Shrapit ek Prem Kahaani - 59 in Hindi Spiritual Stories by CHIRANJIT TEWARY books and stories PDF | श्रापित एक प्रेम कहानी - 59

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श्रापित एक प्रेम कहानी - 59

त्रिजला कहती है--

> आपकी आञा हो तो इसे अभी यहां से कुंभ्मन के पास लेकर चलुं ? 

मातंक त्रिजला को मना करते हूए कहता है--

>" नही त्रिजला हम इसे ऐसे ही यहां से नही ले जा सकते । ज्ञात रहे ये वो दुष्ट मानव नही है जिसके पास 
कुंभ्मनी की मणी है। ये एक अच्छा मानव है । हमे इससे उस रात को हूई घटना के बारे मे जानना है। अगर हम इस क्षण इसे यहां से उठाकर ले जाते हैं तो वह दुष्ट सतर्क हो जाएगा। जिसके पास कुंभ्मनी का मणी है। अभी हम यहां से चलते है। क्योकी हमे उस मानव को भी ढुंढना है जिसके पास कुंभ्मनी का मणी है। "

 इतना बोलकर दौनो ही वहां से उड़कर चला जाता है। सभी एकांश को हैरानी से दैख रहा था । तभी गुणा कहता है--

> ये क्या था यार ? तुमने ये कैसे किया ? 

एकांश कहता है --

> प्यार की भाषा सभी समझते है , समझा । अब चलो रात बहुत हो गई है। 

इतना बोलकर सभी सोने चला जाता है। आलोक सोया हुआ था के तभी उसका फोन रिंग होने लगता है। आलोक दैखता है के उसके फोन में संपूर्णा का फोन आ रहा था। आलोक फोन रिसिव करता है और कहता है---

> हां बोलो मेरी जान क्या कर रही हो ? 

तो उधर से संपूर्णा की आवाज आती है---

> तुम्हारी जान तुम्हे याद कर रही है।

 संपूर्णा नाराज होकर कहती है--

> अच्छा ये बताओ के शाम को तुमने कॉल क्यों नही किया? 

 आलोक कहता है --

> थोड़ा काम था इसीलिए भूल गया । 

संपूर्णा कहती है--

> हां मुझे पता था के ऐसा ही कुछ हुआ होगा। 

आलोक कहता है--

> सॉरी बाबा ! अच्छा ये बताओ तुम्हारी एग्जाम कैसी रही ?

 संपूर्णा कहती है़---

> वो तो अच्छी रही पर मैं तुम्हें अपने एग्जाम के बारे मे बता के लिए कॉल नही किया हूँ। 

आलोक सैतानी अदाज से पुछता है--

> तो... फिर किस लिए ।

 संपूर्णा कहती है--

> जैसे तुम्हे कुछ पता ही नही है । ज्यादा बनो मत । 

आलोक कहता है--

> अच्छा ! पर सच मे बताओ ना क्या बात है। 

संपूर्णा कहती है--

> धत् मुझे शरम आ रही है। 

आलोक कहता है--

> उस सुबह जो हुआ अभी भी करने का मन कर रहा है क्या ?

 संपूर्णा कहती है--

> तुम्हे कैसे पता के मैं उसी के बारे मे सौच रही हूँ ?  

आलोक कहता है--

> तुम्हारी तेज धड़कन से पता चल रहा है। उस दिन 
सुबह अगर चतुर नही आता तो हम लोग चरम सिमा तक पहूँचने वाले थे।

 संपूर्णा कहती है--

> तुमने उस दिन मुझे अधुरा छौड़ दिया फिर पुरा दिन 
मेरे दिमाग मे बस सिर्फ संम्भोग ही चल रहा था। 

आलोक कहता है--

> पर पूरा दिन क्यों ?

 संपूर्णा कहती है--

> अरे पागल संम्भोग बिच मे ही छौड़ देने पर ऐस़ा फील होता है। 

संपूर्णा धिरे से बोलती है--

> मेरा तो मन अभी भी कर रहा है। 

आलोक कहता है--

> अच्छा तो मैं आ जाऊ ? 

संपूर्णा कहती है --

> सच मे क्या ?

