1.स्याही का दामन।
"मेरे लफ्जो ने स्याही का दामन थाम लिया है।
अब लिखूँगी मैं अपनी किश्मत अपने ही हाथो से।
लिखूँगी अपना हर ख्वाब कायम,
कोई अधूरी ख्वाहिश ना छूटने दूंगी।
भर दूंगी रंग आशमा मैं,
इंद्रधनुष से रंगोली लिख दूंगी।
माँ के आँचल की छाओं लिखूँगी।
पिता का सर पे हाथ लिखूँगी।
गुलशन मैं बहार–ऐ–शाम लिख लिखूँगी।
इस दुनिया को गुलफाम लिख दूंगी।
ये धरती गगन फूलों से सजा हो,
ऐसा ही मंजर हर दफा हो,
बागबाँ आशमा को जमीं को बाग़ लिख दूंगी।
खुशियों के कई पेड़ हंसी के गुलाब लिखूँगी।
सींचे जो मिट्टी को ऐसी कई फुहार लिख दूंगी।
जहाँ बैठे बूढ़े और बच्चे साथ बो चौपाल लिखूँगी।
हर दिल दीन ईमान का धनी,
हर घर मैं एक खुशियों की तिजोरी लिखूँगी ।
कहानी बही पुरानी होंगी नये अंदाज लिख दूंगी।”
2.बो मेरी माँ है।
"कैसे कहूं, तुझसे तू क्यों इतनी जरुरी है।
सच तो है ये के तुझबीन मेरी जिंदगी अधूरी है।
दिल तड़प उठता है,
तुझसे दूर जाने के ख्याल से भी।
तेरा ही हिस्सा हूं मे,
इसलिए तो ये कहानी पूरी है।
तू कोई पहलु नहीं मेरी जिंदगी का,
तू मेरी पूरी जिंदगी है।
कैसे कहूं, तुझसे तू क्यों इतनी जरुरी है।
सच तो है ये के तुझबिन मेरी जिंदगी अधूरी है।
मे खुसनसीब हूं के मे भी एक पन्ना हूं,
तेरी जिंदगी की किताब का।
मे बो अक्ष हूं जो तू हर रोज आईने मे अपना देखती है।
तू जग है, जन्नत है, जश्न है, जिंदगी का।
तुझबीन जिंदगी का हर लब्ज है अधूरा।
कैसे कहूं, तुझसे तू क्यों इतनी जरुरी है।
सच तो है ये के तुझबिन मेरी जिंदगी अधूरी है।
हूं शुक्रगुजार उस लम्हे की जिसने,
मुझे तेरी खुशी का जरिया बनाया है।
मानी जिस पल खुदा ने दुआ तेरी,
उस पल से मुझे तेरी गोद का पालना झूलाया है।
थाम कर ऊँगली मेरी जिसने चलना सिखाया है।
दिखाई है जिसने दुनिया मुझे,
दी है जिसने जिंदगी मुझे, बो मेरी माँ हैं।
कैसे कहूं, तुझसे तू क्यों इतनी जरुरी है।
सच तो है ये के तुझबिन मेरी जिंदगी अधूरी है।
जो सारी दुनिया से जुदा है,
मेरे लिए उसका नाम ही खुदा है।
दी है जिसने हर खुशी मुझे, बो मेरी माँ है।"
3. आईना।
"तू मुझमे अक्ष देखता है अपना,
देखकर खुद को सबार लेता है।
जरा देख तो तकदीर मेरी,
सारी दुनिया को खुद से रूबरू कराने बाला,
मैं! खुद आइना होकर भी,
खुद को निहार नहीं पाता।
तू खुशनशीब है।
तुझे अपने दिल का हाल कहने को,
मैं मिला हूं।
मेरे नशीब का क्या?
जो टूट कर भी अपनी आह!
किसी को सुना नहीं पाता।
मैं! खुद आईना होकर भी,
खुद को निहार नहीं पाता।
तू मुस्कुरा के तेरे हिस्से मैं,
सारे जहान की आजादी लिखी है,
खुदा ने…!
रोना तो मुझे चाहिए।
क्यूंकि?मैं तो…!
इन दीवारों की हदों से भी,
पार जा नहीं पाता।
मैं! खुद आईना होकर भी,
खुद को निहार नहीं पाता।
और ना जाने क्यों?
