बैंगलोर, एक ऐसा शहर जो कभी पूरी तरह सोता नहीं है। दूर सड़क पर किसी ट्रक के चलने की आवाज़ और बीच-बीच में कुत्तों के भौंकने को छोड़ दें, तो उस मोहल्ले में गहरा सन्नाटा पसरा था।
अपने कमरे में श्राव्या गहरी नींद में थी। खिड़की के पर्दों की दरारों से स्ट्रीट लाइट की धुंधली रोशनी कमरे में घुसकर फर्श पर अजीबोगरीब परछाइयां बना रही थी। पास की मेज पर रखी डिजिटल घड़ी में लाल रंग के नंबर चमक रहे थे: 3:23.
अचानक श्राव्या की नींद खुल गई। लेकिन, यह कोई सामान्य जागना नहीं था।
उसकी पलकें अभी भी बंद थीं। लेकिन उसका दिमाग पूरी तरह से जाग चुका था। यहाँ तक कि कमरे में पंखे के चलने की आवाज़, दीवार घड़ी की 'टिक-टिक' सब कुछ स्पष्ट सुनाई दे रहा था। "उठो श्राव्या," उसने खुद को आदेश दिया।
लेकिन... उसका शरीर पत्थर जैसा हो गया था!
उसने अपनी उंगलियों को हिलाने की कोशिश की, नहीं हुआ। अपने पैरों को उठाने की कोशिश की, जैसे ताकत ही नहीं बची थी। ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने उसके पूरे शरीर को रस्सियों से कसकर बांध दिया हो, या पूरे शरीर पर कोई भारी धातु का आवरण डाल दिया हो! सांस लेना भी मुश्किल हो रहा था।
घबराहट की एक ठंडी लहर उसकी रीढ़ की हड्डी में दौड़ गई। धुंधले अंधेरे में, कमरे के एक कोने में... उसे लगा जैसे वहां कोई खड़ा है।
एक काली आकृति। इंसान है? या परछाई? समझ नहीं आ रहा था। लेकिन उसे इस बात का अहसास हो गया था कि वह आकृति उसे ही घूर रही है। इतना ही नहीं, उसके कान के पास हवा में फुसफुसाहट सुनाई देने लगी। अस्पष्ट आवाजें... नासमझ आने वाली भाषा... उसके कान के पास ही तेजी से फुसफुसा रही थीं।
श्राव्या का दिल जोरों से धड़क रहा था। उसने चिल्लाने के लिए मुंह खोलने की कोशिश की। लेकिन आवाज गले में ही फंस गई थी। जीभ नहीं हिल रही थी।
"नहीं... यह सच नहीं है... उठो... उठो!" उसने मन ही मन संघर्ष किया।
अपनी पूरी मानसिक और शारीरिक शक्ति को इकट्ठा करके, उसने केवल अपने दाहिने हाथ की छोटी उंगली को हिलाने की कोशिश की।
पहली बार नहीं हुआ, दूसरी बार भी नहीं हुआ, तीसरी बार... सफल!
जैसे ही छोटी उंगली हिली... वह धातु का भारीपन गायब हो गया...
वह दाईं ओर घूमी..
