एकांक्षी के भीतर से प्रकाश बाहर खिंचने लगा। दर्द से वह चीख पड़ी। उसी क्षण जिवंत मणि ने प्रतिक्रिया दी—तेज़ प्रकाश फूटा, जिसने प्राक्षिरोध को क्षणभर के लिए पीछे धकेल दिया।
“तुम कमजोर नहीं हो…”
एकांक्षी के भीतर से वैदेही की आवाज़ गूंजी,
“लेकिन अभी तुम्हें स्वयं को सौंपना नहीं है…”
प्राक्षिरोध गरजा— “अब बहुत हुआ!”
अंधकार का द्वार खुला। वह एकांक्षी को उस द्वार की ओर खींचने लगा। अधिराज ने अपनी पूरी शक्ति झोंक दी—अग्नि-पंख भस्म होने लगे, रक्त गिरने लगा, लेकिन वह रुका नहीं।
“अगर तुम्हें ले जाना है…”
अधिराज चिल्लाया,
“तो मुझे मारकर ले जाओ!”
एकांक्षी की आंखों से आंसू बह निकले। “नहीं अधिराज… इस बार बलिदान तुम्हारा नहीं होगा…”
अचानक एकांक्षी ने स्वयं बंधन ढीले कर दिए। उसने प्राक्षिरोध की ओर देखा—डर नहीं, दृढ़ता के साथ। “अगर मेरी शक्ति ही तुम्हारा लक्ष्य है…
तो मैं तुम्हारे साथ चलूंगी।”
अधिराज स्तब्ध रह गया। “एकांक्षी—नहीं!”
एकांक्षी ने अंतिम बार उसकी ओर देखा। “मुझे ढूंढना…
और इस बार… मुझे बचाने नहीं,
मेरे साथ लड़ने आना।”
अगले ही पल अंधकार द्वार बंद हो गया।
एकांक्षी—जिवंत मणि की धारक—
प्राक्षिरोध के साथ अदृश्य हो चुकी थी।
धरती पर केवल सन्नाटा बचा।
अधिराज घुटनों के बल बैठ गया। उसकी मुट्ठी में एक हल्का-सा प्रकाश रह गया—जिवंत मणि की प्रतिध्वनि। “तुमने स्वयं को सौंपा नहीं है…”
वह बुदबुदाया,
“तुमने युद्ध का मोर्चा चुना है।”
उसकी आंखों में अब शोक नहीं था—
युद्ध की प्रतिज्ञा थी।
“प्राक्षिरोध…”
उसने आकाश की ओर देखा,
“इस बार तुम उसे मेरी कमजोरी नहीं बना पाओगे।
अब वह मेरी शक्ति है… और मैं उसे वापस लाऊंगा।”



(अंतिम युद्धपथ की शुरुआत…)
अंधकार के उस पार, जहां प्राक्षिरोध ने एकांक्षी को कैद किया था, वहां समय भी थमता-सा प्रतीत होता था। चारों ओर विनाश की ऊर्जा बह रही थी, और उसी के केंद्र में एकांक्षी—शांत, स्थिर, लेकिन भीतर से जाग्रत।
उसने आंखें बंद कीं।
अब वह केवल पीड़िता नहीं थी।
वह जिवंत मणि की धारक थी।
“अगर यह युद्ध अंतिम है,” उसने स्वयं से कहा,
“तो इसकी परिणति भी अंतिम होनी चाहिए।”
दूसरी ओर, अधिराज अपने अंतिम युद्धपथ पर निकल चुका था। उसके टूटे पंख अब पूरी तरह अग्नि में रूपांतरित हो चुके थे। हर कदम के साथ वह पक्षीराज से आगे, किसी और ही स्वरूप में ढल रहा था—
संरक्षक नहीं, संहारक।
माद्रिका ने उसके मार्ग में आकर कहा— “यह पथ तुम्हें वापस नहीं लौटने देगा, अधिराज।
अगर तुम आगे बढ़े… तो जो कुछ शेष है, वह भी खो सकते हो।”
अधिराज का स्वर शांत लेकिन अटल था— “मैं पहले ही सब कुछ खो चुका हूं…
अब केवल युद्ध शेष है।”
अंधकार लोक के केंद्र में, जैसे ही अधिराज पहुंचा, प्राक्षिरोध ने उसका स्वागत किया। “आ गए तुम…
लेकिन क्या तुम जानते हो,
तुम किससे लड़ने आए हो…?”
