Bhakt Prahlaad - 3 in Hindi Spiritual Stories by Siya Kashyap books and stories PDF | भक्त प्रह्लाद - 3

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भक्त प्रह्लाद - 3

प्रतिशोध की ज्वाला

हिरण्याक्ष से राजपाट की बागडोर मिलने के पश्चात् हिरण्यकशिपु अत्यंत अहंकारी और अत्याचारी हो गया था। वह विलासितापूर्ण जीवन व्यतीत करने लगा था। जब उसे पता चलता कि अमुक स्थान पर लोग देवताओं की पूजा-अर्चना करते हैं तो वह उन्हें अपने सैनिकों को मृत्युदंड देने की आज्ञा दे देता। इस प्रकार उसकी अत्याचारी नीतियाँ जोर पकड़ने लगी थीं। उसने अनेक गाँवों को वीरान बना दिया था।

हिरण्यकशिपु के राज्य में शैवमत के लोगों को हर प्रकार की स्वतंत्रता प्राप्त थी। जहाँ वैष्णवों का पतन हो चला था, वहीं शैवों का उत्थान अपनी चरम सीमा पर पहुँच रहा था। हिरण्यकशिपु ने राज्य भर में अपने गुप्तचरों का जाल बिछाया हुआ था, जिससे उसे क्षण-क्षण के समाचार मिलते रहते थे। जब उसे यह पता चलता कि हमारे राज्य में वैष्णव दर-दर भटक रहे हैं तो उसे बड़ी प्रसन्नता होती।

हिरण्यकशिपु ने लोगों का यज्ञ करना भी बंद करा दिया था, परिणाम यह हुआ कि देवताओं की शक्ति क्षीण होने लगी। देवता इतने निर्बल हो गए थे कि अपने आपको बचाने के लिए उन्होंने स्वयं को स्वर्गलोक के निर्जन प्रदेशों में छिपा लिया था, जहाँ असुरों की पहुँच नहीं थी।

अब हिरण्यकशिपु को कोई भय नहीं रहा था और वह निष्कंटक होकर राज करने में मग्न था, क्योंकि उसके शत्रु देवता स्वयं उसके भय से छिपे छिपे फिर रहे थे, तो ऐसे में भय किसका ? उसे पूर्ण विश्वास हो चला था कि देवता उसकी शक्ति से भयभीत हो गए हैं और इतने निर्बल भी कि वे उसका सामना नहीं कर सकते। अतः अपने शत्रुओं को अनदेखा कर वह मदिरा के नशे में धुत्त होकर विलासितापूर्ण जीवन व्यतीत करने लगा था। प्रतिदिन राजसभा के बजाय राससभा का आयोजन होने लगा था। रात-रात भर तक नृत्य-गान चलता रहता। उसे अपने राजपाट की कोई सुध न रही थी। वह जो भी आदेश देता, उसे तुरंत संपन्न किया जाता। किसी में उसके तर्क देने की या 'न' कहने की हिम्मत नहीं थी। किसी की इच्छा नृत्य करने की या गाने की हो या न हो, किंतु यदि उसकी इच्छा होती तो वह कार्य तुरंत किया जाता। सभी उसके क्रोध से भली-भाँति परिचित थे।

एक दिन राजदरबार सजा हुआ था। सभी दरबारी उपस्थित थे कि नशे में धुत्त हिरण्यकशिपु ने डगमगाते कदमों से दरबार में प्रवेश किया। उसे देखते ही सभी दरबारी अपने-अपने आसनों से उठ खड़े हुए। जब वह अपने ऊँचे सिंहासन पर जा बैठा, तभी दरबारी अपने-अपने आसन पर बैठे। इससे पहले कि दरबार की कोई कारवाई आरंभ होती, तभी एक दूत ने दरबार में प्रवेश किया। वह हिरण्यकशिपु को अभिवादन कर एक ओर खड़ा हो गया। जब हिरण्यकशिपु ने उसे बोलने की आज्ञा दी तो लाख चेष्टा के बाद भी वह बोल न सका। इससे हिरण्यकशिपु क्रोधित हो उठा और उसके नेत्र रक्तवर्णी हो उठे। उसने एक बार फिर क्रोधित स्वर में दूत को बोलने की आज्ञा दी। इस बार दूत समझ गया कि यदि वह न बोला तो अवश्य ही उसे अपने प्राण गँवाने पड़ेंगे। अतः वह साहस जुटाते हुए बोला, “महाराज! आपके बड़े भाई हिरण्याक्ष अब इस संसार में जीवित नहीं रहे।” दूत ने अभी इतना ही कहा था कि कड़कते स्वर में हिरण्यकशिपु बोल उठा, “तुम्हें ज्ञात भी है, तुम क्या कह रहे हो ?”

