यह उस वक्त की बात है जब मैं 15 साल का था। मेरे लिए प्यार शब्द का इस्तेमाल बड़ा नया सा था। स्कूल में ट्यूशन सेंटर में अक्सर यह शब्द सुनाई पड़ जाती थी पर इसका सही मतलब या इसका सही इस्तेमाल क्या है वह मुझे नहीं पता था।
हर जगह क्योंकि मेरे आस-पास मंडराने वाले लगभग उसी उम्र के थे तो बस धीरे-धीरे ही सही पर उस शब्द को मैं जान रहा था।
कुछ लोग या फिर यह कहना सही होगा कि मेरे जैसे जो बच्चे थे वह उसे शब्द या उस जानकारी को बड़े हल्के में लेते थे। हमारे लिए प्यार महत्वपूर्ण थी पर खेलकूद उससे भी ज्यादा था। ऐसा भी नहीं की जो प्यार में नए-नए गुलाब खील रहे थे उन्हें खेल में दिलचस्पी नहीं थी पर हां जब भी मौका मिलता तब वह उस वक्त बस लड़कियों की बातें ही किया करते थे। और मेरे जैसे लड़के के लिए यह बातें बस एक चुटकुला जैसा या बड़ी साधारण सी बात थी।
पापा के देहांत के बाद उन दिनों मेरा पूरा परिवार नई जगह नए घर में बस शिफ्ट हुए थे मेरे लिए वह जगह नई थी और लोग भी नए थे और एक नया माहौल भी मिला था मुझे। मेरे बड़े भाई जो थे उन्हें इन सब बदलावों से ज्यादा आपत्ति नहीं थी पर एक नए माहौल में ढलना सबके लिए आसान नहीं होता। अच्छी बात यह थी कि उस नए परिवेश में भी एक दोस्त ऐसा मिला जो हमारे स्कूल का था। पर हमारी शाखा अलग थी हां हम दोनों एक ही श्रेणी के थे दोनों ही उस वक्त दसवीं की पढ़ाई कर रहे थे।
पर मुझे उससे घुलना मिलना ज्यादा पसंद नहीं था क्योंकि वह बहुत ज्यादा मजाकिया था। हर बात पर मजाक करना लोगों की टांग खींचना उसे ज्यादा पसंद आता था। पर अक्सर खेलने के बहाने हम मिल जाया करते थे क्योंकि मैं अपने भाइयों की ही तरह ज्यादा शौकीन था खेल कूद में इसलिए उस छोटे से मैदान में जो मेरे घर से बस 100 या 150 मीटर की दूरी पर ही था वहां नए बच्चों के बीच खेलने जाया करता था।
धीरे-धीरे अजय के साथ मेरी बातचीत ठीक-ठाक होने लगी और अनजाने में ही सही पर हम अच्छे नहीं पर हां एक ठीक-ठाक सी दोस्ती जैसा रिश्ता बन गया था हमारे बीच और फिर दोस्तों के बीच दिल के पर्दे अक्सर खुल ही जाते हैं और वहां छुपाने लायक कुछ बचता भी नहीं।
अजय शायद मुझे अपना सच्चा दोस्त समझता था पर सच कह तो मैं खुद कभी उसके साथ उतना उतर नहीं पाया दोस्ती में। आपने अक्सर सुना होगा ज्यादा बोलने वाले लोग अंदर से बहुत अच्छे होते हैं उनका मन साफ सच्चा होता है।
दरअसल हम दोनों एक ही सोसाइटी में रहते थे क्योंकि मेरे पिता पुलिस में थे तो उनके देहांत के बाद मेरे मंझले भाई को सरकारी नौकरी मिली थी, उनकी जगह पर। सरकारी नियमों के हिसाब से घर के एक सदस्य को नौकरी मिलती थी अगर कार्यरत अवस्था में या फिर रिटायरमेंट से पहले सर्विस होल्डर की मौत हो जाती है तब। मेरे मंझले भाई को नौकरी मिली और मेरे परिवार तथा मेरी मां द्वारा सरकार से अनुरोध करने से हमें एक पुलिस क्वार्टर भी उस वक्त मिल गया था जो बहुत छोटा सा था।
