शीर्षक: 2025 में भी अधूरी आज़ादी
साल 2025 की सर्द सुबह थी। शहर के बाहर बने फ्लाईओवर के नीचे टीन और प्लास्टिक से बनी झोपड़ियों की एक कतार थी। ऊपर से तेज़ रफ्तार गाड़ियाँ गुजर रही थीं—कुछ में देश के झंडे लगे थे, कुछ पर “डिजिटल इंडिया” और “विकसित भारत” के स्टिकर।
उसी फ्लाईओवर के नीचे, एक कोने में बैठी थी शांति देवी—करीब पचपन साल की, झुर्रियों से भरा चेहरा, लेकिन आँखों में अब भी ज़िंदा सवाल।
उसके पास बैठी उसकी पोती काव्या, मोबाइल फोन को गौर से देख रही थी। फोन पुराना था, स्क्रीन में दरारें थीं, लेकिन उसमें इंटरनेट चलता था—सरकारी वाई-फाई योजना की वजह से।
काव्या ने अचानक पूछा,
“दादी, मोबाइल में लिखा है—भारत दुनिया की पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। फिर हम यहाँ क्यों रहते हैं?”
शांति देवी के हाथ रुक गए। वह सड़क किनारे कचरा बीन रही थी।
उसने ऊपर देखा—फ्लाईओवर पर लहराता विशाल तिरंगा, जो किसी कॉरपोरेट कंपनी ने आज़ादी के जश्न में लगवाया था।
शांति देवी का जन्म आज़ादी के कई साल बाद हुआ था। उसने कभी अंग्रेज़ों को नहीं देखा, लेकिन गरीबी को उसने बचपन से देखा था—हर दिन, हर वक्त।
उसके पिता मिल में मजदूर थे। माँ दूसरों के घरों में झाड़ू-पोछा करती थीं। तब सरकारें बदलती रहीं, नारे बदलते रहे, लेकिन उनके घर में हालात नहीं बदले।
टीवी पर नेता कहते थे—
“अब कोई भूखा नहीं सोएगा।”
लेकिन शांति देवी जानती थी—भूख भाषण नहीं सुनती।
2024 का चुनाव आया। चारों तरफ़ पोस्टर थे—
“नया भारत”, “आत्मनिर्भर भारत”, “विकसित भारत 2047”।
शांति देवी ने भी वोट दिया। लाइन में खड़े होकर, धूप में जलते हुए। उँगली पर स्याही लगी तो उसे लगा—
“शायद इस बार कुछ बदलेगा।”
लेकिन उसी रात, उसने और काव्या ने आधी रोटी बाँटकर खाई।
काव्या सरकारी स्कूल में पढ़ती थी। स्कूल में स्मार्ट बोर्ड था, लेकिन कई दिन बिजली नहीं होती थी। बच्चों को टैबलेट मिलने की बात होती थी, लेकिन सूची में उसका नाम कभी नहीं आता था।
एक दिन स्कूल में शिक्षक ने कहा,
“बच्चो, आज़ादी का मतलब है—बराबरी।”
काव्या ने घर आकर दादी से पूछा,
“बराबरी क्या होती है?”
शांति देवी हँस दी—कड़वी हँसी।
“बराबरी… जब सबके सपनों की कीमत एक जैसी हो।”
शहर में मेट्रो लाइन बन रही थी। बड़े-बड़े होर्डिंग लगे थे—
“भारत 2025: भविष्य की ओर”
लेकिन उसी निर्माण स्थल पर शांति देवी की बहू राधा ईंटें ढोते-ढोते गिर पड़ी। ठेकेदार ने कहा—
“कल से मत आना।”
न अस्पताल, न मुआवज़ा।
राधा का इलाज सरकारी अस्पताल में हुआ। घंटों लाइन, एक ही डॉक्टर, दवाइयाँ बाहर से। आयुष्मान कार्ड था, लेकिन मशीन “डाउन” थी।
राधा बच गई—लेकिन कर्ज़ में डूब गई।
एक रात फ्लाईओवर के नीचे आग तापते हुए, शांति देवी ने रेडियो सुना। खबर थी—
“भारत चाँद और सूरज के मिशन में आगे बढ़ रहा है।”
काव्या ने मासूमियत से कहा,
“दादी, हम भी कभी हवाई जहाज़ में बैठेंगे?”
शांति देवी ने उसे सीने से लगा लिया।
“ज़रूर… अगर ज़मीन ने पहले हमें जीने दिया।”
2025 में सब कुछ डिजिटल था—राशन कार्ड, बैंक, पहचान। लेकिन शांति देवी के लिए “डिजिटल” का मतलब था—
अंगूठा लगाओ, मशीन कहे—रिकॉर्ड नहीं मिला।
राशन दुकान वाला बोला,
“नेट नहीं है, कल आना।”
भूख ने कहा—
“आज चाहिए।”
एक दिन शहर में गणतंत्र दिवस की रिहर्सल हो रही थी। बच्चे तिरंगा लेकर दौड़ रहे थे। कैमरे थे, ड्रोन थे।
काव्या भी देखने गई। उसने देखा—एक बच्चा मंच पर कविता पढ़ रहा था—
“सारे जहाँ से अच्छा…”
तालियाँ बजीं।
काव्या ने मन में सोचा—
“अगर देश इतना अच्छा है, तो मेरी माँ ईंट क्यों ढोती है?”
शांति देवी को कभी किताबें पढ़ने का मौका नहीं मिला। लेकिन उसने जीवन पढ़ा था—बिना पन्नों के।
उसने काव्या से कहा,
“बेटी, आज़ादी एक तारीख नहीं होती। आज़ादी तब होती है, जब इंसान की मेहनत की कीमत मिले।”
रात को बारिश हुई। फ्लाईओवर के नीचे पानी भर गया। काव्या काँप रही थी।
शांति देवी ने उसे ढँकते हुए सोचा—
“1947 में देश आज़ाद हुआ था। 2025 में भी कुछ लोग सिर्फ़ ज़िंदा रहने की लड़ाई लड़ रहे हैं।”
उसकी आँखों से आँसू बह निकले—चुपचाप, बिना आवाज़।
सुबह अख़बार में हेडलाइन थी—
“भारत तेज़ी से आगे बढ़ रहा है”
शांति देवी ने अख़बार से आग जलाई।
काव्या ने किताब उठाई।
दोनों अपने-अपने तरीके से संघर्ष कर रही थीं।
कहानी यहीं खत्म नहीं होती।
क्योंकि यह कहानी किसी एक परिवार की नहीं है।
यह 2024–25 के उस भारत की कहानी है—
जहाँ
मोबाइल सबके हाथ में है,
लेकिन भविष्य सबके हाथ में नहीं।
जहाँ
देश आज़ाद है,
पर हर इंसान नहीं।
डॉ अनामिका-