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पहले दिन एम.ए की कक्षा में युवाओं के बीच बैठना उसे कुछ अजीब सा लगा | सारे छात्र बीस/बाईस/चौबीस साल के आसपास और वह चौंतीस वर्ष की अम्मा जी ! कुछ ही दिनों बाद वह अपने मिलनसार ख़ुशनुमा स्वभाव के कारण सबकी दीदी बन गई और संकोच की दीवार उसके सामने से न जाने कहाँ ग़ायब हो गई |इसमें उसका मूल खिलंदड़ा स्वभाव काम आया | अब वह अपने से छोटी उम्र के दोस्तों के साथ खिलखिलाने लगी थी किन्तु उनके साथ अभी तक विश्विद्यालय तक ही संबंध सीमित थे | शेष समय तो गृहस्थी, बच्चे और पुस्तकें !
"आप यहाँ एम.ए कर रही हैं ? " एक दिन लॉबी में चलते हुए एक सुदर्शन से दाढ़ी वाले युवक ने पूछा | होगा कोई पच्चीसेक साल का !
"जी--" उसने संक्षिप्त सा उत्तर दिया |
"मैं राजेंद्र पांडे ---पीएच.डी कर रहा हूँ ---दर्शन में---"
"वाह---मेरा प्रिय विषय ! "वह चहकी फिर जैसे उसे लगा कि अजनबी के साथ बचकानी हरकत कर बैठी है, बोलते-बोलते वह एकदम चुप हो गई |
"पर, आप हिंदी में कर रही हैं न ?फिर आपको दर्शन में इतनी रुचि कैसे ?वैसे भी आप तो सीनियर हैं मुझसे --"उसने दाढ़ी वाले सौम्य चेहरे को देखा |
"अपने माता-पिता के कारण, पापा दर्शन में भी पीएच.डी हैं—वैसे मैं ! सीनियर कैसे हो गई ?"
"अरे ! पर, दीदी तो आप हैं ---बड़ी हैं आप हम सबसे, सीनियर ही तो हैं –”दो पल रुककर उसने फिर पूछा था ;
“फ़ाइनल ईयर है न आपका --?"उसने अनामिका को स्नेहसिक्त सम्मान से सहज ही भर दिया |
उसे तो यह भी याद नहीं रहा था कि उसने एक वर्ष पूरा कर लिया है और प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होकर एम.ए के दूसरे वर्ष में आ गई है |
पहले तो उसे लगा वह लड़का उसकी उम्र का मज़ाक बना रहा था जैसे गीता ने दाँत फाड़े थे 'बुड्ढी घोड़ी, लाल लगाम ---' लेकिन लड़के के चेहरे पर नज़र गड़ाने से उसके भीतर की सरलता ने उसे प्रभावित किया |
"हाँ---हाँ --जी ----" वह हकला सी गई | पता नहीं क्यों? आखिर पीएच.डी का छात्र था |
"दीदी ! मैं राजेंद्र ---आपके छोटे भाई जैसा हूँ | ये जी --जी करके मत बोलिए ----"सच में अनुज जैसा ही तो था वह !आना ने उसे स्नेह से देखा |
अनामिका की सरल मुस्कान ने उसका स्वागत किया और मित्रता की एक गाँठ जुड़ गई| उसका फ़ाइनल ईयर था! एक वर्ष बीत भी चुका था ! एम.ए पूरा करके अब उसे
पीएच. डी करने की धुन भी सवार होने लगी थी |विवेक को तो कभी कोई विरोध था ही नहीं !
अनामिका को यह वर्ष और पूरा करना था | पिछले परिणाम देखते हुए, पूर्ण विश्वास था कि प्रथम तो उसे आना ही है |बच्चों के स्कूल जाने के बाद पूरा-पूरा दिन पुस्तकालय में बैठकर नोट्स बनाने में, घर व बच्चों का ध्यान रखने में थकान के मारे चकनाचूर हो जाती वह ! किन्तु अब न जाने कौनसी शक्ति उसे प्रोत्साहित करती कि इतना श्रम करने के उपरांत भी वह इतनी प्रसन्नता व आनंद में रहने लगी थी कि गीता जैसी पड़ौसनों के मन में शंका के बीज उगने लगे|आख़िर ख़ाली दिमाग़ शैतान का घर !
"पता नहीं, जब देखो, भागती दिखाई देवे है ---"गीता कहाँ चुप रहने वालों में थी |
“ आ, बैठ न हमारे पास अनामिका ----“ पड़ौस की कोई न कोई महिला उसे पुकारती ही रहती | वह जानती थी यह सब उस गीता के कारण होता है लेकिन वह चुप बनी रही | सामने के चौंतरे पर बैठकर दाँत फाड़ते हुए वे सारी स्त्रियाँ किसी न किसीका गुणगान करती नज़र आतीं |किसीकी बेटी, किसीका बेटा और किसी का भी नाम उछालने में उन्हें बहुत मज़ा आता था |
अनामिका के कानों पर अब जूँ भी न रेंगती |वह अपने में मस्त रहने लगी थी | हाँ, कभी-कभी अब वह उद्वेलित हो जाती पर उसका कारण गीता नहीं थी | लेकिन एक ही मुसीबत थोड़े ही होती है ? मुसीबतों के तो अम्बार लग जाते हैं सामने ! जैसे एक ततैया उड़े नहीं कि दूसरा आकर काटने के लिए भुनभुनाने लगे वो भी घर से बाहर शिक्षा-स्थल पर !