शाम को मिश्राजी घर आए।
आकर उन्होंने रोज़ की तरह हाथ-पैर धोए और फिर खाने के लिए बैठ गए।
आज का दिन भी बाकी दिनों जैसा ही लग रहा था।
ऐसा महसूस ही नहीं हो रहा था कि कुछ बदला है।
सभी लोग टीवी देखते हुए चुपचाप खाना खा रहे थे।
तभी मिश्राजी ने अपने बेटे से उस नए कानून के बारे में बात की।
बेटे ने बताया कि इस कानून का कई जगहों पर ज़ोर-शोर से विरोध हो रहा है, और शायद यह कानून टिक नहीं पाएगा।
यह सुनकर मिश्राजी थोड़े परेशान हो गए।
पर वे यह भी जानते थे कि केवल एक व्यक्ति की सोच से समाज में परिवर्तन नहीं आता।
आज का समय भी वैसा नहीं रहा
जैसा कभी था,
जब किसी महापुरुष के उपदेश से ही समाज की दिशा बदल जाया करती थी।
आज लोग सुनते तो हैं,
पर बदलना उतना आसान नहीं रहा।रोज़ की तरह अब पूरा समाज सो चुका था।
यह समाज रोज़ जागता है, रोज़ सोता है,
रोज़ नई-नई बातें करता है।
पर जब बात परिवर्तन की आती है,
तो यही समाज उसके खिलाफ खड़ा हो जाता है।
शायद समाज नहीं चाहता कि पाँच सौ सालों से चली आ रही इन प्रथाओं को कोई बदले।
वह नहीं चाहता कि इस समाज की सारी जातियाँ एक हो जाएँ।
वह नहीं चाहता कि सब लोग एक ही थाली में बैठकर खाना खाएँ,
या एक ही जगह खड़े होकर खुद को बराबर समझें।
क्योंकि शायद बराबरी का विचार
सदियों से बनी हुई उस दीवार को गिरा देता है,
जिसे इस समाज ने अपने ही हाथों से खड़ा किया था।रोज़ के दिन इसी तरह निकलते गए।
एक सुबह जब मिश्रा जी ने अख़बार खोला,
तो बड़े-बड़े अक्षरों में एक ख़बर छपी थी—
“UGC द्वारा लाया गया नया नियम वापस ले लिया गया।”
कारण भी साफ लिखा था—
जिस समाज के लिए यह नियम बनाए गए थे,
उसी समाज का एक बड़ा हिस्सा
उन्हें स्वीकार करने को तैयार नहीं था।
शायद उन्हें यह मंज़ूर नहीं था
कि सदियों से बनी ऊँच-नीच की दीवारें ढह जाएँ।
शायद उन्हें यह भी मंज़ूर नहीं था
कि अलग-अलग जातियों और वर्गों के बच्चे
एक ही जगह खड़े होकर
खुद को बराबर समझने लगें।
समाज की जड़ें इतनी गहरी थीं
कि कानून की एक कलम
उन्हें इतनी आसानी से हिला नहीं सकी।
मिश्रा जी कुछ देर तक अख़बार को देखते रहे।
फिर धीरे से अख़बार मोड़कर रख दिया।
उन्हें लगा—
शायद बदलाव के रास्ते में
सबसे बड़ी रुकावट कोई कानून नहीं,
बल्कि समाज की सोच है।क्या समाज कभी सच में बदल पाएगा?
क्या वह उन आवाज़ों को पंख दे पाएगा
जो उड़ना चाहती हैं,
जो बराबरी से जीना चाहती हैं?
या फिर समाज यूँ ही
पुरानी रूढ़ियों और परंपराओं की
जंजीरों में बंधा रहेगा?
क्या आने वाला समय
इन दीवारों को तोड़ पाएगा,
या फिर हर पीढ़ी
उन्हीं सवालों के साथ जीती रहेगी
जिन्हें पिछली पीढ़ियाँ छोड़ गई थीं?क्या हमारी सरकार भी सच में चाहती है कि समाज में परिवर्तन आए?
