सुबह की सुनहरी धूप अब तीखी होने लगी थी। भूपेंद्र के ऑफिस जाने के बाद घर की हलचल थमी नहीं थी, बल्कि उसका स्वरूप बदल गया था। वंशिका अपने कमरे में शीशे के सामने खड़ी थी। वह अपनी फिटनेस को लेकर जितनी संजीदा थी, उतनी ही सचेत वह अपने पहनावे को लेकर भी रहती थी। उसने गहरे नीले रंग की ब्रांडेड जिम-लेगिंग और स्पोर्ट्स टी-शर्ट पहन रखी थी। बालों को ऊँची पोनीटेल में कसकर बांधते हुए उसने एक बार फिर आईने में खुद को निहारा।
वंशिका का जिम, जो उसकी पहचान और गर्व का केंद्र था, उनकी ही पॉश कॉलोनी के एक कोने में स्थित था। यह कोई साधारण जिम नहीं था जहाँ पसीने की गंध और भारी मशीनों का शोर हो। 'फेमिना फिट' नाम का यह जिम विशेष रूप से केवल महिलाओं के लिए बनाया गया था। इसकी खासियत इसकी आधुनिक मशीनें नहीं, बल्कि वह प्राइवेसी और क्लास थी जो यहाँ की सदस्यता लेने वाली महिलाओं को मिलती थी। यहाँ साधारण घरेलू महिलाएं कम ही दिखती थीं, लेकिन शहर के रईस घरानों की बहुएं, बिजनेसवुमेन और ऊंचे रसूख वाली महिलाएं यहाँ की नियमित सदस्य थीं। जिम की बनावट बहुत सुरुचिपूर्ण थी—बड़ी-बड़ी कांच की खिड़कियां जिनसे बाहर का गार्डन दिखता था, सॉफ्ट लाइटिंग और हल्की खुशबू वाला एयर प्यूरीफायर जो हमेशा चलता रहता था।
वंशिका जब वहाँ पहुँचती, तो वह केवल एक इंस्ट्रक्टर नहीं, बल्कि उन महिलाओं की राज़दार और सहेली बन जाती थी। जिम के अंदर मशीनों पर दौड़ती महिलाओं के बीच केवल वजन घटाने की बात नहीं होती थी, बल्कि बड़े घरों की किटी पार्टीज़, नए गहनों और पेरिस की छुट्टियों की चर्चा भी होती थी। वंशिका ने बड़ी मेहनत से इस नेटवर्क को खड़ा किया था।
वह घर से निकलने ही वाली थी कि उसके फोन की घंटी बजी। स्क्रीन पर 'काया' का नाम चमक रहा था।
"हेलो, दीदी?" काया की आवाज़ दूसरी तरफ से आई।
"हाँ काया, बोलो। कुछ भूल गई क्या?" वंशिका ने गाड़ी की चाबी उठाते हुए पूछा।
"नहीं दीदी, रसोई का सारा काम निबट गया है। सब्जियां कट कर फ्रिज में रख दी हैं और कपड़े मशीन से निकाल कर सुखा दिए हैं। अब मैं थोड़ी देर के लिए अपने घर जा रही हूँ, माँ की तबीयत कुछ ढीली है कल से।" काया ने थोड़ा हिचकते हुए अपनी बात रखी।
वंशिका ने घड़ी देखी। अभी सुबह के दस बज रहे थे। "ठीक है, चली जाओ। लेकिन ध्यान रखना, बच्चों के स्कूल से आने से पहले लौट आना। दोपहर का खाना गर्म करना होगा और उनकी यूनिफॉर्म भी प्रेस करनी है।"
"जी दीदी, मैं ठीक एक बजे तक वापस आ जाऊँगी," काया ने हामी भरी और फोन रख दिया।
काया ने अपना झोला उठाया और घर के पिछले दरवाजे से बाहर निकल गई। जैसे ही वह सड़क पर आई, उसके चेहरे की वह फुर्ती जो वह भूपेंद्र के घर में दिखाती थी, थोड़ी मद्धम पड़ गई। वह पैंतीस वर्ष की थी, लेकिन उसकी आँखों में वह चमक नहीं थी जो एक सुखी वैवाहिक जीवन की निशानी होती है। काया का अतीत उन ज़ख्मों से भरा था जिन्हें वह हर सुबह अपनी मुस्कुराहट के पीछे छुपा लेती थी।
काया एक तलाकशुदा महिला थी। उसकी शादी एक ऐसे पुरुष से हुई थी जो दिखने में तो भला था, लेकिन भीतर से वह एक अय्याश और बदतमीज इंसान निकला। शादी के शुरुआती कुछ महीने तो ठीक रहे, लेकिन जल्द ही उसने अपना असली रंग दिखाना शुरू कर दिया। उसे शराब और जुए की लत थी। जब भी वह हार कर आता या नशे में धुत्त होता, उसका सारा गुस्सा काया पर निकलता। वह छोटी-छोटी बातों पर काया पर हाथ उठाता। काया ने सालों तक यह सब सिर्फ इसलिए सहा कि शायद एक दिन सब ठीक हो जाएगा, या शायद समाज के डर से। लेकिन जब बात उसके आत्मसम्मान और जान पर बन आई, तो उसने वह कदम उठाया जिसकी उसके परिवार में किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। उसने तलाक ले लिया।
लेकिन समाज और मायके की हकीकत उससे भी कड़वी थी। काया को लगा था कि मायका उसके लिए सुरक्षित पनाहगाह होगा, लेकिन वहाँ पहुँचते ही उसकी भाभियों के माथे पर बल पड़ गए। माँ, जो कभी उसे प्यार से पुकारती थी, अब उसे बोझ समझने लगी थी। छोटी बहनें, जिनकी शादियाँ अभी नहीं हुई थीं, उन्हें डर था कि एक तलाकशुदा बड़ी बहन के रहते उनके लिए अच्छे रिश्ते नहीं आएंगे। सुबह की चाय से लेकर रात के खाने तक, काया को सिर्फ ताने सुनने को मिलते। "इतना ही घमंड था तो फिर यहाँ क्यों आई?" "दो थप्पड़ खा लेती तो क्या पहाड़ टूट पड़ता?"