गहरी सांस लेते हुए, पसीने से लथपथ श्राव्या बिस्तर पर उठ बैठी। वह अदृश्य जंजीर टूट चुकी थी। उसने तुरंत पास का स्विच दबाया। कमरे में रोशनी हो गई।
कोने में देखा। वहां कोई नहीं था। बस एक कपड़े टांगने वाला स्टैंड और उस पर रखा एक कोट था। फुसफुसाहट भी गायब हो गई थी।
अपने दिल की धड़कन को काबू में करते हुए... उसके अंदर का मेडिकल छात्र अब जाग उठा।
"यह कोई भूत नहीं है। यह सिर्फ 'स्लीप पैरालिसिस' (Sleep Paralysis) है," उसने खुद से जोर से कहा। "मेरा दिमाग जाग गया है, लेकिन मांसपेशियां अभी भी REM स्लीप (Rapid Eye Movement sleep) में थीं। वह काली आकृति, वह फुसफुसाहट... सब कुछ मेरे दिमाग का पैदा किया हुआ भ्रम (Hallucination) था।"
उसने एक गिलास पानी पिया और अपने बिस्तर के पास की दराज से अपनी सीक्रेट नोटबुक निकाली। पेन लिया और कांपते हाथों से लिखा:
> दिनांक: 12 अक्टूबर
> समय: 3:23 AM
> घटना: स्लीप पैरालिसिस (Sleep Paralysis)।
> विवरण: हिप्नागोगिक हैलुसिनेशन (Hypnagogic hallucinations)। यह पूरी तरह से मेडिकल रूप से समझाया जा सकने वाली घटना है। डरने की जरूरत नहीं है।
उसने किताब बंद कर दी। यह सोचकर खुद को तसल्ली दी कि उसने तर्क से डर को जीत लिया है, लाइट बंद की और फिर से चादर ओढ़ ली। लेकिन, उन फुसफुसाहटों की आवाज़ अभी भी उसके दिमाग में गूंज रही थी।
अगली सुबह, रात का अंधेरा और वे भयानक अनुभव दिन की तेज रोशनी में गायब हो गए थे। श्राव्या हमेशा की तरह अपने मेडिकल कॉलेज की क्लास में बैठी थी। हाथ में पेन, सामने खुली हुई नोट्स की किताब।
वह न्यूरोलॉजी (Neurology) की क्लास थी। प्रोफेसर शास्त्री गंभीरता से क्लास में आए। उन्होंने बोर्ड पर बड़े अक्षरों में आज का विषय लिखा: "Sleep Disorders" (नींद की बीमारियां)।
श्राव्या दिलचस्पी के साथ सीधी होकर बैठ गई। प्रोफेसर ने पढ़ाना जारी रखा।
"छात्रों, यह बहुत दिलचस्प है कि जब नींद के चरणों में बदलाव होता है तो मस्तिष्क कैसे प्रतिक्रिया करता है। इसमें एक बहुत ही महत्वपूर्ण स्थिति है - स्लीप पैरालिसिस।"
यह शब्द सुनते ही श्राव्या के रोंगटे खड़े हो गए। क्या इत्तेफाक था! कल रात ही उसने जो अनुभव किया था, आज प्रोफेसर वही पढ़ा रहे थे।
प्रोफेसर ने आगे समझाया: "इस स्थिति में, मरीज का दिमाग जाग रहा होता है, लेकिन शरीर ने मांसपेशियों का नियंत्रण वापस नहीं पाया होता है (Muscle Atonia)। मरीज को अपनी छाती पर बहुत भारीपन महसूस होता है। इतना ही नहीं, मस्तिष्क का भय केंद्र 'एमीगडाला' (Amygdala) अत्यधिक सक्रिय होने के कारण, ऐसा लगता है जैसे कमरे में कोई अजनबी या काली आकृतियां हैं।"
यह सुनकर श्राव्या ने एक गहरी राहत की सांस ली। उसके मन को बहुत सुकून मिला।