या फिर वह केवल समाज को परखना चाहती है —
यह देखना चाहती है कि सदियों पुरानी परंपराएँ
आज भी उतनी ही मजबूत हैं या नहीं।
कभी-कभी लगता है कि राजनीति
धर्म के नाम पर लोगों को बाँटने का काम ज़्यादा करती है।
जिस भारत माता की धरती पर उगा अन्न
हिंदू भी खाता है और मुसलमान भी,
उसी धरती के लोगों के बीच
दीवारें खड़ी कर दी जाती हैं।
और जहाँ तक हिंदुओं के बीच की दीवारों की बात है,
वह तो किसी से छिपी नहीं हैं।
जातियों की ये रेखाएँ
पहले भी थीं,
और शायद आज भी कहीं न कहीं मौजूद हैं।और शायद ये दीवारें अभी बनी ही रहेंगी।
क्योंकि अब इन्हें गिराने या खड़ी करने का काम
कई बार इंसान नहीं, पैसा करने लगा है।
आज समाज में अक्सर वही स्वीकार किया जाता है
जिसके पास धन और साधन होते हैं।
जिसके पास पैसा है, वह कई जगहों पर
उन समाजों में भी जगह बना लेता है
जहाँ कभी बराबरी की बात करना भी कठिन था।
लेकिन सवाल फिर भी वहीं रह जाता है—
क्या केवल पैसे से सच में बराबरी आ सकती है?
या फिर समाज के मन में बैठी ये दीवारें
अब भी कहीं न कहीं ज्यों की त्यों खड़ी हैं?मिश्रा जी रोज़ की तरह अस्पताल जाते और लौटते रहे। दिन यूँ ही बीतते चले गए। इसी बीच बच्चियों की स्कूल की छुट्टियाँ भी शुरू होने वाली थीं।
घर में एक दिन बैठकर सबने बात की कि अब छुट्टियों में क्या किया जाए। आखिर तय हुआ कि मिश्राइन और दोनों बच्चियाँ कुछ दिनों के लिए गाँव चली जाएँगी। शहर की भागदौड़ से दूर गाँव की हवा भी बदल जाएगी और दादा-दादी से भी मुलाकात हो जाएगी।
मिश्रा जी ने कहा,
“तुम लोग पहले चले जाओ, मैं कुछ दिनों बाद अस्पताल से छुट्टी लेकर आ जाऊँगा।”
बेटे के बारे में भी बात हुई। वह शहर के एक प्रतिष्ठित कॉलेज में पढ़ता था और हॉस्टल में रहता था। उसकी छुट्टियाँ कम थीं। इसलिए तय हुआ कि वह सीधे शहर से ही दो-तीन दिन के लिए गाँव आ जाएगा।
असल में बड़े बच्चों का मन अब गाँव में कम ही लगता था।
गाँव की शांत गलियों से ज़्यादा उन्हें अपने दोस्तों का साथ और शहर की रौनक भाती थी।
फिर भी माँ की बात मानकर उसने कहा,
“ठीक है, दो-तीन दिन के लिए आ जाऊँगा।”
घर में अब गाँव जाने की तैयारियाँ शुरू हो गईं।
मिश्राइन कपड़े समेटने लगीं, बच्चियाँ भी अपने खिलौने और किताबें बैग में रखने लगीं।
शहर का घर कुछ दिनों के लिए सूना होने वाला था,
और शायद गाँव की गलियों में फिर से एक नया अध्याय शुरू होने वाला था।सब लोग ट्रेन से गाँव जाने वाले थे। इसलिए शाम की ट्रेन का टिकट पहले ही करा लिया गया था।
शाम होते-होते स्टेशन पर काफी भीड़ हो गई थी। लोग अपने-अपने बैग और सामान के साथ इधर-उधर भागते दिखाई दे रहे थे। उसी भीड़ के बीच मिश्रा जी अपनी पत्नी और दोनों बेटियों को ट्रेन में बैठाने आए थे।
