राधिका के हाथों में वो पुरानी चाबी तब से जल रही थी जब से उसकी दादी ने आखिरी सांस के साथ उसे थमाई थी, और अब तीन दिन बाद, उस चाबी की धातु इतनी गर्म हो चुकी थी कि उसकी हथेली पर निशान बनने लगे थे, फिर भी वो उसे छोड़ नहीं सकती थी क्योंकि हर बार जब वो कोशिश करती, उसे दादी की आखिरी फुसफुसाहट सुनाई देती - "जब तक पहाड़ की चोटी पर मौजूद उस दरवाज़े को नहीं खोलोगी, तब तक न तुम्हारी किस्मत बदलेगी, न इस गाँव की।"
गाँव के लोग कहते थे कि पहाड़ की चोटी पर कोई दरवाज़ा नहीं है, सिर्फ एक टूटा हुआ मंदिर है जहाँ पिछले सौ सालों से कोई नहीं गया, लेकिन राधिका जानती थी कि उसकी दादी झूठ नहीं बोल सकती थीं, खासकर मरते वक्त नहीं, और इसीलिए वो आज रात निकल रही थी, बिना किसी को बताए, क्योंकि अगर गाँव वालों को पता चलता तो वो उसे पागल समझकर बंद कर देते, ठीक वैसे ही जैसे उन्होंने उसकी दादी के साथ किया था जब उन्होंने पहली बार इस रहस्य के बारे में बात की थी।
रात के ग्यारह बज चुके थे और राधिका अपने कमरे की खिड़की से बाहर कूद गई, उसके हाथ में एक मशाल थी और कंधे पर एक छोटा सा बैग जिसमें पानी की बोतल और कुछ खाना था, उसे नहीं पता था कि पहाड़ पर जाने में कितना समय लगेगा लेकिन दादी ने कहा था कि पूर्णिमा की रात को ही वो दरवाज़ा खुलता है, और आज पूर्णिमा थी, अगली पूर्णिमा का इंतज़ार करने का मतलब था एक और महीने तक इस जलती हुई चाबी के साथ जीना, और राधिका जानती थी कि वो इतना इंतज़ार नहीं कर सकती।
गाँव के आखिरी घर को पार करते ही उसे एहसास हुआ कि कोई उसके पीछे आ रहा है, कदमों की आवाज़ साफ सुनाई दे रही थी, और जब उसने पलटकर देखा तो वहाँ अर्जुन खड़ा था, वही अर्जुन जिसने पिछले तीन सालों से उससे बात तक नहीं की थी, वही अर्जुन जो कभी उसका सबसे अच्छा दोस्त हुआ करता था, और अब यहाँ खड़ा था, काले कपड़ों में, उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक के साथ।
"तुम यहाँ क्या कर रहे हो?" राधिका ने पूछा, अपनी आवाज़ को कंपने से रोकते हुए, और अर्जुन ने जवाब दिया, "वही जो तुम कर रही हो - पहाड़ पर जा रहा हूँ, क्योंकि मेरे दादा ने भी मुझे एक चाबी दी थी, और वो भी तीन दिन पहले मरे थे, ठीक उसी दिन जिस दिन तुम्हारी दादी मरी थीं।"
राधिका के हाथ से मशाल गिरते-गिरते बची, उसने अपनी जलती हुई चाबी दिखाई और अर्जुन ने अपनी, दोनों चाबियाँ एक जैसी थीं, चाँदी जैसी धातु की, जिन पर अजीब से निशान बने थे जो चाँद की रोशनी में चमक रहे थे, और तभी दोनों को एहसास हुआ कि ये कोई संयोग नहीं था, ये किसी बड़ी योजना का हिस्सा था।