"हाँ, कल यही हुआ था," उसने मन ही मन सोचा। "वह काली आकृति, वह फुसफुसाहट... वह सब सच नहीं था। यह सिर्फ मेरे दिमाग के न्यूरोट्रांसमीटर (Neurotransmitters) की गड़बड़ी थी। मैं पागल नहीं हुई हूँ, मैंने कुछ भी असामान्य नहीं देखा है।"
क्लास खत्म होने के बाद, तर्क और विज्ञान पर उसका विश्वास और भी मजबूत हो गया। इस बात ने उसे हिम्मत दी कि उसके अनुभव का एक पक्का वैज्ञानिक नाम है।
अगले कुछ दिनों तक उसने खुद को पूरी तरह से पढ़ाई में डुबो दिया। लाइब्रेरी की मोटी-मोटी किताबें ही उसकी दुनिया बन गईं। खाली बैठने पर कहीं वो ख्याल फिर न आ जाएं, इस डर से उसने अपने दिमाग को एक पल का भी आराम नहीं दिया। सुबह से शाम तक सिर्फ पढ़ाई, पढ़ाई, पढ़ाई।
विज्ञान ही सत्य है, बाकी सब भ्रम है - अपने चारों ओर यह किला बनाकर वह सुरक्षित थी... फिलहाल के लिए।
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कुछ दिन बीत चुके थे।
उस शाम कॉलेज की लाइब्रेरी में हमेशा की तरह गहरा सन्नाटा था। परीक्षा नजदीक आने के कारण लाइब्रेरी खचाखच भरी थी। पुरानी किताबों की महक और पंखों की आवाज के अलावा वहां कुछ सुनाई नहीं दे रहा था।
श्राव्या एक टेबल के कोने में बैठी अपनी एनाटॉमी (Anatomy) की बड़ी किताब में मग्न थी। उसकी एकाग्रता इतनी गहरी थी कि वह अपने आस-पास की दुनिया को भूल चुकी थी।
अचानक... लगा जैसे माहौल बदल गया हो।
उसके कान के ठीक पास, उसकी गर्दन के पिछले हिस्से पर एक गर्म सांस का स्पर्श हुआ। तभी, एक गंभीर पुरुष की आवाज उसके कानों में गूंजी। यह अस्पष्ट नहीं थी। ऐसा लग रहा था जैसे कोई उसके ठीक बगल में खड़ा हो और बहुत ही जरूरी, आदेशात्मक लहजे में कुछ कह रहा हो।
श्राव्या ने झटके से सिर उठाया।
सामने का नजारा उसकी धड़कनें रोक देने वाला था।
थोड़ी दूर पर, किताबों की दो अलमारियों के बीच, एक आदमी खड़ा था। वह निश्चित रूप से इस कॉलेज का छात्र नहीं था। उसने पुराने जमाने के पारंपरिक कपड़े - सफेद पंचा (धोती) और शाल पहने हुए थे। उसके चेहरे पर एक अजीब सी गंभीरता थी।
लेकिन, सबसे डरावनी बात यह थी कि... वह मांस-पेशियों वाला कोई आम इंसान नहीं लग रहा था!
वह पारदर्शी (Translucent) था। जैसे पानी में कोई प्रतिबिंब हो, या हल्का धुआं। उसके शरीर के पीछे रखी किताबों की कतार उसके आर-पार धुंधली दिखाई दे रही थी।
लाइब्रेरी में सैकड़ों लोग थे, लेकिन वह आकृति बिना पलक झपकाए सीधे श्राव्या को ही घूर रही थी।
"यह असंभव है... मैं पढ़ते-पढ़ते थक गई हूँ..." यह सोचते हुए श्राव्या ने जोर से अपनी आँखें मलीं। फिर आँखें खोलकर देखा। वह आकृति अभी भी वहीं थी! ऐसा लगा जैसे उसने उसकी तरफ एक कदम बढ़ाया हो।
"हे श्राव्या!"