ट्रेन के आने की घोषणा हुई तो प्लेटफॉर्म पर हलचल और बढ़ गई। कुछ ही देर में ट्रेन प्लेटफॉर्म पर आकर रुकी। मिश्रा जी ने जल्दी-जल्दी सामान अंदर रखवाया और बच्चियों को सीट पर बैठा दिया।
दोनों बच्चियाँ गाँव पहुँचने को लेकर बहुत उत्साहित थीं। वे खिड़की से बाहर झाँक-झाँक कर स्टेशन को देख रही थीं। उनके चेहरे पर एक अलग ही खुशी थी—शायद शहर की भागदौड़ से दूर कुछ दिन खुलकर जीने की खुशी।
ट्रेन चलने लगी तो मिश्रा जी ने एक बार फिर समझाया,
“ध्यान से जाना… पहुँचकर फोन करना।”
मिश्राइन ने सिर हिलाकर हामी भरी और बच्चियों ने हाथ हिलाकर अपने पिता को अलविदा कहा।
धीरे-धीरे ट्रेन प्लेटफॉर्म से आगे बढ़ गई।
मिश्रा जी कुछ देर तक उसी जगह खड़े ट्रेन को जाते हुए देखते रहे, फिर चुपचाप स्टेशन से बाहर निकलकर घर की ओर लौट आए।
उधर ट्रेन में बैठी बच्चियाँ गाँव पहुँचने के लिए बहुत उत्सुक थीं। उनके मन में गाँव की गलियाँ, खेत, पेड़ और अपने रिश्तेदारों से मिलने की तस्वीरें घूम रही थीं।उसी बीच ट्रेन अपने रास्ते पर बढ़ती जा रही थी।
ट्रेन हमारे देश का ऐसा साधन है, जहाँ समाज की हर तस्वीर एक साथ दिखाई दे जाती है। यहाँ अमीरी-गरीबी, ऊँच-नीच, हर तरह के लोग एक ही डिब्बे में सफर करते नजर आ जाते हैं।
आप जिधर भी नजर घुमाओ, वहाँ भाँति-भाँति के लोग दिखाई देते हैं। कोई बड़े सूटकेस के साथ सफर कर रहा होता है, तो कोई एक छोटा सा झोला लेकर। कोई अपने मोबाइल में व्यस्त होता है, तो कोई खिड़की के बाहर बदलते दृश्यों को चुपचाप निहारता रहता है।
किसी सीट पर परिवार बैठा होता है, जो रास्ते भर खाने-पीने और हँसी-मजाक में लगा रहता है। वहीं दूसरी ओर कोई मजदूर वर्ग का आदमी होता है, जो दिनभर की थकान के बाद सीट मिलते ही आँखें बंद कर लेता है।
कभी-कभी तो ऐसा लगता है जैसे ट्रेन सिर्फ लोगों को एक जगह से दूसरी जगह नहीं ले जाती, बल्कि पूरे समाज को अपने साथ लेकर चलती है—उसकी खुशियाँ, उसकी परेशानियाँ और उसके भीतर छिपे भेदभाव भी।
मानो ट्रेन का हर डिब्बा इस देश के समाज की एक छोटी सी झलक हो।लेकिन इस ट्रेन के छोटे से समाज में भी ऊँच-नीच की दीवारें साफ दिखाई देती हैं।
अगर कोई जनरल टिकट वाला गलती से भी ए.सी. या स्लीपर डिब्बे में घुस जाए, तो जैसे अचानक हंगामा सा मच जाता है। लोग ऐसे देखने लगते हैं जैसे कोई बहुत बड़ा अपराध हो गया हो। कुछ लोग भौंहें चढ़ा लेते हैं, कोई सीट से उठकर टिकट पूछने लगता है, तो कोई सीधे शब्दों में डाँट देता है—
“अरे भाई, ये जनरल नहीं है… बाहर जाओ।”
लेकिन कभी कोई यह नहीं सोचता कि जनरल डिब्बे की हालत क्या होती है।
जहाँ कभी-कभी इतनी भीड़ होती है कि खड़े रहने की जगह तक नहीं बचती। साँस लेना भी मुश्किल हो जाता है।
ऐसे में अगर कोई मजबूरी में दूसरे डिब्बे में चला भी जाए, तो क्या वह सच में कोई अपराध कर रहा होता है?