तूने मेरी फितरत अपना रखी है।
टूट कर बिखर जाने की,
टूटना तो मेरी किस्मत है।
तुझे तो खेर माननी चाहिए।
तुझे खुदा ने इतनी खूबसूरत,
सूरत की मिल्कीयत दी है।
शोक तो मुझे मनाना चाहिए,
सारी दुनिया की खूबसूरती खुद मैं समेट तो पाता हूं।
पर मैं खुद की ही सूरत नहीं देख पाता।
मैं! खुद आईना होकर भी,
खुद को निहार नहीं पाता।"
4.इत्र-ऐ-मोहोब्बत।
"कितनी दफ़े खुले दर पे हुई दस्तक,
की आहत से आँखे ये मेरी रोशन हुई।
एक उम्मीद ऐ मेहरम तेरे आने की,
के सहारे एक अरसे से बैठी हूं नजरें बिछाये।
कभी ख्याल तुम भी तो कर लो,
चले आओ यूँही ना कुछ सोचो ना समझो।
मेरी सुनी पलकों मैं जो नीर भरा है,
चले आओ उसके छलकने से पहले।
कही देखो ऐसा ना हो की तुम ना आओ,
और टूट जाये सारे भरम इस शाम के।
जो बिखराये बैठी है रौशनी की किरणे,
बो मांगी थी उसने सूरज से उधार...
बो तन्हाइयो के काले घनेरे,
मेरी और आते रात के अँधेरे...
मेरे साथ तेरे इंतजार मैं बैठी,
शब को मुझसे जुदा कर रहे है।
उधारी की किरणे बो सूरज को देखो,
आहिस्ते आहिस्ते अदा कर रहे है।
अब तो कहो की कब आओगे तुम,
या इत्र-ऐ-मोहोब्बत हो जाओगे तुम।
क्या चंद लम्हों की खुशबु बनकर आये थे तुम?
जो हवाओ के झोंको से गुम हो गए हो।
अब लगता है सच मैं इत्र–ऐ–मोहोब्बत तुम हो गए हो।
चलो ठीक है, आपकी मर्जीयां है।
हम क्या करें? के हमारी तो मजबूरियां है,
गुलो की महक थे सो गुम हो गए तुम।
हम एक शाख़ थे सो बही के बही हैँ।”
5. पैगाम।
"उसने एक पैगाम लिखा मेरे नाम..!
उसमें एक इल्ज़ाम लिखा मेरे नाम..!
वो लिखती है..!
कि एक अरसा गुजारा है तेरे इंतज़ार में...!
ता उम्र भी गुजार सकती हूं..!
मगर तू बेवफ़ा नहीं..!
तुझको भी ये यक़ीन तो दिलाना होगा..!
क्या ख़ूब अदा से लिखा था उसने..!
पढ़ते-पढ़ते लबों पे मुस्कान आ गई..!
वो जता तो रही थी अपनी फ़िक्र... मगर..!
एक उम्मीद की झलक उसके शब्दों में थी..!
उसने आगे लिखा..!
क्यों सताते हो मुझे इतना..?
क्यों दूर जाते हो मुझसे इतना..?
क्या तुम नहीं चाहते मुझे उतना..?
कि जितनी चाहत है मुझे तुमसे..?
मैं एक पल रुक गया पढ़ते-पढ़ते..!
कि उसने बात ऐसी कही..!
थोड़ा डर गया इस ख़्याल से…!
कि कहीं मुझसे यक़ीन उसका ख़त्म होने को तो नहीं..!
मगर फिर दिल को सुकून आया..!
पड़ी जो आगे की दो पंक्तियां..!
लिखा था उसने..!
मर्ज़ी तुम्हारी है..!
मुझे चाहो या भूल जाओ..!
मगर ये ख़्याल रखना..!
ज़हन में अपने एक सवाल रखना ..!
कि ख़ातिर तुम्हारे कहीं कोई दूर बैठा है..!
जिसे तुम महबूब कहते हो..!
क्या तुम इतनी ग़र्ज रखते हो..?
कि उसको भूल पाओ तुम..!
उसका ये एक सवाल..! काफ़ी था..!
मेरा यक़ीन बढ़ाने को..!
भले कितनी भी हों दूरियां..!
कैसी भी हों मजबूरियां..!
कभी ना वो बेवफ़ा होगी..!
