Trikon - 9 in Hindi Crime Stories by Varun Vilom books and stories PDF | Trikon - एक्शन सीरीज़ - अध्याय 9 — सौदा

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Trikon - एक्शन सीरीज़ - अध्याय 9 — सौदा

वर्षा पेन को मेज़ पर टिक-टिक कर रही थी।

एक ही रिदम।

नसों में उतरती हुई।

सौना की बात कहकर अपराजिता लढवान न जाने कहाँ चली गई थी।

कमरे में एयर-कंडीशनिंग ठंडी थी, पर वर्षा की हथेलियाँ पसीने से भीगी थीं।

तभी दरवाज़ा खुला।

वही नौकरानी।

“आइए वर्षा दीदी,” उसने सिर झुकाकर कहा।

“मैडम ने आपको बुलाया है।”

वर्षा एक पल ठिठकी।

फिर उठी।

चल पड़ी।

लंबे गलियारों से गुज़रते हुए, कई बंद दरवाज़े पार करके, वे एक पॉलिश्ड लकड़ी के भारी दरवाज़े के सामने रुकीं।

अंदर से हल्का-सा धुआँ निकल रहा था।

नौकरानी ने दरवाज़ा खोला।

भीतर जाते ही एक सफ़ेद बाथिंग गाउन उसके हाथ में थमा दिया।

“मैडम अंदर हैं।

कपड़े यहीं उतार दीजिए।

सिर्फ़ ये गाउन पहनिए।”

नौकरानी चली गई।

अंदर का बाथरूम छोटा था।

सामने बड़ा शीशा।

पीली रोशनी।

भाप शीशे पर जमी हुई।

वर्षा ने दरवाज़ा बंद किया।

कुछ सेकंड यूँ ही खड़ी रही।

कुर्ते के बटन खोले।

कुर्ता सर के ऊपर से उतार दिया।

आईने में उसका ऊपरी धड़ दिखाई दिया।

सीने के बीचों-बीच — बरसों पुराना दाग़।

हल्का सा उभरा हुआ।

कभी पूरी तरह मिटा नहीं।

उसने उँगली से उसे छुआ।

“यही है,” उसने सोचा।

“यही मेरी कहानी है।”

आईने में उसकी आँखें ठहरी हुई थीं —

न आँसू,

न डर।

फिर विचार बदला।

“पर इस अपराजिता की कहानी क्या है?”

वो हल्का-सा मुस्कुराई।

“अगर ये सिर्फ़ माँ होती…

तो डरती।”

शीशे पर ऊँगली से लकीरें खींची।

“ये सिर्फ माँ नहीं।

ये राजनेता है।

इसके साथ पार्टी है।

कुर्सी है।

पुलिस है।

इंडस्ट्री है।

शायद अंडरवर्ल्ड भी।”

एक लंबी साँस।

“ये केस… जितना सोचा था उससे बहुत बड़ा है।”

सारी लकीरें मिटा दी, और आईने को साफ़ कर दिया।

आईने में उसने अपना चेहरा देखा —

साफ़, जाना-पहचाना,

टीवी का चेहरा।

“कपड़े उतरवा रही है…”

वो सोचती रही।

“पर मेरा चेहरा ही काफ़ी है।”

बाहर से दस्तक हुई।

नौकरानी।

“आप तैयार हैं, दीदी?”

“हाँ, एक मिनट।”

वर्षा ने जल्दी से बाकी कपड़े उतारे।

बाथ-गाउन पहना।

मोबाइल, पर्स — सब कपड़ों के साथ वहीं छोड़ दिए।

दरवाज़े की ओर बढ़ते हुए उसने खुद से कहा—

“घबराना मत।

बस कहानी को कंट्रोल करना है।”

और बाहर निकल गई।

अगला दरवाज़ा खोला।

तेज़ गर्म हवा का झोंका — जैसे पूरे शरीर में सुइयाँ चुभी हों, पर आराम देने वाली।

सॉना।

एक तरफ़ पत्थरों से भरा बड़ा टब — अंगारों-से काले।

दूसरी तरफ़ लकड़ी की बेंचें।

धुआँ हल्का-हल्का तैर रहा था।

तभी खाँसी की धीमी आवाज़ आई।

धुआँ थोड़ा छँटा।

सामने — अपराजिता लढवान।

वैसा ही सफ़ेद गाउन।

खुले बाल।

कोई चश्मा नहीं।

हाथ में ग्रीन टी का कप।

“घबराओ मत, बेटी,” वह बोली।

“आओ। बैठो।”

