काले शीशों वाली एक लंबी ब्लैक BMW अंदर आई। इंजन की धीमी घरघराहट के साथ सबकी नज़र उसी पर टिक गई।
वैदही ने सिर घुमाया — और क्षणभर को जैसे समय थम गया।
गाड़ी का दरवाज़ा खुला, और एक लंबा, सुथरे कपड़ों में सजीव युवक बाहर निकला।
सफेद शर्ट, ग्रे जैकेट, और गहरी नज़रों में आत्मविश्वास की ठंडक। वैदही ने सोचा — फ्रेशर होगा शायद… कोई रईस परिवार से आया है।
वो वहीं खड़ी रही। उसके दोस्तों ने एक-दूसरे की तरफ देखा —
“अरे नहीं… वो फ्रेशर नहीं है, रुक जा वैदही…”
मगर अब देर हो चुकी थी।
वैदही उस लड़के के सामने पहुँच चुकी थी।
वो हल्के कदमों से चलकर रुकी और बोली —
“क्या तुम फ्रेशर हो?”
लड़के ने कुछ नहीं कहा।
सिर्फ उसे देखा — गहरी, शांत आँखों से।
वैदही को लगा, शायद ये चुप रहकर रैगिंग से बचना चाहता है।
उसने बिना कुछ सोचे कहा —
“मैं तुम्हारी सीनियर हूँ, इसलिए तुम्हें मेरी बात माननी पड़ेगी।”
लड़का हल्की मुस्कान के साथ सिर झुका देता है।
“ठीक है,” वैदही ने कहा, “तो चलो, सबसे पहले अपनी जैकेट उतारो।”
लड़के ने बिना कुछ बोले अपना जैकेट उतारना शुरू किया।
भीड़ में हल्की हँसी उठी।
कृतिका और बाकी दोस्त दौड़ते हुए आए —
“रुको… सर, प्लीज़ रुकिए!”
वो लड़के के सामने पहुँचकर झेंपते हुए बोले —
“माफ़ कीजिए सर, दरअसल… ये गलती से…”
लड़के ने बस हल्की मुस्कान दी।
वैदही समझ नहीं पा रही थी कि क्या हुआ।
“क्या हुआ? मैंने तो बस…”
कृतिका ने उसका हाथ पकड़कर कहा — “चलो, अभी चलो यहाँ से।”
वैदही को लगभग खींचते हुए वो वहाँ से ले गईं।
पीछे वो लड़का — वही शांत मुस्कान लिए, अपनी घड़ी देखता हुआ — डीन के ऑफिस की ओर बढ़ गया।
ऑफिस में पहुँचकर उसने विनम्र स्वर में कहा —
“सर, मैं विराज मेहता हूँ। मेरे पिता राजेश मेहता , कुछ जरूरी कारणों से नहीं आ पाए। उन्होंने मुझे आपकी मीटिंग अटेंड करने के लिए भेजा है।”
डीन ने मुस्कुराकर कहा — “ओह,ट्रस्ती मिस्टर मेहता के बेटे ! प्लीज़, अंदर आइए।”
वो बैठ गया, और ऑफिस की खिड़की से बाहर देखा — वही ग्राउंड, जहाँ अभी-अभी एक लड़की ने उसकी रैगिंग करने की कोशिश की थी।
उसके होंठों पर फिर से वही मुस्कान लौट आई — बिलकुल मासूम और अप्रत्याशित।
इधर, क्लासरूम में वैदही लगभग सन्न थी।
कृतिका ने दरवाज़ा बंद करते हुए कहा —
“ पता है तुझे तूने अभी क्या किया?”
“क्या किया मैंने?”
“जिसे तू फ्रेशर समझ रही थी, वो असल में कॉलेज के ट्रस्टी का बेटा था। डीन से मिलने आया था।”
“क्या?!” वैदही की आँखें फैल गईं।
“हाँ, अगर वो बात बढ़ा देता तो बहुत बड़ी मुसीबत हो जाती।”
वैदही का चेहरा एकदम उतर गया।
“लेकिन मैंने तो उससे पूछा था कि क्या वो फ्रेशर है… उसने कुछ कहा ही नहीं! मुझे लगा वो बचने की कोशिश कर रहा है।”
कृतिका ने सिर हिलाया — “हाँ, पर अब सोचो अगर वो शिकायत कर देता तो?”