"चलो साथ चलते हैं," अर्जुन ने कहा, और राधिका ने सिर हिलाया, क्योंकि इस अँधेरे में अकेले जाने से बेहतर था किसी के साथ जाना, भले ही वो शख्स तीन साल से उससे नाराज़ क्यों न हो, और दोनों ने पहाड़ की तरफ चलना शुरू किया, उनके बीच सिर्फ ख़ामोशी थी और जलती हुई चाबियों की हल्की सी आवाज़।
पहाड़ का रास्ता जितना लोग कहते थे उससे कहीं ज़्यादा खतरनाक था, फिसलन भरी चट्टानें, घने जंगल जहाँ जानवरों की आवाज़ें गूंज रही थीं, और कई जगह तो ऐसा लगा जैसे धरती खुद उन्हें वापस धकेल रही हो, लेकिन हर बार जब राधिका या अर्जुन गिरने वाले होते, दूसरा उन्हें संभाल लेता, और धीरे-धीरे, बिना कुछ कहे, वो तीन साल की दूरी कम होने लगी।
"तुमने मुझसे बात करना क्यों बंद कर दिया था?" राधिका ने आखिरकार पूछ ही लिया, जब वो दोनों एक बड़ी सी चट्टान के पीछे पानी पीने के लिए रुके, और अर्जुन ने लंबी सांस ली, फिर बोला, "क्योंकि मुझे डर था कि अगर मैं तुमसे बात करूँगा तो तुम्हें बता दूँगा कि मैं तुमसे प्यार करता हूँ, और फिर तुम मुझे पागल समझकर दूर चली जाओगी, जैसे सब लोग मुझसे दूर चले गए जब मैंने उन्हें बताया कि मुझे सपने में अजीब चीज़ें दिखती हैं।"
राधिका का दिल इतनी ज़ोर से धड़कने लगा कि उसे लगा चाबी की गर्मी नहीं, ये धड़कन उसे जला देगी, उसने अर्जुन की तरफ देखा, चाँद की रोशनी में उसका चेहरा किसी मूर्ति जैसा लग रहा था, और उसने कहा, "मैं भी तुमसे प्यार करती हूँ, और मुझे भी सपने आते हैं, ऐसे सपने जहाँ एक दरवाज़ा है, एक औरत है जो रो रही है, और एक आदमी है जो उससे माफी माँग रहा है।"
अर्जुन की आँखें फैल गईं, "मुझे भी वही सपना आता है, और उस सपने में वो औरत तुम्हारी जैसी दिखती है, और वो आदमी... वो मेरी जैसा दिखता है।"
दोनों कुछ देर चुप रहे, फिर अर्जुन ने राधिका का हाथ पकड़ा, और उनकी चाबियाँ एक-दूसरे को छू गईं, और जैसे ही वो छुईं, एक तेज़ रोशनी निकली, इतनी तेज़ कि दोनों को आँखें बंद करनी पड़ीं, और जब उन्होंने आँखें खोलीं तो वो पहाड़ की चोटी पर थे, बिना आगे चढ़े, बस एक पल में।
सामने एक विशाल दरवाज़ा था, पत्थर का बना, जिस पर वही निशान थे जो उनकी चाबियों पर थे, और दरवाज़े के ठीक बीच में दो छेद थे, एक बाईं तरफ, एक दाईं तरफ, जैसे किसी ने जानबूझकर दो चाबियों के लिए जगह बनाई हो।
"लगता है हमें दोनों चाबियाँ एक साथ लगानी होंगी," राधिका ने कहा, और अर्जुन ने सहमति में सिर हिलाया, दोनों ने अपनी-अपनी चाबियाँ उठाईं, गहरी सांस ली, और एक साथ उन्हें छेदों में डाला।
जैसे ही चाबियाँ पूरी तरह अंदर गईं, ज़मीन काँपने लगी, आसमान में बिजली चमकी, और दरवाज़ा धीरे-धीरे खुलने लगा, अंदर से एक अजीब सी रोशनी आ रही थी, नीली और सुनहरी, जो कभी तेज़ होती तो कभी धीमी, और उस रोशनी के साथ एक आवाज़ आई, एक औरत की आवाज़, जो कह रही थी, "आखिरकार तुम लोग आ ही गए, सौ साल बाद।"