या वह बस थोड़ी सी जगह और थोड़ी सी साँस लेने की कोशिश कर रहा होता है।
पर वहाँ पहुँचते ही उसे सौ लोगों की सौ तरह की बातें सुननी पड़ती हैं—
कभी ताने, कभी गालियाँ, तो कभी अपमान।
और उस पल लगता है कि यह ट्रेन भी हमारे समाज से अलग नहीं है।
यहाँ भी डिब्बे अलग-अलग हैं, जगहें अलग-अलग हैं…
और शायद इंसानों की कीमत भी अलग-अलग मानी जाती है।जिस डिब्बे में मिश्राइन और बच्चियाँ बैठी थीं, उसके बगल वाले डिब्बे में बहुत भीड़ थी।
क्योंकि होली का त्योहार पास आ रहा था, और ऐसे समय में हर कोई अपने-अपने घर पहुँचना चाहता है।
उस दिन ट्रेन में इतनी भीड़ थी कि लोगों को बैठना तो दूर, खड़े रहने की जगह भी मुश्किल से मिल रही थी।
फिर भी लोग किसी न किसी तरह डिब्बों में घुसे जा रहे थे।
आखिर करते भी क्या?
ज्यादातर लोग मजदूर वर्ग के थे, जिन्हें काम के लिए एक शहर से दूसरे शहर जाना पड़ता है।
कोई पंजाब से लौट रहा था, कोई दिल्ली से, तो कोई किसी फैक्टरी या निर्माण स्थल से छुट्टी लेकर अपने गाँव जा रहा था।
हर किसी के हाथ में एक छोटा सा बैग या झोला था,
जिसमें शायद कपड़ों से ज्यादा अपने घर पहुँचने की खुशी भरी हुई थी।
भीड़, शोर और धक्का-मुक्की के बीच भी उनके चेहरों पर एक अलग सी चमक थी—
क्योंकि उन्हें पता था कि कुछ ही घंटों में वे अपने घर, अपने लोगों के बीच होंगे।
लेकिन उसी भीड़ में कई ऐसे लोग भी थे
जो किसी तरह दूसरे डिब्बों में घुसने की कोशिश कर रहे थे,
क्योंकि जनरल डिब्बों में अब साँस लेने तक की जगह नहीं बची थी।उसी भीड़-भाड़ के बीच उस दिन कुछ लड़कियाँ बिना ए.सी. टिकट के ए.सी. डिब्बे में घुस गई थीं।
शायद जनरल डिब्बे की भीड़ से बचने के लिए उन्होंने ऐसा किया था।
लेकिन जैसे ही लोग उन्हें देखने लगे,
पूरे डिब्बे में एक अजीब सा माहौल बन गया।
लोग उन्हें ऐसे घूर रहे थे
जैसे उन्होंने कोई बहुत बड़ा अपराध कर दिया हो।
कोई धीरे-धीरे अपने पास बैठे व्यक्ति से कुछ कह रहा था,
कोई तिरछी नज़रों से उन्हें देख रहा था,
और कुछ लोग तो साफ-साफ बोल भी रहे थे—
“अरे भाई, टिकट है भी या नहीं?”