अचानक किसी ने उसके कंधे पर हाथ रखा।
श्राव्या चौंक गई और कुर्सी से आधी खड़ी हो गई। मुड़कर देखा तो वह उसकी सहपाठी स्नेहा थी।
"क्या हुआ?" स्नेहा ने घबराकर पूछा।
श्राव्या ने तुरंत वापस सामने देखा। लेकिन... उन अलमारियों के बीच अब कोई नहीं था। वह पारदर्शी आदमी हवा में गायब हो गया था। बस खाली जगह थी।
स्नेहा उसे अजीब तरह से देखते हुए बोली, "क्या हुआ? तुम ऐसे आंखें फाड़कर उस खाली जगह को क्यों देख रही हो जैसे कोई भूत देख लिया हो? वहां कोई नहीं है।"
श्राव्या का गला सूख गया था। "कु... कुछ नहीं। बस यूं ही सोच रही थी," उसने हकलाते हुए जवाब दिया। लेकिन उसके हाथ अभी भी कांप रहे थे।
लाइब्रेरी के एसी (AC) वाले माहौल से बाहर निकलकर श्राव्या बाहर सीमेंट की सीढ़ियों पर बैठ गई। शाम की ठंडी हवा चल रही थी, फिर भी उसके माथे से पसीना बह रहा था।
उसका तर्कशील दिमाग अब उलझनों का घर बन गया था।
"उस रात जो हुआ उसे 'स्लीप पैरालिसिस' मान सकते हैं। उसका वैज्ञानिक कारण था। लेकिन अब क्या?" उसने खुद से सवाल किया। "मैं सो नहीं रही थी। मैं पूरी तरह से जाग रही थी (Wide awake)। मेरे आस-पास लोग थे, रोशनी थी। फिर भी वह आकृति सिर्फ मुझे ही कैसे दिखाई दी?"
जैसे ही उसे एहसास हुआ कि विज्ञान की किसी भी किताब में इसका जवाब नहीं है, उसका डर और बढ़ गया।
तभी उसके बैग में रखा फोन वाइब्रेट (vibrate) होने लगा। उसकी सोच का सिलसिला टूटा।
फोन निकालकर देखा। स्क्रीन पर 'पापा' नाम चमक रहा था।
सामान्य तौर पर वह एक ही रिंग में फोन उठा लेती थी। लेकिन आज उसमें वह हरा बटन दबाने की हिम्मत नहीं थी। फोन बजना बंद हो गया।
अगले ही पल एक 'वॉयस मैसेज' (Voice Message) आया। कांपती उंगलियों से उसने उसे प्ले किया। फोन के स्पीकर से उसके पिता की मजबूत और आत्मविश्वास से भरी आवाज सुनाई दी:
"श्राव्या, फोन नहीं उठा रही? पढ़ाई में बहुत व्यस्त होगी। अच्छी बात है। लेकिन याद रखना बेटा, 'एक स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क निवास करता है'। ठीक से खाना खाओ, समय पर सोओ। तभी दिमाग स्वस्थ रहेगा, कोई फालतू विचार नहीं आएंगे..."
पिता की बातें सुनकर श्राव्या की आंखों में आंसू आ गए।
उसे अब लगा कि उसे किसी के साथ, खासकर अपने पिता के साथ इस बात को साझा करना चाहिए। उसका मन किया कि रोते हुए कह दे, "पापा, मुझे डर लग रहा है, मुझे अजीब आकृतियां दिखाई दे रही हैं।"
लेकिन... उसने ऐसा नहीं किया। फोन स्विच ऑफ करके बैग में डाल दिया।
क्योंकि वह जानती थी - उसके पिता पूरी तरह से वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाले व्यक्ति हैं। उनकी नजर में भूत, आत्मा, अलौकिक शक्तियां ये सब "कमजोर दिमाग वालों के लक्षण" या "अंधविश्वास" हैं।
"अगर मैंने उन्हें सच बताया, तो वे मुझे पागल समझ सकते हैं या सोचेंगे कि मैं मानसिक रूप से टूट चुकी हूँ," यह डर उस पर हावी हो गया। विज्ञान और अपने पिता का विश्वास- इन दोनों को बचाए रखने के लिए उसने चुप रहने का फैसला किया।
