Me and My Feelings - 143 in Hindi Poems by Dr Darshita Babubhai Shah books and stories PDF | में और मेरे अहसास - 143

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में और मेरे अहसास - 143

कैसे मैं शृंगार लिखूँ 

कैसे मैं शृंगार लिखूँ, जब के पाकीज़ा हुस्न बहकता हैं ll

आज महफिल में नशीली संगत में अंग अंग छलकता हैं ll

 

कुछ ज्यादा ही रोनक और रोशनी छाई हुई है कि l

कब से सुलगता जलवा देखने को दिवाना तड़पता हैं ll

 

भावों में आवारापन, जहां आँखों में शर्म की नजाकत l

खिलती कलियां औ नव पल्लवित गुल को तरसता हैं ll

 

हुस्न की मल्लिका सोला शृंगार कर आने वाली है तो l

आज स्वागत के वास्ते पत्ता पत्ता बूटा बूटा महकता हैं ll

 

निगाहों में समाकर दिल में बसा लेने को जी करता है गोया l

इस लिए धीरे से और चुपके से रुख से पर्दा सरकता हैं ll

१६-१ -२०२६ 

प्रणय गीत गाऊं

महफिल में प्रणय गीत गाऊं या ग़ज़ल को गुनगुनाऊं l 

या फ़िर अपनी मुलाकातों के प्यारे किस्से सुनाऊं ll

 

आज तुम्हें खिलखिलाता मुस्कुराता देखने को l

तुम्हें पसंद आ जाए वहीं प्यारा सा नगमा गाऊं ll

 

समय की रफ़्तार तो कुछ तेज भाग रही है तो l

जीवन में सुरीलापन और सुखद दिन रात लाऊं ll

 

प्रेम पथ पर चल तो पड़े हैं अब चाहे जो भी मिले l

तुम्हें हसता खेलता देखकर ख़ुद सुख चैन पाऊं ll

 

जीते जी तो जिन्दगी ने खूब भगाया है बस अब l

एक पल सुकून की साँस लेकर क़ायनात से जाऊं ll

१७-१-२०२६ 

प्यार

प्यार है तो बताते क्यूँ नहीं?

गले लगाके जताते क्यूँ नहीं?

 

मोहब्बत भरे प्यारे नशीले से l

होठों पे गीत सजाते क्यूँ नहीं?

 

जन्मों जन्म के लिए नहीं रूठे l

क़सम देकर मनाते क्यूँ नहीं?   

 

किस बात का डर है सखी कि l

दिल से दिल लगाते क्यूँ नहीं?

 

चार दिन जिन्दगी में दोस्त l

खूबसूरत सी बनाते क्यूँ नहीं?

१८-१-२०२६ 

मंजुनाथ 

परेशानियों में सारा काफ़िला लगता हैं l

मंजुनाथ ने निकाला मुब्तिला लगता हैं ll

 

हर कहीं अफरा-तफरी फेली हुई है कि l

सारे शहर में उठा ज़लज़ला लगता हैं ll

 

राहत की इब्तिदाई काम कर रही आज l

प्रार्थना ओ का सिलसिला लगता हैं ll

 

चाहत की इंतिहा का असर देख लो l

अब थोड़ा दर्दों से फ़ासला लगता हैं ll

 

ये जो ग़म के बादल छाए हुए थे वो l

नन्ही गलती का मसअला लगता हैं ll  

१९-१-२०२६ 

अंजनी 

श्री राम के बड़े भक्त थे श्री हनुमानजी l

माँ अंजनी के रक्त थे श्री हनुमानजी ll

 

राक्षसो का सर्वनाश करने साथ रहे l

राम का लक्ष्य थे श्री हनुमानजी ll

 

भीतर से मोम का रुदय था पर l

बाहिर से सख्त थे श्री हनुमानजी ll

 

जिसने भी राम को परेशान किया l

किसीको न बख्श थे श्री हनुमानजी ll

 

रघुनंदन के सेवा में ओतप्रोत रहते l

रामसीता के रक्ष्य थे श्री हनुमानजी ll

२०-१-२०२६ 

 

किसी के रूठने से लहजा बदल नहीं सकता l

दिल मोम की तरह से ये पिगल नहीं सकता ll

 

 

किन्नर

ईश ने सोच समझ कर किन्नर बनाये हैं l

कोई तो मकसद होगा जो उन्हें बनाये हैं ll

 

अपनों ने ठुकराया ओ फेंका गलियों में l

ज़माने ने अनगिनत तोहमत लगाये हैं ll

 

दुलार तो न दिया घर बार निकाला ओ l

लहू ने गुमनाम अँधेरे रास्ते बताये हैं ll

 

कौन से कर्मो की सजा मिली है बस l

ईश से पूछते हमे क्यूँ ऐसे बनाये हैं ll

 

