फिल्म समीक्षा :_ गुमराह
जिंदगी,एक सलीका,सुर, लय है जीने की
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"चलो एक बार फिर से
अजनबी बन जाए हम दोनों", साहिर का यह गीत एक सार्वकालिक संवाद ,कहावत सा बन गया हर सच्चे प्यार करने वाले के लिए।पूरा सुनेंगे तो उन दिनों में डूब डूब जाएंगे जो अब आसमान में खो गए हैं।
एक बहुत दिलचस्प और आज तो और भी जरूरी लगती फिल्म है गुमराह। बीआर चोपड़ा द्वारा निर्देशित,बेहतरीन कहानी और पटकथा, साहिर के खूबसूरत गीतों को रवि के संगीत में महेंद्र कपूर की मखमली आवाज में सुनने का अतिरिक्त आकर्षण ने ही फिल्म को ऑल टाइम ब्लॉक बस्टर बनाया वर्ष उन्नीस सौ तिरसठ में।अशोक कुमार, माला सिन्हा,सुनील दत्त ,शशिकला के बेहतरीन और सधे हुए अभिनय ने फिल्म को नई ऊंचाइयां दी।
आज भी यह फिल्म मील का पत्थर बनी हुई है।इसे देखते हुए जरा भी बोरियत नहीं होती बल्कि जिंदगी की नाजुक समस्या को सुलझाने का एक सहज रास्ता खुलता है।
कहानी और पटकथा
-------------------------------- नैनीताल की खूबसूरत वादियों में मीना और राजेंद्र की मोहब्बत से फिल्म शुरू होती है।राजेंद्र एक खानदानी परिवार का युवक जो पेंटिंग बनाता है,रेडियो पर गाने गाता है। मीना की बड़ी बहन अपने दो बच्चों के साथ आती है पिता के घर।
ऐसे हालात बनते हैं कि वह किसी बीमारी से चल बसती है।
फिर बहन के दो छोटे बच्चों,दोनों ने अद्भुत अभिनय किया है, की खातिर पिता के जोर देने पर उसे बड़ी बहन के पति से विवाह करना पड़ता है। अशोक कुमार ने यह रोल निभाया है। वह एक बेहद सफल वकील और परिपक्व इंसान के रूप में बिना तनाव के इस मुश्किल रोल को जिस तरह निभाते हैं,वह उनके अभिनय की विशाल रेंज को बताता है। उस दौर में ही नहीं बल्कि नई सदी प्रारंभ होने तक भारतीय समाज के हर वर्ग में यह आम बात थी कि ऐसी स्थिति में मृत पत्नी की बहन को ही ब्याह दिया जाए। सोचते ही सिहरन होती है कि बड़ी बहन के पति, यानि जीजाजी से छोटी बहन का ऐसे अचानक से बिना कोई अधिक परिचय,प्रेम तो बिल्कुल ही नहीं,विवाह कर दिया जाता था। हमारे देश में सच में स्त्रियों की कोई आवाज,मनमर्जी आधुनिक समय में रही ही नहीं।क्या आज भी है?