वैदही ने चुपचाप सिर झुका लिया।
मन में ग्लानि का सागर उमड़ आया था।
कुछ देर बाद जब उसे पता चला कि वो लड़का डीन से मिलने के बाद जा रहा है, तो उसने तय किया कि वो माफी मांगेगी।
वो जल्दी से ऑफिस की तरफ गई।
वो लड़का बाहर निकल रहा था।
वैदही उसके सामने आकर बोली —
“सर… वो आज जो हुआ उसके लिए मैं सच में माफ़ी चाहती हूँ। मुझे नहीं पता था कि आप…”
वो रुका, उसकी ओर देखा — वही शांत, सौम्य नज़रें।
बस हल्की मुस्कान दी… कुछ कहा नहीं… और चला गया।
वैदही वहीं खड़ी रह गई।
वो समझ नहीं पा रही थी — उसने कुछ कहा क्यों नहीं?
क्या वो नाराज़ था या…?
उसका मन जैसे उलझ गया था।
वो हॉस्टल लौटी और सीधा कृतिका के कमरे में पहुँची।
“कृतिका, वो कुछ बोले ही नहीं। बस मुस्कुराकर चले गए।”
कृतिका ने हँसते हुए कहा —
“तो क्या हुआ? शायद उसे तू पसंद आ गई है, इसलिए कुछ बोला ही नहीं।”
“क्या?” वैदही ने भौंहें सिकोड़ते हुए कहा।
“हाँ, हो सकता है न। इतनी सुंदर और मासूम है तू, कोई भी तुझे देखे तो मुस्कुराए बिना नहीं रह सकता।”
वैदही ने झुंझलाकर कहा —
“कृतिका, तू हर बात में मज़ाक क्यों करती है?”
और वहाँ से गुस्से में निकल गई।
कृतिका ने मुस्कुराते हुए कहा —
“ये लड़की भी ना… पढ़ाई में टॉपर है लेकिन दिल के मामलों में ज़ीरो।”
फिर वो भी उठी और उसके पीछे चली गई।
कॉरिडोर में चलते हुए वैदही के मन में वही मुस्कान घूम रही थी —
वो बिना कुछ कहे चला गया, मगर उसकी आँखों में कुछ था…
कुछ ऐसा जो दिल को छू गया था।
उसने खुद से कहा —
“नहीं, पागल मत बन, ये सब बेवकूफी है।”
पर मन मान नहीं रहा था।
रात को जब वो अपने कमरे में पढ़ाई के लिए बैठी, तो पेन कई बार नोटबुक पर अटक गया।
हर बार वही चेहरा — वही मुस्कान — उसकी आँखों के सामने उभर जाती।
वो मुस्कुराहट जिसमें न गुस्सा था, न मज़ाक — बस एक अजीब सी सहजता थी।
वो सोचने लगी —
“क्या सच में उसे मैं पसंद आई थी? या वो बस हालात देखकर मुस्कुरा रहा था?”