आलोक कहता है--

> अगर तुम कहो तो कुछ भी कर जाऊ। 

संपूर्णा कहती है-- 

> ठीक है तुम आ जाओ मैं तुम्हे वही पर मिलुगीं। 

आलोक कहता है--

> ठीक है मैं आ रहा हूँ। 

इतना बोलकर आलोक अपनी बाइक लेकर संपूर्णा के पास आ जाता है। और कुछ ही दैर मे आलोक संपूर्णा के घर के बाहर पहूँच जाता है। जहां पर संपूर्णा पहले से ही आलोक का इंतजार कर रही थी। आलोक अपनी बाइक को पास मे खड़ा कर देता है और उतर कर संपूर्णा के पास चला जाता है।

 संपूर्णा ब्लेक कलर की नाईटी पहनी हुई थी जो ट्रांसपेरेंट थी । जिसमे से संपूर्णा की अंतर वस्त्र दिख रहा था आलोक संपूर्णा की वक्ष को दैख रहा था जो उभरे हूए थे। आलोक संपूर्णा को झट से बाहों मे भर लेता है। 

संपूर्णा और आलोक दौनो की सांसे ही तेज चलने लगती है। आलोक संपूर्णा को अपने गौद मे उठा लेता है और संपूर्णा को उसी जगह पर ले कर जाता है जहां पर उन दौनो का संम्भोग अधुरा रह गया था। 

आलोक संपूर्णा के कान मे कहता है--

> आज मैं तुम्हे चरम सुख दे कर ही यहां से जाउगां। 

संपूर्णा कहती है --- 

> मैं तुम्हे जाने दुगां तब ना तुम यहां से जाओगे । 

रात के करीब तीन बज रहा था । एकांश अपनी गहरी निंद मे सो रहा था। तभी एकांश दैखता है के वर्षाली को किसीने कैद करके रखा है। वर्षाली के सरीर पर काफी चोंटे लगी हुई थी जिसमे से खुन बह रहा था। वर्षाली दर्द से कराहते हुए कहती है--

> एकांश जी । आप कहां हो एकांश जी। मुझे यहां से निकालो एकांश जी । आह..! बहोत दर्द हो रही है। मुझे इस कैद से निकालो एकांश जी । ये .. ये .. लोग मुझे मार देगें एकांश जी।

 तभी एक भयानक राक्षस जैसा एक आदमी आता है और वर्षाली को एक कोड़े से मारता है जिससे वर्षाली की चिख निकल जाती है। तभी एकांश की निंद भी खुल जाती है। एकांश सपने मे वर्षाली को तड़पता दैख कर बहुत घबरा जाता है। 

उसे लगने लगता है । के चेतन ही कुम्भन था और वह यहां वर्षाली के बारे मे जानने आया था। जिसके बाद वह वर्षाली को पकड़कर ले गया है। एकांश बहुत घबराया हुआ था। उसका पुरा सरीर पसीने से भिंगा हुआ था।


एकांश अपनी माथे की पसीने को पोछता है। और कहता है--

> ये ये कैसा सपना था । कहीं वर्षाली सच मे तो कोई मुसीबत मे नही है। नही नही एेसा नही हो सकता। मुझे अभी वर्षाली के पास जाकर दैखना चाहिए। 

इतना बोलकर एकांश बाइक स्टार्ट करता है और रात को सुंदरवन की और चला जाता है। इतनी रात होने पर भी एकांश बाइक को भगा रहा था। एकांश को किसी बात का डर नही था । ना अंधेरे का । स्पीड का और ना ही कुंभ्मन का डर था , वो वर्षाली के 
ख्यालो मे ऐसे खो गया था के एकांश के दिमाग से कुम्भन का भय निकल गया था। 

उसके मन मे अगर किसी का डर था तो वो थी वर्षाली की सुरक्षा का। ये मानव अब बहोत ज्यादा चालाक और बुध्दिमान हो गया है। इस तरह की यंत्र का निर्माण करना सहज नही है। इतना बोलकर मातंक और त्रिजला वर्शाली और एकांश के पिछे चला जाता है। 

एकाश के दिमाग मे सिर्फ एक ही बात था के कही वो सपना सच ना हो जाए। उधर आलोक संपूर्णा के गुलाबी होंट में अपने होट को रख देता है। और संपूर्णा और आलोक दौनो ही एक दुसरे को प्यार करने लगता है।

 संपूर्णा एक झटके से आलोक को निचे गिरा देती है और उसके उपर आकर आलोक के होट को चुमने लगती है। संपूर्णा अपने नाईट ड्रेस को उतार देती है। अब संपूर्णा आलोक के उपर सिर्फ अपने दौ अंतर वस्त्र मे थी। आलोक आंखे फाड़ के संपूर्णा की खूबसुरती को दैख रहा था। 

संपूर्णा कहती है--

> उस दिन दैखकर मन नही भरा था क्या ? 