दूत मस्तक झुकाए खड़ा रहा।

हिरण्यकशिपु ने गरजते हुए पुनः पूछा, “यह किस प्रकार संभव हुआ ?”

इसके बाद दूत ने बताया कि पाताल में हिरण्याक्ष का वराह रूपी विष्णु से लोमहर्षक युद्ध हुआ, जिसमें वे मृत्यु को प्राप्त हुए। अपने बड़े भाई की मृत्यु की सूचना पाकर हिरण्यकशिपु स्तंभित सा रह गया। वह यह विश्वास ही नहीं कर पा रहा था कि अत्यंत शक्तिशाली होने के बाद भी उसका भाई मृत्यु को कैसे प्राप्त हुआ। उसे ही क्या, अन्य असुर वीरों को भी इस सूचना पर विश्वास नहीं हो रहा था। अतः अपना संदेह दूर करने के लिए उसने अपने एक वरिष्ठ मंत्री से पूछा कि “यह सूचना सही है या गलत ?” इस पर वह मंत्री बोला, “असुरराज! मेरा तो यह विचार है कि यदि हिरण्याक्ष जीवित होते तो अब तक वापस लौट आते, क्योंकि उन्हें महल से गए हुए लंबा समय बीत चुका है।”

अन्य मंत्रियों ने भी उस मंत्री के कथन के प्रति अपनी सहमति जताई। जब हिरण्यकश्यपु को दूत के कथन की पुष्टि हो गई तो वह दुःखी मन से तुरंत सभा समाप्त कर अंतःपुर की ओर चल दिया। धीरे-धीरे उसका यह शोक भयंकर क्रोध में परिवर्तित हो गया। उसे रह-रहकर विष्णु का स्मरण हो आता। वह अपने भाई की मृत्यु का प्रतिशोध लेने के लिए आतुर हो उठा। अब रास रंग से उसका मन उचट गया था। नाचने-गाने वालों का कोई आता-पता नहीं था। महल में केवल शोक के बादल छाए हुए थे।

हिरण्यकशिपु रात-दिन इसी विचार में डूबा रहने लगा कि जिस विष्णु ने उससे उसका भाई छीन लिया, वह उसे जीवित नहीं छोड़ेगा। उसने तरह-तरह से विष्णु का सामना करने के लिए तैयारियाँ आरंभ कर दी। उसने अनुमान लगा लिया था कि जिसने अथाह सामर्थ्य-शक्ति रखने वाले उसके भाई हिरण्याक्ष को मार डाला तो उसमें वास्तव में ही बहुत बल होगा। अतः वह इसी बात को ध्यान में रखते हुए अपने शक्तिवर्धन में जुट गया।

एक दिन हिरण्यकशिपु को पता चला कि विष्णु तो अमर हैं। उन्हें मारना असंभव है। यह बात जानकर उसका सारा उत्साह व जोश ठंडा पड़ गया। उसे ऐसा प्रतीत हुआ, जैसे उसकी समस्त आशाओं पर तुषारपात हो गया हो। उसने विचार किया कि जो मरता ही नहीं, तो उसे मारने के लिए उद्यत होने का क्या लाभ? फिर अगले ही क्षण उसकी आँखें चमक उठीं। उसके मन में यह विचार कौंधा कि मर नहीं सकता तो क्या हुआ, उसे बुरी तरह परास्त तो किया जा सकता है, घायल तो किया ही जा सकता है और फिर जब विष्णु अमर हैं तो वह स्वयं अमर क्यों नहीं हो सकता? अतः उसने मन बनाया कि वह अमरत्व प्राप्त करने के लिए तपस्या करेगा। उसके मंत्रियों ने भी उसे परामर्श दिया कि अमरत्व के पश्चात् ही वह विष्णु से युद्ध करे।

