रसोई में चाय उबल रही थी। रश्मि अदरक कूट रही थी और सौम्या कप ट्रे में सजा रही थी। भाप और दूध की गंध में एक घरेलू-सा सुकून था—जैसे सब ठीक हो।
सौम्या ट्रे उठाकर बाहर आई।
ड्रॉइंग रूम रोशनी से भरा था। बड़े सोफ़ों पर पशुपति बाबू बैठे थे—सफेद धोती-कुर्ता, कंधे पर डिज़ाइनर शॉल, मोटी सफ़ेद मूँछें और पीछे सँवारे बाल। उनके साथ उनकी पत्नी और बच्चे। सामने सौम्या के माता-पिता। हँसी-मज़ाक चल रहा था, जैसे घर में कोई दरार हो ही नहीं।
“ये बच्ची हमारे घर आ रही है,” पशुपति बाबू बोले, “बहुत ख़ुशी है हमें।”
ठाकुर धुरंधर सिंह ने हाथ मिलाया।
सौम्या ने ट्रे मेज़ पर रख दी।
“अरे,” पशुपति बाबू हँसे, “अभी ब्याह कर आई भी नहीं, और काम शुरू कर दिया।”
“हमने यही संस्कार दिए हैं,” जानकी देवी बोलीं।
पशुपति बाबू ने सहजता से कहा, “बेटा, करण को बुला लाओ। जाने अपने कमरे में क्या कर रहा है।”
सौम्या एक पल को ठिठकी। “जी?”
“जाओ बेटा,” उन्होंने मुस्कराकर कहा, “घबराओ मत।”
सौम्या धीरे-धीरे सीढ़ियाँ चढ़ने लगी। हर क़दम जैसे भारी होता जा रहा था।
करण के कमरे के बाहर फर्श पर कपड़े पड़े थे—बेतरतीब, जल्दी में उतारे हुए। सलवार-कमीज़ एक ओर, भीतर और कपड़ों की परछाइयाँ। दरवाज़ा आधा खुला था। अंदर से टूटी-सी साँसों की आवाज़ आ रही थी।
उसने दरवाज़ा और खोला।
कमरे में बिस्तर था। बिस्तर पर एक स्त्री—निर्वस्त्र—जिसका शरीर यौन क्रिया में ऊपर-नीचे हो रहा था। जिसकी देह पर नीले-पीले निशान साफ़ दिख रहे थे। हवा में अजीब-सी घुटन थी।
सौम्या का गला सूख गया। आवाज़ नहीं निकली।
वह एक क़दम आगे बढ़ी—और तभी उसकी नज़र उस स्त्री की गर्दन पर गई।
गर्दन में फंदा था। कसा हुआ। साँस रोकता हुआ।
नीचे करण था—निर्वस्त्र—उसके चेहरे पर वही जानी-पहचानी कठोरता। हाथ फंदे को कसते जा रहे थे। स्त्री का चेहरा लाल पड़ रहा था, आँखें उभरी हुईं।
सौम्या की नज़र स्त्री के चेहरे पर गई।
वह ख़ुद थी।
उसी क्षण वह चीखना चाहती थी—पर आवाज़ नहीं निकली। फंदे की कसावट उसकी अपनी गर्दन में उतरती चली गई। छाती भारी हो गई। साँस टूटने लगी।
उसने झटके से आँखें खोली।
वह अपने बिस्तर पर बैठी थी। कमरा अँधेरे में था। पसीने से भीगी हुई। हाथ अपने आप गर्दन पर चले गए। कुछ नहीं था। कोई फंदा नहीं।
लेकिन घुटन थी।
वह देर तक बैठी रही, साँसें गिनती हुई।
फिर एक खयाल साफ़ होकर उभरा—बिना डर, बिना शोर के—
अगर यह आदमी ज़िंदा रहा, तो मैं हर रोज़ इसी फंदे में रहूँगी।
यह ख़याल चीख नहीं था। यह निष्कर्ष था।
–
दो घंटे बाद भी सौम्या के कदम कमरे में टिक नहीं पा रहे थे। वह आगे-पीछे चहलक़दमी कर रही थी, नाख़ून चबाते हुए। चेहरे पर वही कठोरता—जैसे कोई फैसला भीतर पक चुका हो।
