Beyond the Boundaries - 3 in Hindi Women Focused by ARTI MEENA books and stories PDF | सीमाओं से परे - 3

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सीमाओं से परे - 3

देखते ही देखते सगाई का दिन भी आ गया।
घर में चारों तरफ खुशी का माहौल था।
सब लोग तैयारियों में लगे हुए थे।
सीमा और अशोक भी खुश लग रहे थे,
और दोनों परिवारों के चेहरे पर भी संतोष दिखाई दे रहा था।
सगाई का कार्यक्रम शहर के एक शादी हॉल में रखा गया था।
रिश्तेदार और जान-पहचान वाले लोग भी धीरे-धीरे आने लगे।
फिर सगाई की रस्में शुरू हुईं —
जैसे वर्षों से हमारे समाज में होती चली आ रही हैं।
अंगूठियों का आदान-प्रदान हुआ,
सबने तालियाँ बजाईं और दोनों को आशीर्वाद दिया।
उस पल सब कुछ बहुत सुंदर और खुशियों से भरा लग रहा था —
जैसे एक नई कहानी की शुरुआत हो रही हो।
सगाई की रस्में पूरी होने के बाद सब लोग एक-दूसरे से मिल रहे थे और हँसी-मज़ाक चल रहा था।
उसी दिन अशोक ने सीमा से कहा —
“अगर तुम्हें ठीक लगे तो हम शादी तक थोड़ा-थोड़ा बात कर लिया करेंगे…
ताकि हम एक-दूसरे को और अच्छे से समझ सकें।”
फिर वह उसे पास की दुकान पर ले गया और उसके लिए एक नया फोन दिला दिया।
अशोक मुस्कुराकर बोला —
“अब जब भी समय मिले, बात कर लिया करेंगे।”
सीमा ने हल्की मुस्कान के साथ फोन ले लिया।
उसके लिए यह सब थोड़ा नया भी था और थोड़ा अच्छा भी लग रहा था।
उसे लगा —
शायद इसी तरह धीरे-धीरे दो अनजान लोग
एक-दूसरे को समझने लगते हैं।दोनों ने थोड़ी देर और बातें कीं।
इधर-उधर रिश्तेदारों के साथ हँसी-मज़ाक का माहौल भी चलता रहा।
धीरे-धीरे दिन बीतने लगे।
अब सीमा और अशोक फोन पर अक्सर बात करने लगे थे।
वे एक-दूसरे की पसंद और नापसंद जानने लगे थे।
कभी घूमने की जगहों की बातें होतीं,
तो कभी अपने-अपने सपनों और भविष्य के बारे में।
समय के साथ इन बातों पर रोक-टोक भी कम हो गई थी।
पहले ऐसा नहीं था।
एक समय था जब अगर कोई लड़की शादी से पहले लड़के को देख भी ले,
तो उसे बड़ी बात माना जाता था।
लेकिन समय के साथ सोच भी बदलने लगी थी।
अब लोगों को यह समझ आने लगा था कि
अगर दो लोगों को पूरी ज़िंदगी साथ निभानी है,
तो एक-दूसरे को समझना और जानना भी उतना ही ज़रूरी है।
इसी बीच सीमा ने सरकारी नौकरी का फॉर्म भरा था। उसने भी बैंक की नौकरी का ही फॉर्म भरा, क्योंकि अशोक ने उसे बताया था कि बैंक की नौकरी में ज़्यादा झंझट नहीं होता—समय से आओ, समय से जाओ, अच्छी सैलरी भी मिलती है। और अशोक को भी इसमें कोई आपत्ति नहीं थी।उधर राधा भी अपने भविष्य के बारे में सोचने लगी थी। अब आगे उसे क्या करना है और क्या नहीं, वह अपने मन में कई योजनाएँ बनाने लगी थी। यह उम्र ही कुछ ऐसी होती है, जहाँ सपने भी पूरे होते हैं और कई बार वही सपने पल भर में टूट भी जाते हैं।
लेकिन राधा केवल चुलबुली ही नहीं, बल्कि समझदार भी थी। उसने मन ही मन निर्णय लिया कि अब वह भी अपनी दीदी के साथ सरकारी नौकरी की तैयारी करेगी।
आज समाज में सरकारी नौकरी को इतना बड़ा बना दिया गया है कि अगर किसी लड़के के पास सरकारी नौकरी नहीं हो तो उसकी शादी होना भी मुश्किल हो जाता है।
और हमारे देश की स्थिति भी किसी से छिपी नहीं है। कभी किसी परीक्षा का पेपर लीक हो जाता है, तो कभी किसी परीक्षा को ही रद्द कर दिया जाता है। लेकिन सरकार को जैसे इन बातों से ज्यादा फुर्सत नहीं होती। बहस और विवाद अक्सर दूसरी ही बातों पर चलते रहते हैं।
इस बीच देश का युवा एक सरकारी नौकरी पाने के लिए अपनी जिंदगी के तीन-चार साल बंद कमरों में किताबों के बीच गुजार देता है। दिन-रात मेहनत करता है, उम्मीदें बाँधता है। लेकिन कई बार अंत में यह सुनने को मिलता है कि उस परीक्षा का पेपर भी लीक हो गया।
