घनश्याम त्रिपाठी का जीवन हर सुख से पूर्ण था। आज्ञाकारी बच्चे और पत्नी भी मृदुभाषिणी थी। धन-सम्पदा में भी कोई कमी न थी। 50 बीघे खेत, बड़ा घर व बाज़ार में कई दुकानें चलती थीं। लेकिन इतना सब कुछ होते हुए भी हृदय अभी भी बड़ा न था।
घर दो मंजिला था। शहरी इलाका होने के कारण आंगन के नाम केवल 4-5 मीटर एक गलियारा था, जिस पर भी फर्श बना दी गई थी। उसी में शौक के लिए कुछ पेड़-पौधे लगा रखे थे। इस बगीचे का मुख्य आकर्षण एक अमरूद का पेड़ था। पेड़ लम्बा था और एकदम सीधे जाकर छतरीनुमा संरचना बनाते हुए खुल गया था।वह मकान के दीवार के पास लगा हुआ था, इसलिए उसका आधा ऊपरी भाग बाहर की ओर लटका हुआ रहता था। अच्छी छाया मिलने के कारण घर का नौकर रामू कभी-कभी दोपहर में उसके नीचे चटाई बिछाकर आराम कर लिया करता था।
उस पर एक बया का घोंसला भी था। साल के अधिकतर महीने वह रसभरे अमरूदों से लदा रहता था। रास्ते से गुज़रते सभी मुसाफिरों की नज़रें उन अमरूदों पर एक बार ज़रूर रुकती थीं। चूंकि पति-पत्नी अकेले ही रहा करते थे, अतः वे अमरूद किसी कंजूस के धन की तरह वहीं के वहीं सड़ा करते थे।
एक सुबह लगभग 11 बजे घनश्याम त्रिपाठी अपने सोफे पर बैठकर आराम से टीवी देख रहे थे। तभी उन्हें अपने अमरूद के पेड़ के हिलने की आवाज़ सुनाई दी। उन्होंने जाकर देखा तो पड़ोस की झुग्गी झोपड़ी के बच्चे उनके पेड़ से अमरूद तोड़ो रहे थे"।
"जल्दी-जल्दी तोड़ो-
"वो वाला बड़ा-वाला
जल्दी वरना वो कंजूस आ जाएगा।"
बच्चे ऐसे कौतूहल कर रहे थे। उनमें से एक बड़ा लड़का पेड़ पर चढ़ा हुआ था। दो-तीन लड़के-लड़कियां उछल-उछलकर कुछ भी करके एक अमरूद तोड़ने की कोशिश कर रहे थे। एक लड़की अपनी फ्रॉक को ऊपर उठाए उसमें अमरूदों को रख रही थी।
यह देखकर त्रिपाठी जी का गुस्सा सातवें आसमान पर चढ़ गया। उन्होंने पास में पड़ी लाठी उठाई और उनकी तरफ दौड़े, जवानी ढल चुकी थी। उनके पहुँचने से पहले बच्चे भाग निकले, जो लड़का पेड़ पर था वह भी भाग निकला।
यह प्रक्रिया कई बार हुई, न बच्चे हार मानने वाले थे न घनश्याम त्रिपाठी जी को मंज़ूर कि कोई उनके अमरूद खाए।
कुछ दिनों बाद, सायंकाल के समय फिर से उन्हें कुछ अनुचित हलचल अपने अमरूद के पेड़ के पास सुनाई दी। इस बार वे तैयार थे। उन्होंने अपने नौकर रामू को आदेश दिया कि वह पीछे के दरवाजे से जाकर उन लड़कों को दबोचे ताकि वो भाग न पाएँ और त्रिपाठी जी उन्हें आगे से दौड़ाएंगे। काम बिल्कुल सफल रहा, उन्होंने बच्चों को भगाया और आगे रामू ने एक लड़की को पकड़ लिया। उतने दिन बाद एक शिकार हाथ लगा। त्रिपाठी जी उसे जाने नहीं देना चाहते थे। रामू ने लड़की को त्रिपाठी जी के हाथों में सौंपा।
"ओ लड़की तुझे बिल्कुल तमीज नहीं है दूसरे के घर चोरी करती है।" त्रिपाठी जी चिल्लाये।
लड़की भी बड़ी तेज़ थी बोली - "पड़े-पड़े सड़ ही तो रहे हैं आपके अमरूद, क्या करोगे उनका।"
त्रिपाठी जी लड़की का ऐसा तीखा जवाब सुनकर भौंचक्के रह गए, इससे पहले वे कुछ बोल पाते हैं। जैसे फूल पर बैठी तितली पकड़ने की कोशिश करने पर बच्चे के हाथ से निकल जाती है। उसी प्रकार वह लड़की भी त्रिपाठी जी के हाथों से भाग निकली।
अब त्रिपाठी जी का गुस्सा सातवें आसमान को पार कर चुका था। वे वहां से सीधे घर पहुँचे और अपनी पुरानी कुल्हाड़ी निकाली और उस अमरूद के पेड़ के कोमल कमल दंड के समान तने पर वार करने लगे। प्रत्येक वार के साथ उनके प्रतिशोध की भावना तेज हो रही थी। उनकी आंखों में उनके मेहनत से लगाए हुए अमरूदों का सुख कोई और भोगता हुआ ऐसे चित्र जीवित हो रहे हैं।
अंत में वह पेड़ दीवार से सरकता हुआ नीचे गिर गया। उसके बचे कुचे अवशेष को भी वहां से हटा दिया गये।
अगले दिन, रामू दोपहर की तेज़ गर्मी से बचने के लिए कहीं पनाह ढूँढ रहा था। बया आँगन की दीवार पर बैठी अपना घर ढूँढ रही थी। पड़ोस के बच्चे फेरीवाले द्वारा लाए गए अमरूदों को आशा भरी नज़रों से ताक रहे थे। परंतु, त्रिपाठी जी अपने सोफे पर बैठे चैन से यह सोच रहे थे कि कम-से-कम उनके मेहनत से लगाए हुए अमरूद के पेड़ का कोई और तो नहीं भोग पा रहा है।