फिल्म के पहले बीस मिनट में ही नायिका की शादी हो जाती है। यह उस दौर की रोमांटिक फिल्मों के लिहाज से काफी अलग और फिल्म के लिए खतरे वाली बात थी। परन्तु बलदेव राज चोपड़ा ऐसे निर्माता निर्देशक रहे जिन्होंने सदैव लीक से हटकर और दमदार कहानियों पर फिल्में बनाई। उनकी अधिकांश फिल्में सामाजिक कुरीतियों और विडंबनाओं पर प्रहार करती हैं। धूल का फूल,तवायफ, निकाह, हमराज, आज की आवाज,दहलीज आदि।
विवाह के एक वर्ष बाद ही राजेंद्र ,सुनील दत्त, दुबारा उसकी जिंदगी में आता है। फिर से वह दोनों प्रेम करने लग जाते हैं। छुप छुपकर मिलते हैं।बेहद व्यस्त,बैरिस्टर साहब अशोक कुमार जब नैनीताल पत्नी को लेने आते हैं तो एक पार्टी में राजेंद्र से उनकी मुलाकात उसके गाने से होती है।
वह उसे मुंबई आने का निमंत्रण देते हैं। फिर वहीं उसके स्टूडियो में वह खूब सारी पेंटिंग्स देखते हैं उसके काम की तारीफ भी करते हैं। वहीं उन्हें अपनी पत्नी की भी खूबसूरत पेंटिंग मिलती है।वह चौंकते हैं पर फिर सहजता से खरीदकर ले आते हैं।घर पर वह दिलचस्प अंदाज में वह पेंटिंग अपनी पत्नी को पेश करते हैं। इस मुश्किल किरदार को,जब वह जानता है कि पत्नी और उसका पूर्व प्रेमी फिर मिल सकते हैं, आगे क्या होगा कि परवाह किए बिना। तनाव को लाए बिना जिस बेहतरीन ढंग से इस पति के असहज होते हुए भी सहज रहना और छोटी छोटी बातों से पत्नी के जहन और विचारों को जानने के प्रयास को जिस तरह अशोक कुमार ने निभाया है वह पूरी फिल्म में छा गए हैं। ऊपर से व्यस्त वकील,मुवक्किलों से मिलना और दो छोटे बच्चों के साथ भी हंसने बोलने वाले पिता इन सारे रंगों को अशोक कुमार क्या खूब एक पेंटिंग की ही तरह स्क्रीन पर रचते हैं यह वाकई आज के बेहद लाउड और ओवर एक्टिंग कर रहे खानों,कुमार,सिंह ,कपूर को देखना चाहिए।
फिर मुंबई में आकर राजेंद्र वकील साहब के घर यदा कदा मिलने पहुंचता है। पत्नी, माला सिन्हा ,उस प्यार और समय को भरपूर जीने लगती है।
एक समस्यायह कथा हिंदुस्तान में हर दूसरी लड़की और लड़के की थी। अब तो इन बातों पर कत्ल हो जाते हैं। अनेक जिंदगियां बर्बाद हो जाती हैं।
फिल्म कहानी,दृश्य और संवाद हकीकत को साथ लेकर चलते हैं।कई दृश्य तो ऐसे लगते हैं मानो आप ही के साथ हो रहे।जैसे प्रेमी से मिलने के समय नहीं पहुंच पाने पर प्रेमी का पति की मौजूदगी में घर आ जाना। या फिर बाहर मिलने में किसी के देख लेने की धुकधुक।
रोमांचक कहानी और यादगार अभिनय
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एक ट्विस्ट आता है और एक आधुनिक स्त्री मीना को राजेंद्र से होटल में मिलते देख लेती है। फिर वह उसे धमकाकर ब्लैकमेल करती है। कई दृश्य निरंतर हैं ब्लैकमेलर शशिकला जिन्होंने उस वक्त ,आज से साठ वर्ष पूर्व ब्लैकमेल करने वाली स्त्री के किरदार में जान फूंक दी थी। मीना की बेबसी, राज खुलने का डर और छटपटाहट को माला सिन्हा इतनी खूबसूरती से पर्दे पर उतारती हैं कि फिल्म देखने वाली हर स्त्री कान पकड़ती है कि ऐसा वह कभी नहीं करेगी। क्योंकि रुपए पैसे की डिमांड बढ़ती जाती है। पति से चुराकर ही रुपया दिया जाता है। कभी तो शक होना ही है। फिर क्या होगा?