फिर सिर झटक दिया —
“नहीं वैदही, अब तुझे फिर से बहकना नहीं है। ये वही रास्ता है जहाँ से तू एक बार भटक चुकी है।”
उसने गहरी साँस ली, और किताबें खोल लीं। बाहर रात गहराने लगी थी। लेकिन उसके भीतर कहीं एक कोमल सी रोशनी जल
चुकी थी — एक अजनबी मुस्कान की, जो उसके सपनों के बीच कहीं जगह बना चुकी थी।
कॉलेज का अगला दिन सामान्य नहीं था। ठंडी हवा में हल्की धूप फैली हुई थी, और कैंपस की सड़कों पर हर तरफ स्टूडेंट्स का शोर था। पेड़ों की छाँव के नीचे, लॉन में कुछ छात्र किताबें खोले बैठे थे, तो कुछ दोस्तों के साथ हँसते हुए कैंटीन की तरफ जा रहे थे।
वैदही अपनी किताबों को बाँहों में दबाए, हमेशा की तरह सीधे रास्ते पर चल रही थी। उसके चेहरे पर वही स्थिरता, वही अनुशासन झलक रहा था—जो उसे बाकी सब से अलग बनाता था। उसके साथ कृतिका थी, जो हर वक़्त उसकी गंभीरता में थोड़ी सा हल्कापन घोल देती थी।
कैंटीन की तरफ बढ़ते हुए, वैदही के चेहरे पर एक हल्की मुस्कान आई थी—शायद लंबे समय बाद मन शांत था। तभी, सामने से किसी के कदमों की आहट आई और अचानक ही कोई उसके रास्ते में आ खड़ा हुआ।
वो विराज था। वही लड़का, जिसे कल उसने गलती से फ्रेशर समझ लिया था और जिसकी रेगिंग करने की कोशिश में सब कुछ उलझ गया था।
वैदही एक पल को ठिठक गई। उसकी नज़र विराज पर पड़ी—साफ-सुथरे कपड़े, एक आत्मविश्वास भरा चेहरा और आँखों में हल्की सी मुस्कान। उसके चेहरे पर वही बेफिक्री थी जो कल थी, लेकिन आज कुछ अलग चमक थी।
वैदही ने खुद को सँभालते हुए कहा,
“सर, आप शायद रास्ता भूल गए हैं… डीन का ऑफिस उधर है।”
उसकी आवाज़ में विनम्रता थी, लेकिन चेहरे पर हल्की झुंझलाहट।
विराज कुछ नहीं बोला। बस उसी मुस्कान के साथ उसे देखता रहा।
वैदही को अजीब सा लगा — ये क्यों चुप है?
कृतिका उसके साथ खड़ी थी। उसकी आँखों में हल्की शरारत थी, और वो समझ गई थी कि विराज का आना महज़ संयोग नहीं है। लेकिन उसने कुछ कहा नहीं।
“चलो यहाँ से,” वैदही ने धीमे से कहा और आगे बढ़ने लगी।
तभी विराज की आवाज़ पीछे से आई —
“कल आप मुझसे मेरा जैकेट माँग रही थीं… क्या आप
बताएँगी कि आपको उस जैकेट की क्या ज़रूरत थी?”
वैदही एकदम रुक गई। पलटकर देखा तो विराज अब भी वही खड़ा था, होंठों पर वही मुस्कान। उसे एक पल में समझ आ गया — शायद इसे सब पता चल गया है।
वो नहीं चाहती थी कि कल की बात किसी बड़े झमेले में बदल जाए। अगर वो डीन से शिकायत कर दे तो अनावश्यक परेशानी हो सकती थी।
थोड़ा झिझकते हुए उसने कहा,
“सॉरी… दरअसल कल मेरे दोस्तों ने मुझे जबरदस्ती कहा था ऐसा करने के लिए। वरना मैं कभी ऐसी हरकत नहीं करती। मुझे तो खुद रेगिंग बिल्कुल पसंद नहीं। अगर आपको बुरा लगा हो तो माफ़ कीजिए।”
उसने बात खत्म की और जाने लगी।
लेकिन विराज ने हाथ बढ़ाकर उसे रोका—“रुकिए, सॉरी की ज़रूरत नहीं है।
और अगर आप चाहें तो जो कल अधूरा रह गया… उसे आज पूरा कर सकती हैं।”
वैदही ठिठक गई।
“क्या मतलब है आपका?”