आस-पास सैकड़ों लोग होने के बावजूद, उस बड़े से कॉलेज कैंपस में श्राव्या को महसूस हुआ कि वह बिल्कुल अकेली है।
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अपने दिल को पत्थर करके श्राव्या फिर से लाइब्रेरी में उसी जगह आ बैठी। परीक्षा पास है, पढ़ना ही होगा, यह उसकी जिद थी।
लेकिन, अब स्थिति और भी खराब हो चुकी थी।
वे फुसफुसाहटें... वे रुकने का नाम ही नहीं ले रही थीं। पहले जो आवाज सिर्फ रात में सुनाई देती थी, अब वह दिन में भी उसका पीछा नहीं छोड़ रही थी। मधुमक्खी के छत्ते जैसी "ज़ज़ज़..." की आवाज उसके कान के अंदर और बाहर एक साथ सुनाई दे रही थी।
उसने अपने कान बंद कर लिए। फिर भी वह आवाज नहीं रुकी।
"क्या यह हवा में तैरती हुई आ रही है? या मेरे दिमाग की नसों में ही पैदा हो रही है?" यह उलझन उसे पागल कर देने की हद तक पहुँच गई थी।
यह तय करते हुए कि वह अपनी बुद्धि पर विश्वास नहीं खोएगी, उसने कांपते हाथों से अपनी मोटी 'Clinical Medicine' की किताब अपनी ओर खींची। तेजी से पन्ने पलटकर "Differential Diagnosis of Auditory Hallucinations" (कान में आवाजें सुनाई देने वाली बीमारियों की सूची) वाला अध्याय खोजा।
उसकी उंगलियां उस सूची पर फिसलने लगीं:
1. सिज़ोफ्रेनिया (Schizophrenia) - मानसिक बीमारी।
2. टेम्पोरल लोब मिर्गी (Temporal Lobe Epilepsy) - मस्तिष्क की नसों की समस्या से आने वाले दौरे।
3. ब्रेन ट्यूमर (Brain Tumor) - मस्तिष्क की गांठ।
4. गंभीर मानसिक तनाव (Severe Stress/Psychosis)।
श्राव्या अपने लक्षणों की तुलना एक-एक करके उन भयानक बीमारियों से करने लगी। हर पंक्ति पढ़ते ही उसके दिल की धड़कन तेज हो जाती थी।
"क्या मैं पागल हो गई हूँ? या मेरे दिमाग में कोई ट्यूमर बढ़ रहा है?"
यह विचार आते ही उसके हाथ इतनी जोर से कांपे कि उसके हाथ का पेन 'टक' से टेबल पर गिर गया। आस-पास के लोगों ने मुड़कर देखा। श्राव्या ने सिर झुका लिया और किताब के अक्षरों को ही घूरती रही। विज्ञान बीमारी का पता तो लगा रहा था, लेकिन समाधान देने के बजाय उसका डर बढ़ा रहा था।
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घड़ी रात के 2:14 बजा रही थी।
बाहर पूरी दुनिया गहरी नींद में सो रही थी। लेकिन श्राव्या के कमरे में अभी भी टेबल लैंप जल रहा था। उसकी पीली रोशनी टेबल पर फैली मोटी-मोटी किताबों के ढेर पर पड़ रही थी।
कल सुबह ही न्यूरोलॉजी की परीक्षा थी।
श्राव्या की आंखें जल रही थीं। पिछले अठारह घंटों से लगातार पढ़ते-पढ़ते उसका दिमाग सुन्न हो चुका था। खाली हो चुके कॉफी मग को किनारे धकेलते हुए उसने सिलेबस कॉपी (Syllabus copy) को अपनी आंखों के करीब लाकर देखा।
अभी भी कुछ आखिरी अध्याय बाकी थे।
उसने किताब के पन्ने पलटे। वहां अजीब और उच्चारण न किए जा सकने वाले बीमारियों के नाम दिखाई दिए:
'Marchiafava-Bignami disease'
'Progressive Multifocal Leukoencephalopathy (PML)'...
