Can a dream be yours? in Hindi Short Stories by Rishav raj books and stories PDF | एक सपना क्या हो पाएगा अपना?

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एक सपना क्या हो पाएगा अपना?



उत्तर भारत के एक छोटे से गाँव सीतामढ़ी के पास बसे एक साधारण से गाँव में एक लड़का रहता था — उसका नाम था आरव। गाँव बहुत छोटा था, कच्ची सड़कें, मिट्टी के घर, और चारों तरफ खेत। वहाँ के लोगों की जिंदगी बहुत साधारण थी। ज़्यादातर लोग खेती या मजदूरी करके अपना गुज़ारा करते थे।

आरव का परिवार भी उन्हीं में से एक था। उसके पिता रामनारायण खेतों में मजदूरी करते थे। सुबह सूरज निकलने से पहले घर से निकल जाते और शाम को थके हुए लौटते। उसकी माँ सविता गाँव के कुछ अमीर घरों में झाड़ू-पोंछा और बर्तन धोने का काम करती थी।

घर में पैसे हमेशा कम पड़ते थे। कई बार ऐसा होता था कि रात का खाना भी पूरा नहीं बन पाता। लेकिन इन सब मुश्किलों के बीच भी आरव के अंदर एक सपना था — कुछ बड़ा बनने का सपना।

बचपन का सपना

आरव बचपन से ही पढ़ाई में तेज था। जब वह स्कूल जाता, तो हर चीज़ को बहुत ध्यान से समझने की कोशिश करता। उसे किताबें पढ़ना बहुत पसंद था।

गाँव का स्कूल बहुत साधारण था। वहाँ ना तो अच्छी लाइब्रेरी थी और ना ही ज्यादा शिक्षक। लेकिन फिर भी आरव के अंदर सीखने की आग थी।

एक दिन उसकी कक्षा में शिक्षक ने बच्चों से पूछा:

“बच्चों, बड़े होकर तुम क्या बनना चाहते हो?”

किसी ने कहा — पुलिस।
किसी ने कहा — किसान।
किसी ने कहा — ड्राइवर।

जब आरव की बारी आई, तो वह थोड़ी देर चुप रहा। फिर उसने धीरे से कहा:

“सर… मैं इंजीनियर बनना चाहता हूँ।”

पूरी कक्षा हँसने लगी।

एक लड़का बोला:
“तू इंजीनियर बनेगा? तेरे पास तो नई कॉपी खरीदने के भी पैसे नहीं हैं।”

आरव चुप हो गया। लेकिन उसके शिक्षक शर्मा सर ने उसकी तरफ देखा और कहा:

“हँसने दो सबको। अगर मेहनत सच्ची हो, तो कोई भी सपना पूरा हो सकता है।”

उस दिन से शर्मा सर आरव के सबसे बड़े सहायक बन गए।

कठिनाइयों का दौर

समय बीतता गया। आरव बड़ा होता गया और पढ़ाई भी कठिन होती गई।

लेकिन उसके सामने सबसे बड़ी समस्या थी — पैसे की कमी।

कई बार ऐसा होता कि स्कूल की फीस भरने के लिए घर में पैसे नहीं होते। तब उसकी माँ अपने गहनों में से कुछ बेच देती।

एक दिन आरव ने अपनी माँ से कहा:

“माँ, अगर पैसे की इतनी परेशानी है तो मैं पढ़ाई छोड़ देता हूँ।”

माँ ने तुरंत कहा:

“नहीं बेटा। गरीबी हमारी मजबूरी है, लेकिन तेरी पढ़ाई हमारी उम्मीद है।”

उस दिन आरव की आँखों में आँसू आ गए। उसने मन ही मन फैसला किया कि वह चाहे कुछ भी हो जाए, पढ़ाई नहीं छोड़ेगा।

संघर्ष और मेहनत

अब आरव ने अपने समय का हर पल पढ़ाई के लिए इस्तेमाल करना शुरू कर दिया।

दिन में स्कूल जाता, शाम को गाँव की एक छोटी दुकान पर काम करता। दुकान का मालिक उसे हर महीने थोड़े पैसे दे देता था।

उसी पैसे से वह किताबें और कॉपी खरीदता।

कई बार गाँव में बिजली चली जाती थी। तब वह लालटेन जलाकर पढ़ाई करता।

गाँव के लोग उसे देखकर कहते:

“इतनी पढ़ाई करके क्या करेगा? आखिर में तो मजदूरी ही करनी है।”

लेकिन आरव इन बातों पर ध्यान नहीं देता था।

उसे अपने शिक्षक की बात याद रहती:

“सपना वही सच होता है जिसे इंसान हार मानने से पहले सौ बार कोशिश करे।”

