“आंखें बंद थीं तो सब दिखता था, आंखें खुलीं नहीं कि सब ओझल हो गया।”
एक छोटी-सी बच्ची के मुख से निकला यह वाक्य साधारण प्रतीत हो सकता है, परंतु जब इसे मन में उतारकर देखा जाए तो यह जीवन-दर्शन का गूढ़ सूत्र बन जाता है। अक्सर सत्य जटिल शब्दों में नहीं, सरल अनुभूतियों में प्रकट होता है। बालमन का सहज कथन कभी-कभी उन प्रश्नों को जन्म देता है, जिनका उत्तर बड़े-बड़े ग्रंथ भी नहीं दे पाते।
आंखें बंद करना सामान्यतः अंधकार का प्रतीक माना जाता है। परंतु क्या वास्तव में आंखें बंद करना अंधकार में जाना है? या फिर वह बाहरी जगत से हटकर भीतर के प्रकाश की ओर मुड़ना है? जब हम आंखें बंद करते हैं, तब दृश्य संसार समाप्त नहीं होता; केवल बाहरी दृश्य हटते हैं और आंतरिक दृश्य उभरने लगते हैं। स्मृतियाँ, भावनाएँ, अपराधबोध, प्रेम, पीड़ा, आकांक्षाएँ—सब एक-एक कर सामने आ खड़े होते हैं।
ध्यान की अवस्था में यही होता है। जब मनुष्य एकाग्र होकर आंखें बंद करता है, तब वह स्वयं से मिलना प्रारंभ करता है। वह देखता है कि उसके भीतर कितनी उलझनें हैं, कितनी इच्छाएँ हैं, कितने भ्रम हैं। वह अपनी गलतियों को भी देख पाता है और सुधार के मार्ग को भी। परंतु जैसे ही आंखें खुलती हैं, संसार का शोर भीतर की उस स्पष्टता को ढक देता है। फिर वही दौड़, वही प्रतिस्पर्धा, वही अहंकार और वही मोह।
यहां प्रश्न उठता है—क्या आंखें खुलना ही ज्ञान है? या ज्ञान कुछ और है?
हम बचपन को देखें। जब बच्चा छोटा होता है, तब वह दुनिया को जिज्ञासा और आश्चर्य से देखता है। उसकी दृष्टि निर्मल होती है। उसमें छल नहीं, गणना नहीं, स्वार्थ नहीं। वह आंखें बंद करके भी विश्वास से मां का आंचल पकड़े रहता है। उसके लिए सुरक्षा बाहर नहीं, संबंधों में होती है।
पर जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, हम “जानने” लगते हैं। हम दुनिया के नियम सीखते हैं, व्यवहार सीखते हैं, लाभ-हानि की गणना सीखते हैं। हमारी आंखें खुल जाती हैं—पर क्या उसी अनुपात में हमारा हृदय भी खुला रहता है? अक्सर नहीं। ज्ञान बढ़ता है, पर संवेदना घटने लगती है।
वृक्ष का उदाहरण इस सत्य को सुंदर ढंग से समझाता है। जब वृक्ष पर नए पत्ते आते हैं, तो वे कोमल, हरे और आकर्षक होते हैं। उनमें जीवन का उल्लास होता है। समय के साथ वे पत्ते परिपक्व होते हैं, कठोर होते हैं, और अंततः सूखकर गिर जाते हैं। उनका गिरना अंत नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत है—वे मिट्टी में मिलकर फिर उसी वृक्ष को पोषण देते हैं।
मनुष्य का जीवन भी ऐसा ही है। हम जन्म लेते हैं, बढ़ते हैं, परिपक्व होते हैं, और एक दिन इस संसार से विदा हो जाते हैं। शरीर पंचतत्व में विलीन हो जाता है। परंतु इस यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं कि हम कितने बड़े हुए, बल्कि यह है कि हमने अपने भीतर की कोमलता कितनी बचाए रखी।
संवेदना ही मनुष्य को मनुष्य बनाती है। जब हम दूसरों के दुख को महसूस करते हैं, तब हमारे भीतर का बालमन जीवित रहता है। लेकिन जब हम केवल अपने लाभ और हानि की गणना में उलझ जाते हैं, तब हमारा ज्ञान किसी कोने में सिमट जाता है और संवेदना सूखने लगती है।
“आंखें बंद थीं तो सब दिखता था”—इसका एक अर्थ यह भी हो सकता है कि जब मन निष्कपट था, तब संसार स्पष्ट था। जैसे-जैसे मन पर परतें चढ़ती गईं—अहंकार, अपेक्षाएँ, अनुभवों की धूल—दृष्टि धुंधली होती गई।
सच्चा ज्ञान वही है जो भीतर की आंखें खोल दे। वह ज्ञान जो हमें विनम्र बनाए, संवेदनशील बनाए, करुणामय बनाए—वही वास्तविक ज्ञान है। यदि आंखें खुली हों और फिर भी हम सत्य न देख पाएं, दूसरों का दर्द न समझ पाएं, अपनी भूलों को न पहचान पाएं, तो वह केवल सूचना है, ज्ञान नहीं।
बच्चे इसलिए सुंदर लगते हैं क्योंकि वे अभी तक छल-कपट से अछूते होते हैं। उनके शब्द सीधे हृदय से निकलते हैं। वे जो देखते हैं, वही कहते हैं। उनके भीतर अभी तक वह द्वंद्व नहीं आया होता, जो बड़े होने के साथ आता है।
जीवन का सार शायद यही है कि हम बड़े तो हों, पर भीतर से छोटे बने रहें। आंखें खुली रहें, पर मन बंद न हो। ज्ञान बढ़े, पर संवेदना कम न हो। परिपक्वता आए, पर कोमलता बनी रहे।
यदि हम ऐसा कर पाएँ, तो आंखें बंद करने पर जो दिखता है, वह आंखें खोलने पर भी ओझल नहीं होगा। तब भीतर और बाहर में भेद नहीं रहेगा। तब जीवन केवल जीया नहीं जाएगा, समझा भी जाएगा।
अंततः प्रश्न आंखों का नहीं, दृष्टि का है।
और दृष्टि वही है जो हृदय से जन्म लेती है।
— अनंत धीश अमन