श्राव्या ने थकी हुई आँखों से उन पन्नों को घूरा। तर्क का सिलसिला फिर शुरू हुआ।
"छी... ये सब तो करोड़ों में किसी एक को होने वाली बहुत दुर्लभ बीमारियां हैं। पिछले पांच साल के प्रश्नपत्रों में एक बार भी इनके बारे में नहीं पूछा गया है। अगर मैं इन सबको अभी पढ़ने बैठ गई, तो मेरे पास जो समय है वह भी कम पड़ेगा, और दिमाग में कुछ घुसेगा भी नहीं," उसने तय किया।
"ये नहीं आएंगे (Low Yield Topics)," उसने जोर से कहा, और उन पन्नों को बिना पढ़े ही किताब बंद करके किनारे रख दी।
उसका सिर बहुत भारी हो रहा था। गर्दन का दर्द बर्दाश्त न कर पाने के कारण वह कुर्सी पर पीछे की ओर झुक गई।
"बस... अब मुझसे और नहीं होगा। सिर्फ 5 मिनट... हाँ, सिर्फ पांच मिनट आंखें बंद करके शांत बैठूंगी। फिर उठकर रिवीजन कर लूंगी," यह सोचकर उसने टेबल पर हाथ मोड़े, उन पर सिर रखा और आंखें बंद कर लीं।
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श्राव्या ने बस टेबल पर सिर रखा था। वह पूरी तरह नींद में नहीं गई थी। यह न तो पूरी तरह जागने की, न ही सोने की एक अजीब 'लिमिनल' (Liminal) अवस्था थी। उसका शरीर आराम कर रहा था, लेकिन उसकी चेतना अभी भी तैर रही थी।
अचानक, उसके मन की गहराइयों में एक कंपन शुरू हुआ।
कमरे के सन्नाटे को चीरते हुए, वही पुरानी फुसफुसाहटें फिर से सुनाई दीं। लेकिन इस बार उनमें डर नहीं था, कोई उलझन नहीं थी। इसके बजाय, उस आवाज में एक फिक्र थी।
उसकी बंद आँखों के सामने का अंधेरा छंट गया और एक तेज रोशनी उभरी।
उसने अभी-अभी यह सोचकर कि "ये नहीं आएंगे" जो किताब किनारे रखी थी, उसी किताब के पन्ने उसके दिमाग के पर्दे पर एक दृश्य की तरह खुल गए। उन पन्नों की लाइनें आंखों को चौंधिया देने वाली चमक के साथ चमक रही थीं।
हजारों अक्षरों के बीच, सिर्फ तीन विषय (Topics) ऐसे हाइलाइट किए हुए दिख रहे थे जैसे किसी ने उन पर मार्कर चला दिया हो:
1. मार्चियाफावा-बिग्नामी डिसीज (Marchiafava-Bignami disease)
2. प्रोग्रेसिव मल्टीफोकल ल्यूकोएन्सेफेलोपैथी - पी.एम.एल (PML)
3. एब्ड्यूसेन्स नर्व - फाल्स लोकलाइजिंग साइन (Abducens nerve - False localizing sign)
ये तीन नाम नियॉन लाइट की तरह उसकी आंखों के सामने झिलमिला रहे थे।
वह अदृश्य आवाज अब उसके कानों में स्पष्ट रूप से आदेश दे रही थी:
"हम पर विश्वास करो... इन्हें पढ़ो..."
यह दृश्य इतना तीव्र था कि श्राव्या को लगा जैसे वह सचमुच आंखें खोलकर पढ़ रही है। वे तीन विषय उसके दिमाग की स्मृति पटल पर इस तरह छप गए जैसे उन्हें उकेरा गया हो।
"हाह...!"
श्राव्या चौंक गई और सांस रोककर जाग उठी। उसके दिल की धड़कन सौ किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ती ट्रेन जैसी थी। माथे और गर्दन पर पसीने की बूंदें छलक आई थीं।
घड़ी देखी। 2:47। आंखें बंद किए हुए उसे बमुश्किल आधा घंटा ही हुआ था। लेकिन, उसे लगा जैसे युग बीत गए हों।
उसका वैज्ञानिक दिमाग तुरंत सतर्क हो गया।
"यह सिर्फ एक सपना था... बस," उसने खुद से जोर से कहा। "परीक्षा के तनाव (Exam Stress) के कारण मेरा दिमाग ऐसे बुरे सपने पैदा कर रहा है। वैसे भी वे तीन बीमारियां परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण नहीं हैं। अगर मैं अभी उठकर उन्हें पढ़ने लग जाऊं, तो पहले से पढ़े हुए महत्वपूर्ण विषय (Important Topics) भी भूल जाऊंगी। समय बर्बाद नहीं करना चाहिए।"
वह उस किताब को वैसे ही बंद करके रखने वाली थी।
लेकिन...
