यह कहानी एक चिड़िया की है।एक छोटी-सी, नन्ही-सी और बहुत ही प्यारी चिड़िया।पूरे जंगल में उससे अधिक सुंदर चिड़िया न किसी ने कभी देखी थी और न ही उसके बारे में सुना था। उसकी आँखों में चमक थी और पंखों में अलग ही रंग।उस चिड़िया का नाम आयिरा था।आयिरा के परिवार में तीन सदस्य थे—उसके माँ-पापा और वह स्वयं। उसका परिवार छोटा था, लेकिन बहुत प्यार से भरा हुआ था।आयिरा स्वभाव से बहुत खुशमिज़ाज थी। वह पूरे जंगल में उड़ती-फिरती, सबकी मदद करती और हर किसी से मीठी बोली में बात करती थी। जंगल के जानवर उसे बहुत पसंद करते थे, क्योंकि वह किसी को दुखी नहीं देख सकती थी।एक दिन आयिरा के जंगल में दूसरे जंगल से एक नई चिड़िया आई। वह बहुत सुंदर थी और अपने जंगल की खूब तारीफ़ कर रही थी। वह वहाँ की हरियाली, आज़ादी और नएपन की बातें कर रही थी। उसकी बातें सुनकर आयिरा का मन भी उस जंगल को देखने के लिए मचल उठा।शाम को जब आयिरा के माँ-पापा खाने का इंतज़ाम करके घर लौटे, तो आयिरा ने उनसे अपने जंगल से बाहर जाने की इच्छा बताई।लेकिन उसके माँ-पापा ने उसे मना कर दिया।उन्होंने प्यार से समझाया, “तुम अभी बहुत छोटी हो। बाहर की दुनिया सुरक्षित नहीं है।”यह सुनकर आयिरा चुप हो गई। वह उदास हो गई।ऊपर से उसने हाँ कह दी कि वह नहीं जाएगी, लेकिन उसके मन में उस दूसरे जंगल को देखने, नए दोस्त बनाने और नई जगहें घूमने की चाह और भी बढ़ गई।आख़िरकार आयिरा ने घर से भागने का मन बना लिया।एक रात, जब सब गहरी नींद में सो रहे थे, आयिरा चुपचाप उठी और अँधेरे में अपने नए सपनों की ओर उड़ चली। लेकिन घना अँधेरा होने के कारण वह रास्ता भटक गई। जंगल का रास्ता छोड़कर वह शहर की ओर पहुँच गई।उड़ते-उड़ते उसने सोचा, “अब तक तो मुझे दूसरे जंगल में पहुँच जाना चाहिए था।”तभी एक शिकारी की नज़र उस पर पड़ी। थकी हुई आयिरा एक डाल पर बैठी थी। उसकी सुंदरता ने शिकारी को मोहित कर लिया।शिकारी ने आयिरा को पकड़ लिया और उसे बाज़ार ले गया। उसकी सुंदरता के कारण उसे बहुत महँगे दामों में बेच दिया गया। आयिरा बहुत दुखी थी, लेकिन उसके मन में अब भी एक उम्मीद थी कि एक दिन वह फिर आज़ाद होगी।जिस आदमी ने आयिरा को खरीदा था, उसके पास एक छोटा बच्चा था, जो मानसिक रूप से ठीक नहीं था। उस आदमी ने आयिरा को उसी बच्चे को दे दिया। पहले बच्चा डर गया, फिर धीरे-धीरे उसे सताने लगा।आख़िरकार बच्चे ने आयिरा के सारे पंख नोच लिए। जब वह उड़ने लायक नहीं रही और बदसूरत हो गई, तो उसे बेरहमी से फेंक दिया गया।अंत में आयिरा के मन में बस एक ही सवाल रह गया—“आख़िर मेरी गलती क्या थी… और यह सब कब तक ज़मीन पर पड़े-पड़े आयिरा की साँसें धीरे-धीरे कम होने लगीं।
उसके पंख बिखरे थे, आँखों की चमक बुझ चुकी थी।
जिस आसमान में उड़ने का सपना उसने देखा था, वह अब बस एक धुंधली याद बनकर रह गया था।
उसे अपने माँ-पापा याद आए—
उनकी ममता, उनकी बातें, और वह चेतावनी जिसे उसने नज़रअंदाज़ कर दिया था।
आयिरा ने आख़िरी बार ऊपर आसमान की ओर देखा,
जहाँ सूरज की हल्की रोशनी फैल रही थी।
उसके मन में कोई शिकायत नहीं थी,
बस एक गहरी थकान थी…
और एक अधूरा सवाल—
“अगर मैं रुक जाती,
अगर मैंने सब्र किया होता,
तो क्या आज मैं ज़िंदा होती?”
एक हल्की-सी साँस के साथ आयिरा की आँखें बंद हो गईं।
न वह उड़ सकी,
न दुनिया देख सकी,
और न ही अपने सपनों को पूरा कर पाई।
उस दिन एक चिड़िया नहीं मरी,
उस दिन भरोसा, मासूमियत
और आज़ादी का सपना मर गया।