इस प्रकार राज्य-भार मंत्रियों को सौंपने के पश्चात् वह अमरत्व प्राप्त करने की आकांक्षा लिये तपस्या करने हेतु वनों की ओर चल पड़ा। उसने अपनी तपस्या के लिए मंदार पर्वत को चुना। वह मंदार पर्वत पर घोर तपस्या में निमग्न हो गया। ‘ॐ ब्रह्म देवाय नमः’ के हिरण्यकशिपु के उच्चारण से संपूर्ण पर्वतीय क्षेत्र ब्रह्ममय हो गया था। न जाने कितनी वर्षा ऋतु बीत गई और न जाने कितनी कड़ी धूप के दिन ऐसे ही निकल गए, उसे कुछ भी न ज्ञात था। न तो सूर्य की कड़ी धूप ही उसे भयभीत कर सकी और न ही सर्दी की बर्फीली ठंड उसे उसके उद्देश्य से विचलित कर सकी। वह हर मौसम में जस का तस अपने इष्टदेव की आराधना में तन्मयता से लीन रहा। हिरण्यकशिपु इतनी कठोर तपस्या कर रहा था कि तपस्या के ताप से उसके शरीर से ज्वाला की लपटें निकलने लगी थीं। इन लपटों ने इतना भीषण रूप धारण कर लिया कि इनका प्रभाव पूरे ब्रह्माड पर पड़ता दिखाई दिया। सरोवर, नदियाँ और समुद्र, सभी इस भीषण ताप से प्रभावित होने के कारण खौलते प्रतीत होने लगे। यही नहीं, पृथ्वी भी तप की अधिकता के कारण कंपन करने लगी। इससे सभी प्राणी भयभीत हो उठे।

दूसरी ओर हिरण्याक्ष की मृत्यु से देवता प्रसन्न थे। उनमें फिर से स्फूर्ति का संचार हो उठा था। देवताओं ने विचार किया, हिरण्याक्ष को तो भगवान् विष्णु ने मार ही डाला और रही बात हिरण्यकशिपु की, तो अब उसे हम मार डालेंगे। यह विचार कर देवता प्रसन्न हो उठे थे। वे सभी देवता, जो अपनी जान बचाने के लिए तितर-बितर हो गए थे, अब एकत्र होने लगे थे।

देवराज इंद्र ने अपनी सेना को संगठित कर उसे प्रोत्साहित करते हुए कहा, “हे देववीरो! इस बार ऐसा युद्ध करना है कि भविष्य में असुर देवताओं पर आक्रमण करने का विचार न कर सकें और उन्हें उनके कुकृत्यों का भली प्रकार दंड मिल सके। यह तो हम सभी भली-भाँति जानते हैं कि इन असुरों ने अनेक साधु-संतों और भक्तजनों के प्राणहरण किए तथा अनेक सत्पुरुषों को अपना धर्म भ्रष्ट करने के लिए विवश किया। उन्हें भिन्न-भिन्न प्रकार से प्रताड़ित किया और उन पर अमानवीय अत्याचार किए। पृथ्वी भी उनके अत्याचारों के भार से त्रस्त है। हम सभी के लिए यह बड़ी प्रसन्नता की बात है कि भगवान् विष्णु ने हिरण्याक्ष का अंत कर दिया है और उसका छोटा भाई हिरण्यकशिपु शायद इस घटना से आहत होकर राजपाट छोड़कर तपस्या करने चला गया है। बस यही हमारे लिए सुनहरा अवसर है कि हम असुरों पर आक्रमण कर उनका सर्वनाश कर डालें। इसके बाद हिरण्यकशिपु को भी मौत के घाट उतार देंगे। हममें से किसी को भी भयभीत होने की कोई आवश्यकता नहीं, क्योंकि भगवान् विष्णु हमारे साथ हैं। हमें अब पूरी शक्ति से असुरों पर आक्रमण कर उनसे अपना प्रतिशोध लेना है।”