विराज मुस्कुराया। “मतलब ये कि कल जो रेगिंग अधूरी
रह गई थी, उसे आज पूरी कर लीजिए। देखिए, मैं पहले से तैयार होकर आया हूँ।”
इतना कहते हुए उसने अपनी जैकेट कंधे से उतारी और वैदही की तरफ बढ़ा दी—“लीजिए, अब कोई परेशानी नहीं होगी।”
वैदही की आँखें चौड़ी हो गईं।
उसकी भौंहें सिकुड़ गईं, चेहरे पर गुस्से की लकीरें उभर आईं।
वो एक पल तक उसे देखती रही, फिर बोली—
“आपको शर्म नहीं आती? ये कॉलेज है कोई मज़ाक का अखाड़ा नहीं! और जो आप कर रहे हैं न, वो किसी संस्कारी इंसान के लायक नहीं है।”
वो मुड़ी, और कृतिका का हाथ पकड़कर आगे बढ़ गई।
कृतिका हँसती हुई बोली—
“अरे, अगर वो खुद कह रहा था करने को, तो करने में क्या बुराई थी? बेचारा कितने प्यार से अपनी जैकेट दे रहा था!”
“कृतिका!” वैदही ने उसे घूरकर देखा, “चुप रहो तुम।”
उसके लहजे में गुस्सा था, और शायद थोड़ी झेंप भी।
दोनों कैंटीन पहुँचीं। वैदही ने टेबल पर किताब रखी, गहरी साँस ली। वो अब भी अंदर से उबल रही थी। तभी
पीछे से वही जानी-पहचानी आवाज़ आई —
“देखिए, मुझे गलत मत समझिए…”
वैदही और कृतिका दोनों ने पीछे देखा। विराज फिर उनके सामने था — इस बार शांत, लेकिन आत्मविश्वास पहले से कहीं ज़्यादा।
“दरअसल,” उसने कहा, “गलत आपने मुझे कल समझ लिया था। मैं कोई ट्रस्टी नहीं हूँ… बस उनका बेटा हूँ। वो नहीं आ पाए थे, इसलिए मुझे भेज दिया। और सच कहूँ तो कल मेरा यहाँ आने का बिल्कुल मन नहीं था।”
वो मुस्कुराया।
“लेकिन पता नहीं क्यों, आज यहाँ आए बिना रह नहीं पाया… जबकि आज मुझे यहाँ कोई काम भी नहीं था।”
कृतिका ने वैदही की तरफ देखा, जैसे वो सब कुछ समझ रही हो। विराज के लहजे में वो सधी हुई फ्लर्टिंग थी जो बात को हल्का भी बनाती थी और असरदार भी।
वैदही को गुस्सा आने लगा।
“देखो मिस्टर,” उसने कड़क आवाज़ में कहा,
“तुम क्या करने की कोशिश कर रहे हो, मुझे अच्छे से समझ आ रहा है। लेकिन तुम्हारी ये चालाकी मुझ पर काम नहीं करेगी। चुपचाप यहाँ से चले जाओ। होगे तुम किसी अमीर बाप के बेटे, लेकिन मेरे आगे तुम्हारे रिच स्टेटस या गुडलुकिंग पर्सनालिटी का कोई असर नहीं होगा। समझे?”
वो खड़ी हुई, आँखों में आग थी, चेहरा गुस्से से तमतमाया हुआ।
उसके हर शब्द में दृढ़ता थी — एक ऐसी लड़की की जो अपने रास्ते से ज़रा भी डगमगाना नहीं चाहती।
विराज, उसके गुस्से को देख, मुस्कुरा उठा।
“ गुड़लुकिंग हाँ...इतनी सी देर मे काफ़ी गौर से देखलिया आपने मुझे....बस… यही अदा तो मुझे यहाँ खींच लाई,” उसने धीरे से कहा।
“वरना बिना मतलब के विराज महता सांस भी नहीं लेता।
वैसे भी, खूबसूरत लड़कियाँ गुस्से में और भी खूबसूरत लगती हैं।”
वो थोड़ा झुका, मेज़ पर रखी अपनी जैकेट उठाई, और जाते-जाते बोला —
“और अगर आपने अभी ये रिएक्शन नहीं दिया होता, तो मैं शायद यहाँ से चला जाता और दोबारा आपकी तरफ देखता भी नहीं।
लेकिन अब… लगता है यहाँ बार-बार लौटकर आना पड़ेगा।”
उसकी आँखों में वही आत्मविश्वासी चमक थी — जैसे किसी जंग का एलान कर गया हो।
वो मुड़ा, मुस्कुराते हुए कैंटीन से बाहर चला गया।
कुछ पल तक सन्नाटा छाया रहा।
वैदही वहीं खड़ी थी — उसका चेहरा अब भी गुस्से से लाल था। उसकी साँसें तेज़ थीं, लेकिन उसकी आँखों में एक हल्की उलझन भी थी — आखिर वो ऐसा क्यों बोल गया?
