The Secret of the Red Stone - Part 5 in Hindi Fiction Stories by Anil singh books and stories PDF | लाल पत्थर का राज - भाग 5

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लाल पत्थर का राज - भाग 5

"विराज... ओ विराज!"
आवाज़ किसी दूर बज रहे पुराने रेडियो जैसी लग रही थी। विराज के कानों में एक अजीब सी भिनभिनाहट थी।
"अरे ओ कुंभकर्ण! आज तेरा ही जन्मदिन है और तू ही ऐसे बेसुध पड़ा है जैसे सदियों की नींद निकाल रहा हो।" माँ ने अपने पसीने से भीगे माथे को साड़ी के पल्लू से पोंछते हुए उसकी रज़ाई झटके से खींच ली। उनके चेहरे पर त्योहारी थकान और बेटे के लिए फिक्र दोनों एक साथ तैर रहे थे। 
विराज ने करवट ली। उसका शरीर ऐसा भारी हो रहा था जैसे किसी ने उसकी नसों में खून की जगह पिघला हुआ सीसा भर दिया हो। पलकें गोंद की तरह चिपकी हुई थीं। उसने बहुत जोर लगाकर अपनी आँखें खोलीं। कमरे की पुरानी ट्यूबलाइट अब बंद थी और खिड़की से बाहर रात में एलईडी बल्ब की रोशनी अंदर रेंग रही थी।
"उठ जल्दी! नीचे मेहमान आना शुरू हो गए हैं और तू यहाँ पड़ा है। जा मुँह धो कर आ," माँ बड़बड़ाती हुई कमरे से बाहर निकल गईं। उनके पैरों की आहट सीढ़ियों पर धीमी होती गई।
विराज बिस्तर पर उठकर बैठ गया। उसने अपने भारी सिर को दोनों हथेलियों के बीच कसकर दबाया। उसका दिमाग बिल्कुल सुन्न था। उसे कुछ याद नहीं था। न वह बर्फीली हवा का झोंका, न वो अलौकिक कन्या, न वो नीली रोशनी, और न ही उसके सीने पर रखा गया वह ऊर्जा का पुंज। उसके ज़ेहन में यादों का पर्दा बस वहीं तक था कि वह काव्या के साथ स्कूटी से घर आया था, सीने में एक अजीब सा दर्द उठा था, और वह कमरे का दरवाज़ा बंद करके बिस्तर पर गिर पड़ा था। तभी उसका हाथ अनजाने में अपनी छाती की तरफ गया।
उसने हड़बड़ा कर अपनी शर्ट के टूटे हुए बटनों के बीच से झाँका। वह लाल, उभरा हुआ निशान, जिसके आस-पास नीली नसें किसी ज़हर की तरह फैल रही थीं... वह अब बिल्कुल सामान्य था। एक मामूली, सपाट काले तिल की तरह। सीने में उठने वाली वह सुलगती हुई आग और टीस भी पूरी तरह गायब थी।
"यह... यह दर्द अचानक ठीक कैसे हो गया?" उसने खुद से फुसफुसाते हुए पूछा। उसने तिल को उंगली से दबाकर देखा। कुछ नहीं हुआ। न दर्द, न बिजली का कोई झटका।
उसने एक गहरी, गर्म सांस छोड़ी जिससे उसके तन गए कंधे अचानक ढीले पड़ गए। शायद वह महज़ एक वहम था या बहुत ज्यादा थकान की वजह से नसों का खिंचाव। वह खुद को यही दिलासा देते हुए घिसटते कदमों से बाथरूम की तरफ बढ़ गया।
आईने के सामने खड़े होकर उसने नल खोल दिया। ठंडे पानी के छींटे अपने चेहरे पर मारे। पानी की बूंदें उसके माथे से टपक कर सिंक में 'टप-टप' गिर रही थीं। आईने में दिख रहा उसका चेहरा थोड़ा थका हुआ ज़रूर था, लेकिन आँखों के पीछे जो खौफ सुबह बरगद के पेड़ के नीचे था, वह अब शांत था। 
