The silent God and the burning devotee in Hindi Spiritual Stories by Pradeep sharma books and stories PDF | मौन ईश्वर और जलता हुआ भक्त

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मौन ईश्वर और जलता हुआ भक्त


​विंध्याचल के घने जंगलों के बीच एक छोटी सी कुटिया थी, जहाँ माधवन नाम का एक युवक रहता था। माधवन की भक्ति ऐसी थी कि लोग कहते थे उसके 'नारायण-नारायण' पुकारने पर पक्षी भी चहकना बंद कर देते थे। वह निष्पाप था, कोमल था। पर नियति के गर्भ में उसके पिछले जन्मों का एक ऐसा भयानक ऋण छिपा था, जिसका हिसाब अब शुरू होना था।

​एक रात, जब माधवन ध्यान में लीन था, पहाड़ी धंसी और उसके घर पर पत्थर गिर पड़े। उसकी बूढ़ी माँ और छोटी बहन, जो उसकी पूरी दुनिया थे, उसकी आँखों के सामने मलबे में दब गए। माधवन पागलों की तरह पत्थर हटाता रहा। उसके नाखून उखड़ गए, उँगलियों से खून की धारा बहने लगी। वह चिल्लाया— "नारायण! बचा लो! मेरी माँ को सांस लेने दो प्रभु!"

​लेकिन आकाश से केवल कड़कती बिजली की आवाज़ आई। मंदिर में बैठे पत्थर के नारायण मौन थे। उसकी माँ ने उसके हाथ को आखिरी बार छुआ और ठंडी पड़ गई।

​भाग्य यहीं नहीं रुका। उसी रात डाकुओं का एक दल वहां से गुजरा। उन्होंने समझा कि माधवन ने कोई खजाना छिपा रखा है। उन्होंने उसे पकड़ा और एक ऊँचे पेड़ से उल्टा लटका दिया।

​डाकुओं के सरदार ने उसकी पीठ पर जलते हुए कोड़े बरसाए। खाल उधड़ गई, खून की छींटे नारायण की उस छोटी सी मूर्ति पर गिरे जो माधवन ने सीने से लगा रखी थी। वह हर कोड़े पर चीखता— "मेरे नाथ! कहाँ हो? क्या तुम्हें मेरी आवाज़ सुनाई नहीं दे रही? मैं तुम्हारा ही तो हूँ!"

​डाकुओं ने उसके शरीर पर गरम तेल डाल दिया। वह दर्द से तड़पा, उसकी आँखों के आगे अंधेरा छाने लगा। उसने चीखकर कहा— "प्रभु! क्या तुम बहरे हो गए हो? क्या तुम्हारी करुणा मर गई है?"

​पर मंदिर का वह पत्थर वैसे ही मुस्कुराता रहा। न बिजली कड़की, न कोई चमत्कार हुआ।

​डाकुओं ने उसे मरा हुआ समझकर पास के एक धधकते हुए कोयले के ढेर पर फेंक दिया। माधवन का शरीर जलने लगा। मांस के जलने की गंध हवा में फैल गई। दर्द इतना असहनीय था कि उसकी चीख भी अब कंठ में फंस गई थी।

​उसे अपने पिछले जन्म का एक धुंधला सा दृश्य दिखा— एक पूर्व जन्म में उसने एक निर्दोष जीव को इसी तरह तड़पा कर मारा था। उसे समझ आया कि यह 'जुल्म' भगवान नहीं कर रहे, बल्कि उसके अपने ही कर्मों का हिसाब है। लेकिन भगवान की खामोशी उसे तोड़ रही थी।

​उसने काँपते हुए, झुलसे हुए होंठों से आखिरी बार ऊपर देखा। उसकी आँखों से खून मिश्रित आँसू बहे। उसने अब 'बचाने' की प्रार्थना छोड़ दी। उसने मरणासन्न अवस्था में कहा:

​"हे गोविंद! यदि मेरी इस तड़प में ही आपको सुख मिलता है, तो मुझे यह तड़प ही स्वीकार है। यदि आप बहरे बनकर खुश हैं, तो मैं मौन होकर खुश हूँ। अब मत बचाना मुझे... बस इतनी कृपा करना कि जब यह देह राख हो जाए, तो मेरी राख आपके चरणों की धूल बन जाए। मैं आपका था, आपका हूँ, और आपका ही रहूँगा... चाहे आप पत्थर के बने रहो।"

​उसने अपनी आँखें मूँद लीं। उसने खुद को पूरी तरह उस 'मौन' के हवाले कर दिया। वह 'आत्म-समर्पण' की वह चरम सीमा थी जहाँ भक्त और भगवान के बीच की दीवार गिर गई,

​जैसे ही माधवन ने अपना अस्तित्व 'शून्य' किया, अचानक पूरे जंगल में चंदन की खुशबू फैल गई। वह धधकते हुए कोयले बर्फ़ की तरह ठंडे पड़ गए।

​एक दिव्य हाथ ने माधवन को उस राख से उठा लिया। माधवन ने आँखें खोलीं, तो देखा—वही नारायण, जिन्हें वह अब तक पत्थर समझ रहा था, उसे अपनी गोद में लेकर रो रहे थे। भगवान की आँखों से गिरते आँसू माधवन के घावों पर पड़ते ही उन्हें ऐसे भर रहे थे जैसे कभी कुछ हुआ ही न हो।

​माधवन ने सिसकते हुए पूछा— "प्रभु! आप तब क्यों नहीं आए जब मेरी माँ मर रही थी? तब क्यों नहीं आए जब मेरी खाल उधड़ी जा रही थी?"

​भगवान ने उसे हृदय से लगा लिया और भारी स्वर में बोले— "पुत्र! जब तू चीख रहा था, तो मैं तुझसे दूर नहीं था। तेरे शरीर पर पड़ने वाला हर कोड़ा पहले मेरे सीने पर पड़ रहा था। पर तेरे प्रारब्ध (कर्म) का हिसाब काटना ज़रूरी था ताकि तू सदा के लिए मुझमें मिल सके। मैं बहरा नहीं था... मैं बस तेरे 'पूर्ण समर्पण' की प्रतीक्षा कर रहा था। देख, तेरे घाव तो भर गए, पर मेरे दिल पर लगे ये जख्म कभी नहीं भरेंगे, क्योंकि ये मुझे याद दिलाएंगे कि मेरे एक भक्त ने मेरे लिए क्या सहा है।"

​माधवन के पास अब शब्द नहीं थे, केवल आँखों से बहते आंसू थे।

​उपसंहार: यह कहानी हमें सिखाती है कि जब भगवान खामोश हों, तो समझ लेना कि वह आपकी सबसे कठिन परीक्षा ले रहे हैं ताकि आपको खुद से जोड़ सकें।