उस मूर्ति के गायब हो जाने के बाद राजू माँ के पास आकर लेट गया। उसकी आँखों में नींद नहीं थी। उसके सिर के नीचे चादर में बहुत सारा पैसा छिपा था। इतना पैसा तो उसने अपनी ज़िंदगी में कभी नहीं देखा था। कभी दिन भर की मज़दूरी के बाद भी उसे ज़्यादा से ज़्यादा 200–300 रुपये ही जमा हो पाते थे। यह इतना पैसा था कि वह उसे गिन भी नहीं सकता था।
माँ को क्या बताएगा कि यह कहाँ से आया? वह यही सब सोचते-सोचते सो गया।
सुबह राजू माँ से पहले ही जाग गया। उसने चादर के नीचे से सारे पैसे निकालकर एक कपड़े में इकट्ठा किए। ज़रूरत के हिसाब से थोड़ा पैसा अलग रखा और बाकी के पैसे घर के कोने में पड़ी टूटी-सी अलमारी में छिपा दिए। फिर उसने माँ को जगा दिया।
माँ ने हैरानी से कहा, “अरे वाह! आज तू मुझसे पहले जाग गया? क्या बात है बेटा, तबीयत तो ठीक है?” माँ ने थोड़ी परेशानी से राजू को देखा।
राजू बोला, “हाँ माँ, मैं ठीक हूँ।”
माँ ने कहा, “चल अच्छा है, मैं नाश्ता बना देती हूँ। मुझे भी सेठानी के घर जाना है। आज उसके घर काम ज़्यादा है, कल जल्दी आने को कह रही थी।” यह कहकर सुधा उठकर खड़ी हो गई।
राजू को अच्छा नहीं लगा, पर वह मुँह धोने चला गया। माँ नाश्ता बना लाई। राजू बहुत चुपचाप बैठा था।
माँ ने टोका, “क्या हुआ राजू? नाश्ता कर, मुझे जाना भी है।”
राजू माँ के पास आकर बैठ गया और बोला, “माँ, तुझे कहीं जाने की ज़रूरत नहीं है आज से… और न ही मैं फेरी पर जाऊँगा।” उसने थोड़ा अटकते हुए कहा।
अलमारी में पड़े पैसों के बारे में माँ को बताना तो था ही। उसने अभी बात करने का फैसला किया और कहा—
सुधा उसकी बात सुनकर थोड़ा हैरान हुई। बोली, “काम नहीं करेंगे बेटा तो खाएँगे क्या?”
राजू बोला, “वो सब तू मत सोच माँ, मैं सब बताता हूँ तुझे… बस तू सुन।”
सुधा ने कहा, “राजू, मेरे पास ज़्यादा समय नहीं है। सेठानी बहुत नाराज़ होगी अगर मैं देर से पहुँची। तू आज फेरी पर नहीं जाना चाहता तो मत जा, पर मुझे तो जाना ही पड़ेगा।”
राजू ने अपनी शर्ट में छिपाए हुए पैसे चुपचाप माँ के सामने रख दिए। इतने सारे पैसे देखकर सुधा बुरी तरह चौंक गई। दोनों के बीच कुछ देर तक खामोशी छाई रही। फिर जैसे अचानक सुधा को होश आया।
वह सदमे में बोली, “राजू, तूने चोरी की है? इतना पैसा कहाँ से लाया?”
राजू ने तुरंत कहा, “माँ, मैंने चोरी नहीं की है। मैं तुझे सब बताने वाला हूँ, तू सुन तो सही।”
सुधा गुस्से और दुख में बोली, “क्या बताएगा तू? मैं देख रही हूँ, आजकल तुझे अपनी इस गरीबी से शर्म आने लगी है, इसलिए ये गलत काम करने शुरू कर दिए? यही सिखाया था मैंने? तेरे पिता को मैं क्या मुँह दिखाऊँगी? हे भगवान, राजू ये क्या कर दिया तूने!” इतना कहते-कहते वह रोने लगी।
राजू ने घबराकर कहा, “नहीं माँ, मैंने कोई गलत काम नहीं किया और न ही ये पैसे कहीं से चुराए हैं। तेरी दी हुई हर सीख मुझे याद है। मैं कभी कोई गलत काम नहीं कर सकता। तू मेरी बात सुन, मैं सब बताता हूँ।”
सुधा ने उसकी ओर देखा। उसकी आँखों में सच्चाई देखकर वह शांत हो गई।
तब राजू ने धीरे-धीरे सारी बात बतानी शुरू की—उस दिन की जब सुधा बीमार थी और वह भगवान के सामने खड़ा होकर उनसे झगड़ रहा था; फिर कुछ लड़कों ने उसके पैसे छीन लिए; और उसके बाद जिन्न के प्रकट होने से लेकर इन पैसों तक की पूरी सच्चाई उसने माँ को बता दी।
सुधा आँखें फैलाए उसकी बातें ऐसे सुन रही थी जैसे कोई कहानी हो।
डरते हुए उसने पूछा, “तू सच कह रहा है, राजू?”