हां वह घर बहुत छोटा था पिछले के मुताबिक लेकिन हमारे इतने बड़े परिवार को आश्रय देने के लिए उस वक्त यही हमारे लिए बहुत था।
लेकिन अजय का परिवार गली के आखिर में अपने खुद की ही घर में रहता था। हम रोज अक्सर मैदान में मिला करते थे खेलने के बाद जब सूरज लगभग ढल रहा होता था तब हम हमारे घर के सामने जो गली और उसमें जो पक्की सड़क थी वहां पर टहला करते थे।
एक दिन ऐसे ही टहलते टहलते हम जब इधर-उधर की बात कर रहे थे तब मेरी नजरों ने कुछ अजीब देखा जैसे ही गली के एक छोर से दूसरे छोर तक हम आते मेरे घर के लगभग एक साथ लगी हुई जो बिल्डिंग थी उसके पहले मंजिल पर उसकी नज़रें जाकर बार-बार वापस आ रही थी।
ऐसा होते हुए मैंने तीन चार बार देखा अबकी बार जैसे ही मेरी नजरे भी ऊपर की तरफ गई तब उस पहले मंजिले के बरामदा में हमारी उम्र की ही एक बहुत खूबसूरत सी लड़की रस्सी में टंगे हुए सूखे कपड़े उतारते हुए दिखी। अजय की ननजरे थोड़ी देर तक बाहर रुकती फिर मेरे पास वापस आ जाती बात करने के लिए।
मैंने पूछा आखिर क्या बात है लेकिन थोड़ी मजाकिया अंदाज में। तब तक वह लड़की सारे कपड़े समेट कर अंदर चली गई थी। अजय मेरी बात सुनकर थोड़ा हंसता थोड़ा शर्माता फिर भी मैंने उससे पूछा क्या वह तुझे पसंद है? प्यार करता है या लाइन मार रहा है?
अजय ने ज्यादा कुछ बोलना जरूरी नहीं समझा बस हां मैं अपना सर हिलाया। फिर वह धीरे-धीरे अपने सारी बातें बोलने लगा मुझे।
दरअसल आज से कुछ दिनों पहले अजय जब भी हमारे घर के सामने से गुजरता था तब उस लड़की को बह रोज आते जाते देखता रहता था। अजय जब भी रास्ते से जाता तो एक बार के लिए अपनी नज़रें वहां टिकाता, कभी वह लड़की भी उसे देखती तो कभी नहीं। ईस दौरान कब उसे प्यार हो गया उसे खुद भी नहीं पता पर उस लड़की ने उस पर तब तक कभी ध्यान नहीं दिया था।
इस तरह वक्त गुजरता गया। क्रिकेट के बाद टहलना और उसके घर के पास चक्कर लगाना। लेकिन फिर पहली बार शाम के एक वक्त वह लड़की जब कपड़े उतारने आई तब आज पहली बार था जब दोनों की नजरे एक दूसरे से टकराई। अजय के मुंह पर जो खुशी थी वह देखने लायक थी।
उस लड़की का नाम था सोना। जो मेरे दोस्त समीर के यहां काम करती थी असल में समीर की जो दीदी उन्हें बस नया-नया बच्चा हुआ था और उन्हें देखभाल करने के लिए किसी की जरूरत थी। वह सोना को लेकर आई थी अपने किसी रिश्तेदार के यहां से।
सोना उनके ही किसी रिश्तेदार की गोद ली हुई बेटी थी लेकिन उसके परिवार वाले उसका बिल्कुल भी ख्याल नहीं रखते थे। दीदी को अक्सर उस पर दया आती थी और जब कभी वह उनके घर जाती तो बहाने से अपने साथ लेकर आ जाती। दिखाने के लिए सोना उनके इधर काम करती थी पर दीदी ने उसे कभी भी इस बात का एहसास नहींहोने दिया।
सोना आमतौर पर बच्चे को संभालती थी और घर के छोटे-मोटे कामों में दीदी की मदद किया करती थी। पर उसे अपनी छोटी बहन जैसा ही दुलार भी करती थी दीदी।