ना कभी मुझको होने देगी..!
हैरानी अब हुई मुझको..!
जो आगे और लिखा था..!
पढ़ा जब मैंने उसको..!
वो लिखती है..!
अगर तुम भूल भी जाओगे..!
तो फिर नज़र कैसे मिलाओगे..?
दर्द रखकर मेरे दिल में...!
बताओ कैसे मुस्कुराओगे..?
मेरी बात छोड़ो..!
तुम अपना हाल कैसे छुपाओगे..?
हो गए हो बेवफ़ा तुम..!
मुझको ये यक़ीन कैसे दिलाओगे..?
मुझे तुमसे भी ज़्यादा जो तुम्हारी धड़कनों की गूंज पता है..!
उनमें गूंजता नहीं अब नाम मेरा..!
मेरे यक़ीन की ये दहलीज़ कैसे छुड़वाओगे..?
कितनी मासूमियत से वो अपने दिल का हाल बताती है..!
ख़ुद ही इल्ज़ाम लगाकर के..!
मेरी वकालत भी ख़ुद ही करती है..!
अब क्या जवाब दूं उसको..?
बड़ा मुश्किल है कुछ कहना..!
अपने हिस्से की चाहत जताने को बस मेरा एक सवाल लिखना काफ़ी है..!
कि मैं तुझसे दूर रहकर के बेख़यालियों में रहता हूं..!
बाक़ी सब ठीक-ठाक सा है..!
अब तुम कहो कि मेरे बिना तुम्हारा हाल कैसा है..?
पढ़ते ही वो समझ जाएगी..!
कि मुझको ख़्याल सिर्फ़ उसका है..!
दरमियान चाहे कितनी ही हों दूरियां..!
मेरे प्यार पर इकलौता हक़ उसी का है..!”️
6. उल्फत से भरी बाते।
"उल्फत से भरी बाते उनकी,
मेरे सारे ख्वाब चुराती हैँ।
रातों को नींद नहीं आती,
मेरे दीन का चेन चुराती है।
हमें उनसे मोहोब्बत हो ना हो,
बो इश्क इन्तहा करते है।
उन्हें कैसे कहे और क्या हम कहे,
हालात अपने कहा समझा पाते है।
बो लाल गुलाब किताबों मैं,
पहली मुलाक़ात की याद बनाकर के,
उनसे छुपाकर रखा है।
उल्फत से भरी बाते उनकी,
मेरे सारे ख्वाब चुराती है।
अब खेर कहा अपने दिल की,
उनके दिल को सँभालने की,
कोशिश मैं लगे रहते है।
दिल मानता नहीं सीमा अब कोई,
हम दायरों मैं रहते है।
हाल बो भी हमारा जानते है,
हमें भी खबर उनके हालातो की है।
उन्हें चाहे मगर कह ना सके,
उलझन इतनी सी मेरी है।
उल्फत से भरी बाते उनकी,
मेरे सारे ख्वाब चुराती है।
बो कह देते है बाते अपनी,
हम अपने अरमा छुपाये बैठे रहते है।
एलान-ऐ-महोब्बत करने की,
जाने घड़ियाँ कब आएंगी।
उस एक पल के इंतजार मैं हम,
घंटो तन्हाई मैं रहते है।
चाहत उनकी और मेरी यूँ तो एक जैसी है।
बस फर्क है इतना सा की बो,
बयां कर देते है सब कुछ,
और हम खामोश रहते है।"
7. कहानी बही है।
"कहानी बही है,
जिंदगी किरदार नये लिख रही है।
बिछड़े थे जो पहले,
फिर उनका मिलना एक बार लिख रही है।
मिलके फिर ना बिछड़ेंगे,
ऐसा इकरार ये कर रही है।
कहानी बही है,
जिंदगी किरदार नये लिख रही है।
मेरे जख्म का मरहम तुझे,
और मुझे तेरे दर्द की दबा लिख रही है।
यूँ राहते थोड़ी थोड़ी,
हम दोनों के नाम लिख रही है।
कहानी बही है,
जिंदगी किरदार नये लिख रही है।
मेरी राहों का तुझे हमसफ़र,
