अध्याय 5: सन्नाटे में उपजा कोलाहल
महागुरु के कक्ष से निकले उस आदेश ने 'विशाल गुरुकुल' की सोई हुई आत्मा को झकझोर कर रख दिया था। बाहर सर्द हवाएँ अब केवल चल नहीं रही थीं, बल्कि दीवारों से टकराकर किसी घायल भेड़िये की तरह कराह रही थीं। आधी रात का समय था, जब आमतौर पर गुरुकुल के गलियारे केवल पहरेदारों की धीमी पदचाप से गूँजते थे, लेकिन आज सन्नाटे की परतें कुछ और ही कह रही थीं।
संकट की गूँज
अचानक, मुख्य मीनार पर लगा 'संकट-घंटा' बज उठा। यह कोई साधारण आवाज़ नहीं थी। इसकी भारी और गूँजती आवाज़ केवल तभी निकाली जाती थी जब गुरुकुल के अस्तित्व पर कोई महा-संकट मंडरा रहा हो। घंटे की हर चोट के साथ ऐसा लग रहा था जैसे गुरुकुल की नींव कांप रही है।
नींद में डूबे छात्र हड़बड़ाकर अपने बिस्तरों से उठ खड़े हुए। मशालों की पीली रोशनी में गलियारे भागते हुए सायों से भर गए। देखते ही देखते, सैंकड़ों छात्र मुख्य सभा-मैदान में एकत्र होने लगे। हर चेहरे पर एक ही सवाल था—क्या शत्रु ने आक्रमण कर दिया है?
आधी रात का जमावड़ा
मैदान के बीचों-बीच आचार्य विक्रम खड़े थे। मशाल की नाचती हुई रोशनी उनके चेहरे की तनावपूर्ण लकीरों को और भी गहरा और डरावना बना रही थी। उन्होंने अपनी गर्जना भरी आवाज़ में आदेश दिया, "शांत हो जाइए! सभी अपनी पंक्तियों में खड़े हों। गणना (Counting) शुरू की जाए!"
छात्रों के बीच एक दबी हुई कानाफूसी का सैलाब उमड़ पड़ा:
"क्या हुआ है?"
"क्या सीमाओं पर खड़ा वह अंधेरा यहाँ तक पहुँच गया?"
"आचार्य इतने विचलित क्यों हैं?"
जब सन्नाटा चीखने लगा
जैसे-जैसे गणना आगे बढ़ी, मैदान का कोलाहल एक दम घुटने वाले सन्नाटे में बदलने लगा। जब रुद्र की कक्षा के छात्रों की बारी आई, तो अचानक गणना रुक गई। आचार्य की आँखें उस एक रिक्त स्थान पर ठहर गईं जहाँ हमेशा अनुशासन और दृढ़ता की मूरत बना रुद्र खड़ा होता था।
"रुद्र कहाँ है?" आचार्य विक्रम की आवाज़ मैदान के एक छोर से दूसरे छोर तक टकराई।
कोई जवाब नहीं आया। रुद्र का स्थान एक डरावने खालीपन को समेटे हुए था। वह छात्र, जिसे महागुरु ने अपना 'प्रिय' और 'रक्षक' कहा था, आज संकट की इस घड़ी में नदारद था।
आचार्य ने फिर से पूछा, उनके स्वर में अब चिंता की धार थी, "क्या किसी को पता है कि रुद्र कहाँ है? उसे आखिरी बार किसने देखा था?"