मेरा दोस्त समीर जो मुझसे एक एक कक्षा छोटा था अपनी दीदी और जीजा जी के घर पर अक्सर आया करता था ज्यादातर वक्त हॉस्टल में ही रहता था वहीं पढ़ाई करता और छुट्टी का पूरा वक्त दीदी के घर में बिताने आ जाता था।
क्योंकि हम एक ही बिल्डिंग में रहते थे तो समीर के साथ मेरी मुलाकात कभी-कभी छत पर हो जाती थी। वहीं से हमारी दोस्ती की भी शुरुआत हुई थी।
अब हर रोज शाम का इंतजार होता था क्रिकेट खेलने कभी होता तो कभी नहीं होता पर सड़क पर टहलने जरूर आते थे। हां अब एक बात पहले से अलग थी कि पहले सिर्फ हमारा मजनू ही राह देखा करता था लेकिन अब इंतजार लैला को भी रहता था। दोनों एक दूसरे को देखते मुस्कुराते और चले जाते ऐसा कई दिनों तक चला पर इस दौरान कभी भी ऐसा ना हुआ दोनों एक दूसरे से आपस में कभीमिले हो।
अब सर्दी आ गई थी सूरज बहुत पहले ही अस्त हो जाता था गर्मियों में जहां कभी-कभी शाम 6:30 बजे अंधेरा छाता था अब 4:30 को ही सूरज रवाना हो जाता था।
हम दोनों दसवीं कक्षा में थे करीब 4:20 पर हमारी छुट्टी होती थी स्कूल की। जिस कारण कपड़े बहुत पहले ही उतर जाते थे रस्सी से। हमारा आशिक कितना भी जल्दी कर ले पर सूरज नहींमानता था। अजय अब निराश होने लगा क्योंकि आप ना खेलने होता और ना ही टहलना पर हां हफ्ते में जब भी छुट्टी आती वह कसर वो जरूर पूरा करता।
उस एक छुट्टी के दिन आशिक जितनी चक्कर लगाता तार से कपड़े उतनी ही बार में उतरते थे। अब तो ऐसा हो गया था मैं भी जब अकेले में रास्ते से गुजरता था मेरी नजरे भी अनजाने में पहले मंजिले पर चली जाती थी इसलिए नहीं कि अपने दोस्त को धोखा दूं बल्कि यह कि उसे बोल पाऊं की आज तेरी आइटम को देखा था।
यह सिलसिला कुछ और दिनों तक चला फिर एक दिन मैं बीमार पड़ गया था। पर उन दो दिनों में हमारा मिलना झूलना नहीं हो पाया। फिर एक दिन स्कूल से लौटते वक्त हमारी गली का रास्ता जहां से शुरू होता था वहां साथ ही दुकान से में चॉकलेट खरीद रहा था। वहां हमारी मुलाकात हो गई फिर से। बड़े खुशनुमा अंदाज में वह सोना के बारे में मुझे बताने लग गया मानो बह इस इंतजार में था कि कब मैं उसे मिलूं और वह यह सब बातें मुझे कर सके।
उसने बताया जब उन दिनों में बीमार था तब शाम के वक्त पहली बार सोना और वह आमने-सामने मिले। दरअसल सोने के पड़ोस में जो परिवार रहता था उनके पास एक कुत्ता था जो शाम के वक्त जब बाहर निकला फिर वापस ही नहीं लौटा। सोना और उसकी पड़ोस वाली आंटी उसे नीचे ढूंढ रहे थे तब इस दौरान उसे मौके का फायदा उठाकर उसने पहली बार सोना से बात करने की कोशिश की और उन्हें कुत्ते को ढूंढने में मदद किया।
बात करते-करते मेरा घर आ गया था मेरे घर के सामने थोड़ी देर तक वह रुका। मैं फिर उससे पूछने लगा, ‘कुत्ता मिला?’
उसने हंसके कहा कुत्ता तो नहीं मिला पर हम दोनों मिल गए।
मैंने उसे फिर से पूछा ‘तो फिर तूने उसे आई लव यू बोल दिया?’