और मुझे तेरी मंजिल लिख रही है।
साथ मेरा और तेरा सातों जन्म लिख रही है।
कहानी बही है,
जिंदगी किरदार नये लिख रही है।
जुदाई के सारे पल मिलन मैं बदल रही है।
छूट गई थी जितनी भी कमियां,
सब पूरी कर रही है।
कहानी बही है,
जिंदगी किरदार नये लिख रही है।"
8. जिंदगी का दीदार।
"बक्त बहुत है,
अभी तेरे आने मैं ,
क्यों ना मैं इस बक्त का एतबार कर लूँ,
तेरे आने से पहले जी भर के,
जिंदगी का दीदार कर लूँ।
माना की तेरे ही संग आना है मुझे,
तो क्यों ना कुछ सफर बक्त का,
जिंदगी के साथ चल लूँ।
जब आएगी तेरे आने की खबर,
तेरा इस्तक़बाल भी कर लूंगा।
आज बक्त है तो इन खुशियोँ का,
मुझे तलबगार हो जाने दे।
कुछ अधूरे ख्वाब जो रह गए है,
उन्हें तमाम भी हो जाने दे।
ऐ मौत बस इतनी सी इल्तिज़ा है तुझसे।
मेरा आखरी बक्त आने से पहले,
मुझे एक दफ़ा।
इश्क़ की दहलीज तो चढ़ने दे।
छू कर धूल उसके दर की,
माथे पर लगाना है।
मेरे इश्क़-ऐ-बतन पर,
फिर मुझे कुर्बान जाना है।"
9. नन्ही परी।
"ना कसम ना कोई वादा किया,
फिर भी सबसे गहरा बंधन बांध लिया।
ना रस्म न कोई रित निभाई ,
उससे प्रीत की ऐसी गांठ बंधाई ।
उसकी कोमल हथेली पर मैंने,
अपनी तकदीर की लकीर पाई है ।
उसकी आंखों की नमियों ने जाने क्यों?
मेरी पलक भीगाई है।
बस इतनी सी यह बात हुई,
जो मेरे दिल को समझ ना आई है।
उसके कदमों की आहट ने,
मेरी धड़कन को बढ़ाया है।
उसके पैरों की पायल ने,
कोई मधुर संगीत सुनाया है।
मेरे घर के आंगन में हंसी उसकी गूंजे ऐसे,
जैसे किसी ने इत्र से घर महकाया है।
तोतली बोली बो जब-जब बोली,
मेरे हर घाब का मरहम होली।
मेरे घर की बो नन्ही सी परी,
है कोई जादू की छड़ी।
जैसे रब ने दे दी हर मर्ज की दवा हो।
ऐसे आई बन के हवा बो।"
10. आजमा लूँ आज खुद को।
"आजमा लूं आज खुद को,
ये ख्वाहिश भी पूरी कर लूं।
सोचती हूं ये अधूरी अपनी कहानी,
मैं खुद ही लिख दूं।
कल का तो पता नहीं,
इस वक्त मैं खुद को तेरा कर दूं।
तू रह जाए मेरे दिल में,
अपने दिल को ही मैं तेरा बसेरा कर दूं।
सोचती हूं ये अधूरी अपनी कहानी,
में खुद ही लिख दूं।
कब तक तू मिटे और मैं जलूँ,
आज इस पानी को जला दूं।
और आग को राख कर दूं।
ना मैं जलूँ ना तू मिटे,
इस दुनिया की हर रित और रीवायत से,
आज हम दोनों को आजाद कर लूँ ।
हमसे जलने वालों की सारी जलन को,
खाक कर दूं।
सोचती हूं ये अधूरी अपनी कहानी,
में खुद ही लिख दूं।"
11. पाप का मंजर।
"धरती पर पाप का मंजर दिन-ब-दिन बढ़ रहा है।
इंसानियत सो चुकी है बस इंसान जग रहा है।
यह नाम भी हम ही ने एक दूसरे को दिया है।
वरना तो हर शरीर जानवर का लग रहा है।
उस पर ये करम तेरे ऐ इंसान बिगड़ रहे हैं।
धर्म बिखर रहा है और हम अधर्म समेट रहे हैं।