उन लड़कियों के चेहरों पर थकान भी थी
और थोड़ी झिझक भी।
शायद उन्हें भी पता था कि वे उस जगह पर बैठी हैं
जहाँ समाज ने उनके लिए जगह तय नहीं की है।
और उस पल ऐसा लग रहा था
जैसे ट्रेन का वह छोटा सा डिब्बा
हमारे पूरे समाज की तस्वीर बन गया हो—
जहाँ जगह से ज़्यादा यह मायने रखता है
कि कौन कहाँ बैठने का हक रखता है।जिस जगह वे लड़कियाँ खड़ी थीं, वहाँ लगभग सभी पुरुष ही बैठे थे।
औरतें मुश्किल से एक-दो ही दिखाई दे रही थीं।
डिब्बे में बैठे ज़्यादातर लोग अपने आप को सभ्य और पढ़े-लिखे समाज से आने वाला मानते थे।
कपड़ों से, बात करने के ढंग से और उनके चेहरे के भाव से यह साफ झलक रहा था कि वे खुद को दूसरों से अलग और बेहतर समझते हैं।
लेकिन उन्हीं सभ्य चेहरों के बीच
वे लड़कियाँ चुपचाप खड़ी थीं—
जैसे किसी ऐसी जगह पर आ गई हों
जहाँ उनका होना ही कुछ लोगों को खटक रहा था।
किसी ने सीधे कुछ नहीं कहा,
लेकिन उनकी नज़रें बहुत कुछ कह रही थीं।
कभी-कभी शब्दों से ज़्यादा
नज़रें इंसान को उसकी जगह याद दिला देती हैं।उस दिन ट्रेन में इतनी भीड़ थी कि उन लड़कियों के लिए जनरल डिब्बे में घुस पाना लगभग असंभव था।
मजबूरी में वे ए.सी. डिब्बे में आ गईं।
लड़कियाँ भी किसी असभ्य जगह से नहीं आई थीं।
उनके कपड़ों और व्यवहार से साफ दिख रहा था कि वे भी एक साधारण, सभ्य परिवार से आती हैं।
बस फर्क इतना था कि उनके पास जनरल डिब्बे का टिकट था।ए.सी. डिब्बे में ऊपर की कई सीटें खाली थीं।
भीड़ में खड़े-खड़े उन लड़कियों के पैर जवाब देने लगे थे।
आख़िर हिम्मत करके उनमें से एक लड़की ने सामने बैठे एक युवक से धीरे से कहा—
“भैया, अगर आपको कोई आपत्ति न हो तो… क्या मैं ऊपर वाली सीट पर थोड़ी देर बैठ जाऊँ?”
लड़की की आवाज़ में थकान भी थी और संकोच भी।
लेकिन उसके इतना कहते ही वह युवक तुरंत बोल पड़ा—
“नहीं, मुझे दिक्कत है। आप यहाँ नहीं बैठ सकतीं।”
उसका जवाब इतना अचानक और कठोर था
कि कुछ क्षण के लिए वहाँ खड़े लोगों की निगाहें भी उसी तरफ मुड़ गईं।
लड़की चुप हो गई।
उसने दोबारा कुछ नहीं कहा।
बस वहीं खड़ी रही—
जैसे उसे अचानक यह याद दिला दिया गया हो
कि हर खाली जगह
हर किसी के लिए नहीं होती।
उस छोटे से डिब्बे में
भीड़ सिर्फ लोगों की नहीं थी,
बल्कि सोच की दीवारों की भी थी,
जो शायद सीटों से भी ज़्यादा भरी हुई थीं।शायद उसी क्षण उस सभ्य समाज ने अपना उत्तर दे दिया था।
कोई ऊँची आवाज़ नहीं हुई, कोई झगड़ा भी नहीं हुआ—
लेकिन आँखों और शब्दों में छिपी दूरी सब कुछ कह गई।
डिब्बे में बैठे अधिकतर लोग साफ-सुथरे कपड़ों में थे,
किसी के हाथ में प्रसाद की थैली थी,
किसी के माथे पर तिलक लगा हुआ था।
लगता था जैसे वे सब किसी धार्मिक स्थान से लौट रहे हों।
पर उस पल यह समझना मुश्किल नहीं था कि
धर्म की यात्रा से लौटते लोग भी
मन के भीतर की दीवारों को साथ ही लेकर चलते हैं।
ट्रेन आगे बढ़ती रही…
और उसके साथ-साथ इस देश का समाज भी—
जहाँ कई बार दूरी रास्तों में नहीं, बल्कि सोच में होती है।