राधिका और अर्जुन ने एक-दूसरे को देखा, फिर हिम्मत करके अंदर कदम रखा, और जो उन्होंने अंदर देखा वो किसी सपने जैसा था - एक विशाल हॉल, जिसकी छत पर तारे चमक रहे थे असली तारे, फर्श पर पानी बह रहा था लेकिन उनके पैर गीले नहीं हो रहे थे, और बीच में एक औरत खड़ी थी, इतनी खूबसूरत कि उसे देखना सूरज को देखने जैसा था, और उसके बगल में एक आदमी था, जिसकी आँखों में दुख था, इतना गहरा दुख कि उसे देखकर रोना आ जाए।
"तुम कौन हो?" अर्जुन ने पूछा, और औरत ने मुस्कुराते हुए कहा, "मैं चंद्रिका हूँ, चाँद की रानी, और ये हैं सूर्यांश, सूरज का राजकुमार, और हम दोनों यहाँ पिछले सौ सालों से बंद हैं क्योंकि हमने एक गलती की थी - हमने एक-दूसरे से प्यार किया, जबकि चाँद और सूरज को कभी एक साथ नहीं रहना चाहिए।"
राधिका को समझ आने लगा, "तो वो सपने... वो असली थे? हम तुम्हारे सपने देख रहे थे?"
चंद्रिका ने सिर हिलाया, "हाँ, क्योंकि तुम दोनों हमारे वंशज हो, तुम्हारी दादी-दादा ने तुम्हें सच नहीं बताया क्योंकि वो डरते थे, लेकिन अब वक्त आ गया है सच जानने का - राधिका, तुम्हारी रगों में चाँद का खून बहता है, और अर्जुन, तुम्हारी रगों में सूरज का।"
अर्जुन हँसा, लेकिन ये एक कड़वी हँसी थी, "ये कोई कहानी है क्या? हम आम इंसान हैं, कोई जादुई प्राणी नहीं।"
सूर्यांश ने पहली बार बोला, उसकी आवाज़ गड़गड़ाहट जैसी थी, "अगर तुम आम इंसान होते तो वो चाबियाँ तुम्हें नहीं जलातीं, अगर तुम आम होते तो तुम यहाँ तक नहीं पहुँच पाते, और अगर तुम आम होते तो जब तुम दोनों ने हाथ पकड़े तो आसमान में बिजली नहीं चमकती।"
राधिका ने अपने हाथ देखे, और उसे पहली बार एहसास हुआ कि उसकी त्वचा हल्की सी चमक रही थी, चाँदी जैसी चमक, और अर्जुन के हाथ सुनहरी रोशनी से भरे थे, और तभी उसे सब कुछ समझ आ गया - उसका जानवरों से बात कर पाना, रात में बिना रोशनी के देख पाना, अर्जुन का अँधेरे से डरना, उसका गर्मी में भी ठंडा रहना, ये सब अलग-अलग बातें नहीं थीं, ये सब उनकी असली पहचान के संकेत थे।
"तो अब हम क्या करें?" राधिका ने पूछा, उसकी आवाज़ काँप रही थी लेकिन उसमें दृढ़ता भी थी, और चंद्रिका ने कहा, "तुम्हें एक चुनाव करना है - या तो तुम हमें यहाँ से आज़ाद करो और खुद यहाँ बंद हो जाओ, क्योंकि इस दरवाज़े को हमेशा किसी न किसी को बंद रखना पड़ता है ताकि चाँद और सूरज की शक्तियाँ दुनिया को नष्ट न कर दें, या फिर तुम एक और रास्ता चुनो।"
"और वो रास्ता क्या है?" अर्जुन ने पूछा, अब उसकी आवाज़ में गुस्सा था, "क्या हमें भी तुम्हारी तरह सौ साल इंतज़ार करना होगा किसी और के आने का?"
