ruho ka soda - 6 in Hindi Fiction Stories by mamta books and stories PDF | रूहों का सौदा - 6

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रूहों का सौदा - 6

​अध्याय 6: माधव का खुलासा और बढ़ता संशय​

​"मुख्य द्वार पर गिरा वह काला लबादा केवल कपड़ा नहीं था, वह रुद्र के अस्तित्व का अंत था या किसी भयानक काल की शुरुआत? महागुरु के कांपते हाथ और उस पर रक्त से अंकित 'रुद्र' का नाम—सभा-प्रांगण के सन्नाटे को चीरने के लिए काफी था।"मुख्य द्वार पर मिला वह रहस्यमयी काला लबादा और रक्त से लिखा रुद्र का नाम—इस दृश्य ने सभा-प्रांगण में मौजूद हर व्यक्ति की रूह कँपा दी थी। महागुरु उस लबादे को थामे पत्थर की मूरत बने खड़े थे

। लेकिन आचार्य विक्रम जानते थे कि समय हाथ से निकला जा रहा है। उनकी प्राथमिकता अभी वह लबादा नहीं, बल्कि गायब हुआ 'रुद्र' था।​उन्होंने माधव के कंधे पर अपनी पकड़ और मजबूत की। आचार्य की आँखों में कठोरता और एक गहरा डर साफ झलक रहा था।​"माधव! द्वार की नियति महागुरु देख लेंगे, तुम मुझे वह बताओ जो तुम्हारी आँखें छिपा रही हैं। रुद्र कहाँ है?" आचार्य के स्वर में अब आदेश और विनती दोनों का मिश्रण था।​एक डरावना सच​माधव ने एक लंबी और ठंडी सांस ली। उसके होंठ बुरी तरह कांप रहे थे, जैसे वह कोई ऐसा सच बोलने जा रहा हो जो उसे भीतर से जला रहा है। उसने लड़खड़ाती आवाज़ में बोलना शुरू किया, "आचार्य... रुद्र पिछले कई दिनों से सो नहीं पा रहा था। वह आधी रात को उठकर अकेले ही 'रक्त-शिला' की ओर जाता था।"​'रक्त-शिला' का नाम सुनते ही वहाँ खड़े वरिष्ठ छात्रों के चेहरे सफेद पड़ गए। वह गुरुकुल की सीमा के बाहर एक वर्जित और शापित स्थान माना जाता था, जहाँ सदियों पहले एक भीषण रक्तपात हुआ था और जिसके बारे में कहा जाता था कि वहाँ की हवाएँ आज भी चीखती हैं।​माधव ने आगे कहा, "कल रात उसने मुझसे कहा था कि उसे कोई पुकार रहा है। एक ऐसी आवाज़ जो केवल उसे सुनाई देती है। उसने कहा कि अगर वह आज नहीं गया, तो यह गुरुकुल कभी सुबह का सूरज नहीं देख पाएगा। वह कोई युद्ध लड़ने नहीं गया है आचार्य... वह खुद को 'भेंट' (Sacrifice) चढ़ाने गया है!"​छात्रों में फैला कोहराम​माधव के इन शब्दों ने छात्रों के बीच एक मानसिक विस्फोट कर दिया। जो छात्र अब तक इसे केवल अनुशासन का उल्लंघन मान रहे थे, वे अब खौफ से भर गए।​"भेंट? क्या रुद्र पागल हो गया है?" एक छात्र चिल्लाया।"अगर उसे कुछ हो गया, तो हमारा क्या होगा? वही तो हमारा रक्षक था!"​पूरे मैदान में एक अराजकता फैलने लगी। छात्र आपस में फुसफुसाने लगे कि शायद रुद्र पर किसी बुरी शक्ति का साया है। अनुशासन की वह दीवार जो बरसों से अटूट थी, आज दरकती हुई महसूस हो रही थी। आचार्य विक्रम ने स्थिति को बिगड़ते देख अपनी गदा ज़मीन पर पटकी, जिससे एक ज़ोरदार धमाका हुआ और सब शांत हो गए।​

, मुख्य द्वार पर फिर से वही भारी दस्तक हुई। इस बार उसके साथ एक कर्कश और अधिकारपूर्ण आवाज़ आई, "मर्यादा का द्वार खोलो! समय समाप्त हो रहा है!"​आचार्य विक्रम और अन्य आचार्यों ने एक-दूसरे की ओर देखा। यह आवाज़ किसी शत्रु की नहीं थी, लेकिन इसमें जो गूँज थी, उसने आचार्यों के साहस को भी विचलित कर दिया। माधव ने अपनी कांपती उंगली द्वार की ओर उठाई और बुदबुदाया, "वह आ गए... रुद्र ने कहा था कि जब वह जाएगा, तो 'वे' यहाँ आएंगे। वही, जो इस लबादे के असली मालिक हैं!"​आचार्य विक्रम ने भारी कदमों से द्वार की ओर बढ़ते हुए आदेश दिया, "द्वार खोलो! देखें तो सही कि रुद्र के जाने के बाद इस गुरुकुल की नियति ने किसे भेजा है।