उसी क्षण एकांक्षी ने आंखें खोलीं।
उसने अधिराज को महसूस कर लिया था।
एकांक्षी ने अपने दोनों हाथ हृदय पर रखे। जिवंत मणि का प्रकाश बाहर फैलने लगा—लेकिन इस बार वह प्राक्षिरोध की ओर नहीं,
अधिराज की ओर प्रवाहित हुआ।
“नहीं…!”
प्राक्षिरोध गरजा,
“यह शक्ति मेरी है!”
एकांक्षी की आवाज़ पूरे लोक में गूंज उठी— “नहीं प्राक्षिरोध…
यह शक्ति सदा से सृजन की थी,
और आज… मैं इसे उस व्यक्ति को सौंपती हूं,
जो इसका दुरुपयोग नहीं करेगा।”
प्रकाश की एक विराट धारा अधिराज के भीतर प्रवेश कर गई।
उसका शरीर कांप उठा।
अग्नि-पंख स्वर्णिम हो गए।
आंखों में अब केवल ज्वाला नहीं—अनंत चेतना थी।
वह घुटनों के बल झुक गया। “एकांक्षी… तुम यह नहीं कर सकती…
तुम स्वयं को शून्य कर दोगी…”
एकांक्षी मुस्कराई। “वैदेही ने एक बार तुम्हारे लिए प्राण दिए थे…
एकांक्षी इस बार शक्ति दे रही है।
फर्क बस इतना है—
इस बार मैं मर नहीं रही…
मैं तुममें जीवित रहूंगी।”
प्राक्षिरोध पीछे हटने लगा। “असंभव…
इतनी शक्ति एक प्राणी में नहीं समा सकती…”
अधिराज उठ खड़ा हुआ।
अब वह केवल पक्षीराज नहीं था।
वह सृजन और संहार का संतुलन था।
“तुम विनाश हो, प्राक्षिरोध,”
उसकी आवाज़ में आकाश कांप उठा,
“और मैं अब उसका अंत हूं।”
अंतिम युद्ध शुरू हुआ।
प्राक्षिरोध ने समस्त अंधकार झोंक दिया।
अधिराज ने कोई आक्रोश नहीं दिखाया—
केवल हाथ उठाया।
जिवंत मणि की शक्ति,
अधिराज की चेतना,
और वैदेही-एकांक्षी का प्रेम—
तीनों एक होकर प्रवाहित हुए।
एक प्रकाश…
जो विनाश को निगल गया।
जब सब शांत हुआ,
तो अंधकार लोक बिखर चुका था।
प्राक्षिरोध—
अब केवल एक स्मृति था।
अधिराज दौड़कर एकांक्षी तक पहुंचा।
वह कमजोर थी, लेकिन जीवित।
अधिराज ने उसे अपनी बाहों में लिया। “मैं जीत गया…
लेकिन अगर तुम्हें खो देता…
तो यह जीत व्यर्थ होती।”
एकांक्षी ने आंखें खोलीं। “तुम नहीं हारे…
और न ही मैंने खुद को खोया।
मेरी शक्ति तुममें है…
और तुम्हारा हृदय मेरे भीतर।”
आकाश में प्रकाश फैल गया।
लोकों का संतुलन लौट आया।
अधिराज ने अंतिम बार तलवार नीचे रखी। “यह मेरा अंतिम युद्ध था…”
एकांक्षी ने मुस्कराकर कहा— “और हमारा पहला शांत भविष्य।”