“सब ठीक है?”
यह सवाल महिला से सबसे ज़्यादा पूछा जाता है।
और जवाब लगभग हमेशा एक ही होता है —
“हाँ, सब ठीक है।”
लेकिन क्या सच में सब ठीक होता है?
अक्सर नहीं।
यह जवाब कई बार सच नहीं, बल्कि एक आदत होता है।
एक मजबूरी।
एक ऐसा पर्दा, जिसके पीछे थकान, उलझन, चिंता और अकेलापन छुपा होता है।
मानसिक दबाव क्या होता है?
मानसिक दबाव का मतलब सिर्फ़ उदासी या डिप्रेशन नहीं होता।
यह वह स्थिति है, जहाँ दिमाग़ लगातार काम करता रहता है —
सोचता है, डरता है, तुलना करता है और खुद को दोष देता है।
महिला के जीवन में यह दबाव धीरे-धीरे बढ़ता है,
इतना धीरे कि वह खुद भी पहचान नहीं पाती कि वह कब थक चुकी है।
वह हँसते हुए सब संभालती रहती है,
लेकिन अंदर ही अंदर खुद को खोती चली जाती है।
रोज़मर्रा की ज़िंदगी और मानसिक दबाव
सुबह उठते ही दिमाग़ चालू हो जाता है —
आज क्या बनेगा?
बच्चों का स्कूल?
घर का काम?
सब ठीक चल रहा है न?
दिन भर काम करते हुए भी दिमाग़ आराम नहीं करता।
शाम को बैठने का मौका मिले तो
सोचें और बढ़ जाती हैं।
अगर कोई काम अधूरा रह जाए,
तो अपराधबोध शुरू हो जाता है।
“मैं ठीक से सब नहीं कर पा रही।”
“मुझसे ही कमी रह गई होगी।”
यह दबाव बाहर से दिखाई नहीं देता,
लेकिन अंदर लगातार भारी होता जाता है।
‘मजबूत बनो’ की सामाजिक अपेक्षा
समाज महिला से हमेशा यही उम्मीद करता है कि
वह मजबूत हो।
रोना कमजोरी माना जाता है।
थक जाना आलस।
और शिकायत करना नखरे।
बचपन से सिखाया जाता है — “सब सह लो।”
“घर संभालना ही तो है।”
“तुम कर लोगी।”
यही “तुम कर लोगी”
सबसे बड़ा मानसिक दबाव बन जाता है।
क्योंकि जब कोई बार-बार कहता है कि तुम संभाल लोगी,
तो तुम्हें लगता है कि अगर नहीं संभाल पाई,
तो शायद तुम ही गलत हो।
क्यों चुप रहती है महिला?
कई बार महिला इसलिए चुप रहती है क्योंकि
उसे समझा ही नहीं जाता।
अगर वह कहे कि वह थकी हुई है,
तो जवाब मिलता है — “इतना क्या सोचती हो?”
“सबके साथ ऐसा होता है।”
अगर वह रो दे,
तो कहा जाता है — “इतनी सी बात पर?”
धीरे-धीरे वह समझ जाती है कि
चुप रहना आसान है।
अपने मन की बात कहने से बेहतर है
“सब ठीक है” कह देना।
मानसिक दबाव का असर शरीर पर
मानसिक दबाव सिर्फ़ मन तक सीमित नहीं रहता।
यह शरीर पर भी असर डालता है।
नींद पूरी नहीं होती।
छोटी-छोटी बातों पर चिड़चिड़ापन बढ़ जाता है।
सिरदर्द, थकान और बेचैनी रहने लगती है।
लेकिन फिर भी महिला खुद से यही कहती है — “थोड़ा एडजस्ट कर लूँगी।”
रिश्तों पर पड़ता असर
जब कोई अंदर से थका होता है,
तो रिश्तों में भी दूरी आने लगती है।
बातें कम होने लगती हैं।
मुस्कान नकली लगने लगती है।
और अकेलापन बढ़ जाता है।
बच्चे भी महसूस करते हैं कि
माँ हँस तो रही है,
लेकिन पहले जैसी नहीं रही।
दोहरी अपेक्षाओं का बोझ
आज की महिला से उम्मीद की जाती है कि
वह आधुनिक भी हो
और पारंपरिक भी।
काम करे तो घर न बिगड़े।
घर संभाले तो अपने सपने भूल जाए।
हर भूमिका में परफेक्ट रहे,
बिना थके, बिना शिकायत किए।
यह दोहरी अपेक्षा
महिला के मन को लगातार दबाव में रखती है।
समाधान नहीं, समझ की ज़रूरत
महिला को हर समय सलाह या समाधान नहीं चाहिए।
उसे बस इतना चाहिए कि कोई उसे सुने।
“मैं समझता हूँ।”
“तुम थकी हुई हो।”
“तुम्हारी भावनाएँ सही हैं।”
ये शब्द किसी दवा से कम नहीं होते।
पति, परिवार और समाज अगर
महिला की मानसिक स्थिति को समझने लगें,
तो बहुत कुछ बदल सकता है।
बदलाव की शुरुआत खुद से
महिला को भी खुद से यह कहना सीखना होगा कि — थकना गलत नहीं है।
मदद माँगना कमजोरी नहीं है।
अपनी भावनाओं को महत्व देना ज़रूरी है।
हर समय सब कुछ संभालना ज़रूरी नहीं।
कभी-कभी खुद को भी संभालना पड़ता है।
निष्कर्ष
“सब ठीक है”
हर बार सच नहीं होता।
कभी-कभी यह एक ढाल होता है,
जिसके पीछे महिला अपना मानसिक दबाव छुपा लेती है।
अगर हम सच में एक संवेदनशील समाज चाहते हैं,
तो हमें महिलाओं की चुप्पी को सुनना सीखना होगा।
क्योंकि मजबूत होना ज़रूरी नहीं,
समझा जाना ज़्यादा ज़रूरी है।