सूर्यांश ने धीरे से कहा, "नहीं, दूसरा रास्ता ये है कि तुम साबित करो कि चाँद और सूरज साथ रह सकते हैं, बिना दुनिया को नुकसान पहुँचाए, कि प्यार किसी भी शक्ति से बड़ा होता है, और अगर तुम ये साबित कर सके, तो न हमें यहाँ रहना होगा, न तुम्हें, और न ही किसी और को।"
राधिका ने अर्जुन की तरफ देखा, उसकी आँखों में सवाल था, और अर्जुन ने उसका हाथ पकड़ते हुए कहा, "मुझे नहीं पता कैसे साबित करना है, लेकिन मुझे पता है कि मैं तुम्हें यहाँ बंद नहीं होने दूँगा, और मैं खुद भी यहाँ बंद नहीं होना चाहता, तो चलो कोशिश करते हैं।"
चंद्रिका मुस्कुराई, पहली बार उसकी मुस्कान में उम्मीद थी, "तो फिर तुम्हें करना ये होगा - तुम्हें अपनी शक्तियों को एक साथ मिलाना होगा, पूरी तरह, बिना किसी डर के, बिना किसी संदेह के, और अगर तुम्हारा प्यार सच्चा है, तो तुम्हारी शक्तियाँ एक दूसरे को नष्ट नहीं करेंगी, बल्कि एक नई शक्ति बनाएँगी, ऐसी शक्ति जो दुनिया को रोशन करे, नष्ट न करे।"
राधिका और अर्जुन ने गहरी सांस ली, उन्हें नहीं पता था कि अपनी शक्तियों को कैसे इस्तेमाल करना है, उन्हें तो आज तक पता भी नहीं था कि उनमें कोई शक्ति है, लेकिन जब उन्होंने एक-दूसरे की आँखों में देखा, तो उन्हें लगा कि शायद प्यार ही काफी है, शायद प्यार ही वो ताला है जो सब कुछ खोल सकता है।
दोनों ने अपने हाथ आगे बढ़ाए और एक-दूसरे को पकड़ लिया, कसकर, जैसे कभी छोड़ना ही नहीं हो, और जैसे ही उनकी हथेलियाँ पूरी तरह मिलीं, उनके शरीर से रोशनी निकलने लगी, राधिका से चाँदी की, अर्जुन से सुनहरी, और वो दोनों रोशनियाँ आपस में टकराने लगीं, तेज़ी से, इतनी तेज़ी से कि पूरा हॉल हिलने लगा।
सूर्यांश और चंद्रिका पीछे हट गए, उनकी आँखों में डर था, क्योंकि पिछली बार जब उन्होंने ऐसा किया था तो पूरी पृथ्वी हिल गई थी, सूनामी आई थी, ज्वालामुखी फटे थे, और तभी तो उन्हें यहाँ बंद करना पड़ा था, लेकिन इस बार कुछ अलग हो रहा था।
राधिका और अर्जुन की रोशनियाँ आपस में लड़ने की बजाय घुलने लगीं, धीरे-धीरे, एक नए रंग में बदलने लगीं, ऐसा रंग जो न चाँदी था न सुनहरा, बल्कि कुछ अलग था, कुछ जो पहले कभी नहीं देखा गया था, और उस नए रंग से एक खुशबू निकली, ऐसी खुशबू जैसे बारिश के बाद धरती से आती है, और एक आवाज़ गूंजी, जैसे हज़ारों लोग एक साथ गा रहे हों।
और फिर अचानक सब कुछ शांत हो गया, रोशनी धीमी पड़ गई, और राधिका और अर्जुन अब भी हाथ पकड़े खड़े थे, लेकिन अब उनके बीच एक छोटा सा गोला घूम रहा था, ऐसा गोला जिसमें पूरा ब्रह्मांड दिख रहा था, तारे, ग्रह, आकाशगंगाएँ, सब कुछ।
चंद्रिका ने आँसू पोंछे और मुस्कुराते हुए कहा, "तुमने कर दिखाया, तुमने साबित कर दिया कि चाँद और सूरज साथ रह सकते हैं, क्योंकि तुम्हारा प्यार इतना शुद्ध है कि उसने एक नई दुनिया बना दी, एक ऐसी दुनिया जहाँ विरोधाभास भी साथ रह सकते हैं।"