तब न केवल उसका समय टूटता है, बल्कि उसके साथ-साथ उसके कई सपने भी बिखर जाते हैं।
अब गर्मियों के दिन थे। पढ़ाई का तरीका भी धीरे-धीरे बदल चुका था। अब ऑनलाइन का ज़माना आ गया था। इसलिए दोनों बहनों ने मिलकर निर्णय लिया कि वे घर पर रहकर ही पढ़ाई करेंगी और ऑनलाइन कोचिंग के माध्यम से अपनी तैयारी जारी रखेंगी।
दिन धीरे-धीरे बीतते गए। तेज़ गर्मी भी अब अपने अंतिम छोर पर पहुँचने लगी थी। ऐसा लगने लगा था मानो गर्मी थक कर विदा लेने वाली हो।
तभी आसमान में काले बादल घिरने लगे और बरसात ने जैसे अपने आने का संदेश भेज दिया। चारों ओर मोरों की आवाज़ें गूंजने लगीं। गाँव के हर कोने से उनकी मधुर पुकार सुनाई देने लगी।
प्रकृति जैसे नए मौसम के स्वागत की तैयारी कर रही थी।
इधर सीमा के ससुराल वाले भी शादी की तारीख तय कराने के लिए पंडित जी के पास गए। उन्होंने पंचांग देखकर शुभ मुहूर्त निकाला।
पंडित जी ने बताया कि अक्टूबर महीने की 6 तारीख को विवाह के लिए बहुत अच्छा मुहूर्त है, और वह भी सुबह का समय है, जो शादी के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है।
यह सुनकर घर के सभी लोग प्रसन्न हो गए। अब जैसे-जैसे तारीख तय हो गई थी, वैसे-वैसे दोनों परिवारों में शादी की तैयारियों की बातें भी शुरू होने लगी थीं।अब शादी को पूरे दो महीने का समय बाकी था। इस दौरान अशोक और सीमा की फोन पर बातें होती रहती थीं। धीरे-धीरे दोनों एक-दूसरे को समझने लगे थे।
दोनों को अपने रिश्ते की सीमाएँ भी पता थीं, इसलिए वे हमेशा एक-दूसरे से सम्मान के साथ बात करते थे। उनकी बातचीत में कभी हँसी-मजाक होता, तो कभी भविष्य की बातें भी हो जातीं।
कभी वे अपनी पसंद-नापसंद के बारे में बताते, तो कभी अपने सपनों के बारे में। इन छोटी-छोटी बातों के बीच ही दोनों के बीच एक अपनापन सा बनने लगा था।
सीमा को भी अब लगने लगा था कि शायद वह अशोक के साथ अपनी आने वाली जिंदगी अच्छे से निभा पाएगी, और अशोक को भी सीमा की समझदारी और सादगी बहुत पसंद आने लगी थी।समय धीरे-धीरे बीत रहा था। शादी की तारीख भी अब ज्यादा दूर नहीं रह गई थी। घर में भी तैयारियों की बातें होने लगी थीं। माँ कभी कपड़ों की सूची बनातीं, तो कभी रिश्तेदारों की।
सीमा यह सब देखती तो उसके मन में खुशी भी होती और हल्की-सी चिंता भी। एक लड़की के लिए शादी का मतलब सिर्फ नई शुरुआत नहीं होता, बल्कि अपने घर, अपने लोगों और अपनी आदतों को पीछे छोड़कर एक बिल्कुल नए जीवन में कदम रखना भी होता है।
उधर अशोक भी अपनी तरफ से शादी की तैयारियों में लगा हुआ था। लेकिन फिर भी वह समय निकालकर सीमा से बात कर लिया करता था। कभी-कभी वह सीमा से उसके पढ़ाई के बारे में पूछता, तो कभी यह भी कहता कि शादी के बाद भी अगर वह नौकरी करना चाहे तो वह उसे जरूर सहयोग देगा।
यह सुनकर सीमा को थोड़ा सुकून मिलता। उसे लगता कि शायद उसने जिस इंसान को जीवनसाथी के रूप में चुना है, वह उसे समझने वाला है।
लेकिन फिर भी उसके मन के किसी कोने में एक हल्का-सा डर बना रहता था। क्योंकि फोन पर की गई बातें किसी इंसान की पूरी सच्चाई तो नहीं दिखा पातीं।
कभी-कभी उसे उस दिन का सफेद तरबूज याद आ जाता, जो बाहर से देखकर उसे लाल और मीठा लगा था, लेकिन अंदर से बिल्कुल कच्चा निकला।
सीमा सोचती—
“कहीं जिंदगी भी वैसी ही तो नहीं होगी? बाहर से सब कुछ अच्छा दिखे और अंदर जाकर कुछ और ही निकले…”
इन सवालों के साथ ही वह फिर खुद को समझा लेती कि हर रिश्ते को समय देना पड़ता है। भरोसा धीरे-धीरे ही बनता है।
और इसी भरोसे के साथ वह आने वाले दिनों का इंतजार करने लगी।