Mantoo:Ek Katha in Hindi Animals by डॉ प्रभात समीर books and stories PDF | मंटू:एक कथा

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मंटू:एक कथा

मंटू :एक कथाबिल्ली पालने का शौक़ मुझे कभी नहीं रहा। किसी भी जानवर को छूने,देखने में भी मुझे कभी डर लगा करता था। तो भी एक समय में हमारा घर, न चाह कर भी, ' बिल्लियों वाला घर' के रूप में कैसे प्रसिद्ध हुआ,इसकी एक आश्चर्यजनक कहानी है।उस दिन कमरे में मैं अकेली बैठी हुई थी ।अचानक  एक  बड़ी बिल्ली आकर मेरी गोद में बैठी और सो गई। सब कुछ तेज़ी से घटित हुआ । मुझे उठने का उसने मौका ही नहीं दिया।उसकी चमकती हुई बेदाग काली त्वचा , ख़ूबसूरत कंचों जैसी अंधेरे में भी चमकती हुई हरी ऑंखें ,उसके शरीर से उठती तरंगें .... मुझे  डराने की पूरी साज - सज्जा के साथ वह आयी  थी। किसीको आवाज़ देना तो दूर रहा, मेरी तेज़ चलती साॅंसें ,हाथ में लगे अखबार की सरसराहट  कहीं उसके आराम में व्यवधान डाल दे तो!कभी सुना था कि बिल्ली सीधा ऑंखों पर ही वार करती है। बच्चे तीसरी मंज़िल पर थे। निस्सहाय मैं जड़ हो चुकी थी।   कभी एक - दो बार बचा हुआ दूध,दही ऑंगन में रखते हुए मैंने माॅं को दूर से देखा था,जिसे वह अपने रौद्र अन्दाज़ के साथ बड़ी चतुराई से चट कर गयी थी। इतनी क्षणिक सी पहचान! मैं तो उस पहचान के दायरे में भी नहीं थी। चूहे, छिपकली,बिल्ली...इनका नाम लेकर ही मुझे डराया जा सकता है।उसके सामने जाना तो मेरे लिए सम्भव ही नहीं था।थोड़ी देर को उस डर को भुलाकर उसकी बात की जाए तो कहा जा सकता है कि वह सुंदरकाय थी।बिल्लियों की किसी सौंदर्य प्रतियोगिता में अगर उसे ले जाया जाता तो अपने रंग - रूप और निराले अंदाज़ से वह निश्चित ही विजेता बनती।उसके बारे में ऐसी बातें बाद में सूझने लगी थीं ।पहले दिन का अनुभव तो हमेशा डराता रहा। हैरान करता रहा कि ऐसा हुआ कैसे! जब तक वह रही यह घटना दोबारा कभी घटित नही हुई।उसे 'मंटू ' नाम से पुकारा जाने लगा।लोग pets का चुनाव अपनी पसंद  इच्छाऔर सुविधा  से करते हैं,उन्हें घर में लाते हैं,पर यहाॅं तो मंटू ने घर का चुनाव किया। वह हमारे घर में आने लगी, लेकिन किसी बुज़ुर्ग की तरह उसने हमें हमेशा अनुशासन में रखा।उसे छूना,गोद में उठाना,दुलार लेना जैसा कुछ भी उसकी इच्छा पर निर्भर करता था।मुझे तो याद नहीं आता कि उसे कभी किसीने गोद में उठाया हो या उसे कभी सहलाया भी हो।हाॅं, वह हम पर अपने अधिकारों का कभी भी प्रयोग कर सकती थी।इसके प्रमाण भी  समय - समय पर मिला करते थे। लोभ - लालच उसे था नहीं, शायद स्वाभिमान भी था। कहीं भी,किसीकी भी रसोई खुली रहे,उसकी पसंद की महक आती रहे,वह निर्लिप्त रहती। खाने का सामान रखकर ससम्मान उसका आवाहन किया जाता,तभी वह स्वीकार करती थी। हो सकता है कि शाकाहारी भोजन उसे ज़्यादा पसंद ही न हो। बाहर की दुनिया के आकर्षणों  से बंधी हुई वह ज़बरदस्त यायावर थी।हमारा घर तो उसका आरामगाह,उसकी शरणस्थली था।  वह आये दिन बाहर कुत्तों से घिर जाती ,अकेले उनसे मोर्चा लेने के बाद अपनी पूॅंछ को उसके आकार से दोगुना ज़्यादा फुलाकर तीर की गति से घर में घुसती और एक निश्चित जगह पर छिपकर किसी सर्पिणी सी फुफकारती रहती। उस समय उसके क़रीब जाने का साहस कोई कर ही नहीं सकता था। खतरा टल जाने का विश्वास होने पर हमारे बीच में किसी कुर्सी पर आकर भरपूर नींद लेना उसके लिए ज़रूरी हो जाता था।यह घटनाक्रम बना ही रहता था।वह बहुत फुर्तीली थी या गली के कुत्ते अशक्त.... वह बोल पाती तो अवश्य बताती।सुना था कि बच्चों को जन्म देते समय बिल्ली बहुत खूॅंखार हो जाती है। हमने पाला भी नहीं था कि वह हमारे लिए सदय होती।लेकिन उस दिन एक अलग ही दृश्य सामने था। रोते हुए वह माॅं की साड़ी तब तक खींचती ही रही जब तक माॅं उस कोठरी के सामने जाकर खड़ी नहीं हुईं,जहाॅं उसको बच्चे देने थे।उस दिन उसका रौद्र रूप निरीहता में बदल चुका था।बच्चों को जन्म देकर थोड़े समय बाद ही उसने हमारे घर से रुख़सती ले ली।फिर वह भूले - भटके किसी वी.आई. पी. की तरह कभी आती,गद्दीदार कुर्सी पर आराम करती।उसे कब तक  घर में रहना है,इसमें हमारा कोई हस्तक्षेप नहीं था। उसका निर्णय ही सर्वोपरि था।मंटू के कितने रहस्यों  की गुत्थियां हमसे कभी सुलझी ही नहीं। उसकी अगली पीढ़ी का अनोखा,अविश्वसनीय  किस्सा अगली पोस्ट में  .....