देवराज इंद्र के उत्साहवर्धक शब्दों को सुनकर देवसेना में जैसे प्राणों का नवसंचार हुआ। सभी ने एक स्वर में जयजयकार के नारे लगाते हुए कहा, “देवराज! हम इस बार अपने प्राणों तक की आहुति दे देंगे, किंतु हम असुरों को बचने का कोई अवसर नहीं देगे। उनका सर्वनाश ही हमारा उद्देश्य है।”

देवसेना के जयनाद से आकाश कंपित हो उठा। इंद्र ने अपनी सेना को कई भागों में विभक्त किया। प्रत्येक समूह के लिए एक वीर सेनानायक नियुक्त किया गया। किस तरह क्लांत सेना की सहायता की जाएगी, किस तरह उसे आवश्यक वस्तुएँ उपलब्ध कराई जाएँगी, किस तरह असुर सेना को घेरा जाएगा — इस तरह की रणनीतियाँ सेनापति कार्त्तिकेय ने पहले ही भली-भाँति तैयार कर ली थीं।

निर्धारित समय पर देवराज इंद्र ने असुरों पर आक्रमण कर दिया। देखते-ही-देखते असुरों को चारों ओर से घेर लिया गया। इससे असुरों के बीच खलबली मच गई। ऐसा नहीं था कि असुरों की कोई तैयारी न थी। उन्होंने भी पूरी तैयारी की हुई थी। वे यह भली-भाँति जानते थे कि उनके राजा तपस्या के लिए गए हुए हैं तो ऐसी स्थिति का लाभ उठाकर देवता उन पर कभी भी आक्रमण कर सकते हैं। असुरों में देवताओं को लेकर व्यंग्यात्मक टिप्पणियों का दौर आरंभ हो गया। कोई कहता कि ये देवता हैं बड़े कायर, जो छिपकर वार करते हैं तो कोई कहता कि यदि हमारे राजा यहाँ होते तो इनका क्या साहस था, जो हमारे साथ युद्ध करते।

देवताओं के अचानक किए गए आक्रमण के उपरांत असुर सजग हो गए, क्योंकि इसका पूर्वानुमान था। असुर सेनापति ने सभी असुर सैनिकों को अपने अस्त्र-शस्त्र धारण करने की आज्ञा दी। असुरों की आँखों में रक्त की प्यासी चमक किसी विकराल काल की भाँति स्पष्ट दिखाई दे रही थी। उनके हाथों में थमे विभिन्न प्रकार के शस्त्र यमदूत को आमंत्रित करने के लिए आतुर थे। उन्हें केवल अपने सेनापति के आदेश की प्रतीक्षा थी। सेनापति ने अपनी आसुरी सेना को उत्साहित करते हुए कहा, “मेरे वीर असुर योद्धाओ! आज हमारे साथ हमारे महाराज नहीं हैं और इसी बात का देवताओं ने लाभ उठाकर हम पर आक्रमण किया है। यह सत्य है कि यदि महाराज यहाँ होते तो देवता ऐसा करने का साहस कदापि न करते। अब जब उन्होंने यह साहस कर ही लिया है तो हमें उन्हें दंड अवश्य देना होगा, पुनः बल-शौर्य से परिचित कराना होगा।”

समवेत स्वर में आसुरी सेना चीख उठी–“हम अपने प्राणों को दाँव पर लगाकर भी अपने महाराज के नाम-यश की रक्षा करेंगे। हम युद्धभूमि में तब तक डटे रहेंगे, जब तक कि देवताओं को उनके दुस्साहस का दंड नहीं दे देंगे।”

इसके पश्चात् समस्त असुर योद्धा असुरराज हिरण्यकशिपु के नाम का जयघोष करते हुए देवताओं की ओर बढ़ने लगे। कुछ ही क्षणों में देवताओं और असुरों में भयंकर युद्ध छिड़ गया। लंबे समय तक सताए जाने के कारण देवताओं में प्रतिहिंसा की ज्वाला धधक रही थी तो दूसरी ओर असुरों का उत्साह इस बात से अधिक बढ़ा हुआ था कि वे पूर्व में देवताओं को कई बार पराजित कर चुके थे। दोनों पक्षों में लंबे समय तक भीषण युद्ध होता रहा।