कृतिका ने उसका चेहरा देखा। पहली बार उसके भीतर कुछ और झाँकता हुआ दिखा — गुस्से के पीछे कहीं न कहीं एक अनकहा एहसास।
“वैदही…” कृतिका ने धीरे से कहा, “अब तो मानना पड़ेगा, वो लड़का दिलचस्प है।”
“चुप रहो कृतिका!” वैदही ने झुँझलाकर कहा और अपनी किताब उठाई।
दोनों कैंटीन से बाहर निकलीं।
कॉरिडोर में हवा चल रही थी। सूरज की रोशनी दीवारों पर पड़कर जैसे दोनों के साए को लंबा कर रही थी।
कृतिका ने देखा, वैदही अब भी चुप थी, लेकिन उसके चेहरे पर वही सवाल लिखा था — क्यों उसे फर्क पड़ा?
हॉस्टल तक का रास्ता वैदही बिना कुछ बोले तय करती
रही। दरवाज़ा बंद करते हुए बस इतना कहा,
“लोग ऐसे क्यों होते हैं, जो सब कुछ मज़ाक समझते हैं…”
कृतिका ने मुस्कुराकर कहा,
“शायद क्योंकि वो दुनिया को तुम्हारी तरह सीरियसली नहीं लेते।”
वैदही ने उसे घूरा, लेकिन कुछ बोली नहीं।
खिड़की से बाहर देखा — दूर मैदान में स्टूडेंट्स खेल रहे थे, हवा में बच्चों की हँसी घुली थी, और उसे लगा जैसे वो सब किसी और दुनिया के लोग हैं — एक ऐसी दुनिया जहाँ भावनाएँ बोझ नहीं होतीं, बस बह जाती हैं।
वो मेज़ के पास आई, किताब खोली, और पढ़ने लगी… पर शब्द अब धुंधले लग रहे थे। मन कहीं और था।
क्या वो सच में इतना परेशान है सिर्फ इसलिए कि विराज ने उसकी तारीफ की? या इसलिए कि उसने उसके भीतर कोई ऐसा एहसास जगा दिया जो उसने खुद से भी छिपा रखा था?
कृतिका तकिए पर सिर टिकाकर उसे देख रही थी, मुस्कुरा रही थी — वो जानती थी, वैदही के चेहरे पर जो झुंझलाहट है, वो
बस गुस्सा नहीं… कुछ और भी है।
लेकिन उसने कुछ नहीं कहा।
वैदही ने किताब बंद की, लाइट ऑफ की, और बिस्तर पर लेट गई। उसकी आँखें बंद थीं, पर दिमाग में बार-बार वही मुस्कान घूम रही थी —
वो मुस्कान जो आज फिर उसके सामने आई थी… और शायद अब उसके दिल में कहीं जगह बना चुकी थी।
खिड़की के बाहर ठंडी हवा चल रही थी, जो परदों को हल्के-हल्के हिला रही थी। दीवार पर लगी घड़ी की टिक-टिक और कभी-कभी दूर से आती किसी कुत्ते की भौंक—बस यही दो आवाज़ें थीं जो उस रात के सन्नाटे को तोड़ रही थीं।
वैदेही की आँखों में दूर-दूर तक नींद का नामोनिशान नहीं था। वह पलंग पर लेटी हुई थी, पर उसका मन किसी बेचैन लहर की तरह बार-बार उठ रहा था। कभी करवट बदलती, कभी तकिये को कसकर पकड़ लेती, तो कभी अचानक उठकर कमरे की लाइट का स्विच ऑन-ऑफ करने लगती—बार-बार, बिना किसी वजह के। पास वाले बिस्तर पर लेटी कृतिका अब तंग आ चुकी थी। उसने करवट बदलते हुए झुंझलाते स्वर में कहा— “यारर्र, ये क्या कर रही है तू? तुझे नींद नहीं आ रही तो मत सो, पर मुझे तो सोने दे। मुझे तेरी तरह रात-रात भर जागने का कोई शौक नहीं है।”