सदा लोगों ने उँगलियों पर नचाया l

समाज ने हिजडा कहकर दबाते हैं ll

२१-१-२०२६ 

धवल धारिणी 

धवल धारिणी ज्ञान का दीपक जलाती हैं l

अंधेरे से उजालों की और लेकर जाती हैं ll

 

श्वेत कमल पर विराजती है माँ सरस्वती l

वाणी में मधुरता, बुद्धि में उजियारा लाती हैं ll

 

जिह्वा पर सदा ही माँ की वंदना हो ओ l

ज्ञान का सागर बहा दे ये दुनिया गाती हैं ll

 

जिस घर में वास करे वीणावाली सरस्वती l

उस घर की संतान ज्ञान व संस्कार पाती हैं ll

 

माँ की वंदना की गूँज से नाच उठे सारा संसार l

माँ की कृपा, आशीर्वाद और छाया भाती हैं ll

२२-१-२०२६ 

गुरुदेव

गुरुदेव के बिना ज्ञान नहीं मिलता हैं l

ओ ज्ञान के बिना मान नहीं मिलता हैं ll

 

संकल्प-विकल्पों से कभी हार न माने।

सिवा गुरु चरण घ्यान नहीं मिलता हैं ll

 

गुरु की छत्रछाया में विद्यमान बनना है l

सही दिशाओ का भान नहीं मिलता हैं ll

 

चाहे पूरी कायनात की प्रदक्षिणा कर लो l

माता पिता गुरु समान नहीं मिलता हैं ll

 

ज्ञान के महा प्रशिक्षक बनके करे उद्घार l 

आशीर्वाद के बिना शान नहीं मिलता हैं ll

२३-१-२०२६ 

नीलमणि 

सजने सँवरने के लिए घर क्यूँ नहीं जाते l

नीलमणि के रत्नों से सँवर क्यूँ नहीं जाते ll

 

ग़र ऊँचाई से इतना डर लग रहा है तो फ़िर l

ऊंचे पहाड़ों से नीचे उतर क्यूँ नहीं जाते ll

 

अकेले अकेले कब तलक भटकते रहोगे तो l

कारवाँ के साथ साथ सफ़र क्यूँ नहीं जाते ll

 

यूँ अपनों से रिश्ता नहीं तोड़ा करते, जाओ l

जहां से आये हो वहां उधर क्यूँ नहीं जाते ll

 

मयखाने के चक्कर कब तक काटा करोगे l

अच्छे नेक दिल हो तो सुधर क्यूँ नहीं जाते ll

२४-१-२०२६

सपनें 

सपनों की रजाई ओढ़े सो जाते हैं l

सुनहरे भावी को पाने खो जाते हैं ll

 

आज ऊँची उड़ान की ख्वाईश में l

थोड़ी ही देर में दिवाने हो जाते हैं ll

 

मौज़ूदगी इतनी नापसन्द है तो l

खुद मर्जी से यहां से लो जाते हैं ll

 

मौज ए शराब उठता दिल में कि l

पीकर महफिल में समो जाते हैं ll

 

शाम होते जब घर जाते है तब l

जान निकल जाती जब वो जाते हैं ll

२४-१-२०२५ 

तिरंगा 

आन बान शान से लहराओ तिरंगा प्यारा l

सब से अद्भुत है हमारा तिरंगा न्यारा ll

 

बुरी नजर न हम पर डालना कभी भी l

हम हिन्दुस्तानी, हिन्दुस्तान है हमारा ll

 

देश पर मर मिटने का ज़ज्बा न हो ओ l

फर्क़ न करो तो क्या काम है तुम्हारा ll

 

अब दुश्मनो को जान लेना चाहिए कि l

हमसे जो भी है टकराया वो है हारा ll

 

इन्सान इंसानियत का नाम है हिन्दू l

भारत की बड़ी पहचान है भाईचारा ll

 

आओ कँधे से कन्धा मिलके दूर करे l 

आज दिलों से नफ़रतों का अँधियारा ll

 

क़दम से क़दम मिलाकर भारत वासी l

आओ बने एक दूसरे का हम सहारा ll

२६-१-२०२६ 

 

कोहरा

दिल में यादों का कोहरा छाया हुआ हैं l

चैन सुकून हरने का इलाज पाया हुआ हैं ll

 

मुलाकातों के हसीन लम्हें ताजा होते ही l

चहेरे पर मुस्कराहट को बोया हुआ हैं ll

 

आज कल बड़ी कशमकश में था दिल कि l

कई दिनों के बाद चैन से सोया हुआ हैं ll

 

शम्स निकला खुशियों वस्ल के वादे से l

हसी का मंजर दिल में समोया हुआ हैं ll

 

