Tree Voice: The Rise of Environmental Siddhas - 4 in Hindi Spiritual Stories by Prashanth B books and stories PDF | वृक्ष वाणी : पर्यावरण सिद्धों का उदय - 4

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वृक्ष वाणी : पर्यावरण सिद्धों का उदय - 4




विक्रम के कमरे में केवल दीपक की रोशनी जल रही थी। मेज पर ताड़पत्र की वह किताब फैली हुई थी। बगल में उसकी नोटबुक, पेंसिल, और एक संस्कृत-कन्नड़ शब्दकोश (Dictionary)।

विक्रम ने अपना चश्मा ठीक किया और प्राचीन लिपि को पढ़ने की कोशिश की। हर शब्द के कई अर्थ थे। हर वाक्य एक पहेली थी।

"'वनस्पति विद्यावंत'..." उसने लिखते हुए बड़बड़ाया। "'वन' यानी जंगल, 'स्पति' यानी स्वामी... जंगल के स्वामी? नहीं, पौधों के स्वामी..."

घड़ी में बारह बज रहे थे।

उसने अगला पत्ता पलटा। संस्कृत के जटिल श्लोक।
"प्राणायामेन वनस्पति संवादः... प्रकृति चेतना संयोगः..."

"प्राणायाम... सांस का व्यायाम? और वनस्पति संवाद... पौधों के साथ बातचीत?" उसने अपनी नोटबुक में लिखा।

दीपक की रोशनी में किताब के चित्र टिमटिमाते लग रहे थे। पौधों के रेखाचित्र, उनके चारों ओर लहरदार रेखाएं—शायद वह उस आभा (Aura) को दर्शा रही थीं।

घड़ी ने दो बजाए।
विक्रम की आँखें जल रही थीं, लेकिन वह रुका नहीं। अर्जुन... उसकी शक्तियां... इस किताब में सारे जवाब थे।

जब खिड़की की दरारों से पहली रोशनी आई, तो विक्रम ने अंततः कुछ महत्वपूर्ण हिस्सों को समझ लिया।

"इतिहास में अर्जुन जैसे लोग रहे हैं," वह उत्साह से बड़बड़ाया। "वनस्पति पालक। पौधों के रक्षक। वे जड़ी-बूटियों के माध्यम से रोगों को ठीक करते थे..."

उसने अपने नोट्स देखे। पन्ने भरे हुए थे—अनुवाद, प्रश्न, विचार।
"मुझे यह उनके साथ साझा करना होगा," उसने तय किया।

---


रविवार की सुबह। पुराने खंडहर मंदिर में शांति थी। पक्षियों की चहचहाहट, पेड़ों के पत्तों की सरसराहट। सुबह की सूरज की किरणें पेड़ों के बीच से छनकर प्राचीन पत्थरों पर पड़ रही थीं।

अर्जुन और किरण पहले से ही वहां थे। वे एक पुराने मंच पर बैठे, सप्ताहांत के आराम के मूड में थे।
"वह देख, यहाँ पीपल की नई जड़ उगी है," किरण ने टूटी दीवार की दरार की ओर इशारा किया।

अर्जुन ने देखा। उस जड़ के चारों ओर मंद हरी आभा टिमटिमा रही थी। वह रोशनी जो केवल उसे दिखती थी।
"हाँ, सुंदर है," उसने धीरे से कहा।

विक्रम का आगमन
"अरे, कोई आ रहा है," किरण ने कहा।
विक्रम रास्ते पर आ रहा था। उसके हाथ में कपड़े में सावधानी से लिपटी कोई चीज़ थी। उसके चेहरे पर थकान थी, लेकिन आँखों में उत्साह।

"विक्रम! इतनी सुबह यहाँ?" किरण चिल्लाया।
"आना ही पड़ा," विक्रम ने कहा, और उनके पास आकर बैठ गया।

किरण हंसने लगा। "क्या यार, रविवार को भी नहीं छोड़ रहा! आज भी किताब लेकर आ गया!"
अर्जुन ने हंसते हुए जोड़ा। "लगता है रविवार को भी विक्रम के पास होमवर्क है!"