वैदेही ने कोई जवाब नहीं दिया, बस धीरे से लाइट का स्विच बंद कर दिया और चुपचाप लेट गई।
कुछ देर तक कमरे में फिर वही सन्नाटा पसरा रहा—केवल घड़ी की टिक-टिक और दोनों की धीमी सांसों की आवाज़ें।
फिर वैदेही ने गहरी साँस ली, जैसे किसी लंबे द्वंद्व के बाद उसने एक फैसला किया हो। वह धीरे-धीरे उठकर बैठ गई और फिर से लाइट जला दी।
कृतिका ने आँखें मलते हुए आधी नींद में करवट ली और बोली—
“अब क्या है मेरी माँ… क्या हुआ, बोल भी दे। मुझे पता है जब तक तू अपने मन के सारे सवाल मुझसे नहीं पूछ लेती, ना तू सोएगी, ना मुझे सोने देगी। इसलिए जल्दी बोल ले, क्या बात है?”
वैदेही कुछ पल चुप रही। उसकी आँखों में हल्की झिझक और चेहरे पर अनकहा डर था। उसने धीमी आवाज़ में कहा—
“एक्चुअली… समझ नहीं आ रहा कि कैसे पूछूं, कहाँ से शुरू करूं।”
कृतिका ने अधीरता से कहा—
“जहाँ से मन करे, वहीं से पूछ। पर जल्दी पूछ, मुझे नींद आ रही है।”
वैदेही ने थोड़ा सिर झुकाते हुए कहा—
“ओके… तो सुन। तुझे याद है ना, मैंने पहले भी तुझसे अपने मन की बात कही थी…”
(थोड़े संकोच के साथ) “तू समझ रही है ना, मैं क्या कह रही हूं?”
कृतिका ने बिना बोले सिर हिला दिया।
“ओके तो मुझे ये पूछना था कि… पहले जो मैंने तुझे बताया था, वो सब सुनकर तुझे कहीं ऐसा तो नहीं लगा कि मेरे कैरेक्टर में कोई प्रॉब्लम है?
देख, तू मुझे अच्छे से जानती है—मैं ऐसी-वैसी लड़की नहीं हूं। इंफैक्ट, मैंने तो अपनी किताबों से आगे जिंदगी में कुछ सोचा-समझा ही नहीं।
फिर पता नहीं क्यों…कुछ समय से ये ‘रॉन्ग फीलिंग्स’, ये ‘रॉन्ग इमोशन्स’ मेरे अंदर कैसे घर कर गए। जबकि मैंने कभी गलत किया नहीं, ना ही सोचा। फिर भी…”
वह रुकी, फिर थोड़ा हिचकते हुए बोली—
“तू समझ रही है ना मैं क्या कहने की कोशिश कर रही हूं?”
कृतिका ने फिर सिर हिलाया।
“अरे तू सिर क्या हिलाए जा रही है,” वैदेही झल्लाई, “कुछ बोल तो! मुझे टेंशन हो रही है।”
वह रुककर गहरी सांस लेती है और कहती है,
“दूसरी बात ये कि… तू भी तो एक लड़की है। तो मैं सोचती हूं कि जो मुझे फील हो रहा है, क्या वो तुझे भी फील होता है? या फिर ये सिर्फ मेरे साथ ही हो रहा है? और अगर होता है, तो क्यों?”