दूर दूर तक घनी चादर फैली हुई है तो l

उजालों को चहुओर से धोया हुआ हैं ll

२७-१-२०२६ 

ठंडी हवा 

भीतर से नशीली यादों की ठंडी हवा आती हैं l

तभी सर्द रातें तन मन को भड़का जाती हैं ll

 

मुलाकात बहुत छोटी ही सही पर हसीन सी l

मुस्कुराहट की लहरे दिल से टकराती हैं ll

 

तेज बयारो ने इस तरह घेरा डाला हुआ कि l

रात कंबल के गर्माहट से लिपटकर बीती हैं ll

 

गर्मी की एक चिनगारी ढूंढती रहती फिजाएं l

अँधियारी रात में हवा थरथराहट गाती हैं ll

 

ग़र बचना से ठंडी बायरो के खौफ़ से तो l

खुद का घोंसला बंधकर बैठे बतियाती हैं ll

 

सभल कर रहना इस वातावरण में यारों l

ठंड में कोहरे की चादर चहुओर छाती हैं ll

 

छोटे बड़े अपनेआप की गर्मी से रक्षा करे l

ठंडी हवा साथ में शरदी ज़ुकाम लाती हैं ll

२८-१-२०२६ 

खिली खिली धूप 

यादों की खिली खिली धूप दिल को बहला गई l

फ़िर से मुलाकात की चिंगारीयों को भड़का गई ll

 

एक अलग ही मजा आ रहा नशीले रूतबे का l

आज थोड़ी गर्मी थोड़ी ठंडी मौसम बहका गई ll

 

सुंदर रंगों के रूप में,मधुर नाद के रूप में आज l

तमन्ना, अरमानो और ख्वाइशों को सहला गई ll

 

फ़िर दिवाकर के आने का संदेश लेकर आई कि l

चिड़ियों को चहचहाना पंखी का तान तड़पा गई ll

 

फ़िर किसी दिन सूरज उजियारा लेकर आयेगा l

खिली खिली धूप किस्मत चमका के तरसा गई ll

२९-१-२०२६ 

बसंत ऋतु

बसंत ऋतु नई उमंग, नई आश और नव जीवन लेकर आती हैं l

ऋतुओकी रानी कहलानेवाली ऋतु नई ताज़गी लेकर आती हैं ll

 

प्रकृति में नव जीवन, नये पत्ते, केसरिया फूलो की रंगत संग l

फिझा ओ में चहुओर खुशियो की बौछार को वह लाती हैं ll

 

नई शुरुआत पुनर्जन्म और नवीनीकरण का प्रतीक है l

ठंडी गर्मी का मिश्रण, सुखद मौसम लाने को जानी जाती हैं ll

 

शोख अदाओं पर दिवानी हुई जाती है और कायनात l

सरस्वती पूजा और होली आगमन के गीत गाती हैं ll

 

आफ़ताब का खिला खिला प्रफुल्लित रूप मनभावन ओ l  

ओस की शबनबी बुँदे और सुनहरी सुबह खूब भाती हैं ll

३०-१-२०२६ 

 

 

बसंत ऋतु

आज बसंत ऋतु साज़िश कर रही हैं l

हमे मिलाने की कोशिश कर रही हैं ll

 

देखो खिली खिली प्रफुल्लित सुबह में l 

ओस की शबनमी बुँदे मालिश कर रही हैं ll 

 

हर तरफ़ बहार छाई हुई है साथ साथ l

केसरिया रंगो की बारिश कर रही हैं ll

 

नये रंग रूप अंदाज़ में ढालकर वो l

सूखे शज़रो को पोलिश कर रही हैं ll

 

ऋतुओकी रानी कहलानेवाली बसंत ऋतु l

होली स्वागत को वर्जिश कर रही हैं ll

३०-१-२०२६ 

खुशबू

प्यार की खुश्बू से जिंदगी के बाग में बसंत छाई हुई हैं l

आत्म सम्मान, जीने की चाहत और ताक़त पाई हुई हैं ll

 

जी भरके बरसने की चाहत हुई तो कड़ी सर्दियों में l

बनके बादल रिमझिम बारिस की बौछार लाई हुई हैं ll

 

तन मन में एक अज़ीब सी बिजली चमकी और l

मखमली यादों से चहेरे पे गुलाबी मुस्कान छाई हुई हैं ll

 

खुश्बू से महक उठी दिल की दुनिया ओ बहक कर l

ग़ज़लो की सरगोशी में प्यार की पुस्तक भाई हुई हैं ll

 

आँखों के इशारों में दिल ने ख़्वाहिश को सुन ली ओ l

सीने की धड़कनों ने नशीली राग रागिनी गाई हुई हैं ll

३१-१-२०२६