जैसे ही उसके हाथों ने उस किताब को छुआ, ऐसा लगा जैसे कोई अजीब सी बिजली दौड़ गई हो। उसकी अंतरात्मा (Gut feeling) धीरे से कह रही थी: "नहीं! इसे पढ़ो! खोलो उस किताब को!"
उसके अंदर एक भयंकर युद्ध चल रहा था। एक तरफ सालों से माना जाने वाला तर्क और विज्ञान था। दूसरी तरफ जिंदगी में पहली बार अनुभव हो रहा यह अलौकिक विश्वास।
उसने किताब की तरफ देखा। फिर घड़ी की तरफ देखा।
"छी! यह मुझे क्या हो रहा है?" वह झल्ला उठी। फिर भी, उस जिज्ञासा ने उसे चुप नहीं बैठने दिया। "ठीक है, सिर्फ एक बार... अगर मैंने जो देखा वह सच हुआ तो? बाद में पछताने से अच्छा है कि मैं इसे अभी पढ़ लूं।"
उसने कांपते हाथों से फिर से वे पन्ने खोले।
सुबह 4:30 बजे तक, उसने बाकी सब कुछ किनारे रखकर, उस आवाज द्वारा सुझाए गए उन तीन विषयों (Marchiafava-Bignami, PML, Abducens nerve) को पूरी तरह से, एक भी अक्षर छोड़े बिना पढ़ डाला।
उसका तर्क हार गया था, डर जीत गया था। या शायद... विश्वास जन्म ले रहा था।
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सुबह के 7:00 बजे।
बैंगलोर की सुबह की हल्की धूप कॉलेज कैंपस पर पड़ रही थी। लेकिन श्राव्या के लिए वह रोशनी भी आंखों को चुभने वाली थी। उसकी आंखें अंगारे जैसी लाल थीं। सिर्फ तीन घंटे की नींद और रात भर चले आंतरिक युद्ध ने उसे शारीरिक और मानसिक रूप से निचोड़ कर रख दिया था।
हॉस्टल से परीक्षा हॉल की ओर जाते समय उसके कदम भारी हो रहे थे।
रास्ते में उसके सहपाठी झुंड में चलते हुए, अंतिम क्षणों की चर्चा में मग्न थे।
"अरे, 'स्ट्रोक' (Stroke) के बारे में पढ़ा है? वह पक्का आएगा," एक ने कहा तो दूसरे ने बहस करते हुए कहा, "नहीं यार, इस बार 'मिर्गी' (Epilepsy) पर लॉन्ग क्वेश्चन की गारंटी है।"
श्राव्या बिल्कुल चुप थी। उसके मुंह में कोई शब्द नहीं था।
उसकी सहेली स्नेहा ने पास आकर पूछा, "क्या हुआ श्राव्या, इतनी डल क्यों लग रही हो? रात भर पढ़ी हो क्या? सब कुछ कवर हो गया?"
श्राव्या ने बस सिर हिला दिया। "हम्म..." बस यही उसका जवाब था। रात को पढ़े गए उन अजीब विषयों के बारे में किसी को बताने की हिम्मत उसमें नहीं थी। अगर वह बताती तो लोग हंसते, यह डर एक तरफ था, और अगर यह सब झूठ निकला तो जो शर्मिंदगी होगी वह दूसरी तरफ।
परीक्षा हॉल की सीढ़ियां चढ़ते समय उसके दिमाग में बस एक ही विचार घूम रहा था:
"अगर... सिर्फ अगर... उस आवाज द्वारा बताए गए विषय प्रश्नपत्र में आ गए तो? तब क्या होगा?"