पहली बड़ी परीक्षा

समय के साथ आरव दसवीं कक्षा में पहुँच गया। यह उसके जीवन की पहली बड़ी परीक्षा थी।

पूरे साल उसने दिन-रात पढ़ाई की। गाँव में लोग कहते थे कि इतना पढ़ने से क्या होगा।

लेकिन जब रिज़ल्ट आया, तो पूरा गाँव हैरान रह गया।

आरव ने जिले में पहला स्थान हासिल किया था।

गाँव के लोग जो पहले उसका मजाक उड़ाते थे, अब उसी की तारीफ कर रहे थे।

उसके पिता की आँखों में खुशी के आँसू थे।

उन्होंने कहा:

“बेटा, आज तूने हमें गर्व महसूस कराया है।”

लेकिन आरव जानता था कि यह तो बस शुरुआत है।

शहर की चुनौती

अब आगे की पढ़ाई के लिए उसे शहर जाना था।

उसके शिक्षक ने उसे पटना के एक अच्छे कॉलेज में दाखिला दिलवाने में मदद की।

लेकिन शहर की जिंदगी गाँव से बिल्कुल अलग थी।

यहाँ हर चीज़ महंगी थी — किराया, खाना, किताबें।

आरव ने एक छोटे से कमरे में रहना शुरू किया और साथ में पार्ट-टाइम काम भी करने लगा।

कभी वह बच्चों को ट्यूशन पढ़ाता, कभी किसी दुकान में काम करता।

कई बार वह इतना थक जाता कि पढ़ते-पढ़ते ही सो जाता।

लेकिन उसके अंदर एक ही बात थी — सपना अधूरा नहीं छोड़ना है।

सबसे कठिन समय

एक दिन अचानक उसके पिता बीमार पड़ गए।

घर से फोन आया कि इलाज के लिए पैसे चाहिए।

आरव के पास इतने पैसे नहीं थे।

उसने अपनी बचत के सारे पैसे घर भेज दिए।

अब उसके पास खुद के खर्च के लिए भी कुछ नहीं बचा।

उस रात वह बहुत देर तक छत को देखता रहा।

उसके मन में एक सवाल आया:

“क्या मुझे पढ़ाई छोड़कर घर लौट जाना चाहिए?”

लेकिन तभी उसे अपनी माँ की बात याद आई:

“तेरी पढ़ाई हमारी उम्मीद है।”

उसने फैसला किया कि वह हार नहीं मानेगा।

आखिरी कोशिश

अब आरव का लक्ष्य था — देश की सबसे कठिन इंजीनियरिंग परीक्षा पास करना।

उसने पूरी ताकत से तैयारी शुरू कर दी।

दिन में कॉलेज, शाम को काम, और रात में पढ़ाई।

कई बार वह 4-5 घंटे से ज्यादा सो नहीं पाता था।

लेकिन उसके अंदर एक आग थी।

वह खुद से कहता:

“अगर मैं आज हार गया, तो मेरे सपने भी हार जाएँगे।”

परिणाम का दिन

आखिरकार वह दिन आ गया जब परीक्षा का परिणाम आने वाला था।

आरव का दिल बहुत तेज धड़क रहा था।

उसने इंटरनेट कैफे में जाकर अपना रोल नंबर डाला।

कुछ सेकंड के बाद स्क्रीन पर रिज़ल्ट आया।

आरव की आँखें नम हो गईं।

उसने परीक्षा पास कर ली थी — और वह भी शानदार रैंक के साथ।

उस पल उसे लगा जैसे उसकी सारी मेहनत सफल हो गई।

गाँव की वापसी

कुछ साल बाद आरव एक सफल इंजीनियर बन गया।

जब वह अपने गाँव लौटा, तो पूरा गाँव उसका स्वागत करने के लिए खड़ा था।

जो लोग कभी कहते थे कि वह कुछ नहीं कर पाएगा, वही लोग आज गर्व से उसका नाम ले रहे थे।

आरव ने गाँव के बच्चों के लिए एक छोटी लाइब्रेरी बनवाई।

उसने बच्चों से कहा:

“मैं चाहता हूँ कि इस गाँव से और भी सपने निकलें।”

कहानी की सीख

इस दुनिया में सबसे बड़ी ताकत पैसा नहीं है।

सबसे बड़ी ताकत है — मेहनत, धैर्य और हार न मानने का साहस।

अगर इंसान अपने सपनों के लिए लगातार मेहनत करता रहे, तो कोई भी मुश्किल उसे रोक नहीं सकती।

आरव की तरह हर इंसान के अंदर एक सपना होता है।

बस जरूरत होती है उसे जिंदा रखने की।

याद रखिए:
“सपने वो नहीं जो हम सोते समय देखते हैं,
सपने वो हैं जो हमें सोने नहीं देते”