हास्पिटल के बहार..
एक बैंच पर बैठी थी राधा मां के आने का इंतजार कर रही थी।
मां ने कहा था कि तुम यहीं बैठकर इंतजार करो , मैं डाक्टर से मिलकर आती हुं।
बेंच पर बैठी राधा सामने निहार रही थी वहां एक छोटा सा बगीचा बना था जिस पर कुछ बैंच पड़ी थी उस पर कुछ लोग बैठे थे।
बगीचे में नीचे हरी घास बिछी थी कुछ छोटे पौधे लगे थे पर, फूल नहीं लगे थे।
राधा बगीचे में कुछ ढूंढ रही थी पर उसे मिला नहीं वह इधर-उधर देखती रही पर वह कहीं नहीं दिखा।
और अचानक राधा ने सामने से देव को आते हुए देखा। उसे यकीन नहीं हुआ उसने अपनी आंखें मलते हुए फिर दोबारा देखा पर वह देव ही था।
राधा कुछ समझ पाती तब तक देव उसके करीब आ गया और बेंच पर बैठते हुए बोला--क्या हुआ राधे ,
यहां क्या कर रही हो बीमार हो क्या तुम?
नहीं यहां मैं घूमने आई हूं।
देखो सामने कितना अच्छा बगीचा बना है चारों और फ्लावर हैं और बीच में बहता हुआ यह फाउंटेन।
क्या राधे ,,तुम भी कुछ भी बोल रही हो।
तो और क्या कहूं तुम्हारा प्रश्न ही ऐसा था। और फिर उसकी निगाहें बगीचे में कुछ ढूंढने लगी।
देव ने देखा और फिर बोला अच्छा छोड़ो,,,ये बताओ क्या ढूंढ रही हो।
अरे मैं खरगोश ढूंढ रही थी देव।
खरगोश ..वह भी हॉस्पिटल में,
हां ..!!
पर क्यों राधे ?
वो बहुत प्यारा लगता है ना देव।
हां..
तुम्हें भी लगता है ?
हां.वो होता ही है ,इतना मुलायम , शर्मीला और सुन्दर की सभी लोग उसे पसंद करते है।
पता है देव --
क्या..
जब हम मिले थे तो,,
तो क्या..
तुम मुझे खरगोश जैसे लगते थे और मेरी सभी सहेलियों भी तुम्हें खरगोश कहती थी।
क्या..! चौंकते हुए बोला देव तुम मुझे खरगोश कहती थी।
मैंने कब कहां कि ,तुम्हें खरगोश कहती थी तुम खरगोश जैसे लगते थे ये कहां मैंने।
अच्छा..तो तुम क्या कहती थी?
शशक
शशक ये कैसा नाम है राधे..
तुम सच में कुछ नहीं समझते ना देव..
ऐसा नहीं है राधे..पर तुम बताओ ना शसक कैसा नाम है।
बुद्धु.. खरगोश को संस्कृत में 'शशक'' कहते है
अच्छा..! पर तुमने कभी बताया नहीं मुझे
हां.. ये सीक्रेट नाम था।
अच्छा.. पर है तो ये एक जानवर का नाम ही ना।
नहीं देव ऐसा नहीं है..
तुम्हें पता है खरगोश की तुलना चंद्रमा से की जाती है और चंद्रमा यानी शशि इसलिए खरगोश को शशक कहते हैं।
और मैं तुम्हें शशि नहीं कहना चाहती थी बस इसलिए,, तुम्हें शशक कहती थी।
मेरी दोस्त अक्सर कहती थी कि --तुम बहुत सुंदर और शर्मीले हो।
अच्छा.. और तुम्हें क्या लगता था राधे?
राधा ने बात पलटते हुए कहां तुम यहां क्या कर रहे हो देव।
पहले मेरी बात का जवाब दो तुम्हें क्या लगता है।
राधा ने अपनी नजरें झुका ली और वो कुछ कहती इससे पहले ही माया देवी बोली --यु अकेले- अकेले किस बात कर रही हो राधा ।
राधा ने नजर ऊपर उठा कर देखा सामने मां खड़ी थी।
राधा बोली किसी से नहीं मां मैं तो यूं ही बैठी थी।
मां बोली चलो राधा घर चलते हैं ।
राधा चुपचाप उठी और मां के साथ चल दी चलते हुए उसने पलट कर देखा__देव अभी बेंच पर बैठा राधा के उत्तर की प्रतीक्षा कर रहा था।
...........
देव घर से निकलते हुए रमा से बोला अच्छा चलता हूं काम खत्म होते ही आ जाऊंगा।
ट्रेन में बैठा देव अभी भी उसके दिलो दिमाग में प्रश्नों का पहाड़ था।
क्या हुआ होगा आंटी जी ने क्यों बुलाया है मुझे ?
तभी उसे ख्याल आया कि आंटी जी ने कहा था कि देव आने से पहले मुझे कॉल कर देना ।
देव ने अपना फोन निकाला और कॉल करके बताया कि आंटी जी में आ रहा हुं।
माया देवी बोली धन्यवाद देव पर तुम घर नहीं आना घर के पास वाले गार्डन में आना मैं तुम्हें शाम को वहीं पर मिलुगी।
देव बोला -ठीक है आंटी
अब तो उसके दिमाग में प्रश्न और तीव्रता से चलने लगे थे ऐसा क्या हुआ होगा कि आंटी ने मिलने भी बुलाया और घर आने से भी रोक दिया।
अब तो राधा भी अपने ससुराल में रहती है।
ऐसा क्या हुआ होगा?
पर उसके पास कोई आंसर नहीं थे।
..........
राधा कमरे में बैठी थी वहां पर अंधेरा था लाइट ऑफ थी।
माया देवी ने कमरे में प्रवेश किया और राधा से बोली बेटा इतना अंधेरा क्यों कर रखा है। लाइट ऑन क्यों नहीं की।
कुछ नहीं मां बस ऐसे ही उठने का मन नहीं किया।
ठीक है राधा कोई बात नहीं। सुनो राधा आज शाम मुझे अपनी एक दोस्त से मिलने जाना है क्या तुम अकेले रह लोगी तुम्हें बुरा तो नहीं लगेगा।
नहीं मां तुम आराम से जावो मुझे बुरा नहीं लगेगा और ना ही अकेला लगेगा जिंदगी ने तो वैसे ही अकेला कर दिया अब और इससे क्या अकेला करेंगी।
माया देवी निरूत्तर थी बस कमरे से निकल गई।
.......
गार्डन पहुंचकर माया देवी ने देखा देव पहले से ही गार्डन में पहुंचकर उनका इंतजार कर रहा था।
माया देवी को देखकर वह अभिवादन के लिए खड़ा हो गया और...