राजू बोला, “हाँ माँ, बिल्कुल सच। और ये तो बस थोड़े से पैसे हैं। बाकी सारे पैसे मैंने उस टूटी-फूटी अलमारी में छिपा दिए हैं।” उसने घर के कोने में पड़ी कबाड़ जैसी अलमारी की ओर इशारा किया।
सुधा उठकर अलमारी के पास गई और कपड़े में बँधी हुई गाठरी निकाल लाई। जैसे ही उसने गाठरी खोली, उसके होश उड़ गए—इतना सारा पैसा!
वह हैरानी से बोली, “क्या करेंगे हम इसका, राजू?”
राजू मुस्कुराकर बोला, “वही तो सोचना है। लेकिन सबसे पहले तेरा इलाज कराना है, माँ। तू अभी मेरे साथ किसी अच्छे डॉक्टर के पास चलेगी। उसके बाद सोचेंगे क्या करना है। आज से तुझे किसी के घर काम करने जाने की ज़रूरत नहीं है।”
पर “सेठानी गुस्सा कर देगी, बेटा…” सुधा की बात सुनकर राजू ने माथे पर हाथ मारते हुए कहा, “माँ, अब कोई चिंता की बात नहीं।” फिर राजू ने माँ को लेकर बड़े डॉक्टर के पास पहुँच गया।
वहाँ का क्लिनिक साफ-सुथरा और महँगा लग रहा था। मरीज भी थोड़े अमीर-से दिखाई दे रहे थे। सुधा थोड़ी घबराई और बोली, “बेटा, यहाँ हम लोगों को अच्छा नहीं लगेगा। देखो ये बड़े लोगों का डॉक्टर है, शायद हमें नहीं देखेगा। चलो, अपने मोहल्ले के पास वाले किसी अच्छे डॉक्टर को दिखा देते हैं ना।”
इतना बड़ा और महँगा क्लिनिक देखकर सुधा घबराई। लोग उनके मामूली कपड़े और साधारण हुलिये को देखकर ऊपर-नीचे देख रहे थे। राजू ने कहा, “माँ, यहीं बैठ जाओ।”
सुधा बैठ गई। राजू रिसेप्शन पर परची बनवाने गया। कंप्यूटर पर काम कर रहा एक लड़का ऊपर से नीचे तक सुधा को देखने लगा।
राजू ने बड़े आत्मविश्वास से कहा, “मेरी माँ बीमार हैं, डॉक्टर को दिखाना है। कृपया परची बना दीजिए।”
लड़के ने भौंहें चढ़ाते हुए कहा, “डॉक्टर साहब की फीस 1000 रुपये है। आप किसी सरकारी डिस्पेंसरी में जाइए।”
राजू ने लड़के के पूरा बोलने से पहले ही 500 रुपये के दो नोट उसके सामने रख दिए। लड़का चुपचाप पैसे लेकर परची बना दिया।
राजू माँ के पास आकर बैठ गया और मुस्कुराते हुए बोला, “देख माँ, तुम बहुत जल्दी ठीक हो जाओगी।”
राजू ने कहा,
“सुधा देवी… आप चलिए डॉक्टर के पास।”
उस लड़के ने आवाज लगाई, और राजू तुरंत उठकर सुधा को डॉक्टर के कैबिनेट में ले गया।
कैबिनेट बड़ा, साफ-सुथरा और व्यवस्थित था। वहाँ एक महिला डॉक्टर बैठी थीं। दोनों को देखकर वह थोड़ी चौंकी, फिर सामान्य होते हुए बोलीं, “बैठो, बताइए क्या हुआ है।”
सुधा ने कहा, “डॉक्टर साहब, मेरी माँ को बहुत समय से बुखार रहता है। कमजोरी भी बहुत हो गई है। एक-दो बार चक्कर आकर गिर गई थीं। कृपया ऐसी दवा दें जिससे वह जल्दी ठीक हो जाएँ।”
सुधा के बोलने से पहले ही राजू जल्दी-जल्दी बोल पड़ा। डॉक्टर हँस दीं और बोलीं, “ठीक है बेटा, तुम बाहर चले जाओ। मैं देख लेती हूँ उन्हें।”
राजू बाहर चला गया।