आलोक कहता है--

> तुम्हे ऐसे दैखने के लिए मेरा मन कभी भी नही 
भरेगा।

 संपूर्णा एक हल्की मुस्कान देती है और सरमाने लगती है। संपूर्णा से अब रहा नही जाता है और वह जल्दी जल्दी आलोक के कपड़े उतारने लगती है। जिससे आलोक के शर्ट के दौ बटन टुट जाता है। आलोक कहता है--

> धीरे संपूर्णा। 

संपूर्णा कहती है--

> नही मुझे बस करने दो ताकी अब कोई डिसटर्ब ना 
करे।

 इतना बोलकर संपूर्णा आलोक के सिने को चुमने लगती है। आलोक के मुह से सिसकियां निकलने लगता है। संपूर्णा आलोक को चुमते चुमते उसकी पेंट को उतार देता है। और उसके अंतर वस्त्र को भी उतार देती है। 

आलोक अब संपूर्णा के आगे पुरी तरह से नग्न था। संपूर्णा आलोक को निर्वस्त्र दैखकर और भी कामुक हो जाती है और आलोक को सहलाने लगती है । जिससे आलोक तड़प उठता है। और सिसकियां भरने लगता है। संपूर्णा आलोक के उपर बैठ जाती है और अपनी वक्ष से अंतर वस्त्र को खोल देती है।

 आलोक के सामने अब संपूर्णा का गौरा वक्ष पुरी तरह से नग्न था। जिसे आलोक आंखे फाड़ कर दैख रहा था। आलोक अपने दौनो हाथ से संपूर्णा के वक्ष तो सहलाने लगता है। जिससे संपूर्णा लम्बी लम्बी सिसकियां लेने लगती है। 

अब आलोक संपूर्णा को निचे सुला देता है। और उसके होट को चुमते चुंमते उसके वक्ष तक पहूंच जाता है। संपूर्णा का वक्ष बड़े बड़े और गौरे रंग के थे। आलोक संपूर्णा को चुमते चुमते नाभी को चुमने लतगा है। संपूर्णा अब पुरी तरह से संम्भोग करने के लिए तैयार हो चुकी थी। और तड़प रही थी । 

उसके मुह से सिर्फ सिसकियां निकल रही थी। आलोक भी अब काम वासना मे लिन हो गया था और संपूर्णा के साथ संम्भोग करना चाहता था। आलोक संपूर्णा को कमर के निचे का अंतर वस्त्र भी खोल देता है। जिससे संपूर्णा अलोक के सामने पुरी तरह से नग्न हो जाती है और संपूर्णा सरमाते हूए अपने सरीर को दौनो हाथ से ढकने की कोशिस करती है। 

आलोक संपूर्णा के हाथ को उसके सरीर से हटा देता है और उसे चुमने लगता है। दौनो की सांसे तेज चल रही थी । आलोक का हाथ संपूर्णा के कमर के पास था जिससे संपूर्णा की सांसे और गरम हो जाती है। अब आलोक संपूर्णा के उपर आ जाता है और संपूर्णा के होंट मे एक किस करता है और उसके साथ संम्भोग करने लगता है। संपूर्णा आलोक को कसके पकड़ लेती है । संपूर्णा का हाथ आलोक के पिट पर था और आलोक अपने दोनो हाथो से संपूर्णा को कस के अपने बदन पर सटा कर रखा था और संम्भोग कर रहा था। 

संपूर्णा के मुह से अब हल्की हल्की सिसकियां की आवाज आने लगती है। अब संपूर्णा आलोक को निचे लिटा देती है और उसके उपर आ जाती है और संपूर्णा संम्भोग करने लगती है। संपूर्णा के उपर आने से आलोक को संम्भोग करने मे और तेजी आ जाती आलोक अपना हाथ संपूर्णा के दोनो वक्षो पर रख देता है।

जिससे संपूर्णा और तेज गती से संम्भोग करने लगती है। दोनो ही संम्भोग मे इतना खो गया था के दोनो के मुह से सिर्फ सिसकियां ही निकल रही थी जो उस माहोल को मदहोश कर रहा था। दोनो के बदन के गरमी से पूरा माहोल गरम हो जाता है । दौनो का शरीर एक दुसरे से चिपका हुआ था और दौनो ही पसीने से पुरी तरह भीगं चुका था। संपूर्णा की वक्ष आलोक के सरीर पर सटा था। दैखते ही दैखते दोनो की रफतार और तैज हो जाती है और संपूर्णा की मुह से अब हल्की हल्की चिखे भी आने लगती है। आलोक और संपूर्णा अब दोनो ही अपने चरम सिमा पर था। आलोक झट से संपूर्णा को अपने निचे कर लेता है और संम्भोग करने लगता है। 

तभी संपूर्णा आलोक से धिरे से कहती है--

> मैं अब संतुष्ट होने वाली हूँ ।


 To be continue....955