The Sindoor of the Deal - Part 5 in Hindi Drama by Anil singh books and stories PDF | सौदे का सिन्दूर - भाग 5

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सौदे का सिन्दूर - भाग 5

राठौर मेंशन के गेट से बाहर निकलते ही, आर्यन ने गाड़ी की खिड़की का शीशा थोड़ा नीचे कर लिया। बाहर की हवा में बारिश के बाद वाली नमी थी, लेकिन गाड़ी के अंदर एयर कंडीशनर की ठंडक और परफ्यूम की महक ने उसे अजीब सी घुटन में जकड़ रखा था।
ड्राइविंग सीट पर आज ड्राइवर नहीं, बल्कि खुद आर्यन राठौर बैठा था। यह बात सान्वी के लिए किसी झटके से कम नहीं थी। सान्वी ने सपने में भी नहीं सोचा था कि जब वह तैयार होकर नीचे आई। तो आर्यन कार में बैठा मिलेगा। तभी आर्यन ने बोला कि "दादी ने जिद पकड़ ली थी बहू अकेले कैसे जाएगी? और वैसे भी, दामाद का फर्ज बनता है कि सासू माँ की खबर लेने साथ जाए।"
आर्यन मना नहीं कर पाया था। दादी के सामने उसकी  एक भी ना चल पाई आर्यन खुद को असहाय सा महसूस कर रहा था। लेकिन अब, जब वे दोनों कार में अकेले थे,तो कार में खामोशी छाई हुई थी।
सान्वी की नज़रें अपनी गोद में रखे हाथों पर थीं। उसकी कलाइयों में दादी के दिए वो भारी सोने के कंगन थे, और शरीर पर लाखों की साड़ी। वह सोच रही थी कि वह अपनी माँ के सामना कैसे करें? माँ, जिन्होंने उसे हमेशा बताया था कि चादर देखकर पैर फैलाना चाहिए। लेकिन आज उनकी बेटी ने न सिर्फ़ चादर बदली थी, बल्कि उस चादर को ओढ़ने के लिए उसने अपनी आत्मा का सौदा भी कर लिया था।
"चेहरे पर से यह मातम सा मूंह ना बनाओ इसे हटा लो," आर्यन की सीधी आवाज़ ने सन्नाटे को चीरा। उसने रोड से नज़रें हटाए बिना ही कहा। "हॉस्पिटल जा रही हो, किसी की शोक सभा में नहीं। अगर तुम्हारी माँ ने तुम्हें इस हाल में देखा, तो उनका बीपी फिर बढ़ जाएगा। और मैं यह दोबारा आईसीयू का ड्रामा झेलने के मूड में नहीं हूँ।"
सान्वी ने पलटकर उसे देखा। आर्यन की उंगलियां स्टीयरिंग व्हील पर कसकर जमी थीं। वह इंसान नहीं, पत्थर था। सान्वी को बहुत गुस्सा आया, गुस्से से उसने अपने दांत को ज़ोर से दबाया। और उसने अपने हाथ की मुट्ठी बांध कर एक गहरी सांस ली, फिर अपने गालों को हल्के से थपथपाया और चेहरे पर एक झूठी मुस्कान बना ली वही मुस्कान जो पिछले चौबीस घंटों से उसका सहारा बनी हुई थी।
"शुक्रिया, याद करने के लिए," सान्वी ने तंज भरे लहजे में, मगर बहुत धीमे से कहा।
हॉस्पिटल की वही जानी-पहचानी गंध
सिटी हॉस्पिटल की पार्किंग में कार का रुकना अपने आप में एक तमाशा था। वहां के खड़े गार्ड्स और लोगों की नज़रें गाड़ी पर आ कर रुक गईं। सान्वी को अपने तरफ लोगों की नजरे देखकर शर्म सी महसूस हुई। यह वही जगह थी जहाँ दो दिन पहले वह नंगे पैर, बिखरे बालों के साथ बिल माफ़ करवाने के लिए हाथ जोड़ रही थी आज वह एक महारानी की तरह गाड़ी से उतर रही थी।
लिफ्ट से ऊपर जाते वक्त आर्यन उसके बिल्कुल पास खड़ा था, पर उन दोनों के बीच एक अनकही दूरी थी। आईसीयू के बाहर वही पुरानी फिनाइल और दवाइयों की मिली-जुली गंध फैली थी, जिसे सूंघते ही सान्वी का जी मिचलाने लगा।
डॉक्टर ने उसे देखते ही पहचान लिया, पर आज उनके बोलने का अंदाज़ ही बदला हुआ था। सान्वी ने मन ही मन सोचा, ' यह सब पैसों का खेल है।' जो डॉक्टर कल तक उसे देखकर मुँह फेर लेते थे या कतराकर निकल जाते थे, आज वही लोग उसके आगे-पीछे जी-हज़ूरी कर रहे थे। इससे पहले की सान्वी कुछ कहती, उससे पहले ही डॉक्टर लपककर पास आए और बोले—
