ज़ोया और अज़ीम के बीच का वह बेनाम रिश्ता अब शहर की हवाओं में महसूस होने लगा था। वे अब अक्सर उन जगहों पर मिलते थे जहाँ कोई उन्हें पहचान न सके—कभी किसी पुराने मंदिर की सीढ़ियों पर, तो कभी शहर के आखिरी छोर पर बसे एक छोटे से पार्क में।
एक कच्चा अहसास:
एक शाम, अज़ीम ने ज़ोया को अपनी माँ की पुरानी डायरी से एक सूखा हुआ 'हरसिंगार' का फूल दिखाया।
"साहिबा, ये फूल खिलते तो रात में हैं, पर अपनी खुशबू पूरे दिन के लिए छोड़ जाते हैं। हमारी दोस्ती भी वैसी ही है... शायद हम हमेशा साथ न रहें, पर ये पल मेरे साथ रहेंगे।"
ज़ोया ने अज़ीम की आँखों में झाँका। वहाँ कोई लालच नहीं था, बस एक साफ़ समंदर जैसा लगाव था। "अज़ीम, तुम हमेशा 'दूर जाने' की बात क्यों करते हो? क्या तुम्हें मुझ पर भरोसा नहीं?"
अज़ीम मुस्कुराया, पर उस मुस्कान में एक अजब सी उदासी थी। "भरोसा आप पर है साहिबा, तकदीर पर नहीं। दरिया किनारे रहने वालों को बाढ़ का डर हमेशा रहता है।"
महल में तूफान:
उधर ज़ोया के घर, मिस्टर खन्ना का सब्र जवाब दे चुका था। उन्हें अपनी बेटी का एक मामूली 'अज़ीम' के साथ घूमना अपने रुतबे पर चोट लग रहा था। उन्होंने तय कर लिया था कि वे इस किस्से को आज ही खत्म कर देंगे।
रात के खाने पर मेज़ पर सन्नाटा था। ज़ोया ने जैसे ही अपना हाथ खाने की तरफ बढ़ाया, मिस्टर खन्ना की आवाज़ गूँजी।
"मैंने सुना है कि आजकल तुम ऑफिस की फाइल्स से ज़्यादा उस दरिया किनारे के पत्थरों में दिलचस्पी ले रही हो?"
ज़ोया का हाथ ठिठक गया। "डैड, मेरा काम पर पूरा ध्यान है।"
"झूठ मत बोलो ज़ोया!" मिस्टर खन्ना ने मेज़ पर हाथ पटका। "मेरे जासूसों ने तुम्हारी और उस लड़के की तस्वीरें मुझे दी हैं। एक मामूली दुकानदार के साथ साइकिल पर घूमते हुए तुम्हें शर्म नहीं आई? लोग हँस रहे हैं मुझ पर!"
"वो मेरा दोस्त है डैड, और वो इंसान बहुत अच्छा है..." ज़ोया की आवाज़ कांप रही थी।
"इंसानियत से तिजोरियाँ नहीं भरतीं!" मिस्टर खन्ना चिल्लाए। "वो एक मौकापरस्त लड़का है। उसे पता है कि तुम किसकी बेटी हो। वो तुम्हारी मासूमियत का फायदा उठाकर अपनी सात पुश्तों का इंतज़ाम कर रहा है। कल सुबह से तुम कहीं बाहर नहीं जाओगी।"
अज़ीम की अग्निपरीक्षा (सस्पेंस):
अगली दोपहर, जब ज़ोया घर में नज़रबंद (Locked up) थी, अज़ीम की दुकान के सामने एक काली लग्जरी गाड़ी रुकी। मिस्टर खन्ना का बॉडीगार्ड बाहर निकला और उसने एक सफेद लिफाफा अज़ीम के सामने फेंक दिया।
"इसमें 50 लाख का चेक है। शहर छोड़ो और कहीं दूर चले जाओ। ज़ोया साहिबा के लिए तुम बस एक 'वक्त गुज़ारी' हो, और हमारे साहब के लिए तुम एक मामूली काँटा। फैसला तुम्हारा है—ये पैसे या अपनी सलामती?"
अज़ीम ने उस लिफाफे को हाथ तक नहीं लगाया। उसने शांत नज़रों से उस आदमी को देखा। "साहब से कहियेगा, कि जिस चीज़ को वो 'कीमत' समझ रहे हैं, वो मेरे लिए सिर्फ कागज़ का एक टुकड़ा है। और जहाँ तक ज़ोया साहिबा की बात है... उनसे मेरा रिश्ता 'सौदे' का नहीं, 'लगाव' का है।"
जैसे ही वह आदमी गुस्से में वहाँ से गया, अज़ीम ने देखा कि दुकान के पीछे कुछ लोग बुलडोजर लेकर खड़े थे। उसे समझ आ गया कि ज़ोया के पिता उसे सिर्फ पैसों से नहीं, बल्कि उसकी पहचान मिटाकर डराना चाहते हैं।