विक्रम हंसा, लेकिन उसका चेहरा गंभीर हो गया। "यह होमवर्क नहीं है। यह तुम्हारे बारे में है, अर्जुन।"
अर्जुन और किरण दोनों गंभीर हो गए।

विक्रम ने सावधानी से कपड़ा खोला। ताड़पत्र की वह किताब उनके सामने थी। प्राचीन, पवित्र।
"यह क्या है?" किरण ने उत्सुकता से पूछा।

"मैंने पूरी रात इसका अध्ययन किया," विक्रम ने कहा। "अर्जुन ने मेरी मदद जिस तरह की थी, याद है न? यह किताब बताती है कि वह कैसे संभव है।"

अर्जुन ने किताब को देखा, दिलचस्पी से लेकिन थोड़े डर के साथ।
"क्या लिखा है?" उसने धीरे से पूछा।

विक्रम ने सावधानी से किताब का पहला पत्ता खोला। उसकी उंगली प्राचीन लिपि पर फिरी।
"इस किताब के अनुसार," उसने धीरे-धीरे पढ़ना शुरू किया, "प्राचीन काल में 'वनस्पति विद्यावंत' हुआ करते थे।"

"वनस्पति विद्यावंत?" किरण ने दोहराया। "मतलब?"
"पौधों का विज्ञान जानने वाले," विक्रम ने अनुवाद किया। "जिन्हें जड़ी-बूटियों से संवाद करने का ज्ञान था।"

अर्जुन उत्साह से आगे झुका। "क्या मेरे जैसे लोग पहले भी थे?"
"थे ही नहीं," विक्रम ने उत्साह से कहा। "उनका सम्मान किया जाता था।"

विक्रम ने धीरे से आगे कहा। "तुम्हें पता है, आयुर्वेद में सुश्रुत महर्षि थे।"
"सुश्रुत?" किरण ने पूछा।
"हाँ। प्राचीन काल के महान चिकित्सक। उन्हें शल्य चिकित्सा (Surgery) का जनक कहा जाता है," विक्रम ने कहा। "उन्होंने अपने ग्रंथ में कहा है—पौधे उनसे बात करते थे।"

"बात करते थे?" अर्जुन ने आश्चर्य से पूछा।
"हाँ। पौधे उन्हें अपने औषधीय गुणों के बारे में बताते थे। कौन सा पौधा किस बीमारी के काम आता है," विक्रम ने समझाया।

"सच में?" किरण ने संदेह से पूछा।
विक्रम ने जारी रखा, अब और अधिक उत्साह के साथ। "देखो, आयुर्वेद में हजारों पौधों के औषधीय गुणों के बारे में लिखा है। हर पौधे के बारे में विस्तार से—कौन सा पत्ता, कौन सी जड़, कौन सा फूल, किस बीमारी के लिए।"

"उन्हें कैसे पता चला?" अर्जुन ने पूछा।
"यही तो सवाल है!" विक्रम ने कहा। "आधुनिक विज्ञान से एक-एक पौधे की जांच करके, उसके रासायनिक गुणों का पता लगाने में सालों लग जाते हैं। लेकिन सुश्रुत और अन्य ऋषियों को हजारों पौधों के बारे में पता था। यह कैसे संभव है?"

सन्नाटा। तीनों सोच रहे थे।
"शायद..." अर्जुन ने धीरे से कहा, "पौधे सचमुच उनसे बात करते थे?"

"बिल्कुल," विक्रम ने कहा। "और इस किताब के अनुसार, तुम्हारे पास वही शक्ति है, अर्जुन।"

"लेकिन कैसे?" अर्जुन ने पूछा। "मुझे नहीं पता कि इसे कैसे इस्तेमाल करना है, यह अपने आप होता है।"

विक्रम ने अगला पन्ना पलटा। "इसलिए यहाँ विधि दी गई है। देखो।"
उसने संस्कृत के श्लोकों को पढ़ना शुरू किया:
"प्राणशक्ति संयोगेन वनस्पति चेतना... प्रकृति तत्त्वा संवादः..."

किरण ने उलझन में मुंह बनाया। "क्या बोल रहा है? मुझे आधे शब्द भी समझ नहीं आ रहे।"
"प्राणशक्ति मतलब जीवन शक्ति... संयोग मतलब जुड़ाव... वनस्पति चेतना मतलब पौधों की चेतना (Consciousness)..." विक्रम समझाने की कोशिश कर रहा था।

अर्जुन परेशान हो गया। "यह बहुत मुश्किल है... ये सारे प्राचीन शब्द..."