वर्षा चुपचाप बैठ गई।

उसके दिमाग़ में बस एक बात घूम रही थी —

उधर उसका बेटा बंधा था… और यहाँ यह औरत सॉना ले रही थी।

अपराजिता मुस्कुराई।

“पूरे दो करोड़ लगे थे जर्मन कॉन्ट्रैक्टर के ये सब सेटअप बनाने के लिए,” उसने सहज स्वर में कहा, “पर शायद एक-दो बार ही इस्तेमाल किया।”

वर्षा का स्वर सख़्त था।

“आपके बेटे के वीडियो मीडिया में जाएंगे।

टीवी पे।

अख़बारों में।

ऑनलाइन।

हर जगह उसकी करतूतें दिखाई देंगी।”

अपराजिता की मुस्कान गायब हो गई।

वह उठी।

धीरे-धीरे गाउन की गाँठ खोली।

गाउन नीचे गिरा।

उसका शरीर —

बिना किसी आडंबर के।

पुराने निशानों से भरा।

खरोंचें।

दबाव के दाग।

“अब तुम्हारी बारी, बेटा।”

वर्षा के जबड़े कसे।

वह भी उठी।

गाउन की पट्टी खोली।

उतारकर नीचे रख दिया।

नग्न थी।

बिना झिझक, हाथ फैलाए।

“देख लीजिए।

कोई वायर नहीं।”

अपराजिता ने एक नज़र डाली।

हल्की मुस्कान।

“अब ठीक से बात होगी।” अपराजिता बोलीं और गाउन उठाने को झुकीं।

उसी पल वर्षा की नज़र एक क्षण को उनके बदन पर ठिठकी।

काली स्याही की एक छोटी-सी आकृति।

फिर वह झुकाव और कपड़े की सिलवटों में ओझल हो गई।

अपराजिता ने गाउन पहन लिया।

फिर वर्षा की तरफ़ देखा।

“तुम नहीं पहनोगी?”

वर्षा ने गाउन की तरफ़ देखा भी नहीं।

“मैं ऐसे ही ठीक हूँ।”

अपराजिता हल्का-सा मुस्कराईं।

“अच्छा। तुम्हारी मर्ज़ी।”

वर्षा बेंच पर बैठ गई।

नीचे की गर्माहट अब भी तेज़ थी,

पर उसके भीतर का डर उतर चुका था।

उसने टाँगें ज़रा-सी ढीली छोड़ दीं और पीठ बेंच से टिका दी।

कुछ पल भाप के बीच

सिर्फ़ दोनों की साँसें थीं।

“अब बोलो,” अपराजिता ने कहा।

“वीडियो डिलीट करने के लिए

कितने रुपये चाहिए?”

वर्षा भड़क उठी।

“मैं बिकाऊ नहीं हूँ।

मुझे इंसाफ़ चाहिए।”

अपराजिता उठी।

पत्थरों पर पानी डाला।

तेज़ भाप उठी।

बिना मुड़े बोली —

“अगर सच में इंसाफ़ चाहिए होता, तो ये वीडियो अब तक शाम की न्यूज़ में चल चुका होता।”

कुछ सेकंड चुप्पी।

वर्षा ने जवाब नहीं दिया।

बस नाख़ूनों को देखा।

फिर धीरे से बोली — “मुझे इंसाफ़ नहीं चाहिए।”

अब उसने आँख उठाई।

“मुझे चाहिए — पाँच करोड़ रुपये।

और अगले विधानसभा चुनाव में पार्टी का टिकट।”

सन्नाटा।

भाप के बीच अपराजिता की हल्की, ठंडी मुस्कान तैर गई।

“बेटी अगर मैं तुम्हारे टुकड़े-टुकड़े करके यहीं इसी सॉना के नीचे गड़वा दूँ तो?”

वर्षा के गले में कुछ अटका।

पर आवाज़ नहीं काँपी।

“लापरवाह नहीं हूँ, मैम।” उसने शांत स्वर में कहा।

“वीडियो रिमोट सर्वर पर है।

हर कुछ घंटे में लॉग-इन न करूँ तो ऑटो-ट्रिगर हो जाएगा।

सबको ईमेल मिल जाएगा।”

अपराजिता ने हथेलियाँ रगड़ीं।

सोचते हुए, “पैसे चाहिए तो पाँच नहीं, पंद्रह करोड़ ले लो,” उसने ठंडे स्वर में कहा।

“पर पार्टी टिकट का वादा नहीं कर सकती।”

वर्षा ने सिर उठाया।

“मुझे पैसे से ज़्यादा… जगह चाहिए।

अपनी खुद की जगह।”

रुकी। मन ही मन हज़ारों गणनाएं चल रहीं थीं।

“और अगर मैं कहूँ — कि न सिर्फ़ वीडियो डिलीट कर दूँगी, बल्कि आपके बेटे को क्लीन चिट दिलाने का तरीका भी है मेरे पास?”

