Shrapit ek Prem Kahaani - 51 in Hindi Spiritual Stories by CHIRANJIT TEWARY books and stories PDF | श्रापित एक प्रेम कहानी - 51

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श्रापित एक प्रेम कहानी - 51

कुंभ्मन परेसान होकर कहता है--

> ये....ये मुझे क्या हो रहा है । मैं....मैं ठीक से चल क्यों नही पा रहा हूँ।


 कुंम्भन अपने अंदर बहुत कमजोरी महसुस कर रहा था। कुंभ्मन गुस्से से कहता है--

> ये मेरे अंदर क्या हो रहा है। मुझमे शक्ती का अभाव 
क्यो हो रहा है। मुझे कुछ याद क्यो नही आ रहा है , मुझे क्या हुआ था।

 इतना बोलकर कुंभ्मन मेला मे घटी घटना के बारे मे सौच रहा था । तभी उसे याद आ जाता है के उसपर किसी ने कोई शक्ती से प्रहार किया था। कुंम्भन अपनी छाती पर हाथ रखकर दर्द से कराहते हूए कहता है--

> आ...हहह । आखिर ये कौन सी शक्ती थी जो मुझे कुंम्भन को शक्तीहीन कर दिया। ऐसी शक्ती इस पृथ्वी पर किसके पास हो सकता है। 

कुंम्भन लड़खड़ाते हूए करहाते कराहते सुंदरवन के अंदर अपने ठिकाने पर पहूँच जाता है । जहां पर एक गूफा था। जिसके अंदर कुंम्भन चला जाता है और एक पत्थर पर जाकर बैठ जाता है। 

कुंम्भन गुस्से से लाल होकर कहता है--

> हे मानव तुम कोई भी हो मैं तुंम्हे सिघ्र ही खोज लूगां और तुम्हारा बली देकर देवी मां को चड़ाउगां और अपनी पुत्री से कहूगां के दैख .... दैख पुंत्री मैने तेरे हत्यारे का बली चड़ा दिया । मैने उसका सर्वनाश कर दिया जिसने तेरे साथ ऐसा किया। 

कुंम्भन उठकर गुस्से से कहता है--

> हे दुष्ट मानव तुम जो कोई भी हो मैं तेरा सर्वनाश कर दूगां। सर्वसर्नाश । 

कुंम्भन की गर्जना पूरे जंगल मे गूजं उठता है। कुंम्भन वही पर पास मे रखी एक लकड़ी के बक्से के पास जाता है जिसमे कुम्भनी का शव रखा था । कुम्भनी को दैखकर ऐसी लग ही नही रहा था के वो मृत थी ऐसा लग रहा था जैसे वो घोर निद्रा मे थी और अभी उठ कर बोल पड़ेगी। 


कुंम्भनी काले रंग के कपड़े पहनी हूई थी उसके शरीर मे कई तरह के रत्न और आभुषण थे । कुंम्भनी एक देत्य कन्या होकर भी अप्सरा से कम नही थी। कुंम्भनी एक अति सुंदर देत्य कन्या थी। कुम्भन जाकर कुम्भनी के सर पर हाथ फैरते हूए रोते हूए कहता है--

> पुत्री मुझे क्षमा कर देना मैं तुम्हारा पिता महा बलशाली कुंभ्मन अपनी पुत्री को इतने वर्षो से जीवित नही कर सका । क्योकीं देवी माँ की शक्ती ने ही मुझे इस जंगल मे बंदी बनाकर रखा है परतुं पुत्री मैं तुम्हे यहां से जिवित लेकर ही जाउगां इस जन्माष्टी तक मैं कैसे भी करके तेरे मणि का खोज करके तुझे यहां से जीवित लेकर जाऊगां चाहे कोई भी शक्ती का सामना क्यों ना करना पड़े। पुत्री अब वो समय भी निकट है जब तुम्हे पुनः जीवित कर दूगां और उस दुष्ट को उसके कर्मो की सजा दूगां । 


इतना बोलकर कुंभ्मन नम आंखो से कुंम्भनी के बालों को सहलाने लगता है। उधर चेतन जल्दी जल्दी अपना कदम अघोर बाबा की गुफा की और बड़ाने लगता है ताकि मेला वाली शक्ती खबर अघोर बाबा तक पहूँचा सके। पर चेतन कुछ ही दुर पहूँचा था के उसने अपना वही रौक लेता है और सौचने लगता है ---

" क्या इतनी सी जानकारी गुरुदेव के लिए पर्याप्त रहेगी ? उन्होने तो मुझे उस शक्ती के बारे मे पता करने को कहा था। इतना तो निश्चित हो गया के कुम्भन को निली रोशनी ने ही घायल किया था। पर वो रोशनी कहीं से आई ये पता करना अभी बाकी है। और ये सब जाने बिना गुरुदेव के पास जाना उचित नही होगा। क्योकीं जब वो मुझसे इस बारे मे पूछेगें तो मैं उन्हें क्या बताउगां ।