उसने आसमान की ओर देखा।
वह परीक्षा कक्ष का दरवाजा पार करके अपने निर्धारित डेस्क पर बैठ गई। दिल की धड़कन फिर तेज हो गई।
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परीक्षा हॉल में बड़ी घड़ी की टिक-टिक के अलावा इतना सन्नाटा था कि सुई गिरे तो उसकी भी आवाज आ जाए।
"ट्रिंग..."
जब घंटी बजी तो श्राव्या चौंक पड़ी। इनविजिलेटर (निरीक्षक) लाइन से आए और सबके डेस्क पर प्रश्नपत्र उल्टे (face down) रखकर चले गए। उसके सामने सफेद पन्नों का ढेर था।
श्राव्या के हाथ ठंडे पड़ चुके थे। उसने आंखें बंद कीं और एक लंबी सांस ली।
"यह सिर्फ एक परीक्षा है... शांत रहो," उसने खुद को समझाया। लेकिन यह बात उसे खुद ही विश्वास नहीं दिला पा रही थी।
"अब आप पेपर देख सकते हैं," निरीक्षक ने संकेत दिया।
पूरे हॉल में कागज पलटने की "सर्र..." आवाज गूंज उठी। श्राव्या ने भी कांपती उंगलियों से प्रश्नपत्र पलटा।
उसकी आंखों ने पहला प्रश्न पढ़ा। वह एक सामान्य प्रश्न था। उसे थोड़ी राहत मिली।
लेकिन, जैसे ही उसकी नजर नीचे गई...
अचानक उसकी सांसें थम गईं। ऐसा लगा जैसे पूरी दुनिया एक पल के लिए रुक गई हो!
उसकी आंखें उस कागज पर छपे अक्षरों को फटी की फटी रह गईं। उसके मुंह से शब्द ही नहीं निकले:
प्रश्न संख्या 2: एब्ड्यूसेन्स नर्व पाल्सी - 'फॉल्स लोकलाइजिंग साइन' को समझाइए।
प्रश्न संख्या 3: मार्चियाफावा-बिग्नामी बीमारी के लक्षण क्या हैं?
प्रश्न संख्या 6: पी.एम.एल (PML) पर संक्षिप्त नोट लिखिए।
"हे भगवान...!"
श्राव्या के मुंह से अचानक चीख निकल गई। बगल वालों ने मुड़कर देखा, लेकिन उसे इसकी कोई परवाह नहीं थी।
रात को देखा गया वह दृश्य, वे फुसफुसाहटें, वह सुबह-सुबह की पढ़ाई... सब कुछ अक्षरशः सच हो गया था! वे तीनों विषय उसके सामने, प्रश्नपत्र के रूप में मौजूद थे।
यह कोई इत्तेफाक नहीं हो सकता। गणित के हिसाब से यह असंभव है!
उसके रोंगटे खड़े हो गए। इतने सालों का उसका वैज्ञानिक तर्क, उसका अविश्वास—सब कुछ अब सवालों के घेरे में आ गया था..!??!
श्राव्या ने धीरे से सिर उठाया और परीक्षा हॉल की छत के शून्यता में अपनी नजरें गड़ा दीं...
उसके अंतर्मन की गहराइयों से, वही पहचानी हुई आवाज फिर गूंजी। लेकिन इस बार वह कानों में नहीं थी, ऐसा लगा जैसे उसकी आत्मा की गहराई से आ रही हो।
"क्या अब भी विश्वास करोगी...?"
एक अजीब सी मुस्कान के साथ, उसने कांपते हाथों से अपनी कलम उठाई।
वह उत्तर लिखने के लिए तैयार थी। लेकिन वह जानती थी - यह सिर्फ एक परीक्षा नहीं थी, यह एक नई और रहस्यमयी यात्रा की शुरुआत थी।