अपराजिता के चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान तैर गई।

“तू दिखने में जितनी भोली है,” वह धीरे से बोली, “अंदर से उतनी ही कमीनी है।”

वर्षा खिलखिलाकर हँसी।

“अंदर-बाहर — अब आप सब देख चुकी हैं, मैडम।”

अपराजिता उठ खड़ी हुई। “राजनीति का खेल खेल लेगी?”

“एक बार मैदान में उतर जाऊँ… फिर खेल समझ लूँगी।” वर्षा ने सपाट शब्दों में कहा।

सौना का दरवाज़ा खुला।

भाप पीछे छूटती गई।

दोनों बाहर निकलीं।

अब फिर से साड़ी, स्वेटर, सलीके का मुखौटा।

और वर्षा— संयत, संतुलित।

ड्रॉइंग रूम में हल्की रोशनी थी।

नौकरानी ट्रे में ग्रीन टी लेकर आई।

वर्षा ने कप की तरफ़ देखा।

हल्की मुस्कान।

“अब तो डील हो गई,” उसने धीमे कहा,

“अब भी ग्रीन टी ही पिलाएँगी?”

अपराजिता हँसी।

वो वाली हँसी— जो मंच पर नहीं आती।

“अरे ओ,” उसने नौकरानी की तरफ़ देखे बिना कहा,

“जा… वो व्हिस्की की बोतल ले आ।

जो राज बाबा विदेश से लाया था।

और साथ में बर्फ।”

नौकरानी चुपचाप मुड़ी।

कुछ देर बाद— क्रिस्टल के दो ग्लास।

भूरी तरल रोशनी।

बर्फ की खनखनाहट।

अपराजिता ने बोतल से खुद डाला।

पहले वर्षा के ग्लास में।

फिर अपने में।

दोनों की नज़रें मिलीं।

ग्लास टकराए, और

दोनों ने एक साथ घूँट भरा।

और उसी घूँट के साथ एक सौदा पक्का हो चुका था।

उधर पुलिस वैन जंगल की सड़कों पर दौड़ती चली जा रही थी।

वैन के भीतर हँसी गूँज रही थी।

फोल्डिंग टेबल पर समोसे।

काग़ज़ के गिलासों में चाय छलक रही थी।

“अरे फौजी, तू तो हीरो निकला,” एक हवलदार हँसा,

“उस मुस्टंडे की गर्दन ही तोड़ डाली।”

जोगी हल्का मुस्कुराया।

अनीश सिगरेट सुलगा रहा था।

संभावित सिंह सामने बैठा था।

“सर, अकादमी में आपका नाम आज भी लिया जाता है,” वह बोला।

अनीश हँसा।

“बोल तो ऐसे रहा है जैसे मैं पौराणिक इतिहास बन गया हूँ।”

सब ज़ोर से हँसे।

वैन घने जंगल के रास्ते से गुज़र रही थी।

ड्राइवर स्पीड बढ़ाए था —

जल्दी स्टेशन पहुँच जाना चाहता था।

तभी— संभावित के फोन की मैसेज ट्यून बजी।

एक छोटी-सी आवाज़।

पर जैसे किसी ने हवा रोक दी हो।

संभावित ने हँसते हुए फोन निकाला।

स्क्रीन देखी।

बस एक पल।

और उसी पल में

उसके चेहरे का रंग उतर गया।

अनीश ने देख लिया।

बाक़ी लोग अब भी हँस रहे थे।

संभावित ने धीरे से चाय का कप टेबल पर रखा।

बहुत संभलकर।

उसका दायाँ हाथ धीरे-धीरे कमर की तरफ़ गया।

सर्विस गन।

बस इतना ही काफ़ी था।

अगले ही सेकंड— अनीश ने उबलती चाय सीधे संभावित के चेहरे पर दे मारी।

चीख।

सुलगती चमड़ी की गंध।

उसी पल

अनीश ने बगल वाले हवलदार के पेट में घूँसा जड़ दिया।

वैन झटके से डोली।

“अबे—!”