डॉक्टर सुधा का चेकअप करने लगी—ब्लीड प्रेशर और बुखार चेक करने के बाद उन्होंने कहा, “वैसे तो सब ठीक है, लेकिन मैं एक-दो टेस्ट लिख देती हूँ। शायद बुखार ज्यादा दिन रहने के कारण टाइफाइड बन गया है, इसी वजह से कमजोरी और चक्कर आते हैं। ये दवाइयाँ ले लेना, खाने-पीने का ध्यान रखना और टेस्ट कराकर रिपोर्ट लेकर अगले हफ्ते फिर मिलना।”
सुधा ने सिर हिलाया और बाहर आ गई।
राजू ने सारी दवाइयाँ ध्यान से खरीदी, साथ ही बहुत सारे फल भी ले आया। दोनों घर पहुँच गए।
आते हुए राजू ने खाना भी ले लिया था। बहुत दिनों बाद, जैसे दोनों की ज़िंदगी में फिर से खुशी लौट आई हो।
खाना गरम करके दोनों ने भरपेट खाया। राजू बहुत खुश था। उसने माँ की तरफ देखकर कहा, “माँ…”
अच्छे डॉक्टर के इलाज से सुधा जल्दी ही ठीक हो गईं। लेकिन अब एक नई चिंता सामने थी—दोनों में से कोई काम पर नहीं जा रहा था और पैसा धीरे-धीरे खत्म होता जा रहा था।
राजू को शुरुआत में चिंता नहीं थी। उसे याद था कि जिन्न ने कहा था—वह तीन बार जो चाहे मांग सकता है। अभी उसकी दो इच्छाएँ बाकी थीं। इसी भरोसे पर वह थोड़ा बेफिक्र था।
पर कई दिन बीत गए… और जिन्न दोबारा नहीं आया।
अब राजू को डर सताने लगा—
“कहीं वो अपना वादा भूल तो नहीं गया? या फिर किसी और के हाथ तो नहीं लग गया?”
एक रात वह घर के बाहर मैदान में बैठा यही सब सोच रहा था। अचानक आसमान में बिजली कड़की—पर बारिश नहीं हुई। उसी पल ज़मीन पर पड़े उस पत्थर से लाल रोशनी फूटने लगी।
राजू ने घबराकर सिर उठाया। सामने अँधेरे में दो लाल आँखें चमक रही थीं।
“क्यों छोटे मियाँ… माँ का इलाज करा लिया?”
जिन्न की भारी आवाज़ गूंजी।
“अपनी परेशानी तो दूर कर ली… मेरी आज़ादी का क्या?”
जिन्न इस बार थोड़ा गुस्से में था।
राजू घबरा गया।
“म-मुझे नहीं पता था तुम्हें कैसे बुलाना है। मैं तो कब से तुम्हें बुलाना चाहता था…”
जिन्न ने ज़ोरदार अट्टहास किया।
“सच में? मुझे बुलाना चाहते थे?”
वह डरावनी आवाज़ में बोलते हुए उसके करीब झुका—
“मुझसे चालाकी करने की कोशिश मत करना। जब भी तुम कहोगे ‘आ जाओ’, मैं हाज़िर हो जाऊँगा। अब अपनी बाकी बची दो इच्छाएँ बताओ… और मुझे आज़ाद करो।”
राजू ने आज पहली बार जिन्न का इतना भयानक रूप देखा था। वह सहम गया, फिर हिम्मत जुटाकर बोला—
“मुझे इस बार भी पैसा चाहिए… लेकिन सिर्फ खर्च के लिए नहीं।
मुझे अपने घर की मरम्मत करानी है।
माँ के लिए एक छोटा-सा काम शुरू कराना है, ताकि वो इज़्ज़त से कमा सकें।
और… मैं पढ़ना चाहता हूँ।
इतना पैसा दे दो कि हम ईमानदारी से आगे की ज़िंदगी जी सकें।”
जिन्न ने गंभीर स्वर में कहा—
“और तीसरी ख्वाहिश?”
अब फैसला राजू के हाथ में था…
क्या वह अपनी आखिरी इच्छा भी पैसे के लिए माँगेगा?
या कुछ ऐसा माँगेगा जो उसकी पूरी ज़िंदगी बदल दे?