वह जल्दी से कपड़े बदलकर नीचे की तरफ चला।
सीढ़ियां उतरते ही देसी घी में सिकती पूरियों, छौंक की उस तीखी महक और इलायची वाली खीर की खुशबू ने एक साथ उस पर धावा बोल दिया। पूरा घर किसी मछली बाज़ार से कम नहीं लग रहा था।
बैठक के सोफे दीवार से सटा दिए गए थे। फर्श पर बिछी दरी पर मोहल्ले के छोटे बच्चे गुब्बारे फोड़ने की प्रतियोगिता में लगे थे।
चाचा जी एक पुरानी डगमगाती कुर्सी के ऊपर प्लास्टिक का स्टूल रखकर, देसी जुगाड़ से बिजली की रंग-बिरंगी झालर टांगने में जूझ रहे थे। "अरे चिंटू के पापा, ज़रा तार वहां से मोड़ देना, टेप मैं लगा देता हूँ," वे मुँह में लोहे की दो कीलें दबाकर बोल रहे थे। 
विराज चुपचाप नीचे उतरा। उसने बिना किसी से नज़रें मिलाए, एक मशीन की तरह बुआ और फूफा जी के पैर छुए। 
"जीते रहो शेर!" फूफा जी ने अपना भारी हाथ उसकी पीठ पर मारा और एक 500 रुपये का कड़क नोट निकाल कर उसकी शर्ट की ऊपरी जेब में जबरदस्ती ठूंस दिया। "अब जल्दी से कोई नौकरी-वौकरी पकड़ो, फिर तुम्हारी बारात में नागिन डांस भी तो करना है हमें।" 
आस-पास खड़े रिश्तेदारों में एक जोरदार ठहाका गूंज गया। विराज ने बस एक फीकी सी, होंठों तक सिमटी हुई मुस्कान दे दी। उसकी यह मुस्कान आँखों तक नहीं पहुँची थी। वह भीड़ में होकर भी खुद को एक पारदर्शी बुलबुले के अंदर बंद महसूस कर रहा था। 
"यहाँ दाँत मत दिखाओ, जाकर कोल्ड-ड्रिंक की बोतलें निकालो फ्रिज से!"
एक जानी-पहचानी, हुक्म चलाने वाली आवाज़ ने उसे पीछे मुड़ने पर मजबूर कर दिया।
सामने काव्या खड़ी थी। उसने काले रंग का एक खूबसूरत सूट पहना हुआ था, लेकिन बालों का जूड़ा अभी भी उसी लापरवाही से बंधा था जैसे वह कॉलेज में बांधती थी। उसके हाथों में स्नैक्स से भरी दो प्लेटें थीं। वह ऐसे बर्ताव कर रही थी जैसे यह विराज का नहीं, बल्कि उसी का घर हो।
विराज को देखते ही उसके कदमों की रफ़्तार थोड़ी धीमी हो गई।
काव्या ने प्लेटें पास रखी मेज पर रख दीं। वह विराज के करीब आई। उसकी गहरी काली आँखें विराज के चेहरे को ऐसे खंगाल रही थीं जैसे कोई खोई हुई चीज़ ढूंढ रही हों। दोनों के बीच उस शोरगुल वाले कमरे में भी अचानक एक अजीब सा, भारी सन्नाटा पसर गया। 
"अब... अब तबीयत कैसी है तुम्हारी?" काव्या ने बहुत धीमी आवाज़ में पूछा। उस आवाज़ में हमेशा वाली 'चंडी' गायब थी; उसकी जगह एक छुपी हुई घबराहट थी। उसने अनजाने में ही अपनी बाहें अपने सीने पर बांध लीं, जैसे खुद को किसी अनजाने डर से बचा रही हो।
विराज ने हल्की सी गर्दन हिलाई। "मैं ठीक हूँ। बस नींद आ गई थी भारी वाली। पता नहीं कैसे..."
