उल्टा आप
कमल चोपड़ा
लड़की को मास्टर जी के घर से निकलते देखकर देखने वालों की आँखों से आग की लपटें निकलने लगी थीं। कर्फ्यू में ढील मिलते ही लड़की के घर वाले आकर लड़की को ले गए थे। वे जिस तेज़ी से आए थे उसी तेज़ी से लौट गए थे। उनके जाने के बाद मुहल्ले में हड़कंप-सा मच गया था।जिस वक्त कल अचानक दंगा भड़क उठा था, शाज़िया उस वक्त मास्टर जी के यहाँ ट्यूशन पढ़ने आई हुई थी। जाने कैसे दंगाइयों को भनक लग गई थी कि विधर्मियों की एक लड़की मास्टर जी के यहाँ ट्यूशन पढ़ने आई हुई है। दंगाई मास्टर जी के घर के आगे जमा हो गए थे।“मास्टर.... हमें पता चला है कि तुमने मुसलमान लड़की को अपने घर में शरण दे रखी है। चुपचाप उसे हमारे हवाले कर दो....” मास्टर जी अपने दरवाज़े पर अड़कर खड़े हो गए– “हिंदू होकर अपने घर में मुसलमान लड़की को क्यों शरण देने लगा? मेरा विश्वास करो मैं अपने धर्म, अपने ईश्वर की कसम खाकर कहता हूँ कि मेरे घर में कोई मुस्लिम लड़की नहीं है।” मास्टर जी की कसम पर दंगाइयों को विश्वास करना पड़ गया। दंगाई आगे बढ़ गए। कुछ देर बाद कर्फ्यू लगा दिया गया था। फोन करके मास्टर जी ने लड़की के घर वालों को सूचित कर दिया कि शाज़िया उनके घर में पूरी तरह सुरक्षित है। वे उसकी बिल्कुल चिंता न करें। जैसी उनकी बेटी वैसी हमारी बेटी।सुबह शाज़िया को मास्टर जी के घर से निकलते हुए देखकर आसपास वालों की आँखें फटी की फटी रह गईं। इसका मतलब लड़की रात-भर मास्टर जी के घर पर ही थी। मास्टर जी ने झूठ बोला। झूठी कसम खाई। कुछ ही देर बाद मास्टर जी के घर के बाहर भीड़ इकट्ठा हो गई थी और मास्टर जी के घर पर पत्थर बरसने लगे थे.... झूठी कसम खाने वाले झूठे अधर्मी गद्दार..! बाहर निकल साले गद्दार.... मास्टर जी बाहर निकले। पत्थरों की बौछार ने मास्टर जी को पूरी तरह लहूलुहान कर दिया.... खून से लथपथ होने के बावजूद मास्टर जी चीख रहे थे– “झूठ बोलकर मैंने किसी की जान बचाई। मेरा धर्म तो यही कहता है। अधर्मी मैं हूँ या उल्टा आप जैसे! सच्चा हिंदू हूँ मैं या....!”कर्फ्यू में ढील जारी थी। मुख्य सड़क पर पुलिस ही पुलिस थी। लोग हड़बड़ी में थे। शाज़िया को लेकर उसके अब्बू अपने मुहल्ले में पहुँचे तो आसपास वालों ने उन्हें घेर लिया– “तू ठीक तो है न! रात-भर तुझे उस काफिर के घर में रहना पड़ा। उस काफिर ने तेरे साथ ऐसा-वैसा कुछ.... किया कराया तो नहीं!” वह भीड़ से घिर गई थी– “तू डर मत! बस एक बार बोल दे... उस काफिर ने कुछ किया कराया है तो...? खुदा की कसम हम उसे ज़िंदा नहीं छोड़ेंगे...”चीखने लगी वह– “काफिर नहीं हैं मास्टर जी। वे सच्चे इंसान हैं। बेटी की तरह रखा उन्होंने। काफिर तो आप लोग हो जो इस तरह कह रहे हो..!”“मारो साली को! एक तो रात-भर काफिर के यहाँ रहकर हमारे मज़हब की बेइज़्ज़ती करवा दी है, और उल्टा हमें ही काफिर बता रही है।”भीड़ उस पर पिल पड़ी थी। अब्बू के बचाने की कोशिश के बावजूद लहूलुहान होकर वह अपने मज़हब वालों के बीच गिर पड़ी थी।