एक छोटे से शहर में एक साधारण परिवार से ताल्लुक रखने वाला कॉलेज का छात्र आरव था, जिसके सपने बड़े थे लेकिन हालात सीमित थे, उसके पिता एक छोटी सी दुकान चलाते थे और माँ घर संभालती थीं, पैसों की कमी के बावजूद आरव पढ़ाई में मेहनत करता था क्योंकि उसे यकीन था कि शिक्षा ही उसकी तक़दीर बदल सकती है।
उसी कॉलेज में पढ़ने वाली अनाया एक समझदार, संवेदनशील और आत्मसम्मान से भरी लड़की थी, जिसने बचपन से ही संघर्ष देखा था, माँ जल्दी गुजर गई थीं और पिता की तबीयत अक्सर खराब रहती थी, इसलिए अनाया ने कम उम्र में ही जिम्मेदारियों का बोझ उठाना सीख लिया था, फिर भी उसके चेहरे पर हमेशा उम्मीद की मुस्कान रहती थी।
कॉलेज की लाइब्रेरी में एक दिन किताबों के बीच दोनों की मुलाक़ात हुई, बातचीत धीरे-धीरे दोस्ती में बदली और दोस्ती कब एक गहरे, सच्चे प्रेम में बदल गई, यह दोनों को खुद भी पता नहीं चला, उनका प्यार दिखावे का नहीं बल्कि समझ, सम्मान और एक-दूसरे के सपनों को अपनाने वाला था।
समय आसान नहीं था, आरव को पढ़ाई के साथ-साथ पार्ट-टाइम काम करना पड़ता था, कई बार वह थक कर टूट जाता, तब अनाया उसके लिए ताकत बन जाती, उसे याद दिलाती कि आज की मेहनत ही कल की सफलता बनेगी, और जब अनाया अपने पिता की बीमारी और भविष्य की चिंता से घबरा जाती, तब आरव उसका सहारा बनकर उसे यह भरोसा दिलाता कि वह अकेली नहीं है।
दोनों के रास्ते में समाज की बातें, पैसों की कमी, असफलताओं का डर और कभी-कभी खुद पर शक भी आया, कई परीक्षाओं में असफलता मिली, कई मौके हाथ से निकले, कई रातें आँसुओं में बीतीं, लेकिन उन्होंने एक बात कभी नहीं छोड़ी — एक-दूसरे का हाथ।
आरव ने कॉलेज के आख़िरी साल में एक बड़ी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी शुरू की, दिन-रात मेहनत की, अनाया ने अपने सपनों को थोड़े समय के लिए पीछे रखकर उसे पूरा समर्थन दिया, नोट्स बनवाए, हौसला बढ़ाया और हर असफल मॉक टेस्ट के बाद उसे फिर से खड़ा किया।
आख़िरकार वह दिन आया जब आरव को सफलता मिली, उसका चयन हो गया, उस एक पल में उसे सिर्फ नौकरी नहीं मिली बल्कि अपने संघर्ष पर विश्वास भी मिला, और उस सफलता में अनाया का त्याग, धैर्य और प्रेम शामिल था।
आरव ने सफलता के बाद अनाया को कभी पीछे नहीं छोड़ा, अब अनाया की बारी थी, उसने आगे पढ़ाई शुरू की, अपने लक्ष्य की ओर बढ़ी और आरव उसका सबसे मजबूत सहारा बना, कुछ वर्षों बाद अनाया ने भी अपने सपनों को साकार किया।
जब दोनों अपने जीवन में स्थिर हुए, तब उन्होंने यह समझा कि उनका प्रेम सिर्फ साथ चलने का नहीं था बल्कि साथ बढ़ने का था, उन्होंने प्रेम को कमज़ोरी नहीं बल्कि ताकत बनाया, और संघर्ष को सीढ़ी।
आज वे दोनों एक सफल, सम्मानजनक और शांत जीवन जी रहे थे, जहाँ प्रेम कोई दिखावा नहीं बल्कि हर मुश्किल में एक-दूसरे के लिए ढाल बनना था, और उनकी कहानी यह सिखाती है कि सच्चा प्रेम वही है जो हालात से नहीं डरता, बल्कि संघर्ष में और मजबूत हो जाता है।