परेशान होकर काया ने नौकरी ढूंढनी चाही। लेकिन यहाँ उसकी दूसरी सबसे बड़ी कमजोरी सामने आई—शिक्षा। काया ने जैसे-तैसे रो-धोकर सिर्फ आठवीं तक पढ़ाई की थी। उसके पास न कोई डिग्री थी, न कोई विशेष कौशल। आधुनिक दफ्तरों के दरवाजे उसके लिए बंद थे। उसे समझ आ गया था कि सम्मान के साथ जीने के लिए उसे वही काम करना होगा जिसमें वह सबसे माहिर है—घर संभालना और खाना बनाना।
शुरुआत में उसने आस-पास की सोसायटियों में खाना बनाने का काम शुरू किया। दो घरों से चार हुए, और फिर पाँच। धीरे-धीरे लोगों को पता चला कि इस सांवली सी औरत के हाथों में गजब का स्वाद है। वह जो भी बनाती, उसमें एक अलग ही सोंधापन होता। एक दिन वंशिका की एक सहेली के घर किटी पार्टी में काया ने खाना बनाया था। वंशिका को उसका काम और शांत स्वभाव इतना पसंद आया कि उसने काया को सीधे अपने घर पर रख लिया।
पहले तो काया सिर्फ सुबह-शाम खाना बनाने आती थी, लेकिन वंशिका ने महसूस किया कि काया सिर्फ एक रसोइया नहीं, बल्कि एक कुशल प्रबंधक भी है। वह घर को वैसे ही संभालती जैसे कोई अपनी जागीर संभालता है। वंशिका का अपना बिजनेस (जिम) बढ़ रहा था, भूपेंद्र अपने ऑफिस में व्यस्त रहते थे, और बच्चों को किसी ऐसे की ज़रूरत थी जो माँ जैसी ममता और अनुशासन दोनों दे सके। वंशिका ने काया को एक आकर्षक वेतन पर 'फुल टाइम हाउस हेल्प' के रूप में रख लिया।
काया के लिए भी यह एक वरदान जैसा था। अलग-अलग घरों में काम करने के अपने अलग ही झंझट थे। कहीं मालकिनें छोटी-छोटी बातों पर चीखती थीं, तो कहीं काम का कोई समय तय नहीं था। लेकिन यहाँ, भूपेंद्र के घर में, उसे सम्मान मिला। भूपेंद्र एक बेहद आदर्शवादी और सुलझे हुए इंसान थे, जो कभी काया से ऊँची आवाज़ में बात नहीं करते थे। वंशिका आधुनिक थी, वह काया को एक कर्मचारी से ज्यादा एक सहयोगी मानती थी।
काया जब अपने मायके की तंग गली में पहुँची, तो उसे फिर से वही भारीपन महसूस हुआ। लेकिन अब उसके पास एक ताकत थी—उसका अपना काम और उसकी आर्थिक स्वतंत्रता। वह अब वह अबला काया नहीं थी जो मार खाकर रोती रहती थी। वह अब वह काया थी जिसके बिना भूपेंद्र का पूरा घर थम जाता था।
उसने अपनी माँ के लिए दवाइयां लीं, कुछ देर वहाँ रुकी, लेकिन उसका मन बार-बार घड़ी की ओर जा रहा था। उसे बच्चों के आने से पहले पहुँचना था। उसे उस रसोई में जाना था जहाँ उसकी सत्ता चलती थी। उसे उस घर में वापस जाना था जहाँ उसकी आवाज़ को सिर्फ सुना ही नहीं जाता था, बल्कि हर कोई सुबह से शाम तक बस 'काया... काया...' पुकारता रहता था।
भूपेंद्र के घर का वह कोना, जहाँ वह रहती थी, अब उसका असली मायका बन चुका था। यहाँ के बच्चे उसे अपनी माँ की तरह मानते थे और वंशिका उसकी बातों पर भरोसा करती थी। काया ने झोला उठाया और तेज़ी से बस स्टॉप की ओर चल दी। उसे एक नया अध्याय लिखना था, एक ऐसी ज़िंदगी का जहाँ वह किसी की मोहताज नहीं थी।
क्रमशः
ज्योति प्रजापति
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