Prem n Haat Bikaay - 3 in Hindi Love Stories by Pranava Bharti books and stories PDF | प्रेम न हाट बिकाय - भाग 3

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प्रेम न हाट बिकाय - भाग 3

3--

 

      गुज़रे पल किसकी मुट्ठी में कैद रह सकते हैं ?जब समय अवसर देता है तब मन का ढीठपन उस अवसर को भुनाने में आनाकानी करता है, समय बीत जाने पर हम हाथ मलते रह जाते हैं | खूबसूरत अहसासों की संवेदना से घिरा मन (अनामिका )आना  को अपने बालपन में खींचकर ले जाता, आँसू से लबरेज़ कर देता उसे ! कहाँ, कैसे बालपन व किशोरावस्था के दिनों को समेट ले ! उन दिनों तो मन के भीतर से एक आक्रोशित भावना पनपती रहती और खीज आती माँ-पापा पर !'क्यों हर समय अपने उपदेश थोपते रहते हैं ?'

      दोनों भाई-बहन बहरे और बेशर्म थे, और सभी बच्चों की तरह करते तो वही थे जो मन ठान लेता , चाहे छिप-छिपकर ही सही ----! ये सब चीज़ें तो आज महसूस होती हैं न !मन पुकारना चाहता है पुराने दिनों को लेकिन देर हो चुकी होती है ---- 

       विवाह के लंबे चौदह वर्षों बाद आना के भीतर की  सोई हुई छात्रा ने फिर से करवट लेनी शुरू कर दी | कब से उसका मन अपनी छोड़ी हुई पढ़ाई फिर से शुरू करने के लिए मचल  रहा था | मज़े की बात यह थी कि जब पढ़ने का अवसर और समय था तब किताबों में रखकर नॉवल्स पढ़े जाते थे | माँ-पापा दोनों उच्च-शिक्षित !दोनों  का अध्ययन के प्रति बहुत  गहन लगाव ! दोनों का अधिक शिक्षित होना आना और उसके छोटे भाई अनुज को कोई कम पीड़ा देने वाला न था | जब देखो हर समय शिक्षा की महत्ता पर व्याख्यान सुनने पड़ते | 

        चाहे माँ-पापा हों या उनके अंतरंग मित्र !बस, हर बार मिलने पर वो अपने बच्चों की पढ़ाई की और उनके भविष्य की ही चर्चा करते रहते|आज लगता है, वह सब बड़ा स्वाभाविक था जिसको सुनते हुए आना और  छोटा दोनों ही ऊबने लगते | ‘पता नहीं किसने बनाई है ये पढ़ाई !’ भुनभुन करता अनुज और आना अपनी पाठ्य-पुस्तक में रखा  नॉवल पढ़ते-पढ़ते मुस्कुरा देती | गुलशन नंदा के ज़माने थे वो ! उनकी पॉकेट-बुक्स युवाओं की अलमारी में पाठ्य-पुस्तकों के पीछे या नीचे छिपाकर रखी जातीं |  पाठ्यक्रम की पुस्तकों  में छिपाकर पढ़ने का आनंद कुछ और ही होता | माँ-पापा की दृष्टि में गुलशन नंदा को पढ़ना समय का दुरुपयोग था-----पर होता है न एक समय बाहरी मित्रता के आक्रमण का जो मन में युद्ध का सा शंखनाद बजाता रहता है और इस युद्ध को रोकने की चेष्टा करने वाले शत्रु दिखाई देते हैं |वो एक दौर था ऐसी पुस्तकों को छिपाकर पढ़ने की क्रांति का ! विशेषकर आना के घर में तो उनकी पुस्तकों को छिपाना ही पड़ता और फिर चटकारे ले-लेकर सहेलियों से बातें साझा की जातीं  --  