सूर्यांश ने राहत की सांस ली, "अब हम सब आज़ाद हैं, अब न किसी को यहाँ बंद रहना होगा, न ही दुनिया को डरना होगा, क्योंकि तुमने प्यार की असली ताकत दिखा दी है।"
दरवाज़ा चरमराया और पूरी तरह खुल गया, बाहर सुबह हो रही थी, और जब राधिका और अर्जुन ने बाहर देखा तो उन्हें अपना गाँव दिखा, लेकिन अब वो गाँव पहले से अलग था, वहाँ फूल खिल रहे थे जो पहले कभी नहीं खिले थे, नदी का पानी साफ़ हो गया था जो सालों से गंदा था, और लोग मुस्कुरा रहे थे, ऐसी मुस्कान जो सालों से नहीं देखी गई थी।
"तुमने सिर्फ अपने आप को नहीं, पूरे गाँव को आज़ाद किया," चंद्रिका ने कहा, "क्योंकि जब हम यहाँ बंद हुए थे तो इस गाँव पर एक श्राप पड़ गया था, कि यहाँ कभी खुशी नहीं होगी, लेकिन अब वो श्राप टूट गया है।"
राधिका ने पूछा, "और अब तुम लोग क्या करोगे?"
सूर्यांश ने आसमान की तरफ देखा, "हम अपनी जगह पर वापस जाएँगे, मैं सूरज के पास, और चंद्रिका चाँद के पास, लेकिन अब हम जानते हैं कि प्यार दूरी से बड़ा होता है, और हर रोज़ जब सूर्यास्त होगा और चंद्रोदय, हम एक दूसरे को देख पाएँगे, कुछ पलों के लिए, और वो पल हमारे लिए काफी हैं।"
चंद्रिका ने राधिका को गले लगाया, "तुम्हारी शादी सुंदर हो, तुम्हारी ज़िंदगी खुशियों से भरी हो, और हमेशा याद रखना कि तुम आम नहीं हो, तुम विशेष हो, और तुम्हारी शक्ति तुम्हारी ज़िम्मेदारी भी है।"
सूर्यांश ने अर्जुन के कंधे पर हाथ रखा, "और तुम, हमेशा उसका ख्याल रखना, क्योंकि वो सिर्फ तुम्हारी प्रेमिका नहीं है, वो तुम्हारा दूसरा आधा हिस्सा है, और तुम दोनों अलग होकर अधूरे हो।"
और फिर एक तेज़ रोशनी में सूर्यांश और चंद्रिका गायब हो गए, आसमान में उड़ते हुए, एक सुनहरी और एक चाँदी की लकीर छोड़ते हुए, और राधिका और अर्जुन वहीं खड़े रह गए, हाथ में हाथ डाले, अपनी नई ज़िंदगी की शुरुआत को देखते हुए।
जब वो गाँव वापस पहुँचे तो लोग हैरान थे, उन्हें नहीं पता था कि रात क्या हुआ था, लेकिन सबको एक अजीब सी खुशी महसूस हो रही थी, ऐसी खुशी जो बिना वजह होती है, और जब उन्होंने राधिका और अर्जुन को साथ देखा, हाथ में हाथ डाले, तो किसी ने कोई सवाल नहीं पूछा, क्योंकि कुछ चीज़ें इतनी सही होती हैं कि उनके बारे में पूछने की ज़रूरत नहीं होती।
राधिका की माँ ने उसे गले लगाया और फुसफुसाते हुए कहा, "तुम्हारी दादी ने सही कहा था, तुम कुछ खास हो," और राधिका ने सिर्फ मुस्कुरा दी, क्योंकि अब उसे पता था कि 'खास' होने का मतलब क्या है।
अर्जुन के पिता ने उसके कंधे पर हाथ रखा, "तुम्हारे दादा को तुम पर गर्व होता," और अर्जुन की आँखों में आँसू आ गए, क्योंकि उसे पता था कि उसके दादा ने ये सब जानते हुए भी उसे कभी नहीं बताया ताकि वो एक आम बचपन जी सके।