 इतना बौलकर चेतन कुछ दैर सौचने लगता है और कहता है--

> हां ये ठीक रहेगा मैं सिधा हॉस्पिटल चला जाता हूँ । वहां पर कोई ना कोई तो होगा जो उस शक्ती को देखा होगा। और मेरे लिए ये पता करना अति आवश्यक है के वो शक्ती कहां से आई थी। और ये जानकारी मुझे सिर्फ वही से प्राप्त हो सकता है।


 इतना बोलकर चेतन अपना कदम बापस मौड़ लेता है और जल्दी जल्दी अपना कदम हॉस्पिटल की और बड़ाने लगता है।

इधर कुंम्भन अपनी पुत्री के शव के पास से उठकर गूफा के अंदर बनी एक कमरे की तरफ जाता है। जिसमे लोहे के दिवार बना था। कुंभ्मन दरवाजा खोलता है और अंदर चला जाता है। जैसे ही कुंभ्मन अंदर जाता है वह गुस्से से लाल हो जाता है । कुंम्भन अपने हाथ के दौनो मुठ्ठी को बंद करके दौनो हाथ उपर उठाकर चिल्लाते हुए कहता है--

> नही.....! ऐसा संभव नही है वो यहां से कैसे मुक्त हो सकता है। 

कुंम्भन गुस्से से लाल हो जाता है और आंखे बड़ी बड़ी हो जाता है। कुंम्भन गुस्से से गुर्रराते हुए बाहर आता है और एक बड़ी सी मूर्ति के पास जाकर बैठ जाता है जहां पर एक हवन कूंड था । कुंम्भन पास मे रखे चाकु को उठाता है और उस चाकु से अपने दाहिना हाथ पर एक घांव लगाता है जिससे कुंम्भन के हाथ से खुन निकलने लगता है।

 कुंम्भन अपना हाथ को कुंड के उपर ले जाता है जिससे उसका खुन उस कुडं पर गिरने लगती है। कुंम्भन का खुन उस कुंड पर गिरता है वहीं पर आग जल उठती है। आग जलने के बाद कुंम्भन उस कुंड मे आहुती देने लग जाता है और जौर जौर से कहता है --

> हे देवी माँ प्रसन्न हो । प्रसन्न हो माता । मां ..! मुझे शक्ती दे मुझे शक्ती की आवश्यकता है ताकि इस जन्माष्टी तक मैं उस दुष्ट मानव को ढुंढ पाऊं जिसके कारण मेरी पुत्री इतने वर्षो से इस अवस्था मे है। मां मुझे शक्ती दे ताकि मैं इस बंधन को भैद पाऊं जिससे इन मानवो ने मुझे इस जंगल मे बंदी बनाकर रखा है उन्होनें ये जानना आवश्यक नही समझा के दोष किसका है। मां तु तो जानती है के मैं अगर चाहू तो इस संसार मे वास कर रहे सभी को मृत्यु तक पहूँचा सकता हूँ पर मैं ऐसा नही कर सकता । 


कुंम्भन चिल्लाकर कहता है--

> मैं ऐसी नही कर सकता। क्योकीं हम देत्य वचन बद्ध है। परतुं मां अगर इस जन्माष्टी तक मुझे मेरी पुत्री जिवित नही मिली तो मैं इस गांव मे रह रहे सभी का सर्वनाश कर दुगां। सर्वनाश ।

 कुंम्भन यज्ञ कुडं पर आहुती देते जा रहा था । आहुती देते हुए कुंभ्मन बार बार एक ही शब्द बोल रहा था--

> मातंक मेरे मित्र प्रकट हो । प्रकट हो मित्र । मुझे तुम्हारी आवश्यकता है। प्रकट हो मित्र । 

कुंभ्मन के इतना कहते ही उस यज्ञ कुडं से दौ दैत्य जौर जौर से हंसते हूए प्रकट होता है --

> हा हा हा हा । 

वो दौनो दैत्य कुंम्भन के मित्र मांतक और मांतक की पत्नी त्रिजली थी। कुंम्भन दौनो को दैखकर बहुत प्रसन्न होता है और यज्ञ कुंड से उठकर मांतक को गले लगाते हूए कहता है --
.> आओ मित्र आओ । 

कुंभ्मन त्रिजला की और दैखकर कहता है--

> भाभी श्री त्रिजला को कुंभ्मन का प्रणाम। 

मांतक और त्रिजला कुंभ्मन को दैखकर बहोत प्रसन्न होता है। मांतक कुंम्भन से बड़े प्यार से कहता है--

> कहो मित्र आज अचानक इतने वर्षो बाद मुझे कैसे याद किया ? क्या कोई विषेश कार्य है मित्र जो तुमने हम दैनो को इस मृत्यु लोक पर बुलाया है ?