"मिसेज... राठौर?" डॉक्टर ने थोड़ा हिचकते हुए पूछा। "आपकी माँ को हमने प्राइवेट वार्ड में शिफ्ट कर दिया है।
आपकी मां को होश आ गया है और वे लगातार आपके ही बारे में पूछ रही है।" सान्वी के कदम खुद-ब-खुद वार्ड नंबर 302 की तरफ बढ़ गए। आर्यन उसके पीछे चल रहा था—हाथ जेब में डाले, पूरी तरह बेफिक्र।
"मिसेज... राठौर?" डॉक्टर ने थोड़ा सकुचाते हुए पूछा। "आपकी माँ को हमने प्राइवेट वार्ड में शिफ्ट कर दिया है। उन्हें होश आ गया है और वे लगातार आपके ही बारे में पूछ रही है।" सान्वी के कदम बेचैनी में खुद-ब-खुद वार्ड नंबर 302 की तरफ बढ़ गए। आर्यन उसके पीछे-पीछे चल रहा था—हाथ जेब में डाले, बिल्कुल लापरवाह अंदाज़ में।
दरवाजा खोलते ही सान्वी ने सामने देखा कि बेड पर सुमित्रा देवी लेटी थीं। उनके चेहरे पर अभी भी पीलापन दिख रहा था, हाथों में ड्रिप लगी थी, लेकिन उनकी आँखों में अपनी बेटी को देखने की चमक थी।
"सान्वी..." माँ की उस कांपती हुई आवाज़ ने सान्वी का कलेजा चीर दिया। सान्वी दौड़कर बेड के पास गई और माँ के सीने से लग गई। माँ से लिपटते ही ऐसा लगा जैसे पिछले कुछ दिनों की सारी थकान और ज़िल्लत धुल गई हो। माँ की ममता की छाँव में जो सुकून था, वह सान्वी को जीते-जी स्वर्ग का अहसास करा रहा था। उनके हाथों का वह हल्का सा स्पर्श सान्वी की सारी कड़वाहट मिटा रहा था। पर अगले ही पल, उन बीते दिनों का सारा दर्द, डर और अपमान आँसुओं का सैलाब बनकर उसकी आँखों से बह निकला। वह फूट-फूटकर रोना चाहती थी, अपनी आत्मा की चीख बाहर निकालना चाहती थी और चीखकर बताना चाहती थी कि— 'माँ, मैंने तुझे बचाने के लिए खुद का सौदा कर लिया है!'
मगर तभी आर्यन की वह चेतावनी याद आई। कि "अगर एक भी आंसू गिरा, तो खैर नहीं!" सान्वी ने जैसे-तैसे खुद के दिल को पत्थर बनाया। उसने जल्दी से अपनी आँखें  पोंछीं और माँ का माथा चूम लिया। "मैं ठीक हूँ माँ... बिल्कुल ठीक। देखो न, आप अब कैसी हो?"
सुमित्रा ने कांपते हाथों से सान्वी का चेहरा सहलाया, उनकी आँखों में ममता उमड़ रही थी। पर जैसे ही उनकी नज़र सान्वी के माथे के सिंदूर और गले के मंगलसूत्र पर पड़ी एवं पहनी हुई साड़ी पर गई उन्हें जैसे बिजली का झटका लगा। उनके मन में सवालों का तूफ़ान खड़ा हो गया। आखिर इतनी जल्दी यह सब कैसे हो गया? अभी तो तीन-चार दिन पहले तो कुछ भी नहीं था, फिर अचानक यह शादी? उन्हें अपनी परवरिश पर पूरा भरोसा था, पर सान्वी की हालत देखकर उनका कलेजा कांप रहा था। उनकी आँखों में गहरा शक और बेचैनी साफ़ झलक रही थी।
"यह सब क्या है मेरी गुड़िया?" सुमित्रा ने कांपती आवाज़ में पूछा। तभी उनकी नज़र दरवाजे पर खड़े आर्यन पर रुकी। उन्होंने इशारा करते हुए पूछा, "और... ये साहब कौन हैं?"
यह वही पल था, वह 'धर्मसंकट' जिसका सान्वी को सबसे ज़्यादा डर था। 'झूठ बोलना पाप है'—बचपन से यह पाठ पढ़ाने वाली माँ की आँखों में आँखें डालकर आज उसे अपनी ज़िंदगी का सबसे बड़ा झूठ बोलना था।
सान्वी ने एक पल के लिए आर्यन की तरफ देखा, फिर कांपते हाथों से माँ का हाथ थामकर बोली, "माँ... यह आर्यन हैं। आर्यन राठौर। यह... इन्हीं से मेरी शादी हुई है, ये मेरे पति हैं।"
सुमित्रा के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। "पति? पर सान्वी... बिना बताए? अपनी माँ तक को खबर नहीं की?"