गालियाँ।

धक्का-मुक्की।

जोगी उठ चुका था।

उसने दो हवलदारों को बाँहों में जकड़ लिया — लोहे का शिकंजा।

अनीश संभावित पर झपटा।

दोनों की उँगलियाँ एक ही रिवॉल्वर पर।

खींचातानी।

“सर… पागल हो गए हैं आप!” संभावित चीखा।

“ऊपर से मैसेज आ गया न?” अनीश गरजा।

उधर— एक हवलदार पीछे से जोगी पर झपटा।

राइफल की बट।

ठक।

जोगी की आँखें घूम गईं।

उसने पकड़ ढीली की।

घुटनों पर गिरा।

तीनों उस पर टूट पड़े।

लातें।

घूँसे।

वैन बेकाबू डोल रही थी।

अंदर— अनीश और संभावित की पकड़ फिसली।

धाँय!

गोली चली।

क्षण भर सन्नाटा।

अनीश का पुराना साथी सीने पर हाथ रखे गिर पड़ा।

खून फैल गया।

“साले!” अनीश दहाड़ा।

फिर— एक के बाद एक गोलियाँ।

संघर्ष।

चीखें।

उसी अफरातफरी में

एक गोली आगे जा लगी।

ड्राइवर की गर्दन पीछे झटकी।

स्टीयरिंग छूटा।

वैन डगमगाई।

“सम्भाल—!”

बहुत देर हो चुकी थी।

वैन डिवाइडर से टकराई।

धड़ाम!

एक पल हवा में।

फिर पलटी।

फिर दूसरी।

लोहे की चादरें मुढ़ती हुईं।

काँच बिखरता हुआ।

आख़िरकार वैन सड़क किनारे पेड़ों से जा टकराई।

धूल।

धुआँ।

सन्नाटा।

पीछे फॉलो करती पुलिस जीप तेज़ी से आगे निकल गई।

कुछ सौ मीटर आगे जाकर रुकी और यु-टर्न लेने लगी।

वैन के भीतर— कराहें।

टूटी साँसें।

खून की गंध।

अनीश ने लात मारकर पीछे का दरवाज़ा खोला।

वह बाहर गिरा।

कपड़े फटे।

चेहरा खून से लथपथ।

पीछे— लाशों और दबे शरीरों का ढेर।

दूर से लौटती पुलिस जीप की हेडलाइट्स।

अनीश ने एक सेकंड भी नहीं गंवाया।

वह सीधे जंगल की तरफ़ भागा।

झाड़ियों में कूद गया।

अँधेरा उसे निगल गया।

पीछे सायरन फिर बजने लगे।

और इस बार— कोई किसी का शागिर्द नहीं था।

कुछ देर बाद

संभावित सिंह पुलिस जीप के टायर से सटा बैठा था।

चेहरा आधा जला हुआ।

गीला टॉवल दबाए।

पास में कतार से बिछी लाशें।

एक ओर — जोगी।

आँखें बंद।

चेहरे पर सूजा हुआ गाल।

हाथों में मोटी लोहे की हथकड़ी।

संभावित का फोन स्पीकर पर था।

“मैडम,” वह बोला, “कोई नहीं बचा।

सिर्फ़ ये जोगिंदर सांगवान ज़िंदा है।”

अनीश के भाग जाने की बात छुपा गया।

फिर बोला — “कहिए तो इसे भी लाशों के साथ दफ़ना दें?”

फोन के दूसरी तरफ़ हल्की हँसी।

अपराजिता की आवाज़।

“नहीं बेटे। इस लड़के जोगी को ज़िंदा रखो। उसकी हमें ज़रूरत है।”

संभावित ने गीला टॉवल दबाया।

दर्द से दाँत भींचे।

“मेरा तो चेहरा पूरा जल गया है, मैडम।”

अपराजिता हँसी।

“अरे, तेरी प्लास्टिक सर्जरी स्विट्ज़रलैंड से करवाऊँगी।

घबरा मत। 

और सुना है बहू को लेकर कहीं गया नहीं अभी तक।

तुम दोनों का हनीमून भी मेरे खर्चे पर होगा।”

संभावित हल्का मुस्कुराया।

“जी, मैडम।”

“शाबाश बेटे,” अपराजिता बोली, “अब मेरी बात ध्यान से सुन…”

फोन पर वह बोलती रही।

संभावित “जी मैडम” कहता रहा।

“बाकी हमने भी अपनी तैयारी कर ली है। तुम अपना काम ठीक से करना।”

अपराजिता ने बात ख़त्म की।

पास बैठा जोगी बेसुध पड़ा था।

और जो आगे होने वाला था — उसकी कल्पना अभी किसी ने नहीं की थी।


— जारी —

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