अगले कुछ महीनों में राधिका और अर्जुन ने अपनी शक्तियों को समझना और नियंत्रित करना सीखा, राधिका ने सीखा कि वो रात में जानवरों से बात कर सकती है, पानी को अपनी मर्ज़ी से घुमा सकती है, और लोगों के सपनों में जा सकती है, और अर्जुन ने सीखा कि वो आग को बिना छुए जला सकता है, सूरज की रोशनी को इकट्ठा करके बीमारों को ठीक कर सकता है, और अँधेरे को दूर भगा सकता है।
लेकिन सबसे बड़ी बात जो उन्होंने सीखी वो ये थी कि जब वो एक साथ होते हैं, तो उनकी शक्तियाँ दोगुनी नहीं बल्कि सौ गुनी हो जाती हैं, और इसीलिए उन्होंने फैसला किया कि वो हमेशा साथ रहेंगे, न सिर्फ प्यार की वजह से बल्कि ज़िम्मेदारी की वजह से भी।
छह महीने बाद उनकी शादी हुई, पूरे गाँव में ऐसी शादी पहले कभी नहीं हुई थी, क्योंकि जिस दिन उन्होंने सात फेरे लिए, उस दिन आसमान में एक अजीब सा दृश्य दिखा - सूरज और चाँद एक साथ दिखे, कुछ मिनटों के लिए, और ऐसा कोई ग्रहण नहीं था, ये कुछ और था, ये सूर्यांश और चंद्रिका का आशीर्वाद था।
और उस दिन के बाद से राधिका और अर्जुन ने अपनी ज़िंदगी गाँव के लोगों की मदद करने में बिताई, वो बीमारों को ठीक करते, फसलों को बचाते, और जब भी कोई मुसीबत आती, वो दोनों साथ मिलकर उससे लड़ते, और हर बार जीतते, क्योंकि उनके पास कोई हथियार नहीं था सिवाय उनके प्यार के, और प्यार से बड़ा कोई हथियार नहीं होता।
कुछ सालों बाद उनके दो बच्चे हुए, एक बेटी जिसकी आँखें चाँदी जैसी थीं, और एक बेटा जिसके बाल सुनहरे थे, और दोनों में अपने माँ-बाप की शक्तियाँ थीं, लेकिन राधिका और अर्जुन ने उन्हें कभी दबाव नहीं डाला कि वो अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करें, उन्होंने बस उन्हें सिखाया कि शक्ति के साथ ज़िम्मेदारी आती है, और प्यार सबसे बड़ी शक्ति है।
और इस तरह गाँव बदल गया, वो गाँव जो कभी अँधेरे और दुख में डूबा था, अब रोशनी और खुशी का केंद्र बन गया, और लोग दूर-दूर से आने लगे राधिका और अर्जुन से मिलने, उनकी कहानी सुनने, और ये समझने के लिए कि प्यार कैसे दुनिया बदल सकता है।
लेकिन राधिका और अर्जुन कभी घमंड नहीं करते थे, वो हमेशा सादा जीवन जीते थे, और हर रोज़ शाम को जब सूर्यास्त होता, वो दोनों छत पर बैठकर आसमान देखते, और उन्हें लगता कि वो सूर्यांश और चंद्रिका को देख सकते हैं, एक दूसरे की तरफ मुस्कुराते हुए, और तब उन्हें एहसास होता कि उनकी कहानी सिर्फ उनकी नहीं थी, ये पीढ़ियों की कहानी थी, ये प्यार की अमरता की कहानी थी।
और जब भी कोई उनसे पूछता कि उनकी खुशी का राज़ क्या है, तो राधिका हमेशा वही जवाब देती, "राज़ ये है कि हमने कभी एक-दूसरे को बदलने की कोशिश नहीं की, हमने एक-दूसरे को वैसे ही स्वीकार किया जैसे हम हैं, अपनी अच्छाइयों के साथ, अपनी बुराइयों के साथ, अपनी शक्तियों के साथ, और अपनी कमज़ोरियों के साथ।"
