यह कहानी “मैं दादा-दादी की लाडली” का दूसरा भाग है।बचपन की मासूमियत के बाद, अब ज़िंदगी ने मुझे
पहली बार अधूरे प्यार से मिलवाया।
एक ऐसा एहसास, जो मिला नहीं…
पर दिल में हमेशा के लिए बस गया।
अध्याय 2 – अधूरा प्यार
।
तुम्हें लाइफ में कैसा पार्टनर चाहिए?”
सब अपनी पसंद बताती, हँसी-मजाक के साथ, और मैं चुप-चाप उनकी बातें सुनती।
फिर मेरी बारी आई।
मैने कहा,
"मुझे ऐसा पार्टनर चाहिए जो मुझे पूरा तरह प्यार करे, सोलमेट टाइप।
और मैं उसके लिए पूरी दुनिया लूट दूंगी।”
पर जिंदगी का खेल कुछ और था।
मेरा प्यार मिला... पर अधूरा।
सिर्फ एक तरफ़ा प्यार, जो मेरे दिल के कोने में छुप गया।
हर दिन मैं अपने घर की छत से उपयोग देखती हूं।
कभी स्कूल से छुट्टी होती, तो एसटीडी में जाकर उससे बात करती,
और सिर्फ उसकी आहट से ही पहचान लेती हूं।
उसकी मुस्कान, उसकी हल्की सी बातें,
मेरी दुनिया को रोशनी और दर्द दोनो देती थी।
हर पल का ये छोटा सा इंतज़ार
मेरी जिंदगी का एक हिसा बन गया था।
मुझे लगता था, अगर मैं एक दोस्त के लिए भी उसका करीब हो जाऊं,
तो मेरी दुनिया पूरी हो जाये।
पर प्यार अधूरा था,
सिर्फ मेरी तरफ से था, जो कभी पूरा नहीं हो सकता था।
हमारी दोस्ती भी अधूरे प्यार की गवाह थी।
हम साथ होते हैं, हंसी-मज़ाक करते हैं,
और मैं चुपके से उसकी तरफ देखती हूँ।
कोई ना समझता था कि मेरे दिल में क्या है,
पर मैं जानती थी - मेरा प्यार सिर्फ एक राज़ था।
अधूरा प्यार मुझे ये भी सिखाता था:
जिंदगी में कभी हर चीज़ पूरी नहीं होती,
फिर भी हम दिल से प्यार करते हैं, बिना किसी शर्त के।
हर दिन, हर दोस्त, मैं उसकी छोटी-छोटी बातों में खुश हो जाती हूँ,
और ये भी समझ की प्यार सिर्फ मिलना नहीं, महसूस करना भी होता है।
कभी कभी, अधूरा प्यार ही सबसे गहरा होता है,
क्योंकि वो हमारी आँखें, दिल और सोच में बस जाता है।
फिर भी मैं खुश थी.
क्योंकि ये प्यार मुझे अपनी भावनाओं को समझाना, खुद से प्यार करना, और अपनी भावनाओं की इज्जत करना सिखाता था।
और शायद यही अधूरे प्यार की ख़ूबसूरती है -
वो कभी पूरा नहीं होता, पर हमेशा हमारे साथ महसूस होता है।
मुझे ये भी लगता था कि एक दिन, जब समय सही होगा,
शायद ये अधूरा प्यार कहीं पूरा हो जाये.
तब तक, मैं उसे देखती रहूंगी,
हर पल का सुकून और दर्द महसूस करती रहूंगी,
और अपने दिल के इस छोटे से राज़ को प्यार से संभालती रहुं
समय के साथ मैंने यह भी समझ लिया था
कि हर प्यार किस्मत में लिखा नहीं होता।
कुछ प्यार सिर्फ़ हमें मजबूत बनाने आते हैं,
हमें हमारी भावनाओं से रूबरू कराने आते हैं।
कई बार रातों में
मैं खुद से सवाल करती थी—
क्या मेरा यह एहसास ग़लत है?
क्या बिना कुछ पाए इतना महसूस करना
कमज़ोरी कहलाता है?
लेकिन हर बार
दिल से यही जवाब आता था—नहीं।
यह कमज़ोरी नहीं, यह सच्चाई है।
अधूरा प्यार हमें तोड़ता भी है
और बनाता भी है।
यह हमें सिखाता है
कि हम बिना किसी उम्मीद के भी
किसी के लिए
दिल में जगह बना सकते हैं।
मैंने उससे कभी
कुछ माँगा नहीं।
न वादे,
न इज़हार,
न कोई भरोसा।
बस उसकी मौजूदगी ही
मेरे लिए काफ़ी थी।
शायद यही वजह थी
कि यह प्यार
आज भी ज़िंदा है।
क्योंकि इसमें
शिकायत नहीं थी,
सिर्फ़ एहसास था।
आज जब पीछे मुड़कर देखती हूँ,
तो कोई पछतावा नहीं होता।
बल्कि एक सुकून होता है
कि मैंने दिल से प्यार किया।
चाहे वह अधूरा ही क्यों न रहा हो।
क्योंकि कुछ कहानियाँ
पूरी होकर ख़त्म हो जाती हैं,
और कुछ अधूरी रहकर
हमारी ज़िंदगी का हिस्सा बन जाती हैं।
मेरा यह अधूरा प्यार भी
ऐसी ही एक कहानी है—
जो कभी पूरी नहीं हुई,
लेकिन हमेशा
मेरे साथ चलती रही।