अजय ने जवाब दिया, ‘नहीं यार इतना टाइम ही नहीं मिला पर हां अगली बार जरूर बोल दूंगा’।
6 महीने में दोनों पहली बार आमने-सामने आए अब फिर कब मिलेंगे क्या पता तब तक उसकी मां दूर से ही उसे आवाज देने लगी तो फिर वह अपने घर चला गया।
फिर छुट्टियों के दिनों में अजय 9 से 10:00 बजे सुबह दूसरे लड़कों के साथ खेलने आ जाता था और मेरे घर के पास आकर जोर-जोर से मेरा नाम लेकर खेलने के लिए बुलाता रहता था। मेरा बड़ा भाई फिर बाहर आता और आकर उसे डांटते हुए कहता कि उसके कान अभी सही सलामत है।
पर उसके चिल्लाने का कारण बस मुझे पता थी असल में मेरे बहाने किसी और को जो बुलाना था।
जनवरी के महीने में हमारे छोटे से राज्य त्रिपुरा में सबसे ज्यादा ठंड पड़ती थी। वैसे तो ठंडी का मौसम अक्टूबर से फरवरी मार्च तक चलता पर जनवरी में सबसे तेज रहता था ठंड। आमतौर पर ना सूरज उगता सारा दिन चारों ओर बस कोहरा छाया रहता था। तो अब नाही तार पर कपड़े सूखते और ना ही कपड़े उतारने वाली दिखती ऐसे तीन-चार दिन और चला गया। अजय रोज शाम को मेरे घर के पास खड़ा रहता पर वह नहीं दिखती थी। धीरे-धीरे अजय निराश होने लगा।
लेकिन चौथे दिन जब चारों ओर अंधेरा हो गया था तब भी वह खड़ा रहा ना वह खुद गया और ना ही मुझे घर जाने दिया। तब ही उधर दूर से उसकी मां और इधर मेरी मां हम दोनों को घर लौट ने के लिए बुला रही थी बार-बार पर हम पढ़ाई का बहाना दिए और देर तक रुके रहे। फिर अचानक एकदम से वह हुआ जो हम दोनों ने कभी नहीं सोचा था।
एक सफेद चादर ओढ़ सोना हमारे सामने से गुजरती हुईजाती है। मैं अपने दोस्ती का फर्ज अदा कर रहा था इसलिए उसे दो बार पीछे से धक्का देते हुए मैंने कहा जा उससे बात कर ले। पर उससे हिम्मत ना बन पाई।
फिर दो कदम और चलकर सोना रुकी। चारों ओर घना अंधेरा था साथ में आसमान से लगातार गिरता हुआ कोहरा जिसने चारों तरफ एक सफेद चादर ओड रखा था उसमें कुछ ठीक से दिखाई नहीं दे रही थी। फिर भी दूर लगी स्ट्रीट लाइट से कुछ अंधेरा साफ हो रहा था, कोहरे ने अपने आगोश में उसे भी ले लिया था फिर भी हल्की रोशनी गली के रास्ते के ऊपर बिखेर रही थी।
सोना उस वक्त अपने चादर को और अच्छी तरह से झगड़ते हुए हल्की सी पीछे की तरफ मुड़ी। और फिर कुछ देर रुक कर अचानक अपने कदमें तेज करके अंधेरे में गायब हो गई।
अजय मेरा दोस्त न हीं उससे कुछ बोल पाया और ना ही उसके कदम उसके पीछे जा पाए। वह वही भूत की तरह खड़ा रह गया। फिर कुछ देर ठहरने के बाद मैं भी अपने घर चला गया और वह भी अपने घर चला गया कोहरे के बीच सब कुछ ऐसे ही सन्नाटे में खत्म हो गया।
शाम को कभी-कभी हम दोनों दोस्त अक्सर जब क्रिकेट नहीं खेला करते थे तब पास के पार्क में चले जाया करते थे। उस दिन सोना भी वहां आई हुई थी दीदी और उनके छोटे बच्चे के साथ। झूले पर बैठे सोना बच्चे को गोद में लेकर झूल रही थी इसकी दीदी पास में टहल रही थी और हम दोनों सोना पर नजर गढ़ाए हुए बैठे थे।
इससे बोर होकर मैं पास के दूसरे झूले पर जाकर बैठ गया। वह पार्क बच्चों के लिए था और हम अब बच्चे नहीं रहे हमें दूसरी चीजों को इस्तेमाल करना सख्त मना था। और इसलिए पार्क में दूसरी चीजों को इस्तेमाल करके हम खेल नहीं सकते थे तो झूला ही एकमात्र सहारा था। तो फिर मैं भी आराम से झूला झूलने लग गया, फिर अचानक मेरा ध्यान अजय के ऊपर गया मैंने देखा कि वह सोना के साथ वाले झूले में जाकर बैठ गया और फिर बच्चे को प्यार करने के बहाने बहुत हिम्मत जुटाकर उससे थोड़ी-थोड़ी बात करने लग गया। यह पहली बार था जब मैं उन दोनों को एक दूसरे से बात करते हुए एक दूसरे के साथ बैठे हुए देखा था मानो आज उनसे ज्यादा खुश में हो गया था।