विक्रम ने दूसरा श्लोक पढ़ने की कोशिश की:
"ध्यानावस्थायां प्रकृति तत्त्वा साक्षात्कारः... पंचमहाभूत संवेदन..."
"ध्यान की अवस्था में... प्रकृति के तत्व... साक्षात्कार..." वह हर शब्द धीरे-धीरे बोल रहा था।

किरण ने सिर हिलाया। "यह तो स्कूल में हमारे संस्कृत टीचर जैसा लग रहा है। कुछ समझ नहीं आ रहा।"
अर्जुन निराश हो गया। "शायद मैं इसे समझने के लायक नहीं हूँ।"

किरण खड़ा हो गया। "विक्रम, यह बहुत कठिन है। हमें समझ नहीं आएगा।"
अर्जुन भी उदास हो गया। "हाँ... शायद हमें इस ज्ञान की ज़रूरत नहीं है।"
दोनों जाने के लिए तैयार हो रहे थे।

विक्रम ने उन्हें देखा, हताशा के साथ। पूरी रात का अध्ययन... और वे पहले ही हार मान रहे हैं...
विक्रम अचानक खड़ा हो गया, उसकी आवाज़ में हताशा थी।

"रुको! इतनी आसानी से हार मत मानो!"

अर्जुन और किरण ने आश्चर्य से उसकी ओर देखा। विक्रम का इस तरह डांटना उनके लिए नया था।
"लेकिन विक्रम—" किरण ने शुरू किया।
"नहीं!" विक्रम ने उसे रोका। "तुम समझ नहीं रहे हो। अर्जुन, तुम्हारे पास कुछ असाधारण है। कुछ विशेष। और तुम इसे अनदेखा करना चाहते हो? सिर्फ इसलिए कि यह मुश्किल है?"

अर्जुन ने नीचे देखा, अपराधी की तरह।
"लेकिन ये सारे श्लोक..." अर्जुन ने कमजोर आवाज़ में कहा।

"तो हम सरल रास्ता ढूँढेंगे!" विक्रम ने कहा। "हर जटिल चीज़ का एक सरल मूल होता है। चलो उसे ढूँढते हैं।"

विक्रम फिर से किताब के पास बैठ गया। वह पन्नों को धीरे-धीरे पलटने लगा, खोजते हुए।
अर्जुन और किरण धीरे-धीरे वापस बैठ गए, विक्रम के दृढ़ संकल्प से प्रभावित होकर।

"होना चाहिए कहीं..." विक्रम बड़बड़ाया, पन्ने पलटते हुए। "मूल विधि... प्राथमिक तकनीक..."
अचानक उसका हाथ रुक गया। उसकी आँखें किताब के एक खास हिस्से पर टिक गईं।

"... यह देखो!"
तीन सरल पंक्तियाँ:
उसने उत्साह से पढ़ना शुरू किया। ये पंक्तियाँ अलग थीं—अधिक सरल लिपि में, अधिक स्पष्ट।

"वनस्पतिवत् भव
वनस्पतौ प्राणं देहि
वनस्पतिः तव प्राणं ददातु"

"इसका क्या मतलब है?" किरण ने पूछा।
विक्रम ने धीरे-धीरे अनुवाद किया:

"पौधे की तरह बनो।
पौधे के भीतर सांस दो।
पौधा भी तुम्हारे भीतर सांस देगा।"

सन्नाटा। तीनों उन सरल शब्दों को आत्मसात कर रहे थे।

अर्जुन ने धीरे से कहा। "वह... वह मुझे होता हुआ महसूस होता है।"
"क्या होता है?" विक्रम ने उत्सुकता से पूछा।
"जब मैं पौधों के पास होता हूँ... मुझे उनकी सांस महसूस होती है। जैसे वे जीवित सांस ले रहे हों।"

विक्रम उत्साह से आगे झुका। "यह ध्यान तकनीक जैसा है, लेकिन पौधों के साथ!"
"तो बस... पौधों के साथ सांस लेनी है?" किरण ने व्यावहारिक रूप से पूछा।
"इस किताब के अनुसार, हाँ," विक्रम ने कहा। "यह सभी वनस्पति संचार का मूल है।"

अर्जुन ने आसपास के पौधों को देखा। उनके चारों ओर रंगीन आभा धीरे-धीरे टिमटिमा रही थी। "क्या मुझे कोशिश करनी चाहिए?"
"हम सब कोशिश करेंगे," विक्रम ने कहा।