पति अशोक कुमार ,जो इस दोस्ती और प्यार को देख समझ रहे होते हैं,बड़ी ही समझदारी से जिस तरह अपनी पत्नी को मौका देते हैं सही और गलत में से चुनने का ,वह यादगार बन जाता है।
आखिर में वह जान देने का सोचती हैं ,क्योंकि शादी की कीमती अंगूठी वह ब्लैकमेलर ले जाती है।
आगे किस तरह एक चौंकाने वाले क्लाइमेक्स के साथ फिल्म अपने अंजाम तक पहुंचती है,वह वाकई देखने की ही चीज है। फिल्म यूट्यूब पर निशुल्क उपलब्ध है।
इसी फिल्म में विवाहित साहिर ने वह यादगार शेर लिखा जो अमृता प्रीतम की जिद ,साहिर से प्यार करने की, का जवाब भी था।
"वह अफसाना, जिसे अंजाम तक लाना हो नामुमकिन
उसे एक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ देना अच्छा"
यह हर समझदार व्यक्ति की रूल बुक का अहम हिस्सा है।
अमृता को जब मौका दिया युवा,गरीब,बेरोजगार पर स्वाभिमानी साहिर ने तो वह उन्हें ठुकराकर विदेश चली गई थी। तीन साल बाद आई तो साहिर अपनी किस्मत और संघर्ष से मुंबई फिल्मों और अदबी मंचों पर उभर रहे थे। जब वह और कुछ वर्षों में स्थापित हो गए तो कुमारी अमृता प्रीतम का पुराना प्यार जाग उठा।उन्होंने साहिर को फॉलो करना प्रारंभ किया मुंबई से दिल्ली तक। पर वह इंसान, शायर,जिसने दिल टूटने और धोखे के बाद संघर्ष किया और पिता की चुनी हुई लड़की से निकाह कर अपनी बेगम के साथ अनेक महीने फ़ाके किए। फिर कामयाबी धीरे धीरे मिलनी शुरू हुई तो वही बेगम थी जो उनके बच्चों,घर को पूरी निष्ठा से संभालती थीं। ऐसी वफादार बीवी को आगे कामयाब होकर कैसे साहिर छोड़ते? क्यों छोड़ते? ऊपर से जो रिवाज था दूसरी बेगम ,तीसरी बेगम का पढ़े लिखे,अदबी साहिर ने उसे कभी नहीं माना। हमेशा अपनी बेगम के ही रहे। सातवें दशक में उर्दू में आई आत्मकथा में चुप्पी तोड़ी है शायर ने।और अमृता के हर जगह साहिर को लेकर इजहार के बाद भी कभी भी साहिर ने कोई टिप्पणी नहीं की। और न ही साहिर की बीवी ने कोई प्रतिक्रिया दी। सही अर्थों में साहिर और उनकी बेगम की यादगार प्रेम कहानी है ।
खैर,वह आगे कभी आप पढ़ें। यह सार्वकालिक फिल्म अभी मैंने दुबारा देखी और अपनी कहानी,अभिनय और मुश्किल हालातों को संभालने के हुनर सीखने के हिसाब से बहुत अच्छी लगी।
पूरी फिल्म में बेहद मासूम,सुंदर ,दिल के हाथों मजबूत पर समझदार मीना की भूमिका में माला सिन्हा ने जान डाल दी। अशोक कुमार बहुत मुश्किल रोल को अपने जादुई अभिनय से यादगार बना दिया। सुनीलदत्त युवा प्रेमी और कलाकार के रूप में अच्छे लगे। बाद में ऐसी ही युवा,खिलंदड़े नायक की भूमिका वक्त,हमराज,मेरा साया अनेक फिल्मों में उन्होंने की। मुश्किल था साठ का दशक।कई पुराने सितारे जमे हुए थे तो राजेंद्र कुमार,धर्मेंद्र ,मनोज कुमार भी आ चुके थे।ऐसे में बेहद सामान्य चेहरे वाले आकाशवाणी में काम करने वाले सुनीलदत्त का जगह बनाना उनकी मेहनत और लगन का परिचायक था। माला सिन्हा की यह लगातार तीसरी सुपरहिट फिल्म थी।वह बहुत बड़ी,कामयाद हीरोइन थी।उन्होंने आगे युवा,नए हीरो धर्मेंद्र के साथ भी काम किया।उन्हें भी ब्लॉकबस्टर, रामानंद सागर की आंखे, फिल्म दी।
गुमराह फिल्म बताती है कि संबंधों का रास्ता तनाव,हिंसा से नहीं बल्कि समझदारी और थोड़ा झुकने से निकलता है। यह गोल्डन रुल आज बेहद उपयोगी और काम का है।
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(डॉ.संदीप अवस्थी,आलोचक और फिल्म लेखक
804,विजय सरिता एनक्लेव,बी ब्लॉक,पंचशील,अजमेर,305004
मो7737407061)