"तुम्हारा तो क्या है दीदी,  बी.ए पास करके गृहस्थी चलानी है, हमें तो सँभालनी पड़ेगी गृहस्थी –जाने कितना पढ़ना पड़ेगा --?अभी तो ये लंबा सफ़र है ---"वह अपने इतने लंबे हाथ खोलकर दिखाता जैसे मीलों की दूरी तय करने जा रहा है |  अनुज पर एक सरसरी दृष्टि डालकर, मुस्कुराती  आना  फिर से अपने नॉविल में गुम होने की कोशिश करती |भाई की  बात से मन कुछ भटक भी जाता -

'आसान है क्या गृहस्थी चलाना?सबकी फ़रमाइशें पूरी करते हुए भी हमेशा यही सुनो 'आखिर दिन भर करती क्या हो ?' बहुत से घरों के कॉमन संवाद थे | इससे अच्छा यह नहीं कि बाहर नौकरी करो,  अपना पैसा --अपनी मस्ती !--पर --उसके लिए तो गंभीरता से कुछ करना होगा न यानि पढ़ाई-लिखाई !'सोचती तो अनामिका बहुत कुछ किन्तु वह 'सोचा हुआ' दिमाग़ की बंद डिबिया में ही कसमसाता, कुछ समय बाद दम तोड़ देता |   

        माता-पिता दोनों खासे शिक्षित, दोनों विद्या से इश्क़ करने वाले और उनके ही दोनों बच्चे शिक्षा से दूर भागने वाले ---हाँ!पास ठीक-ठाक नंबरों से हो जाते किन्तु जिसकी प्रतीक्षा माता-पिता को रहती कि सुनहरे अक्षरों में बच्चों का नाम अँधियारे को चीरकर उनके सामने पटल पर चमकदार अक्षरों में आ खड़ा हो, वैसा कभी हो नहीं पाया | एक चिंता सी सवार रहती दोनों के मन पर, न जाने इन बच्चों का क्या होगा ? 

         फिर न जाने कैसे आना ने रो-गाकर प्रथम श्रेणी में बी.ए पास कर लिया, एम.ए में दाखिला भी ले लिया |इसी बीच उसके लिए काफ़ी अच्छे परिवार से  रिश्ता आ गया और लड़के को देखकर रिश्ता पक्का कर दिया गया  | एक ही बात थी कि छोटे परिवार में जन्मी, पली-बढ़ी अनामिका को काफ़ी बड़े परिवार में अपनी योग्यता दिखानी थी, सबका मन जीतना था | ख़ैर, कहते हैं न जोड़ियाँ ऊपर से बनकर आती हैं, शायद यही कहावत उसके ऊपर खरी उतरी थी |उसका विवाह हुआ और वह अपने पति विवेक के साथ गुजरात चली गई |   

       थोड़ा अफ़सोस तो था माँ-पापा को कि उच्च  शिक्षित माता-पिता की बच्ची एक साधारण घर की बेटी के समान ग्रेजुएशन करके डोली में बैठकर चली गई किन्तु संतुष्टि इस बात की थी कि घर-वर अच्छा मिल गया था | अनामिका के साथ माता-पिता  व पूरे परिवार वाले भी संतुष्टि की साँस ले रहे थे|वैसे बेटी चाहिए और उसके निकालने की भी  इतनी चिंता ! अनुज को अच्छा नहीं लगता था जब आना दीदी के विवाह की बात चलाई जाती | कुछ कहता तो उसे यही सुनने को मिलता ;

“अभी छोटे हो बेटा, बीच में नहीं बोलते बड़ों के और हाँ दीदी बेटी है घर की, उसे तो अपने घर जाना ही है –“लेकिन क्यों ? उसके माँ, पापा दीदी के माँ-पापा नहीं हैं क्या ?उसके बाल-मन में सवाल उमड़ने लगते लेकिन सभी सवालों का एक ही उत्तर मिलता उसे, ’छोटे हो ----‘भला, ये क्या बात हुई ?लेकिन दीदी के विवाह के बाद जब वह अकेला रह गया तब उसने अपने बारे में कुछ सोचना शुरू किया |  

उसको लगा कि अब उसे अपनी शिक्षा के प्रति गंभीर होना होगा |