पाप पुण्य की गठरी में आखिर हम क्या भर रहे हैं।
अस्मत की रक्षा की कसम तो हर जुबान खाती है।
पर वही जुबान एक फूंक से अस्मतों का दिया बुझाती है।
इंसानी शरीर के वह दो हाथ जाने,
किस-किस किस्म के गुनाहों का जरिया है।
एक हाथ रंगा है खून से दूसरे से खींचा लाज का पर्दा है।
दिमाग से आती अब सिर्फ साजिशें कि बू है।
दिल की धड़कनों में भी अब कहां सच्चा सुकून है।
जाने किस मिट्टी से आजकल ईश्वर इंसान बन रहा है।
इंसान होकर इंसान अपनी औकात भूला रहा है।
मिलेगी जिस मिट्टी में एक दिन,
हस्ती जिस मिट्टी के पुतले की,
आज वही कुड़ियों में मिट्टी का दम लगा रहा है।
बो जले या फिर गाढ़ा जाए हश्र तो एक ही होना है।
जो मिट्टी से जना है उसे मिट्टी में ही पुराेना है।
फिर किस बात का मलाल है तुझे किस बात का रोना है।
जिसे ना जग बदल सका ना युग बदल सके,
ना धर्म बदल सका ना कर्म बदल सके।
वह शाश्वत सत्य तो सिर्फ जन्म और मृत्यु है।
धर्म कर्म या पाप पुण्य हर खेल का अंजाम,
तो एक ही होना है।
तू खाली हाथ ही आया था और खाली हाथ ही जाना है"
12. तू बेबाक है।
"तू बेबाक है ऐ आईने,
जो दिल में हो बिन लफ्जों के सब कह देता है।
तेरे रूबरू जो आऊं अपनी हकीकत से टकरा जाती हूं।
औरों से तो छुपा भी लूं तेरे आगे सब कह जाती हूं।
तू आंखों से दिल का हाल पढ़ लेता है।
तू बेवफा है ऐ आईने,
जो दिल में हो बिन लफ्जों के सब कह देता है।
खुद से नहीं तूने मेरा मुझसे तारुख़ यूं करवा दिया।
कल तक मैं जिस चाहत से अनजान थी,
तूने उससे मुझे मिला दिया।
अब तेरी यह सूरत मुझको भी दे दे…!
तेरी यह बेबाकियाँ मुझको भी दे दे…!
छू लूं मैं आसमा इस जमीँ पर रहते…!
कुछ अपनी सी आदतें मुझको भी दे दे…!
तू बेवफा है ऐ आईने,
जो दिल में हो बिन लफ्जों के सब कह देता है।
मुझे है पता तू भी कुछ है खफा,
अब कह भी दे जो दिल में हो।
मुझसे भला कैसी हया,
मैंने बांट लिया तुझसे मेरा दर्द,
तू भी बांट ले मुझसे अपना गम,
ज्यादा ना सही तो दो लफ्जों की ही बात कह दे।
तू बेबाक है ऐ आईने,
जो दिल में हो बिन लफ्जों के सब कह देता है।
मुझको है यकीँ तेरी खामोशियों में कोई राज है।
आज तू इतना जो खामोश है जरूर कोई बात है।
चल छोड़ देते हैं यह बातें सारी,
इनमें कहां कुछ खास है,
दो पल बैठ लेते हैं तन्हा,तू जो मेरे साथ है।
तू बेबाक है ऐ आईने,
जो दिल मे हो बिन लफ्जों के सब कह देता है।
कल फिर शुरू होगा वही जिंदगी का सिलसिला।
जहां हर सूरत बनावटी होगी हर हंसी होगी झूठी।
जहां हर बात मतलब की हर मुलाकात मतलबी होगी।
चल फिर कभी मुलाकात होगी फिर यही बात होगी।
फिर तेरी बेबाकियों के साथ मेरी खामोशियां होगी।
तू बेबाक है ये आईने…!"