"माँ, सब इतनी जल्दी में हुआ कि सोचने का वक्त ही नहीं मिला," सान्वी ने नताशा की सिखाई हुई कहानी दोहराना शुरू किया। "आपकी हालत बहुत बिगड़ चुकी थी। डॉक्टर ने कहा था कि ऑपरेशन के लिए तुरंत पैसों का इंतज़ाम करना होगा। तभी आर्यन आगे आए... इन्होंने हमारी मदद की। हम एक-दूसरे को पहले से जानते थे 
आप अस्पताल के बिस्तर पर लेटे हुए ही तो बार-बार ज़िद कर रही थी कि मैं जल्द से जल्द शादी कर लूँ और अपना घर बसा लूँ। बस, आपकी उसी इच्छा का सम्मान रखने के लिए हमने आपके ठीक होने का इंतज़ार नहीं किया और आनन-फानन में शादी का फैसला कर लिया।
हमने मंदिर में ही फेरे ले लिए ताकि... आपकी इच्छा पूरी हो सके।
माँ, इसलिए हमने मंदिर में ही फेरे ले लिए ताकि... ताकि आपकी जान बच सके।"
यह आधा सच था और आधा कोरा झूठ। सुमित्रा की आँखों में एक पल के लिए संदेह की लहर उठी, उन्होंने अपनी पैनी नज़रों से आर्यन को ऊपर से नीचे तक देखा। आर्यन, जो अब तक किसी मूर्ति की तरह खड़ा था, धीरे-धीरे चलते हुए कदमों से बिस्तर के करीब आया।
झुककर बड़े प्रेम से सुमित्रा के पैर छुए।
यह देख सान्वी हक्की-बक्की रह गई और फटी आँखों से उसे देखने लगी। विश्वास नहीं हो रहा था कि आर्यन ऐसा कुछ कर सकता है।
आर्यन ने सीधी नज़रें मिलाते हुए कहा, "नमस्ते माँ जी। हमें माफ़ कर दीजिएगा कि हम आपका आशीर्वाद पहले नहीं ले पाए... हालात कुछ ऐसे बन गए थे कि हमारे पास कोई और रास्ता नहीं था।"
उसकी आवाज़ में वह चुभने वाला ताना नहीं था जो सान्वी के लिए हुआ करता था। उसकी बातों में एक संजीदा सम्मान था।
सुमित्रा एक स्कूल मास्टर की पत्नी थीं, इंसानों को भांपने की कला उन्हें विरासत में मिली थी। उन्होंने गौर से आर्यन की आँखों में झांका। उन्हें वहाँ प्यार तो नहीं दिखा, पर एक मजबूत ज़िम्मेदारी और ठहराव ज़रूर नज़र आया। शायद उसी पल उन्हें यकीन हो गया कि उनकी बेटी कम से कम सुरक्षित हाथों में है।
"जुग-जुग जियो बेटा," सुमित्रा ने कांपते हाथों से आर्यन के सिर पर आशीर्वाद दिया। "मेरी बच्ची बहुत सीधी है, इसे दुनियादारी की समझ रत्ती भर भी नहीं है। यह लोगों की कड़वाहट नहीं पहचान पाती और बहुत जल्दी किसी पर भी भरोसा कर लेती है। छोटी-छोटी बातें इसके दिल को लग जाती हैं... बस इसका ख्याल रखना। इसके पिता के जाने के बाद, यही मेरी दुनिया है।"
उस एक स्पर्श और उन चंद लफ़्ज़ों ने कमरे के माहौल को बोझिल कर दिया। आर्यन, जो करोड़ों की डील करते वक्त भी कभी विचलित नहीं होता था, उस बीमार माँ के कांपते हाथों के नीचे एक पल के लिए काँप गया। उसे महसूस हुआ कि यह आशीर्वाद उसने पैसों के दम पर खरीदा है, और शायद इसीलिए, यह उसे किसी वरदान के बजाय किसी भारी बोझ की तरह लग रहा था। यह उसके 'कर्मों का हिसाब' था या उसने एक माँ की ममता के साथ छल किया था।

लेखक की टिप्पणी:
इस अध्याय में हमने देखा कि सान्वी किस तरह अपने आत्मसम्मान और माँ की जान के बीच पिस रही है। आर्यन का किरदार अभी भी एक रहस्य बना हुआ है—एक तरफ वह कठोर है, तो दूसरी तरफ वह संस्कारों का निर्वाह भी कर रहा है। क्या यह उसकी कोई नई चाल है या उसके पत्थर दिल के नीचे भी कोई संवेदना छिपी है? कहानी के अगले मोड़ पर यह देखना दिलचस्प होगा।