इस बार असुरों ने देवताओं को निर्बल और दीन-हीन समझने की भारी भूल की थी, जिसका उन्हें भारी मूल्य चुकाना पड़ा। वे अपनी पूरी सेना के साथ देवताओं पर टूट पड़े थे। उन्होंने देवताओं की भाँति ऐसी कोई रणनीति नहीं बनाई थी कि अपनी क्लांत सेना को सहायता कैसे पहुँचाई जाए। इसका कारण यह था कि असुर समझते थे कि वे कुछ ही क्षणों में देव-सेना को परास्त कर देंगे। वे इस बात से अनभिज्ञ थे कि देवताओं ने अपनी पूरी शक्ति के साथ आक्रमण ही नहीं किया है, अपितु अपनी सेना का कुछ भाग संकटकाल में सहायता के लिए भी रख छोड़ा है। इसी कारण असुरों की अपेक्षा देवताओं का पक्ष अधिक सशक्त था।

भारी रक्तपात के बीच दोनों पक्षों की सेना में शिथिलता आ गई थी। इस स्थिति को देवताओं ने अपने लिए सुनहरा अवसर समझा। अतः उन्होंने बिना विलंब किए अपनी रक्षित सेना को बुला लिया। देवताओं की तरोताजा रक्षित सेना ने पूरी शक्ति के साथ थके-माँदे असुरों पर आक्रमण कर दिया। इससे असुरों के पैर उखड़ गए। उन्हें अपने प्राण बचाने भी भारी पड़ गए। देवताओं के इस प्रकार किए गए आक्रमण से असुरों की रक्षापंक्ति पूर्ण रूप से धराशायी हो गई। अतः असुरों के पास अपने प्राण बचाकर भागने के अलावा और कोई मार्ग नहीं था। युद्ध क्षेत्र से भागने में ही उन्होंने अपना हित समझा। परिणामस्वरूप देवताओं ने असुरों पर विजय भी प्राप्त की।

विजय प्राप्त करने के पश्चात् देवताओं ने असुर नगरी में प्रवेश किया और वहाँ जो भी बहुमूल्य वस्तुएँ थीं, सभी अपने अधिकार में ले लिया। इसके पश्चात् उन्होंने बंदी बनाने का कार्य किया। उन्होंने देखा कि नगर में स्त्रियों और बच्चों के अलावा कोई असुर न था। लगभग सभी असुर नगर छोड़कर भाग चुके थे, किंतु देवताओं ने किसी स्त्री या बच्चे पर कोई अत्याचार नहीं किया। हाँ, हिरण्यकशिपु की पत्नी कयाधू को अवश्य बंदी बना लिया, जो उस समय गर्भवती थीं।

कयाधू का स्वभाव आसुरी प्रवृत्ति के विपरीत था । वह शांत उदार और दयालु प्रकृति की महिला थीं। असुरों के बीच रहने के उपरांत भी उनमें एक भी आसुरी गुण न था। जब देवताओं ने कयाधू को बंदी बनाया, तो उन्हें बड़ा दुःख हुआ। मार्ग में देवताओं को देवर्षि नारद मिले, तो उन्होंने देवराज इंद्र से पूछा, “देवराज! तुम धर्मपरायण पतिव्रता कयाधू को लेकर कहाँ जा रहे हो?”

“देवर्षि! इस समय कयाधू गर्भवती हैं। जब यह अपनी संतान को जन्म दे देगी, तो हम इन्हें मुक्त कर देंगे। कयाधु से मेरी कोई शत्रुता नहीं है।” इंद्र ने कहा, “किंतु इसका पुत्र मेरा शत्रु अवश्य है, जिसे मैं जन्म लेते ही मार डालूँगा।”

“नहीं देवराज, यह उचित नहीं है।” देवर्षि ने इंद्र को समझाते हुए कहा, “उस बालक का क्या दोष, जो तुम उसकी हत्या करोगे। वास्तविकता तो यह है कि वह बालक भविष्य में भगवान् श्रीहरि का बहुत बड़ा भक्त बनेगा। अतः उसकी हत्या करने का विचार भी आप त्याग दें तो अच्छा होगा।”

देवर्षि नारद की बात सुनकर देवराज इंद्र बड़े विस्मित हुए और उसी समय कयाधू को मुक्त कर दिया। इसके पश्चात् कयाधू देवर्षि के साथ चली गईं और उनके आश्रम में रहने लगीं।