माधव का मौन और गहराता संदेह
तभी, अग्रिम पंक्ति में खड़े छात्रों के बीच एक हलचल हुई। रुद्र का सबसे करीबी मित्र, माधव, कांपते हुए हाथों के साथ आगे बढ़ा। उसका सिर नीचे की ओर झुका था और उसकी हथेलियाँ पसीने से भीगी थीं।
आचार्य विक्रम तेज़ी से उसकी ओर बढ़े। उनकी भारी पदचाप माधव के दिल की धड़कन बढ़ा रही थी। उन्होंने माधव का कंधा पकड़ते हुए उसे अपनी ओर घुमाया, "माधव! तुम उसके साये की तरह रहते हो। बताओ, वह कहाँ गया है? महागुरु के आदेशानुसार, आज सत्य छिपाना अपराध माना जाएगा।"
माधव ने धीरे से अपना सिर उठाया। उसकी आँखों में आंसू थे और होंठ बुरी तरह कांप रहे थे। उसने कुछ कहने के लिए मुँह खोला ही था कि तभी...
वह डरावनी दस्तक
गुरुकुल के भारी मुख्य द्वार पर एक ज़ोरदार दस्तक हुई।
ठक... ठक... ठक!
यह दस्तक साधारण नहीं थी। ऐसा लग रहा था जैसे कोई लोहे का हाथ पत्थर के द्वार को तोड़ देना चाहता हो। सभा-प्रांगण में खड़ा हर छात्र और हर आचार्य अपनी साँसें थामे द्वार की ओर मुड़ गया। महागुरु, जो अब तक ऊँचे चबूतरे पर मौन खड़े थे, उनकी नज़रें भी उस बंद द्वार पर जम गईं।
रुद्र का गायब होना और द्वार पर हुई वह रहस्यमयी दस्तक—ये दो अलग घटनाएँ नहीं थीं। यह उस पुराने 'सौदे' की वापसी थी, जिसका ज़िक्र महागुरु ने पंद्रह साल पहले किया था। संकट अब द्वार खटखटा रहा था, और गुरुकुल का सबसे बड़ा योद्धा अपनी जगह से गायब था।
... द्वार पर हुई वह दस्तक साधारण नहीं थी। ऐसा लग रहा था जैसे कोई भारी संकट स्वयं द्वार खटखटा रहा हो। सभा-प्रांगण में खड़ा हर छात्र और हर आचार्य अपनी साँसें थामे खड़ा था। आचार्य विक्रम ने अपनी गदा संभाली और भारी कदमों से द्वार की ओर बढ़े।"सावधान!" आचार्य की गर्जना गूँजी, "द्वार खोलो!"जैसे ही भारी लोहे की जंजीरें सरकीं और कपाट धीरे-धीरे खुले, बाहर का दृश्य देखकर सबके खून जम गए। बाहर कोई शत्रु सेना नहीं थी, कोई हमलावर नहीं था। कोहरे से लिपटी उस रात में, द्वार की देहली पर केवल एक पुराना, धूल से सना काला लबादा पड़ा था।महागुरु, जो अब तक मौन थे, तेज़ी से नीचे उतरे। उन्होंने कांपते हाथों से उस लबादे को उठाया। लबादे के भीतर से एक छोटा सा पत्थर नीचे गिरा, जिस पर ताज़ा रक्त से 'रुद्र' का नाम अंकित था।महागुरु की आवाज़ गले में ही घुट गई। उन्होंने आसमान की ओर देखा, जहाँ बादलों के बीच से चाँद का रंग गहरा लाल पड़ चुका था।"समय पूरा हुआ..." महागुरु बुदबुदाए, "यह दस्तक रुद्र के आने की नहीं, बल्कि उस 'रूहों के सौदे' के वापस आने की है, जिसे मैंने पंद्रह साल पहले इस गुरुकुल की दीवारों में दफन किया था। रुद्र चला गया है... और अब वह अकेला वापस नहीं आएगा।"मैदान में खड़ा हर छात्र थर-थर कांप रहा था। रुद्र का गायब होना केवल एक छात्र का जाना नहीं था, बल्कि एक ऐसी खौफनाक दास्तान की शुरुआत थी जिसने 'विशाल गुरुकुल' की सदियों पुरानी नींव को हिलाकर रख दिया था।