और अर्जुन जोड़ता, "और हमने हमेशा याद रखा कि हम अलग-अलग हो सकते हैं, जैसे सूरज और चाँद, लेकिन साथ मिलकर हम कुछ बना सकते हैं जो अकेले कभी नहीं बना सकते - हम सुबह और शाम बना सकते हैं, वो वक्त जब दुनिया सबसे खूबसूरत होती है।"
और इस तरह उनकी कहानी खत्म नहीं होती, ये सिर्फ शुरुआत थी एक ऐसी यात्रा की जो पीढ़ियों तक चलेगी, क्योंकि असली प्यार कभी खत्म नहीं होता, वो सिर्फ रूप बदलता रहता है, और हर रूप में वो उतना ही खूबसूरत होता है।
आज भी अगर तुम उस गाँव में जाओ, तो तुम्हें पहाड़ की चोटी पर वो दरवाज़ा मिलेगा, लेकिन अब वो बंद नहीं है, वो खुला है, हमेशा के लिए, और उस दरवाज़े के सामने दो पेड़ उगे हैं, एक जिसके पत्ते चाँदी जैसे हैं, और एक जिसके फूल सुनहरे हैं, और कहते हैं कि अगर कोई सच्चे प्यार की तलाش में है, तो उसे उन पेड़ों के नीचे बैठकर आँखें बंद करनी चाहिए, और अगर उसका प्यार सच्चा है, तो उसे अपने प्यार का रास्ता दिख जाएगा।
और हर पूर्णिमा की रात, जब चाँद पूरा होता है, तो उस दरवाज़े से एक अजीब सी रोशनी निकलती है, ऐसी रोशनी जो न चाँदी है न सुनहरी, बल्कि दोनों का मिश्रण है, और वो रोशनी पूरे गाँव को नहला देती है, और उस रात सब लोग अच्छे सपने देखते हैं, ऐसे सपने जहाँ प्यार जीतता है, हमेशा।
राधिका और अर्जुन बूढ़े हो गए, उनके बाल सफेद हो गए, उनकी त्वचा पर झुर्रियाँ आ गईं, लेकिन उनकी आँखों में वही चमक थी जो उस रात थी जब वो पहली बार पहाड़ पर चढ़े थे, और जब उनका आखिरी दिन आया, तो वो दोनों साथ थे, हाथ में हाथ डाले, मुस्कुराते हुए, क्योंकि उन्हें पता था कि मौत भी उन्हें अलग नहीं कर सकती।
और जब उन्होंने आखिरी सांस ली, तो गाँव के लोगों ने देखा कि आसमान में दो तारे टूटे, एक चाँदी का और एक सुनहरा, और वो दोनों तारे जाकर पहाड़ की चोटी पर गिरे, और वहाँ से एक नई रोशनी निकली, इतनी तेज़ कि पूरा गाँव रोशन हो गया।
और उस दिन के बाद से, हर रात जब लोग आसमान देखते हैं, तो उन्हें दो तारे दिखते हैं, इतने करीब कि लगता है वो एक दूसरे को छू रहे हैं, और लोग कहते हैं कि वो राधिका और अर्जुन हैं, अब वो भी सूर्यांश और चंद्रिका की तरह आसमान में हैं, हमेशा के लिए, साथ-साथ, क्योंकि जो प्यार धरती पर सच्चा होता है, वो आसमान में भी बना रहता है।
और उनकी कहानी आज भी सुनाई जाती है, नानी-दादी अपने पोते-पोतियों को सुनाती हैं, और हर बार जब कोई कहता है कि प्यार में बहुत मुश्किलें होती हैं, तो कोई न कोई राधिका और अर्जुन की कहानी सुना देता है, और कहता है, "अगर चाँद और सूरज साथ रह सकते हैं, तो तुम भी रह सकते हो, बस ज़रूरत है सच्चे प्यार की, और थोड़ी सी हिम्मत की।"