रश्मि भाभी पास की कुर्सी पर बैठी थीं। दोनों हथेलियाँ माथे पर टिकाए, सिर झुका हुआ।
“तेरा दिमाग़ ख़राब हो गया है, सौम्या?” रश्मि ने बिना नज़र उठाए कहा।
सौम्या रुकी नहीं। “दिमाग़ तो अब सही हुआ है मेरा,” उसने सपाट स्वर में कहा। “शादी की रात ही—दूध में ज़हर दे दूँगी उसे।”
रश्मि ने झटके से सिर उठाया। “पगली, फ़िल्मों की दुनिया से बाहर निकल,” वह फुसफुसाईं। “करण शराब पीकर आएगा। दूध पिएगा नहीं—तुझे ही पिला देगा।”
सौम्या ठिठकी नहीं। “तो उसकी सुपारी दे दूँगी,” उसने कहा। “इंटरनेट पर वेबसाइटें हैं। मेरे अकाउंट में ढाई लाख पड़े हैं। सब दे दूँगी पर उसकी सेक्स-स्लेव नहीं बनूँगी।”
“एक हादसा हुआ है,” रश्मि ने तैश में कहा, “और तू क़त्ल पर उतर आई है।”
“एक हादसा?” सौम्या भड़क उठी। “कैसे-कैसे गंदे वीडियो भेजता है मुझे। रुको—मेरे फोन में होगा कहीं।”
वह झटके से फोन उठाती है। स्क्रीन पर उँगलियाँ तेज़ी से चलती हैं। Downloads फ़ोल्डर खुलता है। एक फ़ाइल दिखती है।
“ये,” कहकर वह फोन रश्मि के सामने रख देती है।
वीडियो चलता है।
दोनों चुपचाप देखती हैं—शुरू से अंत तक। जंगल, अधूरा बाँध, लाशें, और आख़िर में नक़ाबपोश डाकू जख्खड़ का संदेश। वेबसाइट का पता। ये वही वीडियो था जो ठाकुर साहब ने मंत्री जी से लिया था।
कमरे में जैसे हवा जम गई।
रश्मि ने बिना कुछ कहे फोन छीन लिया और एक झटके में वीडियो डिलीट कर दिया।
“सौम्या, ये कहाँ से आया तेरे फोन में?” उनकी आवाज़ अब सख़्त थी।
“मुझे बिल्कुल नहीं पता, भाभी,” सौम्या ने कहा। “मैंने नहीं भेजा। न मंगवाया।”
उसी पल बाहर से शोर उठा।
दोनों चौंककर बाहर निकलीं।
हवेली के गलियारों में अफ़रातफ़री थी। सिक्योरिटी वाले, गुंडे-मवाली—सब हथियार उठाए भाग रहे थे। संदूकों और अलमारियों से बंदूकें निकाली जा रही थीं। आर्मरी के दरवाज़े खुले थे। गोलाबारूद भरा जा रहा था।
मुख्य गेट के पास जीपें और स्कॉर्पियो कतार में खड़ी थीं। लोग कूद-कूद कर बैठ रहे थे और गाड़ियाँ निकलती जा रही थीं।
रश्मि ने एक आदमी को रोक लिया। “कुंदन! क्या हुआ?”
कुंदन हाँफ रहा था। “पता नहीं, भाभी,” उसने जल्दी-जल्दी कहा। “ठाकुर साहब, हीरा, राजीव भैया—सब लोग जंगल की तरफ़ कूच कर रहे हैं। पशुपति बाबू के लोग, पुलिस की पार्टी, सब पहुँच रहे हैं, भारी फौज जा रही है।” वह पल भर रुका। “कुछ बड़ा होने वाला है। आप लोग अंदर ही रहिए।”
और दौड़ता चला गया।
सौम्या और रश्मि वहीं खड़ी रहीं।
दूर, इंजन की आवाज़ें मिलकर एक नई हवा बना रही थीं—ऐसी हवा, जिसमें लौटना मुश्किल होता है।