काव्या ने एक लंबी सांस ली। "शुक्र है। दोपहर को तुम्हारी हालत देखकर तो मेरी जान ही निकल गई थी। मुझे लगा तुम्हारे घर वालों को क्या जवाब दूँगी।"
काव्या ने झूठ बोला था। उसे डर घर वालों का नहीं था, बल्कि डर उस पल का था जब बरगद के पेड़ के नीचे उसने विराज के हाथ छुए थे और उसे वह खौफनाक सपना याद आ गया था। पर यह बात उसने अपने होंठों के पीछे ही दबा ली। 
"अरे विराज! चल जल्दी आ, केक कटने का टाइम हो गया है!" एक दोस्त ने आवाज़ लगाई।
माहौल फिर से शोरगुल में बदल गया। कमरे के बीचों-बीच रखे गोल मेज़ पर एक बड़ा सा चॉकलेट केक रखा था। सब लोग उसके आस-पास इकट्ठा होने लगे। बच्चों ने 'हैप्पी बर्थडे' गाने के लिए अपनी सांसें रोक लीं।
विराज ने मेज़ के पास जाकर प्लास्टिक का चाकू उठाया।
तभी... मुख्य दरवाज़े की घंटी बजी। डिंग-डोंग!
"मैं देखती हूँ, शायद शर्मा जी होंगे," माँ ने अपने हाथों से आटा झाड़ते हुए दरवाज़े की तरफ कदम बढ़ाए।
विराज का चाकू केक के ऊपर ही रुक गया। उसे अचानक एक अजीब सी बेचैनी हुई। उसके कानों में अचानक दोपहर वाली वह 'खट-खट' की भारी आवाज़ गूंज गई, जिसे वह भूल चुका था। 
माँ ने दरवाज़ा खोला। बाहर कोई शर्मा जी नहीं थे। कोई भी नहीं था। बस गली का एक कुत्ता दूर खड़ा भौंक रहा था।
"अजीब लोग हैं, घंटी बजाकर भाग गए," माँ बड़बड़ाईं। लेकिन तभी उनकी नज़र दरवाज़े की चौखट पर रखी एक चीज़ पर पड़ी।
"विराज! यह देख, शायद तेरा कोई दोस्त यह छोड़ गया है।"
माँ ने एक छोटा सा, पुराने डिज़ाइन वाला लकड़ी का बक्सा लाकर मेज़ के किनारे रख दिया। बक्से पर कोई नाम नहीं था। न कोई रैपर था। वह लकड़ी इतनी पुरानी और काली लग रही थी जैसे उसे ज़मीन के नीचे से खोद कर निकाला गया हो।
सबका ध्यान उस अजीब से बक्से पर चला गया। "खोल कर देख भाई, किसी ने बम तो नहीं भेज दिया," एक दोस्त ने मज़ाक किया, लेकिन कोई हंसा नहीं।
विराज ने चाकू नीचे रखा। जैसे ही उसने उस बक्से की तरफ अपना हाथ बढ़ाया, उसके सीने का वह साधारण सा दिखने वाला तिल एक सेकंड के लिए किसी गर्म सुई की तरह चुभा। उसने मुट्ठी कस ली। 
उसने कांपते हाथों से उस लकड़ी के बक्से का छोटा सा पीतल का कुंडा खोला और ढक्कन पीछे की तरफ सरका दिया।
ढक्कन खुलते ही... आस-पास खड़े लोगों को कुछ समझ नहीं आया। लेकिन विराज के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। बक्से के अंदर कोई तोहफा नहीं था। अंदर पुराने बरगद के पेड़ की एक सूखी, काली पड़ चुकी छाल रखी थी। और उस छाल के ठीक ऊपर... एक बिल्कुल ताज़ा, दूध जैसा सफ़ेद चमेली का फूल रखा था।
उसी पल, ताज़े चमेली और घिसे हुए चंदन की एक बेहद तीखी, दमघोंटू महक ने एक झटके में कमरे की पूरी हवा को निगल लिया। यह महक इतनी हावी थी कि घी और खीर की खुशबू कहीं पीछे छूट गई।