चैप्टर 2 — बेचैनी
बारिश रात तक चलती रही।
सावी के कमरे की खिड़की आधी खुली थी। पर्दे हवा के साथ हिल रहे थे और मेज़ पर रखा वही सफेद गुलाब अब हल्का झुक चुका था। पंखुड़ियों पर जमी बूंदें चमक रही थीं… लेकिन सावी की आंखों में नींद नहीं थी।
उसके दिमाग में बार-बार वही दृश्य घूम रहा था —
तेज बाइक… चीख… और रेयांश का चेहरा।
वो डरावना नहीं लगा था।
अजीब तरह से… सुरक्षित लगा था।
सावी ने खुद को झटका —
“पागल हो क्या… किसी अनजान लड़के को जानती भी नहीं।”
लेकिन सवाल पीछा नहीं छोड़ रहे थे।
उसे बचाने कौन आया?
हमलावर कौन थे?
और उसे देखकर रेयांश ऐसा क्यों बोल रहा था जैसे वो पहले से सब जानता हो?
उसने फोन उठाया।
स्क्रीन पर कई मिस्ड कॉल्स थीं —
अथर्व
सावी ने तुरंत कॉल बैक किया।
“तू ठीक है ना?” कॉल उठते ही अथर्व की आवाज आई। वो सामान्य बनने की कोशिश कर रहा था, लेकिन बेचैनी साफ थी।
“हाँ… मैं ठीक हूँ,” सावी धीमे से बोली।
“ठीक मतलब? सावी चार लोग थे! और वो… वो लड़का… रेयांश… उसे कैसे पता था?”
सावी चुप रही।
अथर्व ने गहरी सांस ली —
“कल से तू अकेली कहीं नहीं जाएगी। मैं लेने आऊंगा, छोड़ने आऊंगा। और हाँ, उस लड़के से दूर रहना।”
“क्यों?” सावी के मुंह से अचानक निकल गया।
फोन के उस तरफ कुछ पल चुप्पी रही।
“क्योंकि… वो नॉर्मल नहीं है।”
“हमलावर नॉर्मल थे?” सावी की आवाज धीमी लेकिन साफ थी।
अथर्व रुक गया।
उसके पास जवाब नहीं था।
“सावी,” उसने नरम स्वर में कहा, “कुछ गड़बड़ है। बहुत बड़ी। और तू… तू अभी कुछ नहीं समझ रही।”
सावी ने हल्की हंसी निकालने की कोशिश की —
“तू ज़रूरत से ज्यादा सोच रहा है।”
अथर्व की आवाज पहली बार भारी हुई —
“नहीं। कम सोच रहा हूँ… शायद।”
कॉल कट गया।
सावी कुछ देर फोन देखती रही।
अगली सुबह
कॉलेज कैंपस असामान्य रूप से शांत था। कल की घटना के बाद हर कोई अपने-अपने अंदाज़ में बातें बना रहा था — किसी ने कहा चोर थे, किसी ने कहा गैंग, किसी ने कहा पॉलिटिकल मामला।
लेकिन सावी के आते ही सबकी नज़र उसी पर टिक गई।
अथर्व पहले से गेट पर खड़ा था।
आज वो मुस्कुरा नहीं रहा था।
“चल,” उसने बस इतना कहा और उसके साथ अंदर चलने लगा।
“तू ठीक से सोया भी नहीं ना?” सावी ने पूछा।
“नींद आई ही नहीं।”
दोनों कुछ कदम चुप चले।
फिर अथर्व अचानक बोला —
“आज फूल नहीं था।”
सावी रुक गई।
उसने पलटकर गेट की तरफ देखा।
सच में… आज वहां कुछ नहीं था।
पहली बार उसे खालीपन महसूस हुआ।
अजीब सा।
“अच्छा ही है,” अथर्व बोला, “अब खत्म।”
सावी ने हामी भर दी… लेकिन उसके दिल ने नहीं।
उसी वक्त — कॉलेज की छत
रेयांश रेलिंग के पास खड़ा नीचे देख रहा था।
आज उसके हाथ खाली थे।
उसके पीछे एक आदमी खड़ा था — उम्र करीब 40, चेहरा सख्त।
“उन्हें खबर मिल गई है,” उसने कहा, “अब वो सीधे लड़की तक पहुंचेंगे।”
रेयांश की नजर नीचे चलती सावी पर थी।
“पहले ही पहुंच चुके हैं।”
“तो खत्म कर देते हैं मामला।”
रेयांश की आंखें ठंडी हो गईं।
“कोई उसे छुएगा नहीं।”
“तुम भूल रहे हो… वो वही चेहरा है।”
कुछ सेकंड की खामोशी।
रेयांश की मुट्ठी भींच गई।
“चेहरा है… वो नहीं।”
उसने मुड़कर कहा —
“जब तक मैं हूँ… उसे सच पता नहीं चलेगा।”
नीचे कैंपस
सावी क्लास में बैठी थी लेकिन ध्यान बाहर था।
उसे बार-बार लग रहा था कोई देख रहा है।
उसने खिड़की की तरफ देखा।
तीसरी मंजिल की छत खाली थी।
फिर भी… एहसास खत्म नहीं हुआ।
अथर्व ने नोटबुक उसकी तरफ सरकाई —
“कितनी बार बाहर देखेगी?”
सावी हल्का मुस्कुराई —
“पता नहीं… अजीब लग रहा है।”
अथर्व ने पहली बार सीधे उसकी आंखों में देखा।
“सावी… अगर मैं कहूँ कुछ दिनों कॉलेज मत आ…”
“क्या?” वो चौंकी।
“बस… भरोसा कर।”
“अथर्व तू डरा रहा है।”
वो कुछ पल चुप रहा… फिर बहुत धीरे बोला —
“डरना चाहिए।”
सावी की धड़कन तेज हो गई।
“तुझे कुछ पता है?”
अथर्व ने नज़रें हटा लीं।
“नहीं… लेकिन जल्द पता चल जाएगा।”
उसी समय क्लासरूम का दरवाज़ा खुला।
सबकी नज़र उधर गई।
रेयांश अंदर आया।
सीधे… सावी की तरफ देखा।
और पहली बार उसने क्लास के सामने कहा —
“तुम्हें अभी मेरे साथ चलना होगा।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
अथर्व खड़ा हो गया —
“क्यों?”
रेयांश ने उसकी तरफ देखा।
आंखों में चेतावनी साफ थी।
“क्योंकि अब देर हो चुकी है।”
सावी का दिल बैठ गया।
उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था…
लेकिन ये साफ था —
वो सच से अभी बहुत दूर थी…
और वो सच अब खुद चलकर उसके पास आ रहा था।