और इस तरह वो जलती हुई चाबी, वो रहस्यमय दरवाज़ा, वो पहाड़ की चोटी, और वो प्यार की कहानी, सब मिलकर बन गए एक किंवदंती, ऐसी किंवदंती जो सदियों तक चलती रहेगी, क्योंकि प्यार की कहानियाँ कभी पुरानी नहीं होतीं, वो हमेशा नई लगती हैं, और हर बार जब कोई उन्हें सुनता है, तो उसे लगता है कि ये कहानी सिर्फ उसके लिए ही लिखी गई है।
और शायद यही तो प्यार की ताकत है - वो हर किसी को अपना लगता है, हर किसी को छूता है, और हर किसी को विश्वास दिलाता है कि हाँ, चमत्कार होते हैं, बस विश्वास रखने की ज़रूरत है, और थोड़ा सा इंतज़ार करने की, क्योंकि जो चीज़ तुम्हारे लिए बनी है, वो तुम्हें ज़रूर मिलती है, चाहे कितनी भी मुश्किलें क्यों न आएँ।
तो अगर कभी तुम्हें लगे कि ज़िंदगी मुश्किल है, तो आसमान देखना, और उन दो तारों को ढूँढना जो एक दूसरे के इतने करीब हैं कि लगते हैं एक, और फिर याद करना राधिका और अर्जुन को, और खुद से कहना कि अगर वो कर सकते हैं, तो मैं भी कर सकता हूँ, क्योंकि हर इंसान में वो ताकत है, बस उसे पहचानने की ज़रूरत है, और जब वो ताकत मिल जाए किसी और की ताकत से, तो फिर कुछ भी असंभव नहीं रहता।
समापत
समापन नोट: यह कहानी हमें सिखाती है कि:
प्यार की कोई सीमा नहीं होती - जैसे चाँद और सूरज, जो एक-दूसरे के विपरीत हैं, फिर भी साथ मिलकर दुनिया को रोशन करते हैं, वैसे ही दो अलग-अलग इंसान भी मिलकर कुछ खूबसूरत बना सकते हैं।
हर इंसान में कुछ खास है - राधिका और अर्जुन को भी शुरू में नहीं पता था कि वे कितने विशेष हैं। हम सभी में कुछ अनोखा है, बस उसे पहचानने और स्वीकार करने की ज़रूरत है।
साथ मिलकर हम मजबूत होते हैं - अकेले राधिका या अर्जुन वो नहीं कर सकते थे जो उन्होंने साथ मिलकर किया। जीवन में साथी का होना सबसे बड़ी ताकत है।
पीढ़ियों की विरासत - हमारे बुज़ुर्गों की कहानियाँ और सीख हमें राह दिखाती हैं। दादी-दादा की बातों में गहरा ज्ञान छिपा होता है।
सच्चाई हमेशा जीतती है - राधिका और अर्जुन ने अपने सच्चे प्यार से एक सदियों पुराने श्राप को तोड़ दिया। सच्चाई और ईमानदारी से बड़ी कोई शक्ति नहीं।
जिम्मेदारी के साथ आती है शक्ति - उन्होंने अपनी जादुई शक्तियों का इस्तेमाल दूसरों की भलाई के लिए किया, अपने फायदे के लिए नहीं।
यह कहानी काल्पनिक है, लेकिन इसका संदेश वास्तविक है - प्यार, विश्वास, और साहस से कोई भी मुश्किल आसान हो जाती है।
अगर आपको यह कहानी पसंद आई, तो इसे अपने प्रियजनों के साथ साझा करें, क्योंकि अच्छी कहानियाँ बाँटने से बढ़ती हैं, घटती नहीं।
और हाँ, अगली बार जब आप रात को आसमान देखें, तो उन दो तारों को ज़रूर ढूँढिएगा जो एक-दूसरे के बहुत करीब हैं। कौन जाने, शायद वे राधिका और अर्जुन ही हों, आपको मुस्कुराते हुए देख रहे हों।
धन्यवाद ❤️
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