’’ हालात से समझौता सभी करते हैं, मगर पापा, मैं हालात से कुछ वर्ष और लड़ना चाहता हूं, जुझना चाहता हूं मुश्किलों से। हमको मालूम है कि आप जो भी कह रहे हैं अपने अनुभव के आधार पर ही कह रहे हैं, मैं भी उस दुःख-दर्द को अनुभव करना चाहता हूं और मैं विश्वास दिलाता हूं कि मैं हारूंगा नहीं, बल्कि जीत के ही दिखाउंगा। ’’ हरि प्रसाद जी भौचक्के होकर अपने पुत्र विवेक की बातें सुन रहे थे। हरि प्रसाद जी ने गर्दन पीछे घुमाई तो देखा कि सुमित्रा हाथ में चाय का प्याला लिए खड़ी है।
हरि प्रसाद जी ने अपना चश्मा हाथ में लेकर विवेक से कहा ’’ तो तुमने ठोकड़ खाना, भटकना क्या होता है, कैसा होता है, अनुभव करने की ठान ली है, तो जाओ, खाओ धक्के।’’
हरि प्रसाद जी ने सुमित्रा से कहा ’’ सुन रही हो, अपने शाहजादे की बकवास? बताए गए रास्ते पे नहीं चलेंगे, बल्कि टेढ़े, अन्जाने रास्ते पर चलेंगे। ’’
’’ मैं बात................। ’’ इससे पहले कि सुमित्रा अपनी बात खत्म करती, हरि प्रसाद जी सुमित्रा का हाथ पकड़कर दुसरे कमरे में ले गए।
टेबल पर रखे चाय के कप से धुआं अब भी निकल रहा था और हरि प्रसाद जी की आग उगलती, बिन धुआं वाली आँखें एकटक हो चाय के कप को देख रही थी। कुछ समय के बाद विवेक उस कमरे में आया तो देखा कि पापा चादर ओढ़ कर सो रहे हैं। विवेक ने ठंडी हो चुकी चाय को एक झटके में गटक कर अपने तरफ देख रही माँ की ममतामयी आँखों में झांक कर फीकी हंसी बिखेरी और कमरे से बाहर निकल गया।
आज जीवन में पहली बार हुआ कि जब विवेक अड्डाबाजी करने वाली जगह पर गया तो जरूर मगर दोस्तों से अलग हटकर अकेला बैठ गया। सोचने की मुद्रा में ध्यानमग्न हो गया। विवेक की नज़र कभी खुले आकाश की तरफ तो कभी हल्की मंद-मंद बह रही हवा के द्वारा हिलते पत्तों पर गई। आज विवेक ने ठान लिया था कि चाहे स्थिति कितनी भी प्रतिकुल हो चाहे मन हजार जगह भटके, चाहे आज कोई सही निर्णय नहीं ले पाउं, मगर सोचना नहीं छोड़ुंगा और किसी न किसी नतीजे पर पहूंच ही जाउंगा।
विवेक को रह रह कर गप्पू की बातें याद आने लगी और वो गप्पू की कही गई बातों में खो गया।
गप्पूु ने अपनी हंसी बीच में ही रोकते हुए विवेक से कहा था ’’ जितना हंसना है, उतना जी भर कर हंस लो, लेकिन ये बात हम दोनों के बीच ही रहनी चाहिए, किसी दुसरे को पता नहीं चलना चाहिए। ’’
विवेक ने अपनी ंहंसी बीच में ही रोक कर कहा था ’’ अच्छा बाबा, किसी को भी पता नहीं चलेगा, तु विश्वास कर। ’’ विवेक एक बार फिर खिलखिला कर हंस पड़ा।
गप्पू ने कहा ’’ ये तो हुई आनंद को उठक-बैठक कराने वाली बात, अब तुमको बताता हुं कि उसका चक्कर किसके साथ चल रहा है, चक्कर क्या, वही उसके पीछे है, लड़की तो उसको घास भी नहीं डाल रही है।
गप्पू की कही गई बातों के याद से बाहर आते ही विवेक ने ठंडी सांस भर के ओफ्फ की आवाज के साथ ’न’ में सिर हिलाने के बाद दोनों हाथों से अपने दायीं-बायीं तरफ की गाल पर हल्का तमाचा जड़ा और फिर सोचने में व्यस्त हो गया।
थोड़ी देर ध्यान से सोचने के बाद विवके को एहसास हुआ कि कोई आवाज लगा रहा है, पता है गप्पू की ही आवाज है।
विवेक ने पीछे मुड़कर देखा कि गप्पू के साथ-साथ उसके सारे दोस्त ताश खेलने में व्यस्त हैं, उनलोगों को एहसास ही नहीं हो रहा है कि थोड़ी ही दुर पर विवेक उदास-निराश और अकेला बैठा है।
विवेक ने भी अपनी गर्दन सीधी करके अपने मन में कहा ’’ ठीक ही तो है, मेरे दोस्त लोग ऐसा क्यों करेंगे, जब्कि मैंने उनलोगांे को साफ-साफ कह दिया है कि मैं अकेला रहकर अपने बारे में कुछ सोचना चाहता हूं। ’’
विवेक ने सोचना शुरू किया तो उसके मन में आया कि उतना देर मैंने सोचा क्या, खाली समय बर्बाद किया, खाली गप्पू और आनंद की बात। चलो जो हुआ सो अच्छा हुआ। अब चाहे कुछ भी हो, इधर-उधर की फालतू फिजूल की बातें नहीं सोचूंगा, अब अपना ध्यान भटकने ही नहीं दुगा।
विवेक की अंर्तआत्मा ने झकझोरा तब उसको किसी अच्छे सोच वाले व्यक्ति की कही गई बात याद आयी कि संघर्ष और परिश्रम में जमीन-आसमान का अंतर है। तूम संघर्ष की सोचते हो और माध्यम का तुमको पता नहीं। भटकना क्या और ठोकर खाना क्यों।
विवेक को आभाष हुआ कि ठोकर से सबक ले लेना ही ठोकर पर असली विजय है। विवेक को यह भी एहसास हुआ कि पापा ठीक ही कह रहे हैं कि बारहवीं की परीक्षा एक बार फिर से देनी चाहिए।
घर पहूंचकर विवेक अपने पिता से ढीठाई से सामना न कर, नज़र झुका कर खुद को कमरे में बंद किया और अपनी पढ़ाई में लीन हो गया।
समाप्त