वैदेही के सवाल खत्म होते ही कृतिका अचानक ज़ोर से हँसने लगी।
उसकी हँसी कमरे में गूंज उठी।
वैदेही हैरान-सी होकर बोली—
“ये क्या! मैं तुझसे इतनी सीरियस बात कर रही हूं और तू हँस रही है! तू मेरा मज़ाक उड़ा रही है ना? उड़ा ले मज़ाक! अगली बार से तुझसे कोई बात शेयर नहीं करूंगी।”
वह रूठकर पलंग के एक किनारे बैठ गई, चेहरा दूसरी ओर कर लिया।
कृतिका ने अपनी हँसी रोकने की कोशिश की, और फिर बोली—
“ऐसी बात नहीं है यार… मैं तेरा मज़ाक नहीं उड़ा रही। बस तेरी मासूमियत देखकर हँसी आ गई। तू इतनी नादान है कि तेरे सवाल सुनकर लगता है जैसे कोई छोटी बच्ची बात कर रही हो। इसमें तेरी भी कोई गलती नहीं है। सही बात है—इंसान जिस चीज़ की पढ़ाई करेगा, उसे उसी का तो ज्ञान होगा ना! और तेरी पूरी ज़िंदगी अब तक स्कूल, घर और किताबों के बीच ही बीती है। तूने अपने आस-पास के माहौल को कभी समझने की कोशिश ही नहीं की।”
कृतिका की आवाज़ अब थोड़ी भावुक थी—
“देख, तू बचपन से मेरी दोस्त है। मुझे याद है, मेरा पहला बॉयफ्रेंड 9th स्टैंडर्ड में बना था। और उस वक्त मेरी टॉपर फ्रेंड—मतलब तूझको ‘बॉयफ्रेंड’ शब्द का सही मतलब भी नहीं पता था। याद है, जब मैंने तुझे उसके बारे में बताया था तो तूने क्या कहा था?
तू बोली थी—‘जैसे गर्ल्स एक-दूसरे की दोस्त होती हैं, वैसे बॉय भी तो गर्ल्स के फ्रेंड बन सकते हैं, इसमें बुराई क्या है?’
और फिर तू गई और मेरी माँ से कह दिया कि मैंने स्कूल
में बॉयफ्रेंड बना लिया है!”
कृतिका अब हँसते-हँसते बोल रही थी—
“तुझे क्या पता था, उसके बाद क्या हुआ। तू तो कहकर भाग गई, पर माँ की मार मैंने खाई थी! और उसी डर से मैंने फिर कभी स्कूल में बॉयफ्रेंड नहीं बनाया—तेरी वजह से।”
वैदेही थोड़ा शर्मिंदा होकर मुस्कुराई, पर तुरंत बोली—
“तो तू अब ये सब मुझे सुना रही है? मैं सीरियस बात कर रही हूं!”
कृतिका ने सिर हिलाते हुए कहा—
“सुन, तब तू नहीं समझी थी, ठीक है। पर अब जब तेरे अंदर के हार्मोन्स उछाल मार रहे हैं, तो तू मेरे पास शिकायत लेकर आई है।
अगर तूने समय के साथ किताबों के साथ-साथ बाकी चीज़ों का भी थोड़ा ज्ञान लिया होता, तो आज ये दिक्कत नहीं होती।”
वैदेही कुछ पल चुप रही। उसकी आँखों में बेचैनी थी।
“तो मतलब तू कह रही है कि मेरे साथ जो हो रहा है, वो गलत नहीं है?”
कृतिका ने मुस्कुराते हुए कहा—
“बिलकुल नहीं। हर लड़की के साथ ऐसा होता है। बस
फर्क इतना है कि नॉर्मल लड़कियाँ वक्त के साथ खुद को और अपनी फीलिंग्स को संभालना सीख लेती हैं। तूने वो नहीं सीखा, इसलिए अब परेशान है। पर अब सोचने से कुछ नहीं होगा। अगर सोचना ही है तो सोल्यूशन सोच, क्या किया जाए।”
वैदेही ने उतावलेपन से कहा—
“अरे तो मैं तुझसे सोल्यूशन ही तो मांग रही हूं! और तू है कि अपना दुखड़ा रोने लगी। यार, बता ना क्या करूं!”
कृतिका ने थोड़ी देर सोचते हुए कहा—
“अब इसमें बताने को क्या है? मैं पहले ही तुझे सोल्यूशन बता चुकी हूं, और तुझे वो पसंद नहीं आया। अब क्या कर सकती हूं? तेरी इन ‘इंटिमेट फीलिंग्स’ का इंटिमेट ही सोल्यूशन निकलेगा ना—जैसी बीमारी, वैसी दवा!”