सब कुछ अब ठीक सा था पर अजय और मेरा मिलना बहुत कम हो गया। मुझे ट्यूशन क्लासेस पढ़ने के लिए अब अक्सर शाम को जाना होता था स्कूल के बाद अब धीरे-धीरे हमारे खेलकूद भी कब हमसे छूट गए हमें पता ही नहीं चला। पर फिर भी जब भी हम मिलते उनके प्रेम कहानी पर खूब चर्चा होती।
फिर एक दिन शाम को अजय मुझे घर से बाहर बुलाता है और फिर कहता है की सोना कल आई नहीं थी बाहर कपड़े लेने। पर मुझे उसमें कुछ खास अजीब नहीं लगा क्योंकि ऐसा कहीं दफा पहले भी हो चुका था।
फिर भी मैंने उसे आस देते हुए कहा कि कल नहीं आई तो क्या हुआ आज आ जाएगी। पर फिर भी बहुत देर इंतजार करने के बाद भी सोना आज नहीं आई। अजय उदास होकर वापस चला गया।
अजय इसी तरह अजय अगले और 2 दिन तक बालकनी में सोना को देखने आता इंतजार करते रहता और फिर निराश होकर चला जाता। अब दीदी ही हर रोज कपड़े सुखाने आती और रस्सी से कपड़े उतारने भी आती थी। आशिक को अब खाली हाथ लौटना पड़ता था।
सोना को ना देख पाने के कारण अजय अंदर से टूटने लग गया था उसके जज्बात अब बाहर झलकने लग गए थे। वह आमतौर पर उदास रहने लगा। हर शाम मेरे घर के पास आकर वह खड़ा हो जाता था पर सोना फिर कभी उसे नहीं दिखी।
यह छोटी सी प्रेम कहानी जो बस अपने पंख खोलकर आसमान को छूने चली थी अचानक अपने पंख तोड़कर जमीन पर कैसे आ गिरी यह मैं समझ नहीं पा रहा था। मानो आसमान में अचानक बादल छकर चारों ओर अंधेरा करके तीव्र वर्ष शुरू हो गई हो।
अजय अब अक्सर उदास रहता। एक आशा से सोना को देखने आया करता था और फिर उसका सपना पल ही भर में टूट जाता।
मैं उसे उस दौरान दिलासा देने के अलावा उसके लिए कुछ ना कर पाया। फिर एक दिन हम दोनों ने सोना यानी दीदी के घर में किसी एक बहाने से जाने का प्लान बनाया। हम बहुत उत्सुक होकर उसके घर में उसे ढूंढने के बहाने जाने लगे कि तभी मुझे बहुत दिनों बाद समीर मिला।
समीर जो दीदी का छोटा भाई था वह 2 दिन की छुट्टी पर उनके घर आया हुआ था। समीर को देखकर हम दोनों के दिल में एक नई आशा जगी।
अजय ने मुझे उसे सोना के बारे में पूछने के लिए कहा। फिर बातों ही बातों में मैंने समीर से सोना के बारे में पूछ ही लिया। फिर समीर ने जो बताया उसे सुनकर हमारे पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई।
सोना के बारे में यह सब सुनकर अजय अपने आप को और रोक न पाया और आंखों में आंसू लिए तेज कदमों से अपने घर के तरफ दौड़ कर चलागया।
समीर ने बताया सोना को दीदी ने बहुत प्यार दुलार दिया था उसके खुद के घर में जहां उसे कोई प्यार नहीं करता था और ना ही उसकी देखभाल करता था दीदी ने उसे सब कुछ दिया पर बदले में उस लड़की ने दीदी के पर्स से पैसे चुराने की कोशिश की। दीदी ने उस वक्त उसे पैसे चुराते हुए रंगे हाथों पकड़ लिया। फिर उन्होंने जब उससे पूछा बह यह क्यों कर रही थी? तो पहले उसने कुछ नहीं बताया। फिर दीदी ने जब उसे गुस्से में आकर तो थप्पड़ मारे तो फिर उसने सब कुछ बता दिया कि वह पैसे क्यों चुरा रही थी।
असल में समीर ने आगे बताया वह लड़की किसी लड़के से प्यार करती थी और उसे गिफ्ट देने के लिए ही उसने दीदी के बैग से पैसे चुराए। लेकिन जब दीदी ने उसे उस लड़के के बारे में पूछा, तब बहुत बार पूछने के बाद भी उसने कोई जवाब नहीं दिया इसलिए दीदी ने उसे गुस्से में आकर उसके घर वापस भेज दिया।
समीर से यह सब सुनने के बाद मैं कुछ देर तक वही हैरान परेशान खड़ा रहा। अजय तब तक जा चुका था वापस, अपने अंदर उसे दर्द को लेकर हमेशा हमेशा के लिए।
सोना फिर वापस कभी नहीं आई। सोना के दिल मैं अजय के लिए इतना प्यार होगा यह उसने कभी सोचा नहीं था। पर हां उनके प्यार की यह छोटी सी कहानी हमेशा के लिए अधूरी रह गई।