समय की पगडंडी और इंसान का अनुभव दोनों में अद्भुत ताल होता है। जीवन में कभी-कभी बहुत अच्छा होना हमें कमजोर या टूटे हुए महसूस करा सकता है। यह भ्रम पैदा कर सकता है कि हम अपने स्वभाव में बदलाव करें। लेकिन वास्तविकता यह है कि कठिनाई या चोट हमें बदलने के लिए नहीं, बल्कि हमारे भीतर की कमजोरी को शक्ति में बदलने के लिए आती है। यही शक्ति हमारे साहस और आगे बढ़ने के मार्ग को प्रशस्त करती है।
एक घटना मेरे दिल के किसी कोने में दफ़न थी। यह घटना लंबे समय तक अपनी आज़ादी की प्रतीक्षा कर रही थी। यह घटना हुई एक साहित्यिक यात्रा के दौरान, जब मेरी मुलाकात एक अजनबी से हुई। पहली बार मिलते ही कुछ सामान्य बातें हुईं, लेकिन धीरे-धीरे वह रिश्ता दोस्ती की कसौटी पर परखा जाने लगा। यह अनुभव ऐसा था जैसे अंधेरी रात में पूर्णिमा की हल्की छाया धीरे-धीरे स्पंदित हो रही हो। कुछ ही दिनों में वह संबंध इतना सहज और प्राकृतिक लगने लगा कि जैसे यह समय से पहले ही निर्धारित हो।
आदर और सम्मान की कसौटी पर जो रिश्ता प्रगाढ़ होना था, वह शायद मेरे खुलेपन और सरल स्वभाव की वजह से गुमनाम ही रहा। मुझे इसका अनुमान कभी नहीं था। यह घटना अचानक हुई, जैसे किसी कुसुम को खिलने से पहले ही किसी के कदमों के नीचे गिरना पड़ जाए।
इस दौरान मुझे स्वयं को समझाना कठिन हुआ। अंततः मैंने महसूस किया—कौन सा गुनाह था जिसकी सजा मुझे मिली? मैंने बहुत प्रयास किया, अपनों से अपनी भावनाएँ साझा कीं, लेकिन कोई समाधान नहीं मिला। जैसे दीपक के नीचे अंधेरा होता है, मैं भी अंधकार में था। जलती हुई बाती की तरह मैं जल रहा था, लेकिन प्रकाश की कोई किरण नहीं दिखी।
उलझन, बेबसी और लाचारी के साथ मैं सोचता रहा—कहाँ जीऊँगा और स्वभाव में बदलाव करके आखिर क्या करूँगा? जीवन की राह पर ठोकर लगने से घायल परिंदा भी मृत्यु नहीं मांगता। यही सोच मुझे अपने स्वभाव और ईमानदारी के मार्ग पर टिकाए रखी।
फिर मैंने निर्णय लिया—अपने स्वभाव में रहकर ही अपने ज़ख्मों और अनुभवों को स्वीकार करना और उनसे सीखना। यदि मेरी ईमानदारी, सत्यता और स्वतंत्र स्वभाव किसी को नापसंद हो, तो क्या मैं अपने स्वभाव को बदल दूँगा? बिल्कुल नहीं। जीवन में फूल मिले या कांटे, अपने मूल स्वभाव में परिवर्तन करना आत्महत्या के समान है।
जैसे जल की प्रकृति शीतलता है और अग्नि की प्रकृति ताप, यदि वह अपने स्वभाव को बदल दे तो क्या होगा?
यही चिंतन करते हुए मैंने अपने स्वभाव को प्राथमिकता दी। अपने अनुभवों से सीख लेकर, जीवन की राह में उसी ऊर्जा और संकल्प के साथ आगे बढ़ा। यह मार्ग आसान नहीं था, लेकिन ईमानदारी, साहस और स्वाभाविकता की शक्ति से मैं हर कठिनाई का सामना कर सका।
इस अनुभव ने मुझे यह सिखाया कि जीवन में स्थायी सफलता और संतोष केवल अपने मूल स्वभाव और सत्यनिष्ठा को बनाए रखकर ही संभव है। चाहे राह में फूल हों या कांटे, अपने स्वभाव को अपनाना और उस पर टिके रहना ही जीवन की सच्ची जीत है।
जीवन के सफ़र में
आपके आसपास सब कुछ विशेष है,
किन्तु आप उनसे भी अधिक विशेष हैं।
इस सत्य का बोध ही
आपके भीतर ऊर्जा का संचार करता है।
जब आप स्वयं के मूल्य को पहचान लेते हैं,
तभी आप अपने व्यक्तित्व को निखारने
और अपने आसपास की दुनिया को
और भी सुंदर, सार्थक व बेहतर बनाने में
समर्पित हो जाते हैं।
— अनंत धीश अमन