वह मुस्कुराई और बोली—
“बैसे दो और रास्ते हैं मेरे पास, पर तुझे पसंद नहीं आएंगे। एक्चुअली, तू वो कर नहीं पाएगी।”
वैदेही तुरंत बोली—
“मैं तैयार हूं! तू जो बोलेगी, करुंगी—बस तू बता।”
कृतिका ने उंगली उठाई—
“ओ हेलो! सुनने से पहले हाँ मत बोल, समझी?”
वैदेही झुँझलाकर बोली—
“देख, अब तू इरिटेट मत कर!”
“ठीक है तो सुन,” कृतिका ने कहा, “पहला रास्ता ये है कि तू… (थोड़े सस्पेंस के साथ) सन्यास ले ले और ब्रह्मचारिणी बनके जंगल चली जा। फिर ये सारी परेशानियाँ खत्म!”
वैदेही की आँखें चौड़ी हो गईं—
“ये क्या बक रही है तू? तुझे मेरी परेशानी मज़ाक लग रही है?”
वह थोड़ी मायूस होकर बोली—
“मैंने तो सुना था कि लोगों को अपने सपने पूरे करने में दुनिया भर की परेशानियाँ झेलनी पड़ती हैं, पर मेरी जैसी परेशानी किसी ने नहीं सुनी होगी!”
कृतिका हँसते हुए बोली—
“और सुनेगी भी नहीं, क्योंकि हर कोई तेरे जैसा अतरंगी नहीं होता! खैर, मैं तेरा मज़ाक नहीं उड़ा रही। मैं समझ रही हूं तू क्या झेल रही है। ठीक है, तुझे वो आइडिया पसंद नहीं आया, तो ड्रॉप करते हैं। अब तेरे पास बस ‘वन एंड ओनली’ रास्ता बचा है। उसमें कोई ऑप्शन नहीं है, तूझे मानना ही पड़ेगा।”
वैदेही ने उत्सुकता से कहा—
“तो बोल ना, वो क्या है?”
कृतिका ने चुटकी लेते हुए कहा—
“अच्छा है इस बार बिना सुने तूने हाँ नहीं बोला!”
“अब बोल भी ना,” वैदेही बोली।
“वो मैं अभी तुझे नहीं बता सकती,” कृतिका ने रहस्यमयी अंदाज़ में कहा।
“फिलहाल, तुझे मुझ पर भरोसा रखना होगा और वादा करना होगा कि जो मैं कहूँगी, तू वो करेगी।”
वैदेही ने शक से देखा—
“ऐसे कैसे! देख, मुझे तुझ पर भरोसा नहीं है। वैसे भी तू कितने उल्टे-सीधे आइडिया देती है, कहीं फिर कुछ वैसा ही न करा दे तो…”
कृतिका ने हँसते हुए दोनों हाथ जोड़े—
“अरे बाबा, डर मत! दोस्त हूं तेरी, कोई सूली पर नहीं लटकवाऊंगी समझी?”
वैदेही ने थोड़ा सोचते हुए कहा—
“ठीक है… मेरे पास और चारा भी क्या है? तेरी बात मान लेती हूं। लेकिन याद रखना—मैं तेरी दोस्त हूं, कुछ ऐसा-वैसा मत करना।”
“हाँ-हाँ मेरी माँ!” कृतिका ने हँसते हुए कहा, “फिलहाल अब मुझे सोने दे। बाकी बातें कल डिस्कस करेंगे।”
वैदेही ने सिर हिलाया और छोटे बच्चे की तरह दुबककर
लेट गई। उसकी आँखें धीरे-धीरे बंद होने लगीं।
कृतिका ने मुस्कुराकर उसकी ओर देखा, फिर चैन की साँस लेते हुए लाइट बंद कर दी।
कमरे में फिर वही शांति लौट आई—पर हवा में एक अनकहा सस्पेंस था।