 मांतक अपनी भारी आवाज से कहता है--

> बताओ मित्र इस मृत्यु लोक मे किसमे इतना साहस हो गया जिस कारण तुम्हे मुझे यहां पर बुलाना पड़ा। 
बताओ मित्र बताओ।

 मांतक की बात सुनकर कुंभ्मन को बहुत हर्ष होता है और कहता है--

> मित्र एक मानव के कारण मैं इस जंगल मे 10 वर्षो से बंदी हूँ ।

 कुंम्भन की बात सुनकर मांतक और त्रिजला दौनो ही हैरान हौ जाता है। कुंभ्मन की बात सुनकर त्रिजला कहती है--

> क्या एक मानव ने ? 

तभी मांतक कहता है--

> ये तुम क्या कह रहे हो मित्र एक मानव ने तुम्हें यहां 10 वर्षो से बंदी बनाकर रखा ? आखीर ऐसी कौन सी शक्ती है उसके पास जिसके कारण तुम्हे इतने वर्ष इस जंगल मे व्यतित करना पड़ा ।

 कुंम्भन दौनो को सारी बात बोलकर सुनाता है और फिर कहता है--

> मेरी पुत्री का मणी मित्र । इसी वजह से मैं यहां पर बंदी हूँ परतुं मित्र अब मेरे पास केवल कुछ ही समय शेष है अगर समय रहते मैं उस मणी को नही ढुंढ पाया तो मैं अपनी पुत्री को फिर कभी जीवित नही कर पाऊगां ।

 इतना कहने के बाद कुंम्भन के आखो से आंसु बहने लगता है। मांतक इतना सुनकर बहुत हैरान हो जाता है और कुंम्भन से कहता है--

> क्या ? परतुं कुम्भनी का मणी उस मानव के पास कैसे पहूँचा ? एक देत्य से उसका मणी ले लेना किसी साधारण मनुष्य का काम नही हो सकता। मित्र कुंम्भनी कहां है ?

कुंम्भन अपना सिर निचे करके अपनी अगुली कुम्भनी की और करके दिखाता है। मांतक और त्रिजला घबराते हूए धीरे धीरे आगे बड़ता है । दौनो कुम्भनी को दैखकर हैरान हो जाता है। क्योकीं वहां पर कुम्भनी की शव रखा था। जिससे मांतक और त्रिजला दैनो के आंखो से आंसु बहने लगता है। मांतक कहता है--

> हे इश्वर ये क्या हो गया ? 

मांतक गुस्से से लाल होकर कुंभ्मन से पूछता है---

> मित्र कौन है वो दुष्ट मानव जिसके कारण पुत्री कुम्भनी की ये दशा हुई है । मुझे बताओ मित्र । मैं उसका सर्वनाश कर दूगां। उसका वध कर दूगां मैं। 

कुंभ्मन मांतक के कंधे पर हाथ रख कर कहता है--.

> इसीलिए मैने तुम्हे यहां बुलाया है। 

मातंक कहता है--

> परतुं मित्र तुम तो उस मणी तक बड़ी सरलता के साथ पहूँच सकते थे फिर तुमने हमे क्यों बुलाया ? 

कुंभ्मन कहता है--

> मित्र मैं इस जंगल मे वर्षो से कैद हूँ उन मानवो ने 
देविय शक्ती से मुझे बांधकर रखा है जिस कारण से मैं इस जंगल से बाहर नही जा रहा हूँ परतुं मित्र तुम्हें तो सारे बंधन तैड़ने का ज्ञान है जिससे तुम इस जंगल से बाहर जाकर मणी का खोज कर सको एक बात और मित्र मेरी पुत्री का मणी जिसके पास है उसने किसी शक्ती से उस मणी को बांध कर रखा है जिस कारण से मैं उस मणी तक नही पहूँच पा रहा हूँ। और इसिलिए मैने तुम्हें स्मरण किया है क्योकी तुम दौनो रुप बदलने मे निपुण हो तुम लोग कोई भी रुप धारण कर सकते हो। मित्र अब केवल तुम ही हो जो मेरे पुत्री को जिवन दान दे सकते हो। 

मातंक कहता है--

> तुम चिंता ना करो मित्र कुम्भनी हमारी भी पुत्री है 
और उसे बचाने के लिए हम कुछ भी कर सकते हैं। अब हमे कहां जाना होगा मित्र ?

To be continue....813