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"यह किताब कहती है," विक्रम ने पढ़ते हुए कहा, "इसे घनी वनस्पति वाली जगह पर करना चाहिए।"
तीनों ने चारों ओर देखा। पुराना खंडहर मंदिर—इसके लिए एकदम सही जगह थी। हर तरफ पौधे, लताएं, पेड़। प्रकृति ने प्राचीन पत्थरों को पूरी तरह ढक लिया था।
"इससे बेहतर जगह नहीं मिल सकती," किरण ने कहा।

"लेकिन अगर कुछ गलत हो गया तो?" अर्जुन ने चिंतित होकर पूछा।
विक्रम ने उसकी ओर देखकर मुस्कुराया। "यह केवल सांस लेना है, अर्जुन। क्या गलत हो सकता है?"

तीनों मंदिर के बीच में बने पुराने मंच के चारों ओर बैठ गए। उनके चारों ओर घनी हरियाली थी। जंगली पेड़, पीपल, लताएं, फूल।
अर्जुन को हर जगह विभिन्न रंगों की आभा दिख रही थी। आज वे अधिक तीव्रता से चमक रही थीं।

"आंखें बंद करो," विक्रम ने निर्देश दिया, किताब को देखते हुए। "अपने पास के किसी एक पौधे पर ध्यान केंद्रित करो।"
तीनों ने आंखें बंद कर लीं।

"अब सांस लो," विक्रम ने धीरे से कहा। "लेकिन पौधे की तरह सांस लो। तुम्हारी सांस पौधे की सांस बन जाए।"
"पौधे सांस कैसे लेते हैं?" किरण ने आंखें बंद किए ही पूछा।
"धीरे... शांति से... सहज रूप से..." विक्रम ने कहा। "कल्पना करो कि पौधा कैसे सांस लेता है।"

सन्नाटा। केवल पक्षियों की चहचहाहट, पत्तों की सरसराहट।

किरण ने अपना चेहरा थोड़ा सिकोड़ा। उसे कुछ खास महसूस नहीं हो रहा था। केवल सामान्य सांस।
विक्रम ने अपनी सांस को धीमा कर दिया, विधिपूर्वक पालन कर रहा था। उसे भी कुछ खास नहीं हो रहा था। लेकिन उसे शांति महसूस हो रही थी।

लेकिन अर्जुन...
अर्जुन ने जैसे ही अपनी सांस शुरू की, कुछ अलग होने लगा।

उसके चारों ओर की रंगीन आभा तीव्र होने लगी।
हरा, नीला, बैंगनी, सुनहरा प्रकाश उसके चारों ओर घूमने लगा, नृत्य करने लगा।
उसकी सांस धीरे-धीरे गहरी हो गई। उसके चेहरे पर शांति का भाव आ गया।

अर्जुन की सांस एक विशेष लय में आ गई। धीमी, गहरी, प्राकृतिक। पौधों की सांस की तरह।
उसके चेहरे में सूक्ष्म बदलाव आया। घबराहट से शांति। शांति से विस्मय।

उसका सिर थोड़ा बाईं ओर मुड़ा, फिर दाईं ओर। आंखें बंद होने के बावजूद, ऐसा लग रहा था जैसे वह कुछ देख रहा हो। कुछ सुन रहा हो।
आभा और तीव्र हो गई, उसके चारों ओर भंवर की तरह।

किरण और विक्रम अभी भी आंखें बंद किए, अपनी सांस पर केंद्रित थे। उन्हें पता नहीं था कि अर्जुन के साथ क्या हो रहा है।

अर्जुन के चेहरे पर विभिन्न रंगों की आभा खेल रही थी। उसकी बंद पलकों पर सुनहरा प्रकाश टिमटिमा रहा था।
उसकी सांस और गहरी हो गई। उसका शरीर पूरी तरह स्थिर हो गया, लेकिन उसके चेहरे का भाव... जैसे वह कुछ अद्भुत अनुभव कर रहा हो।

सूक्ष्म ध्वनियां—पत्तों की सरसराहट, पौधों की फुसफुसाहट—वे तीव्र हो गईं।
अर्जुन के होंठ थोड़े हिले, जैसे कुछ कह रहे हों। लेकिन आवाज़ नहीं आई।

रोशनी और चमकदार हो गई, उसे पूरी तरह से घेरते हुए।
और उसके चेहरे पर... शांति, विस्मय, और किसी पवित्र अनुभव का भाव उभर आया।
वह पौधों की दुनिया में प्रवेश कर रहा था...