13.सीरत तेरे जैसी चाहिए।
"मेरे अक्ष मे कुछ कुछ झलक तुझसी दिखती है।
कहते हैँ सब लोग की मैं तुझसी दिखती हूं।
क्या सच मैं माँ मैं तेरे जैसी लगती हूं।
पर मैं बस ये चाहती हूं।
सूरत चाहे हो ना हो, मुझे सीरत तेरे जैसी चाहिए।
नयन नक्श सायद तेरे जैसे हों लेकिन,
सब्र तुझसा नहीं मुझ मैं।
तेरे जीवन की एक तस्वीर तूने खुद ही मुझे दिखाई है।
उस तस्वीर मैं जैसा मेने देखा है तुझको,
वैसा होने को हिम्मत चाहिए।
सूरत चाहे हो ना हो, मुझे सीरत तेरे जैसी चाहिए।
गहरी समझदारी मैं एक मासूमियत की,
उजली सी छवि जैसी तुझमे दिखती है।
बैसी समझ और मासूमियत की झलक,
कभी कोई मुझमे भी देखे।
उस बक्त की एक खूबसूरत तेरे जैसी ही तस्वीर चाहिए।
सूरत चाहे हो ना हो मुझे सीरत तेरे जैसी ही चाहिए।
खुद को खो कर औरो के लिए जीने का,
जो जज़्बा है तुझ मैं।
अपनी जिंदगी मैं भी कुछ ऐसा कर गुजरने का,
तुझसा जूनून चाहिए।
सूरत चाहे हो ना हो मुझे सीरत तेरे जैसी चाहिए।
पर इन सब से जुदा एक अनकही शिकायत है मुझे तुझसे,
आखिर कुछ तो खामियाँ तेरे जीवन मैं भी हैँ।
मुझे तेरे जवाब मैं उन खामियों की सही वजह चाहिए।
सूरत चाहे हो ना हो मुझे सीरत फिर भी तेरे जैसी ही चाहिए।”
14. पत्ते की तरह।
"दरख़्तोँ की कैद से निकल के बो पत्ते,
जो हवाओ के सहारे उड़ान ढूंढ़ते थे।
उनको कहाँ मालूम थी ज़माने की हकीकत।
यहाँ जो लगते है यार! बही होते है कातिल हमारे।
जिसको समझकर कैद पत्ते की तरह,
हम भी छोड़ आये थे जिसे किसी के लिए।
उसकी राह से गुजरते हुए जब लगी ठोंकर,
तो जाना की जिसको छोड़ आये थे,
गेरोँ के लिए, बो तो अपना ही आशियाना था।
और जहाँ पहुंचे थे एक उम्र गवा कर,
बो तो सारा शहर ही बेगाना था।
बो पत्ता भी पछताया तो होगा,
जमीं पर गिरने के बाद।
जो फिर दोबारा ना मिला होगा,
उसे हवा के झोंके का सहारा।
ना पँख मिले होंगे,
ना पूरा हुआ होगा आशमा छूने का ख्वाब।
फिर आखिर की तो होंगी उसने भी कोशिशे तमाम।
पर ना लोट पाया होगा बो फिर,
उसी दरख़्त की सुहानी कैद मैं।
बस यही शिलशीला मेरे साथ हुआ,
पत्ते सा सुलूक किश्मत ने मेरे साथ किया।
ना रहा बो पुराना आशियाना मेरा,
ना उस शहर को अपना हम कह सके।
कोई बैठा रहा धुंध की चादर ओढे,
मेरे ओर आशियाने के दरमियाँ।
उसपे ये पलकों का पानी भी दगाबाज निकला,
सर्द मौसम मैं मुझे ओर भिगोता रहा।
गर्दिश मैं सही कट तो गई बो काली रात,
फिर सुबह उठने की जो कोशिश मेने की,
पता चला की जिश्म से रूह भी आजादी मांग ले गई।
अपना हर नाता बो भी मुझसे तोड़ गई।
अब ये सोचूँ की ये कौन सा सफर था।
जान थी तो जिंदगी से बेखबर था।
मौत आई तो जाने क्यों मरने का गम था।
खेर अब ये ख्याल करना भी तो बेफिजूल था।
ये सिर्फ मेरा नहीं उस हर पत्ते का हश्र था।
जो दरख़्तोँ से टूट के हुआ पतझड़ था।
इस ख्याल से ऐसे मैं उभरा जैसे,
कोई हवा का झोंका मुझे छू के हो गुजरा।
एक नजर फिर अपने शरीर को देखा,
मैं हेरत मैं था, की हुआ है ये क्या?
पतझड़ों मैं कही दबा हुआ मेरा जिश्म था।
ये भी क्या हवाओ की शाजिश थी या सिर्फ एक संजोग था।
था बो जो भी आखिर जिंदगी का सच था।
मेरे ज़िस्म से लिपटा हुआ हर एक पत्ता,
मेरी जिंदगी की किताब का,
एक एक पन्ना सा लग रहा था।”